सरोमाहात्म्ये 22 ब्रह्मोत्पत्ति वर्णन, सांनिहत्य सरोत्पत्ति सप्तर्पि एवं बालखिल्यों की उत्पत्ति एव तपश्चर्या, शिव द्वारा ऋषियों के धर्मज्ञान की परिक्षा ऋषियों द्वारा शिव के लिङ्ग का पातन, ब्रह्मा द्वारा ऋषियों को ज्ञान का उपदेश

लोमहर्पण ने कहा-हे समस्त मुनियो! आप लोग महान् वामनपुराण को सुनें जिसे सुनकर मनुष्य वामन की कृपा से मुक्ति को प्राप्त करता है। (३)

ब्रह्माके पुत्र महात्मा वालसिल्यादि ऋपियों के साथ सनत्कुमार स्थाणु बट के पास बैठे हुए थे। (४)

महर्पि मार्कण्डेय ने उनके पास नम्रतापूर्वक जाकर सरोवर के माहात्म्य, उसके विस्तार और स्थिति के विषय में पूछा। (५)

माण्डेय ने कहा-हे सर्पशास्र में कुशल महात्मा ब्रह्मपुत्र (सनत्कुमार) ' आप मुझसे सरोवर के सर्वपाप- नाशक माहात्म्य को कहिए। (६)

हे द्विजश्रेष्ठ ! स्थाणु के पास कौन-कौन तीर्थ दृश्य तथा कौन कौन अदृश्य हैं तथा कौन से अत्यन्त पविन लिङ्ग है। जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति पाता है। वट के दर्शन का पुण्य तथा उत्पत्ति भी बताइये । (७-८)

इनकी प्रदक्षिणा से होने वाले पुण्य, तीर्थस्नान का फल एवं अदृश्य और दृश्य (तीयों) का पुण्य, किस प्रकार सरोवर के मध्य में देवाधिदेव स्थाणु स्थित  हुए, किस कारण से इन्द्र ने तीर्थ को पुन घूलि से भर दिया, स्थाणुतीर्थ के माहाम्य, चक्रतीर्थ के फल, एवं सूर्य- वीर्य तथा सोमतीर्थ के माहाम्य-इन सबको आप मुझसे बताइये। (६-११)

हे महाभाग ! सरस्वती के समीप शंकर तथा विष्णु के गुह्य स्थानों को आप विस्तार से कहिए। (१२)

हे देव ! देवाधिदेव के माहात्म्य को आप यथार्थ रूप से घना क्योंकि ब्रह्मा की कृपा से थाप को सब कुछ ज्ञात है। (१३)

लोमहर्पण ने कहा-मार्कण्डेय का वचन सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनि का मन तीर्थ की अति भक्ति से आपूरित हो गया। (१४)

आसन को शिथिल करने के उपरान्त शंकर को प्रणाम कर उन्होंने प्राचीन काल में ब्रह्मा से सुनी हुई सभी बातों का वर्णन किया। (१५)

सनत्कुमार ने कहा-मंगल कारक, वरदावा महादेव, ईशान को प्रणाम कर मैं ब्रह्मा से कथित तीयों की उत्पत्ति को कहूँगा। (१६)

पूर्व समय में घोर एकार्णन मे समस्त स्थानर जद्गम के विनष्ट हो जाने पर प्रजाओं के बीजरवरूप एक वृहद् अण्ड की उत्पत्ति हुई।

उस अण्ड मे स्थित ब्रह्मा ने शयन का उपक्रम क्यिा । सहस युग पर्यन्त शयन करने के उपरान्त वे जगे। (१८)

सोकर उठे हुए ब्रह्मा ने लोक को शून्य देखा । तदनन्तर रजोगुण से मोहित होकर ये सृष्टि की चिन्ता करने लगे। (१९)

रजोगुण सृष्टि शारक एव सत्त्वगुण स्थितियारक माना गया है। सहार के समय तमोगुण की प्रवृत्ति होती है। (२०)

(वस्तुत ) वे भगवान् गुणातीत तथा व्यापक है। उन्हें ही पुरप कहा जाता है। जीव नामक समस्त पदार्थ उन्हीं से व्याप्त है। (२१)

बे ही ब्रह्मा, विष्णु और सनातन महेश्वर हैं। उन महात्मा को जानने वाला सर्वज्ञ एव मोक्षवित होता है। (२२)

जिनका अनन्त चित्त आत्मा मे ही व्यवस्थित है उनके लिए समस्त तीर्थों एवं आश्रमों से क्या प्रयोजन? (२३)

शील-समाधियुक्त आत्मारूपी नदी सयम रूपी पवित्र तीयों याली एव सत्य रूपी उदक से पूर्ण है। इसमे स्नान करने वाला पुण्यात्मा पवित्र हो जाता है। अन्तरात्मा की शुद्धि जल से नहीं होती। (२४)

आत्मज्ञान रूपी सुख मे प्रवेश करना ही पुरुष का प्रधान कर्तव्य है । सन्त लोग उसी को ज्ञेय कहते हैं। उसको पाकर शरीरधारी सम्पूर्ण कामनाओं को छोड़ देता है। (२५)

एकता, समता, सत्यता, शील में स्थिति, दण्ड विधान का त्याग, अक्रोध एव क्रियाओं से उपरम के सदृश ब्राह्मण के लिए कोई अन्य धन नहीं है। (२६)

हे द्विजोत्तम । मैंने सक्षेप में तुमसे यह ज्ञान कहा है इसे जानकर तुम निस्सन्देह परम ब्रह्म को प्राप्त करोगे।

अब तुम परमात्मा ब्रह्म की उत्पत्ति सुनो। उस नारायण के विषय मे लोग यह श्लोक उदाहत करते हैं- (२८)

'आप' अर्थात् जल ही को 'नार' ( एवं परमात्मा की ) 'तनु' कहा जाता है। वे उसमें शयन करते हैं अतः उन्हें 'नारायण' कहा जाता है। (२९)

जागृत होने के उपरान्त उस जल में जगत् को अन्तर्गत हुआ जानकर भगवान ने अण्ड का भेदन किया। उससे 'ओम्' इस शब्द की उत्पत्ति हुई।(३०)

तदनन्तर उससे (प्रथम ) भू, द्वितीय भुर एव तृतीय स्व की उत्पत्ति हुई। इनका 'भूर्भुव स्व' यह नाम हुआ। (३१)

उससे उस सविता देवता का वरेण्य तेज उत्पन्न हुआ। सृत उस तेज ने जल को सुखाया। (३२)

तेज से जलके शोषित होने पर शेप कलल के रूप मे  परिवर्तित हुआ । कपल से बुद-युद हुआ ओर तदनन्तर वह कठिन हो गया। (३३)

काठिन्य से भूतों को धारण करने वाली धरणी उत्पन्न हुई। जिस स्थान पर अण्ह स्थित था वहीं सनिहित. मरोवर, है। (३४)

तेज के आदि में उत्पन्न होने से उसे 'आदित्य' कहा जाता है । अण्ड के मध्य में लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए। (३५)

उस अण्ड का उल्व ( गर्भवेष्टन ) मेरु पर्वत है एव अन्य पर्वत उसके जरायु माने जाते हैं। समुद्र एव सहस्रों

नदियाँ गर्मेदक है। ब्रह्मा के नाभि-स्थान में जो महान निर्मल बल है उस स्वच्छ श्रेष्ठ जल से महान् सरोवर परि पूर्ण है।

उसके मध्य में स्वाणु स्वरुप महा मनसी वटवृक्ष है। उससे ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य ये वर्ण निकले एव द्विजो की शुपधा हेतु उससे बूढो की उत्पत्ति हुई। तदन्तर सृष्टि की चिन्ता कर रहे अध्यकवज्मा ब्रह्मा के मन से सनकदि महषिर्यो की उत्तपत्ति हुई।

पुन प्रजा की कामना से चिन्ता कर रहे धीमान् ब्रह्मा से सात ऋषि उत्पन्न हुए। वे प्रजापति हुये।

रजोगुण से मोहित ब्रह्मा ने जब पुन चिन्ता की तो तप स्वाध्याय परायण बालखिम्यो की उत्पत्ति हुई।

वे सदा स्नान निरत, देवपूजा पराजय रहते तथा उपवासों एव तीव्र व्रतो से अपने शरीर को शोषित करते है।

अग्निहोत्र से युक्त होकर वानप्रस्थ विधि से परम तप द्वारा वे शरीर को शोषित करते हैं।

अत्यन्त दुर्बल एव धमानिमात्रावशेष होकर वे लोग सहस्र दिव्य वर्षो तक देवेश की आराधना करते रहे विस्तु शङ्कर प्रसन्न नही हुए।

तदनन्तर चिरकाल के पश्चात आकाश मार्ग से उमा सहित शङ्कर भ्रमण कर रहे थे। उस समय(वालखिल्यों) देख कर सुन्दर व्रतो वाली देवी ने दुःखी होकर देवदेवेश शङ्कर को प्रसन्न कर कहा-देवदारु बन में रहने वाले वे मुनिगण क्लेशित हो रहे है। हे देव मुक्त पर दया कर आप उनके क्लेश को दूर करे। हे देव क्या इन भेद धर्मनिष्ठो का दुष्कत अनन्त है जिससे स्नायु एव अस्थि मात्र अवशिष्ट हाने पर भी वे आज तक शुद्ध नही हुए। देवी के वचन को सुनकर चार चन्द्रास्ल से शोभित बन्धक के शुद्ध शङ्कर ने हँसते हुए कहा।

श्री महादेव ने कहा- हे देवि धर्म की गति गहन होती है। तुम उसे यथार्थ रुप मे नही जानती। ये लोग न तो धर्म को जानते है और न कमरहित ही है।

क्रोध से भी ये मुक्त नही है। ये केवल मूढवृद्धि है। यह सुन कर देवी ने कहा- प्रशस्त व्रत वालों के लिये ऐसा न कहिए। हे देव आप अपने स्वरुप को प्रकट करे। मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है। ऐसा कहने पर शङ्कर ने हँसकर देवी से इस प्रसार कहा- (५०-५१)

तुम यहाँ रुको। ये मुनिगण जहाँ घोर तप कर रहे हैं वहाँ जाकर मैं र्म दिखलाता हूँ। (५२)

महात्मा शङ्कर के ऐसा कहने पर प्रसन्न देवी ने ( अपने ) पति भुवनेश्वर से कहा-आप वहाँ जाँय जहाँ अग्निहोत्र परायण, अध्ययनशील एव काष्ठ तथा लोप्ट सदृश वे मुनिगण स्थित है। (५३-५४)

तदनन्तर उन्हें देखकर देव शकर वनमालांधारी, भिक्षा कपाल को धारण किये, साग-सुदर नग्न युवा के रूप मे मुनियों क समक्ष भिक्षाहेतु पर्यटन करते हुए 'भिक्षा दो यह कह कर एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाने (५५ ५६)

आश्रम में पर्यटन कर रहे उनको देखकर ब्रह्मवादियों की स्त्रियों ने कौतुकपूर्ण स्वभाववश उनके रूप से मोहित होकर एक दूसरे से कहा--आओ भिक्षुक को देखें। परस्पर ऐसा कहने के उपरान्त पर्याप्त मूलफल लेकर मुनि पत्नियों ने उन देव से कहा 'भिक्षा लो।' उन्होंने भी

अत्यन्त आदर पूर्वक उस भिक्षा-कपाल को फैला कर कहा- (५७-५९)

हे तपोवनवासिनियो! "दो दो। आप सभी का कल्याण हो।" वहाँ हँस रहे देवेश को पार्वती देख रही थीं। उन्हें भिक्षा देकर कामातुर मुनि पत्नियों ने उनसे पूछा । (६०)

स्त्रियों ने कहा-हे तापस। तुम किस व्रतिविधि का पालन कर रहे हो जिससे वनमाला विभूषित सुन्दर स्वरूपधारी आपको नग्नलिङ्ग विशिष्ट तापस बना पड़ा है। यदि आप चाहे तो हम आप की प्रिया हो सकती है। (६१)

तपस्विनियों के ऐसा कहने पर हँसते हुए (शङ्कर ने) कहा-यह व्रत इस प्रकार का है जिसका कुछ भी रहस्य प्रकाशित नहीं किया जा सकता। (६२)

हे सौभाग्यशालिनियो। जहाँ बहुत सुनने वाले हों यहाँ इस व्रत की व्याख्या नहीं की जा सकती। यह जानकर आप सभी चली जाँय" (६३)

उनके ऐसा कहने पर उन्होंने मुनि से कहा-हे मुनि । हम एकान्त में चलेंगी (क्योंकि) हमे महान् कुतुहल हो रहा है। (६४)

यह कहकर उन सभी ने उनको अपने पाणिपल्लवों से पकड लिया।कुछ कामातुराहो क्ण्ठ मे लिपट गई,कुछ ने उन्हें पाहुओं मे आवेष्टित कर लिया, कुछ स्त्रियों ने उन्हें जानुओं से पकड़ लिया, कुछ सुन्दर स्त्रियाँ उनके केश का स्पर्श करने लगी, कुछ उनकी कटि से लिपट गई एव कुछ ने उनके पैरों को पकड लिया। (६५-६६)

मुनियों ने आश्नम में अपनी स्त्रियों का क्षोभ देखकर 'मारो मारो' ऐसा कहते हुए हाथों में काष्ठ और पाषाण लेकर शिव के लिङ्ग को उखाड कर फेंक दिया। लिग गिरा दिये जाने पर ईश्वर अन्तर्धान हो गये। (६७-६८)

भगवान् रुद्र देवी के साथ कैलाश पर्वत पर चले गये। देवाधिदेव का लिङ्ग गिरने पर चराचर का नाश होने लगा। इससे पवित्र मर्पियों को क्षोभ हुआ । इस प्रकार देव के व्याकुल होने पर एक अत्यन्त बुद्धिमान श्रेष्ठ मुनि ने कहा-"हम उन महात्मा तापस के अस्तित्व को नहीं जानते। हम सभी ब्रह्मा की शरण में चलें। वे ही उनकी चेष्टा (रहस्य ) को समझेंगे।" ऐसा कहे जाने पर सभी ऋषि अत्यन्त लज्जित हुए। (६९-७२)

वे रोग देवताओं से सेवित ब्रह्मा के लोक में गये एवं

देवेश को प्रणाम कर लज्जा से मुख नीचा किये सड़े हो (७३)

तदनन्तर उन्हें दुःखित देखकर ब्रह्मा ने यह वचन कहा अहो ! क्रोध से कलुपित चित्त बाले तुम लोग मूह हो । हे मूढयुद्धिवालो! तुमलोग धर्म की कोई क्रिया नहीं जानते । हे क्रूरकर्मा तापसो। धर्म के उस रहस्य को सुनो जिसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य शीघ्र धर्म का फल प्राप्त करता है। हमारे इस शरीर में रहने याला जो नित्य विभु है वह अनादि एवं महास्थाणु है । वह इस शरीर से पृथक् प्रतीत होता है। जैसे उम्मल वर्ण का भी मणि आश्रय के प्रभाव से उप्ती रूप का दीखता है उसी प्रकार आत्मा भी मन से संयुक्त होकरमन के भेद का आश्रय कर कर्मों से उपचित होता है। तदननर कर्मशात् यह स्वर्ग एवं नरक के भोगों को भोगता रहता है। युद्धिमान व्यक्ति वो ज्ञान तथा योग इत्यादि उपायों द्वारा उस मन का शोधन करना चाहिए। (७४-७९)

उस मन के शुद्ध होने पर अन्तरात्मा स्वयमेव निराकुल है हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है ऐसा पुरुष शरीर  के शोपक क्लेशों द्वारा नहीं शुद्ध होता । पातकों से बचने के लिये ही क्रियाओं का विधान हुआ है। यत अत्यन्त कलुपित देह शीघ्र शुद्ध नहीं होता अत एव लोक मे सत्पथ का यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। (८०-८२)

फिसी लोकाध्यक्ष ने उत्तमभाग्य वालों के लिए मोह-माहात्म्य के चिह्न स्वरूप इस वर्णाश्रम विभाग का निर्माण (८३)

आप लोग आश्रम में रहते हुये भी क्रोध तथा काम से अभिभूत है। शानियों के लिये घर आश्रम है और अयोगियों (अज्ञानियों) के लिये अनाश्रम है। (८४)

यहाँ समस्त कामनाओं का त्याग यहाँ नारिमय यह भ्रम एवं कहाँ इस प्रकार का बोध जिससे तुम लोग अपनी आत्मा को नहीं पहचान पाते।

मोधी पुरुष लोक में जो यश करता है, जो दान देवा है अथवा जो तप या हवन करता है उसका कोई फल दसे नहीं मिलता। उस मोधी के समी फल व्यर्थ होते है।(८६)