वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 16 कुरुक्षेत्र के तीर्थ सप्तसारस्वत-तीर्थ-वर्णन
यहाँ से शूलपाणि के अमृत स्थान में जाना चाहिये, जहाँ गन्धों सहित देवताओं ने हनुमान को प्रकट किया था।
उस तीर्थ मे स्नान करके मनुष्य अमृतत्व प्राप्त करता है। तीर्थ सेवी उत्तम ब्राह्मण कुलोत्तारण तीर्थ मे जाकर मातामह और पितामह के समस्त यशों का उद्धार करता है। राजर्षि शालिहोत्र के रैलोक्यविश्रुत तीर्थ में स्नान करने । से मनुष्य देइजनित पापों से विमुक्त हो जाता है । सरस्वती मे श्रीकुअ नामक त्रैलोक्य प्रसिद्ध तीर्थ है। उसमे भक्तिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है। यहॉ से नैमिषकुञ्ज तीर्थ मे जाकर स्नान करने से पवित्र मनुष्य नैमिपारण्य तीर्थ मे स्नान से मिलने वाला पुण्य प्राप्त करता है। वहाँ वेदवती से निपेवित अति प्रख्यात तीर्थ है। (४-८)
हे द्विजश्रेष्ठो। रावण के द्वारा केश पड़ने पर शोकाभिभूत होकर उसने उन्हीं के वध हेतु प्राणों का परित्याग किया था।
तदनन्तर महात्मा राजा जनक के गृह में उत्पन्न होकर वे राम की सीता नामक विख्यात पतिव्रता पत्नी हुई।
रावण ने स्वय अपने विनाश के लिये उनका हरण किया। रावण को मारने के पश्चात् विभीषण का अभिषेक पर राम सीता को उसी प्रकार घर लाये जैसे जितचित्त व्यक्ति कोनि को प्राप्त करता है। उनके तीर्थ में स्नान कर मनुष्य कन्याया (कन्यादान) का फल प्राप्त करता है एवं समस्त कलुपों से मुक्त होकर परम पद को जाता है। तदनन्तर ब्रह्मा के उत्तम और महान् स्थान को जाना चाहिये जहाँ स्नान करने से अवर (निम्न) वर्ण का व्यक्ति ब्राह्मगत्व प्राप्त करता है एव ब्राह्मण विशुद्वात्मा होकर परम पद की प्राप्ति करता है। (११-१४)
तदनन्तर त्रैलोक्य दुर्लभ सोमतीर्थ में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमा ने तपस्या कर द्विजराजत्व की प्राप्ति की थी।
वहाँ स्नान कर अपने पितरों और देवताओं की पूजा करने से मनुष्य कार्तिरी पूर्णिमा के चन्द्र-सदृश निर्मल होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। (१६)
त्रैलोक्य-दुर्लभ सप्तसारस्वत नामक एक तीर्थ है जहाँ सुप्रभा, काश्चनाक्षी, विशालय, मानसहुदा, सरस्वती ओघ-नामा, विमलेदका एव सुवेणु नाम की सात सरस्वतियाँ एक
मे मिलकर प्रयाहित होती हैं। (१७-१८)
पुष्करतीर्थ में अवस्थित पिनामह दे यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त होने पर सभी प्रापियों ने उनसे कहा "आप यह या महाफरजना नहीं होगा। क्योंकि यहाँ सरिच्छ ठा सरस्वता नहीं दिसलाई पड़ रही हैं।" यह सुन कर प्रसन्नतापूर्वक भगवान् ने सरस्वती का स्मरण किया। (१६-२०)
पुष्कर में यज्ञ कर रहे पितामह द्वारा आहूत सुप्रभा नाम की देवी यहाँ सरस्वती नाम से प्रख्यात हुई। (२१)
पितामह का मान करने पाली वेगयुत्ता उस सरस्वती को देख कर प्रसन्न मुनियों ने उनका अरयधिक सम्मान किया। (२२)
इस प्रकार पुष्पर मे स्थित इस सरिच्छे टा सरस्वती को महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्र में लाये। (२३)
नैमिपारण्य में स्थित तपोधन शौनकादि मुनियों ने पौराणिक महात्मा लोमहर्पण से पूछा। (२४)
"सन्मार्ग में पलने याने हम लोगों को यज्ञ का फल कैसे प्राप्त होगा?" तदनन्तर उन महाभाग ने ऋषियों को शिरसे प्रणाम कर कहा-(२३)
जहाँ सरस्वती अवस्थित है यहाँ यज्ञ का महान् फल होता है। यह सुनार विविध वेदों का अध्ययन करने पाले मुनियों ने समवेत होकर सरस्वती का स्मरण किया। सन (दीर्घ काल मे समाप्त होने वाले यक्ष) को पाने याले' पियों के ध्यान करने पर ये यहाँ नैमिष क्षेत्र में टन महात्माओं के यज्ञ में प्लारनार्थ पाञ्चनाक्षी नाम से समागत हुई। यही प्रसिद्ध नदी मङ्कण द्वारा स्मरण किये जाने पर पुण्यतोया सरस्वती के रूप में पुरुक्षेत्र में आयी । गयाशेन में महायज्ञ करने पाने गय के यज्ञ में आहूत श्रेष्ठ सरस्वती नदी का प्रसिद्ध प्रत याते ऋपियों ने 'विशाला' के नाम से अभिहित किया । (२८-३०)
महात्मा मरण ऋपि द्वारा समाहूत यह नदी धुरसंग मे आकर प्रविष्ट हो गई। (३१)
देयर्पियो द्वारा सेयित परम पवित्र उचर कोशल प्रदेश में उहालक मुनि ने सरस्वती का ध्यान किया। (३२)
एन मुनि के कारण सरिर भेटा सरस्वती उस देश में मायी एव पसलमृगचर्मधारी मुनियों द्वारा पूजित हुई।
सम्पूर्ण पापों ने नाशिम वे मनोहरा नाम से विमान
१. बहुत दिनों में न होने वाले यरों को या हो ।