त्रैलोक्यलक्ष्मी का बलि के समीप उपस्थित होना, श्वेतादि लक्ष्मी चतुष्टय की उत्पत्ति एवं विभाग का वर्णन, महापद्मादि निधियों का वर्णन, जयश्री का बलि के शरीर में प्रेवश तथा श्रीसम्पत्र बलि के वैभव का वर्णन

पूजित हो। (४४)

हे दैत्येन्द्र । क्षत्रिय स्वाध्याय एवं यज्ञ मे निरत, दान देने वाले, शस्त्र जीवी तथा प्रजा पालन करने वाले (४५)

पैश्यगण यज्ञाध्ययन सम्पन्न, दाता कृपि-कर्ता एच पाणिज्यजीवी हों तथा पशुपालन का कर्म करें। (४६)

हे असुरश्रेष्ठ । शूद्रगण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सदा सेवा में रत रहें और तुम्हारी आज्ञा का सदा पालन (४७)

हे दितिजेश्वर । जब सभी वर्ण के लोग अपने अपने धर्म मे रहते है तो निश्चय ही धर्म की वृद्धि होती है एय धर्म की वृद्धि होने पर राजा की उन्नति होती है। (४८)

अत हे बलि | तुम सभी वर्गों को स्वधर्म मे सदा स्थित करो। उसकी (स्वधर्म की) वृद्धि से तुम्हारी वृद्धि होगी। उसकी हानि से हानि होती है। (४६)

महासुरेन्द्र महात्मा प्रहलाद यलि से इस प्रकार वह कर मौन हो गये। हे मह । तदनन्तर बलि ने इस प्रकार कहा-आपने जो आदेश दिया। मैं उसी के अनुसार कार्य करूंगा। (५०)

पुलरस्य ने कहा-दे द्विज । देवों के ब्रहालोक चले। जाने पर बलि सदा धर्मान्वित रहसे हुए लोक्य का पालन करने लगा।

उस समय जगन् पो मृतयुग की तरह धर्मयुक्त हुआ देखकर कलियुग अपने स्वभाव का सेवन करने के निमित्त ब्रह्मा की शरण मे गया।

वहाँ जाकर उसने प्रझा से इन्द्रादि देवों से युक्त देखा। वे अपनी दीप्ति से मुरासुर समन्धित अपने लोक को प्रराशित कर रहे थे। (३)

उन ईश्वर ब्रह्मा को प्रणाम कर कलि ने उनसे कहा-

हे देव श्रेष्ठ । बलि ने मेरे स्वभाव को नष्ट कर दिया है । (४)

योगी भगवाम् ब्रह्मा ने उससे कहा-फेयल तुम्हारा ही नहीं अपितु समस्त जगत का स्वभाव उस बलवान ने हरण कर लिया है। (५)

हे कलि । मरत् सहित वरण एवं देवेन्द्र को देखो। पलि के बल से भास्कर भी दीन हो गये हैं। (६)

सहस्रशीर्प एव सहस्रपाद् (विष्णु) के अतिरिक्त तीनों लोकों में उसके कर्म को रोकने वाला कोई नहीं है। (७)

वे अव्यय पलि द्वारा किए गये सद्धर्म के कारण प्राप्त उसकी भूमि, स्वर्ग, राज्य, लक्ष्मी एवं यश का अपहरण (८)

भगवान ब्रह्मा के ऐसा कहने पर अव्यय कलि, इन्द्र आदि देवताओं को दीन हुआ देखकर विभीतक वन में चला गया।

हे नारद । बलि का लोप हो जाने से तीनों लोकों में कृतयुग प्रवृत्त हो गया। चारों वर्गों में चतुष्पाद् धर्म की व्याप्ति हो गई। (२०)

रापत्या, अहिंसा, सत्य, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, दया, दान, मृदुता, सेषा और यक्ष-कार्य-ये सभी समस्त

जगत् में व्याप्त हो गये। हे महान् । बलि ने बल्वान् कलि को भी कृतयुग यना दिया। (११-१२)

सभी वर्ण अपने अपने धर्म में अवस्थित हो गए, द्विजगग विभिन्न आश्रमों का अवलम्बन करने लगे तथा राजा प्रजापालनरूपी धर्म का आचरण करने लगे। (१३)

हे ब्रह्मन् । इन तीनों लोकों के धर्म परायण होने पर वरदानी भैलोक्य लक्ष्मी दानवेश्वर बलि के पास आयीं। (१४)

इन्द्र की लक्ष्मी को आयो हुई देखकर बलि ने पूछा-

मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो एव क्सि प्रयोजन से आयी हो।

पद्ममाला विभूपिता रक्ष्मी ने उसकी यात सुनकर कहा-हे पलि। में बलात् तुम्हारे पास आई हुई जो स्त्री हुँ उसे सुनो।

अमित बलशारी चक्रगदाधर देव विष्णु ने इन्द्र को छोड़ दिया है। अत मैं तुम्हारे समीप यहाँ आई (१७)

उन्होंने (विष्णु ने) रूप युक्त चार युवतियों की पुष्टि की (प्रथम युवती) सत्त्व प्रधान, श्वेत शरीरिणी, श्वेताम्बरधारिणी श्वेतमाल्यानुलेपन से युक्त एवं श्वेत गजास्ट थी।

(दूसरी युवती ) रजोगुण प्रधान, रक्तशरीरिणी, रक्ताम्बर- धारिणी, रक्तमाल्यानुलेपन से युक्त एवं रक्तावर्ण के अश्व पर आरूढा थी। (तृतीय युवती) तमोगुण-प्रधान, पीत वर्ण के शरीर वाली, पीताम्बरधारिणी, पीतमाल्यानुलेपन से युक्त एवं सुवर्ण रथ पर आरूढ़ थी। (चतुर्थ युक्ती) त्रिगुण प्रधान, नील शरीर वाली, नीलाम्बरधारिणी एव नील वर्ण के माल्य, गन्ध एवं अनुलेपन से युक्त तथा नील वृषारूढ़ थी। सत्त्वप्रधाना, श्वेतशरीरिणी, श्वेताम्बरधारिणी एवं कुञ्जरारूदा (युवती) ब्रह्मा, चन्द्रमा एवं चन्द्रमा के अनुयायियों के समीप चली गई। रजोगुण से युक्त, रक्ताङ्गी, रक्ताम्बर- धारिणी एवं अश्वारूढा (युवती को उन्होंने ) इन्द्र, मनु तथा उनके सदृश लोगों को प्रदान किया। कनकवर्णाङ्गी, पीताम्बरधारिणी, सौभाग्यवती रथारूढा ( युवती को उन्होंने ) प्रजापतियों, शुक्र एय वैश्यों को दिया। नीलवस्त्रधारिणी, भ्रमरसदृशी, वृषस्थित चतुर्थ (युवती) दानवों, नेतों, शूद्रों एवं विद्याधरों के पास चली गई। उस श्वेतरूपा को विप्रादि सरस्वती कहते है। (१८-२६)

यज्ञ में ब्रह्मा सहित सदा मन्त्रादि से वे उसकी स्तुति करते है। क्षत्रिय लोग उस रक्तवर्णा को जयश्री कहते हैं। (२७)

हे असुरश्रेष्ठ । यह इन्द्र तथा मनु के साथ यशस्विनी हुई । वैश्य एवं प्रजापतिगण उस पीतवसना कनकाङ्गी की सदालक्ष्मी के नाम से स्तुति करते हैं । दैत्यों एवं राक्षसों सहित शूद्रगण श्री देवी के नाम से भक्तिपूर्वक उस नील- वर्णाङ्गी की स्तुति करते है। इस प्रकार उन चक्रधारी देव ने उन मारियों का विभाजन किया। (२८-३०)

अव्यय निधियों इनके स्वरूप में स्थित हैं। इतिहास, पुराण, साहु वेद, स्मृतियाँ, चौसठ कलाएँ एवं महापद्म निधि श्वेताङ्गी के अन्तर्भूत है। मुक्ता, सुवर्ण, रजत, रथ, अश्य, गज, भूपण, शस्त्र, अस्त्र एवं वस्त्र स्वरूप पद्मनिधि रकाङ्गी के अन्तर्भूत हैं। गौ, भैंस, गर्दभ, उष्ट्र, सुवर्ण, यस्त्र, भूमि, औषधियाँ एवं पशु स्वरूप महानील निधि पीताङ्गी में स्थित है। अन्य सभी जातियों को अपने में समाविष्ट करने वाली समस्त जातियों में सर्वश्रेष्ठ जाति ( पर सामान्यात्मक ) स्वरूप शङ्कनिधि नौलागी देवी में स्थिति है। हे दानव ! इन (निधियों) के स्वरूपान्तर्गत पुरुषों के जो लक्षण होते हैं मैं उनका वर्णन कर रही हूँ। उन्हें

समझो। (३१-३५)

हे दानवपते । महापद्म से आश्रित पुरुप सत्य और शौच से युक्त तथा यजन, दान और उत्सव में रत रहते हैं। (३६)

पद्म से आनित मनुष्य यज्ञकारी, सौभाग्यवान, अहंकारी, मानप्रिय, बहुत दक्षिणा देने वाले तथा सर्वसाधा- रण लोगों से सुखी होते हैं। (३७)

महानील द्वारा आनित व्यक्ति सत्य तथा असत्य से युक्त, देने और लेने में चतुर तथा न्याय, अन्याय और न्यय करने वाले होते हैं। (३८)

हे वलि ! शंख से आश्रित पुरुप नास्तिक, शौच-रहित फूपण, भोगहीन, चोरी करने वाले एवं मिध्याभाषी होते हैं। हे दानर ! मैंने इस प्रकार आपसे उनके स्वरूप पा वर्णन दिया। (३६-४०)

पही रागिणी नामक जयश्री में आपके पास आई हूँ। हे दानवपति! मेरी साधुजनों से संमत एक प्रतिज्ञा है। (४१)

मैं घोर पुरुप का आश्य करती हूँ। नपुंसक के समीप कदापि नहीं जाती। तीनों लोरों में आपके समान पल्यान दूसरा नहीं है। (४२)

अपनी बल संपत्ति से तुमने मेरी दृढ़ प्रीति उत्पन्न की है क्योंकि युद्ध में परामम कर तुमने देवराज को जीता है।

हे दानव ! इसीसे आपके श्रेष्ठ सत्त्व एवं सभी से अधिक पल को देसकर (आपके प्रति) मेरी स्थिर एवं उत्तम प्रीति हो गई है। (४४)

अतः मैं स्वयमेव अतिपराक्रमी तथा मानी वीर आप के समीप आयी हूँ। हे दानवश्रेष्ठ ! हिरण्यकशिपु के फुल में उत्पन्न आप असुरेन्द्र के इस प्रकार के कर्मों में कोई आश्चर्य नहीं है। हे राजन् ! शत्रुओं से अपहृत त्रैलोक्य को विक्रम द्वारा जीतकर आपने दिति के पुत्र अपने प्रपितामह को और विशिष्ट कर दिया। दानवेन्द्र पलि से ऐसा कहकर चन्द्रवदना शुभ जयश्री (यलि मे) प्रविष्ट होर (उन्हें ) घोषित करने लगी। उनके प्रविष्ट हो जाने पर ही, श्री, बुद्धि, घृति, कीर्ति, प्रमा, मति, क्षमा, समृद्धि, विद्या, नीति, दया, श्रुति, स्मृति, धृति, कीर्ति, मूर्ति, शान्ति, क्रिया, पुष्टि, तुष्टि एवं अन्य सभी