20 कुरुक्षेत्र के तीर्थ

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लोमहर्पण ने कहा-प्राचीनकाल मे दर्वि पि वहाँ चार समुद्रों को ले आये। प्रत्येक में स्नान करने से मनुष्यों को सहस्र गोदान का फल मिलता है।

हे द्विजोत्तमो । उस तीर्थ में जो कुछ तप किया जाता है वह पापी द्वारा किये जाने पर भी परिपूर्ण होता है । (२)

हे द्विजो । शतसाहसिक एवं शतिक नामक दोनों तीर्थों में स्नान करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है।

चहीं सरस्वती के तट पर सोमतीय विद्यमान है जिसमें स्नान करने से पुरुप राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

रेणुका तीर्थ में जाकर श्रद्धालु और जितेन्द्रिय पुरप मातृभक्ति से होने वाला पुण्य प्राप्त करता है। ब्रह्मनिपेवित ऋणमोचन तीर्थ में जाकर मनुष्य देव, ऋपि एव पितरों से उत्पन्न होने वाले ऋणों से मुक्त हो जाता है। कुमार (कार्तिकेय ) के अभिषेवस्थल ओजस नामक प्रसिद्ध तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य यशस्वी होता।

है एव वहाँ श्राद्ध करने से उसे कुमार पुर की प्राप्ति होती है। (६-७)

चैत्र शुक्ल पप्टी में जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा उसे गया में श्राद्ध करने का फल प्राप्त होगा। सूर्य के राहुग्रस्त हो जाने पर अर्थात् सूर्यप्रहण के समय सन्निहत में किये गये श्राद्ध के सदृश यहाँ का श्राद्ध होता है। इसमे सन्देह नहीं करता चाहिये। (६)

पूर्व समय में वायु ने कहा था कि ओजसतीर्थ मे किया गया श्राद्ध अहा होता है। अत प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। (१०)

चैत्र मास की शुक्ल पष्ठी के दिन जो श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा उसके पितरों को अक्षय उदक की प्राप्ति होगी । (११)

वहाँ त्रैलोक्य विश्रुत पञ्चवट नामक तोय है, जहाँ स्वय योगमूर्ति धारी महादेव विराजमान हैं। (१२)

वहाँ स्नान तथा देवाधिदेव महेश्यर की पूजा कर मनुष्य गाणपत्य प्राप्त करता है एव देवताओं के साथ आनन्द करता है। (१३)

हे द्विजोत्तमो! वहाँ प्रसिद्ध कुस्तीर्थ है जहाँ कुरु ने क्षेत्र-कर्पणार्थ घोर तप किया था। (१४)

उनके घोर तप से सन्तुष्ट होकर इन्द्र ने कहा-हे सुन्दर व्रतों वाले राजपि । तुम्हारे इस तप से में सन्तुष हूँ। (१५)

कुरुक्षेत्र में इन्द्र का यज्ञ करने वाले लोग पाप रहित पुण्य लोकों को जाते हैं। (१६)

तदनन्तर हँसकर इन्द्रदेव स्वर्ग चले गये । खेद रहित शतक्रतु (इन्द्र) पुन पुन आकर एवउपहास पूर्वक पूछ पूछकर चले गये। कुरु ने जब उग्रतप द्वारा अपनी देह का कर्पण किया तो इन्द्र ने प्रेम पूर्वक कहा "आपरा जो इच्छित हो उसे कहें।"(१७- १८)

कुरुने कहा-इस तीर्थ मे निवास करने वाले श्रद्धालु मनुष्य ब्रह्मलोक प्राप्त करें। (१९)

अन्यत्र पाप करने वाले एव पञ्चपातकों से दूषित मनुष्य इस तीर्थ में स्नान करने से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त करें। (२०)

१. ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरुपत्नीगमन बार इन पापियों में से किसी के साथ सम्पर्क-ये पाँच महापातक माने गये हैं।

हे द्विजोत्तमो। कुरुक्षेत्र में कुरतीर्थ अत्यन्त पवित्र है। उसका दर्शन पर पापी मनुष्य परमपद प्राप्त करता है। (२१)

कुरुतीर्थ में स्नान कर मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और कुरु की आज्ञा से परमपद प्राप्त करता है। (२२)

तदनन्तर शिवद्वार में स्थित स्वर्गद्वार को जाना चाहिये। शिवदार मे स्नान करने से मनुष्य पामपद को प्राप्त करता है। (२३)

तदुपरान्त त्रैलोक्य प्रसिद्ध अनरक तीर्थ मे जाना चाहिये। उसके पूर्व में ब्रह्मा, दक्षिण मे महेश्वर, पश्चिम मे रुद्रपत्नी एव उत्तर में पद्मनाभ तथा इनके मध्य में त्रैलोक्य दुर्लभ अनरक तीर्थ स्थित है। (२४- २५)

इसमे स्नान करने वाला पातकों एव उपपातकों से मुक्त जाता है। वैशाख की पष्ठी तिथि को जब मङ्गलवार हो उस समय स्नान करने से मनुष्य पातकों से मुक्त हो जाता है।