कात्यायनी का प्रादुर्भाव, देवों द्वारा कात्यायनी की स्तुति अगरस्य द्वारा विन्ध्य का निम्नीकरण

पुलस्त्य ने व्हा-सदनन्तर महिष द्वारा पराजित देय गग अपने-अपने क्यानों को छोड़ कर अपने पाइनों और आयुषों पे साथ पितामह को आगे कर पधारी लक्ष्मी पति कादर्शन करने गए।

यहाँ सार उन रोगो ने विष्णु पय शेर इन दोनों मुरोतमा धे एक साय येठे देस्य । उन दोनों सिद्धि साधनों को देखने के अनन्तर प्रणाम कर उन लोगों ने एनसे माहिपाक्षिके फर्म पायन किया। (२)

(उन्होंने बहा-) हे प्रभो! महिपामुर ने अधिनी-एमा, पूर्य, चन्द्र, पायु, अग्नि, प्रमा, परम, इन्द्र आदि (एम) देयताओं के अधियरों पर आश्मश कर स्वर्ग से निमल दिया है तथा हम लोग चीप निवासी पना दिये गये।

दम रगत देवताओं की यह पात मुन कर आप दोनों हमारे हित को याद कहे। अन्यथा दानव द्वारा युद्ध मारे जा रहे हम लोग आज रसातल मे परे जायेगे। (४)

शंकर के साय मुरारि ने उनके इस प्रकार के वचन को सुना तथा उन दुःखी चित्तरालों को देखा। तदनन्तर फाराग्नि-सदृश अव्ययात्मा हरि ने सहसा पोप दिया।

बदनन्तर मधुसूदन, शेयपितामह तथा शादि देवताओं द्वारा क्रोध करने पर उन मुरा से महान संभ से प्रस्ट हुआ।

हे मुने । अनुपम प्रत्यापन अपि के आश्रम में पर्यंत गंग तुल्य पद सेज एकत्रित हो गया। उन महर्षि ने तेज या उपयर (पहग) फिया । (७)

सन महर्षि द्वारा उत्पन्न रिये गए सेज से आया तेज सहसों सूर्य के सदर जाग्यायमान हो गया। उससे

योग से विशुद्ध देवाली एवं चचल तथा विशाल नेत्रों वाली कात्यायनी आविर्भूत हुई।

महेश्वर के सेज से कात्यायनी का मुख, अग्नि के तेज से उनके तीन नेत्र, यम के सेज से केश तथा हरि के तेज से उनकी अट्ठारह मुजाएँ उत्पन्न हुई। (ह)

चन्द्रमा के तेज से उनके सम्यक् सटे हुये स्तनयुगल, इन्द्र के तेज से मध्य भाग तथा घरुण के तेज से ऊरु, जहाएं एवं निलम्बों की उत्पत्ति हुई। (१०)

लोकपितामह ब्रह्मा के तेज से उनके पद्ममोश तुल्य पद युगल, आदित्यों के तेज से पैर की अगुंलियों, तथा वसुओं के सेज से उनके हाथ की अंगुलियों उत्पन्न हुई। (११)

प्रजापतियों के तेज से उनके दात, यक्षों के तेज से नाक, वायु के सेज से दोनों कान, साध्य के तेज से कामदेव के धनुष सदृश उनकी दोनों भहिं प्रकट हुई। (१२)

महर्षि का उत्तमोत्तम क्या महान् सेज पृथ्वी पर

'कात्यायनी' इस नाम से प्रसिद्ध हुआ और तदनन्तर वे उसी नाम से जगत् में प्रसिद्ध हुई।

वरद निशूरी ने उन्हें त्रिशूल, मुरारि ने चम, वरुण ने शद्धा शत, अग्नि ने शक्ति, यायु ने घनुप तथा सूर्य ने अक्षय याणों वाले दो तूणीर प्रदान किया। (१४)

इन्द्र ने घण्टा सहित वन, यम ने दण्ड, यम ने दण्ड, कुबेर ने गदा, ब्रह्मा ने कमण्डलु के साथ अक्षमाला तथा पाल ने ढाल सहित उग्र तयार दिया । (१५)

चन्द्रमा ने चामर सहित हार, समुद्र ने माला, हिमा-लय ने सिंह, विश्वकर्मा ने चूड़ामणि, कुण्डल, अर्धचन्द्र क्या कुठार प्रदान श्यिा।

गन्धर्यराज ने उनके अनुरूप, रजत का पूर्ण पान (मद्य) पात्र, नागराज ने मुजङ्गहार तथा प्रातुओं ने न मुरझाने याले पुष्पों की माला प्रदान की।

तदनन्तर श्रेष्ठ देवताओं के ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी) ने उच्च अट्टहास किया। इन्द, विष्णु

रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा मूर्य थादि श्रेष्ठ देय उनकी रसुति करने लगे- (१८)

योग से पिशुद्ध देहयारी मुरपूजित देवी को नमस्कार है। निद्रा रूप से पृथ्वी में व्याप्त है, पेही तृष्णा, प्रपा, भुपा, मयदा, फान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, आमा, माया, शाकि, एमी, पृत्ति, दया, प्रालि राया माया है। ऐमी संसारण्यापिणो देवी को नमस्कार है। (१९-२०)

सदननर देपारों से इस न देषी सिंह पर आस्ट दोर विध्य नामक एम चिमाया महान पर्व पर गई पिरो भगरत्य मुनि ने भी निम्न कर दिया था। (२१)

नारद ने पूछा-गुदारमन् । यह पाया कि भगवान् अगमय मपि ने उस परतो सिरिये  किस परत मे निम्नग याना किया? (२२)

पुटरर ने रामापीर पार मेयिभ्य ने गायिदारी

सूर्य की गति पोरोक दिया ।तदनन्तर मूर्य ने महर्षि अगस्त्य के पास जासर होम पे अन्त में यह पचन कहा- (२३)

हे द्विज । में यहुत दूर से आपरे पास आया हूँ।हे मुनीन्द्र । आप मेरा उद्धार करें। मुझे मेरा अभीष्ट दान द जिससे मैं निश्चिन्त होर थायश में विचरण (२४)

इस प्रकार दियारर पे गुण संयुफ यास्य को सुनकर अगस्त्य ने कहा- मैं सुग्हें मुम्हारा मनोभिलपित दान दूंगा। मेरे पास से काई भी यार विमुख हो पर नहीं जाता।" (२५)

अगस्त्य फेअमृतमय पपा प्ये मुनर शिर से धन्जलि संयुक्त किये हुए प्रभु दियावर ने कहा-"आरयर  गिरिपर मेरा मार्ग रोक रहा अन भगवन् ! थाप विभ्यापलयोनीपा करने प्रयत्न करें। (२६)

पुग्मजन्मा धगारप ने पूर्व प्रेमात गाकर पदा-

"मेरे द्वारा विष्य को नीचा किया हुआ ही समझो। यह पर्यंत तुम्हारी रिरणों से पराजित होगा। मेरे धरणों के आश्रित तुम्हारे लिये व्यथा ऐसी ?"

वृद्ध शरीर पाले महर्षि अगस्त्य ऐसा पह पर यिनप्रना पूर्वक भफि से सूर्य की स्तुति करने के उपरान्न दण्डर पा स्याग पर विध्यपर्वत के निम्ट गए। (२८)

यहाँ जारर मुनि ने पर्या से पहा "मैं अतिपवित्र महातीर्थ को जा रहा हूँ। मैं पृद्ध होने से दार ऊपर पढ़ने में असमर्थ हैं या आप तबाट नीया हो जाय।" (२९)

मुनिमेष्ठ के ऐसा कहने पर पर्यंत नीम्न शिष्तर पाला दो गया। दानार महर्षिश्रेष्ठ ने यिसपा पो पदर पार करने के पान उससे यह यदा- (१०)

मैं जप स पवित्र तीर्थ से स्नान करके पुन अपने महान् पापम में नौ सय तक तुम्हें नही पाना चाहिये । अन्यथा अवज्ञा परने के पारण में तुम्हें पोर शाप दूंगा। (३१)

पेसा रहकर भगवान अगरस्य सहसा दक्षिण दिशश की ओर अन्तरिक्ष में पले गये तथा उचित समय में पिर आऊँगा' ऐसा यहार नसी दिशा में ये रक गये। (२२)

यहाँ मुनि ने विशुद्धस्वर्गमय सोरणों पाले अतिरम गीय आभम की रचना कर एप उसमें विदर्भपुत्री (पामुद्रा) को रख कर पयं अपने भाभम यो पजे गए। (३३)

अमित मानिमान मुनि विभिन्न तुओं के पर्षमाउ में नित्य आयस्थित अपने आम्म में निगस करने तथा समय दण्ड में रह पर नप परने सगे। पिम्पपर्यन भी आग में महान् आमम स्प्रेयर मदर के भय से नही पाता । पेनही ऐसा समस कर यह सिर नीपारिग हुए स्थित है।

महर्षे! इस घर भगम्य ने मदार पर्यमराज को