प्रहलाद द्वारा विष्णु का अदिति के गर्भ में प्रविष्ठ होने का बात सुनकर बलि का विष्णु के लिए दुर्वचन, प्रह्रलाद का बलि को शाप एव बलि द्वारा प्रह्रलाद से अनुनय करने पर प्रहलाद का उपदेश

आप विपाद मत करें। (४७)

हे दक्षात्मजा। जब मैं आपके उदर में आऊँगा उस समय दैत्य निस्सन्देह निस्तेज हो जायेगे।(४८)

हे विप्र । ऐसा कहकर शत्रुओं के नाशक भगवान् विष्णु इन्द्र के हितार्थ अपने सेज के अंशमात्र से उन देवी के उदर में प्रविष्ट हो गये। (४९)

पुलस्त्य ने कहा-विश्वयोनि के कथनानुसार वामनाकार देव के देवमाता के गर्भ में स्थित होने पर असुरगण निस्तेज हो गये। (१)

असुरों को सेजहीन देखकर दानव श्लेष्ट बलि ने दानवेश्वर प्रहलाद से यह वचन कहा। (२)

बलि ने कहा-हे तात | आप यह बतलायें कि दानव किस कारण से निस्तेज हो गये हैं ? हे शुभाशुभ के ज्ञाता! आप परम ज्ञानी हैं। (३)

पुलस्त्य ने कहा-पौत्र के उस वचन को सुन कर (दानों के) सेज की अत्यधिक हानि किससे एवंक्यों हुई है। (यह जानने के लिये) प्रहलाद क्षणभर ध्यानस्थ रहे । (४)

दैत्यों के लिये वासुदेव के कारण उत्पन्न भय को जानकर उन योगात्मा ने यह सोचा कि सम्प्रति विष्णु कहाँ स्थित है?

हे नारद! नाभि के अधोमाग में सात पातालों का चिन्तन पर वे पशी नाभि के उपर भू' आदि लोकों को देखने के लिये पहुँचे।

उन्होंने पहजागार भूमि एवं उसके मध्य में महान् समृद्धि से सम्पन्न मुवर्णमय पहजार पर्यंतश्रेष्ठ मेरु को (७)

उसके उपर महापुरियों में पाठ लोकपति एवं उनके ऊपर मझा यी येराजपुरी को देखा। (८)

उसके नीचे उन्होंने महापुण्ययुक्त देवताओं से पूजित तथा पशु-पक्षियों से पूर्ण देयमाता अदिति के आश्रम को देरा। (९)

देमुने! समस्त सेजों से अधिक संजरियनी अदिति को देसार दानयपति (प्रसाद) मधुम्हन को खोजने के लिए उनके पदर में) प्रविष्ट हुए। (१०)

उन्होने समस्त प्राणियों में भेष्ट यामनारति उन जगन्नाथ माधप को देयमाता फे उदर में देखा। (११)

समस्त मुरों एवं अमरों से सर्यतः व्याप्त शरीर पाले मत पा, पर्य गदा धारण करने वाले उन पुण्डरीकाक्ष को देख कर हसी यागम से यामनत्य को प्राप्त देरय सेशोहर विष्णु जानार घे प्रकृविरय हो गए। (१२-१३)

तदनन्तर मधुसूदन को प्रणाम र महायुद्धिमान प्रहलाद ने विरोचनपुत्र पलि से मधुर पचन यहा। (१४)

प्रह्लाद ने कहा- दैत्येन्द्र ! आप लोगों को जिससे भय उत्पन्न हुआ है एवं जिस कारण दैत्यगण निरज होगये हैं यह सय मैं कहता हूँ । सुनो। (१५)

आपके द्वारा पराजित हुए इन्द्र सहित रद्र, सूर्य एवं अग्नि आदि देवता त्रिभुवनधर देय हरि की शरण में गए। (१६)

वे जगद्गुरु महायाटु हरि इन्द्र आदि देवताओं को अभय देकर अदिति फे उदर में अयती हुए हैं। (१७)

हे पनि ! मेरा ऐसा मन है कि उन्होंने तुम लोगों का सेजोहरण कर लिया है। है पलि! अन्धकार सूर्योदय को सहन करने में समर्थ नहीं होता। (१८)

पुलारय ने कहा-प्रसार का यपन मुनर प्रोप से प्रशुरित अश्रोष्ट पारे पलि ने भाषिर्म से प्रेरित होकर प्रलाद रो पड़ा। (१९)

परि ने कहा- ताव ! यह हरि ऐन है। जिनके धरण हमें भय उपस्थित माहै। हमारे पास पामुरेष से अधिक स्याम् सैनौ दरप हैं। (२०)

उन लोगों ने इन्द्र सहित स्तु, अग्नि एवं वायु आदि सहस्रों देवों को युद्ध में पराजित कर उनके दर्प को नष्ट किया ए उन्हें स्वर्ग से भगा दिया। (२१)

वह बलवान् विप्रचित्ति मेरी सेना का अप्रगामी जिसने वेगपूर्वक सूर्य के रथ से महावेगयुक्त चक को खींच लिया था। (२२)

अय शंकु, शिय, शंभु, असिलोमा, विलोमकृत, त्रिशिरा, मकराक्ष,पपर्या एवं नतेक्षण-ये तथा अन्य अनेकों नानायुद्ध- विशारद घलवान (दैत्य मेरे सहायक हैं) जिनमें प्रत्येक की सोलहवीं क्ला के भी तुल्य विष्णु नहीं हैं। (२३-२४)

पुलस्त्य ने कहा-पौत्र के इस वचन को सुनकर सत्यात मुद्ध उन प्रहलाद ने विष्णु निन्दक बलि से कहा- तुम पापी दुष्टबुद्धि मूर्ख को धिक्कार है। हरि की निन्दा करते हुए तुम्हारी जिता क्यों नहीं गिर गयी? (२५-२६)

हे दुधुद्धि । हे हमति ! तुम सोचनीय एवं सज्जनों द्वारा निन्दनीय हो। क्योंकि तुम त्रिलोक के गुरु विष्णु की निन्दा कर रहे हो। (२७)

'निस्सन्देह में भी शोचनीय हूँ जिसने तुम्हारे उस

पिता को उत्पन्न किया जिससे तुम देवनिन्दक तथा र पुन हुए(२८)

निश्चय ही तुम एवं ये महासुर भी जानते हैं जनार्दन से अधिक कोई अन्य मेरा प्रिय नहीं है। (२६)

हरि मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है यह जानते हुए भी तुमने सर्वेश्वरेश्वर देव की निन्दा कैसे की १ (३०)

तुम्हारे पिता (तुम्हारे लिये) गुरु एवं पूज्य हैं। उनका भी गुरु एवं पूज्य मैं हूँ। लोकगुरु भगवान हरि मेरे भी पूज्य एवं गुरु हैं। (३१)

हे मूढ़ पापी ! गुरु के गुरु के भी गुरु तुम्हारे लिए पूज्य एवं पूज्यतम हैं। तुम पूज्य की निन्दा करते हो अत: तुम अधः पतित क्यों नहीं हो गये । (३२)

तुमने इन दुराचारी दानयों को सोचनीय बना दिया । क्योंकि वासुदेव के निन्दक क्रूर तुम इनके राजा हो।

हे पापाचारी ! क्योंकि तुमने पूज्य एवं अर्चनीय हरि पी निन्दा की है अतः तुम्हारे राज्य का नाश होगा। (३४)

क्योंकि मन, कर्म एचं वाणी से मेरा केशव से थधिक

अन्य कोई प्रिय नहीं है अत राज्य भ्रष्ट होकर तुम अध पतित हो जाओ। (३५)

क्योंकि चतुर्दश लोगों में उनसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है अत राज्य भ्रष्ट होकर तुम पतित हो जाओ। (३६)

क्योंकि ससार मे सभी भूतों का (वासुदेय के अतिरिक्त अन्य कोई) आश्रय नहीं है अव में तुम्हे राज्यच्युत (३७)

पुलस्त्य ने कहा-हे ब्रह्मन् । ऐसा कहे जाने पर पलवान् बलि गीर आसन से उतरा एव हाथ जोड़ पर शिर से प्रणाम कर कहा-हे गुरु । मेरे उपर आप प्रसन्न हो । गुरुजन अपराध परने पर भी शिशुओं को क्षमा करते है। (३८-३९)

हे दानवेश्वर। आपका मुझे शाप देना उचित है। में शटओं व राज्य के विनाश से भयभीत नहीं हूँ। (४०)

हे विभु । मुझे राज्य से विच्युत हो जाने का दु स नहीं है। आपका अपराध करने का मुझे सर्वाधिक दुस है। (४१)

अतः हे तात । मेरे अपराध को क्षमा करें। में एक

अनाथ दुष्टबुद्धि पालर हूँ। गुरजन दोष करने पर भी दीन घने हुए शिशुओ को क्षमा करते हैं। (४२)

पुलस्त्य ने कहा -ऐसा वचन कहने पर विष्णु के चरणों में भक्ति रखने वाले मोह-रहिन महात्मा (प्रहलाद) ने चिरफाल तक विचार कर पौत्र से इस प्रकार यह अद्भुत एय मधुर पचन यहा। (४३)

प्रहलाद ने कहा-हे तात । मोह ने मेरे ज्ञान एव विवेक को ढक दिया था। इसी से विष्णु को सर्वगत जानते हुए भी मैंने तुम्हें शाप दिया ।

हे दानव । निश्चय ही तुम्हारा ऐसा भविष्य था। इसी से विवेक का प्रतिबंधक महामोह मुझमें प्रविष्ट हुआ था। (४५)

अत हे विभो । राज्य के लिए दुख मत करो। अवश्य- म्भावी विपय कदापि विनष्ट नहीं होते। (४६)

बुद्धिमान व्यक्ति को पुन, मित्र, पत्नी, राज्यभोग और धन के आने तथा जाने पर दुखी नहीं होना चाहिए। (४७)

हे दैत्येन्द्र । पूर्वकर्मों के विधान से जैसे जैसे सुख और दुख आते है, मनुष्य को उसी प्रकार उनको सहन करना चाहिये। (४८)

सयमी व्यक्ति को आपत्तियों का आगमन देखकर दुखी नहीं होना चाहिए एव अत्यन्त विपुल सम्पत्ति को देखकर धैर्यच्युत नहीं होना चाहिए । (४६)

उत्तम पुरुष धन का क्षय होने पर मोह एव धन की प्राप्ति होने पर हर्ष नहीं करते। वे कर्त्तव्य के प्रति सदा धीर बने रहते हैं। (५०)

हे दैत्येन्द्र । ऐसा जानकर तुम्हे किसी प्रकार का विषाद नहीं करना चाहिये। तुम विद्वान हो। विद्वान् दुखी नहीं होता। (५१)

हे महामाहो। तुम्हारे लिये तथा अन्यों के लिये महान् अर्थपूर्ण तथा हितकर (वचन) सुनो एवं सुनकर वैसा ही करो। (५२)

हे दानवेन्द्र । तुम उन्हीं शरण्य पुरुषोत्तम की शरण मे जाओ। वे ही इस भय से तुम्हारी रक्षा करेंगे। (५३)

आदिमध्यान्तहीन, चराचरगुरु, ससाररूपी गर्त मे गिरे हुओं के हाथ को अवलम्ब देने वाले एव सर्वनियामक हरि विष्णु की शरण मे जाने वाले मनुष्य निश्चय ही ससार में दुखी नहीं होते। (५४)

हे दानषश्रेष्ठ । अप तुम उन्हीं मे मन लगाकर उनके भक्त बनो । वे जनार्दन ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। (५५)

मैं भी पापक्षय के लिए ईश्वर की आराधना र तीर्थ यात्रा करने जाऊँगा। पापषिमुक्त होकर मैं यहाँ जाऊँगा जहाँ लोकपति अच्यूत नृसिह है। (५६)

पुरुस्त्य ने कहा-इस प्रकार बलि को आश्वासन देने के उपरान्त महात्मा (प्रह्लाद) ने योगाधिपति विष्णु का स्मरण किया एव दानवसमूहों के पालकों से अनुमति ले कर तीर्थयात्रा करने चले गये।, (५७)