वामन महा पुराण
अगस्त्योक्त पाप प्रशमन स्रोत
हे महर्षि । त्रिपुरारि के द्वारा कहे गये इस स्तोत्र का पाठ करने से विष्णुभक्त मनुष्य पापमुक्त और सौम्य होकर प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठ देवनाओ से पूजित होता है। (५१)
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पुटस्य ने कहा- मुनि । में आपसे पापों का शमन बरने पारा दूसरा स्तोत्र पाहता हूँ। म भरीमोनि अभ्यपन परने से पाप नष्ट हो जाता है।
में देश मतय एवं पूर्वरूपधारी गोविन्द का नमस्कार करता हूँ। मैं पसी, मा एवं निविथम विशु को नमरघर करता हूँ। (२)
में माघप, मान, पीफे और कुमार को नमागार करता हूँ। में नारायण को नमरमर रता है। मैं गरवासन हूँ।में सोनमरमर करता हूँ।
में ऊर्थश, नाशिदस्प धारण करने पाने, पुरम्या, पमपार, पराग और पायप्रिय देव ममराराहूँ। (४)
मैं अजित, यिधम्मा, पुण्डरीर, द्विप्रिय, हंस, शम्भु तथा प्रजापति सहित प्रमा को नमस्कार करता। (२)
में शुल्पा, पमघर देय, शिव, विष्णु, मुगार, गोपति एवं पीतामा को प्रणाम करता है।
मैं गदाधारी को नमस्कार करता हूँ। मैं तोय नमरधार करता। में अर्धनारीपर या पापनाशर देव को गमगर (७)
में पेकुण्ठसहिल गपाल तथा अपराजित समार करता है। मैं पिपरप, सौगन्धि, मदाशित प्रगाम करना।
में पाधारिप, पर्मम, वायग्मुर, अमरेपर, पुष्कराक्ष
पयोगन्धि और केशव को नमस्कार करता हूँ।
में अविमुक्त, लोल, ज्येष्ठेश, मध्यम, उपशान्त तथा जम्बुक सहित मारकण्डेय को नमस्कार करता हूँ ।(१०)
में पद्मकिरण को नमस्कार करता हूँ। मैं पढ़यामुख को नमस्कार करता हूँ। में कार्तिकेय वाह्लीक, तथा शिखी को प्रणाम करता हूँ। (११)
मैं स्थाणु एवं अनघ को नमस्कार करता हूँ तथा वनमाली के नमस्कार करता हूँ। में लागलीश तथा लक्ष्मीपति को नमस्कार करता हूँ।(१२)
मैं विनत्र को प्रणाम करता हूँ तथा हव्यवाहन को नमस्कार करता हूँ। निसौवर्ण को नमस्कार करता हूँ तथा घरमीयर को नमस्र करता हूँ।
में विणाचिवेत, ब्रह्मेश तथा शशिभूषण को प्रणाम करता हूँ। मैं सर्वरोगविनाशक कपर्दी को प्रगाम करता (१४)
मैं चन्द्र, सूर्य, ध्रुव, तथा महान् ओजस्वी रुद्र को प्रणाम करता हूँ। में पद्मनाभ, दिरण्याक्ष तथा अव्यय स्कन्द पो प्रणाम करता हूँ। (१५)
में भीम और हंस को प्रणाम करता हूँ। में हाटकेश्वर को प्रणाम करता हूँ। में सदाईस को प्रणाम करता हूँ तथा प्राणतर्पण को प्रणाम करता हूँ। (१६)
मैं रुक्मकवच, महायोगी एव ईश्वर को नमस्कार करता हूँ। मैं श्रीनिवास को नमस्कार करता हूँ तथा पुरुषोत्तम को नमस्कार करता हूँ। (६७)
मैं चतुर्भुज देव को प्रणाम करता हूँ। में घसुधाधिप को प्रणाम करता हूँ। मैं वनस्पनि, पशुपति और अव्यय प्रभु को प्रणाम करता हूँ। (२८)
मैं श्रीकण्ठ, वासुदेव, दण्डी सहित नीलाण्ड, सर्व, अनय, गौरीश तथा गबुन्धर को नमस्कार करता हूँ। (१९)
मैं मनोहर कृष्णकेश तथा चक्रपाणि यो नमस्कार करता मैं यशोधर, महानाहु और कुशप्रिय को नमस्कार करता (२०)
मैं भूधर, वादितगद, सुनेत्र, शूलयांपी, भद्राक्ष, घौरभद्र तथा शकुणिक को नमस्कार करता हूँ। में घृपयज, महेश, विश्वामिन, शशिप्रभ, उपेन्द्र, गोविन्द तथा पञप्रिय को नमस्कार करता हूँ। (२२)
में सहस्रशीर्ष तथा पुन्दमाली देय को नमस्कार करता हूँ। में फाअग्नि, रद्रदेवेश वया कृत्तिवासा को प्रणाम परवा (२३)
में छागनेश को नमस्कार करता हूँ तपा पजासन को