वामन महा पुराण
वामन का बलि के यज्ञवाद में प्रवेश एव बलि से पद वर की याचना, वामन का विराट् रुप प्रह्ण एवं उनका त्रिविकम रुप, बाण का वामन से बलि-बन्धन विषयक प्रश्न, वामन का बलि को वर प्रदान, बलि का पाताल एव वामन का स्वर्ग गमन
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पुलस्त्य ने पहा-इतने मे यामनाकार भगवान आ गये। यज्ञशाला के समीप आर वे ऊँचे स्वर से कहने लगे-
ओंकार पूर्वक घेदमन्त्र तपोधन पियों के रूप में इस यज्ञ में स्थित है। यमों में अश्वमेधयज्ञ सर्वश्रेष्ठ है और दरपस्यामी पलि यशाओं में प्रधान है। (२)
इस प्रकार पे पचन फो मुनार जिसेन्द्रिय दानवाधि- पनि पछि आर्यपात्र लेकर सही यामनदेव गहे थे यही गये। (३)
तदनन्तर अर्य आदि से देवदेवेचर की पूजा करके अमुरपति पति ने भरद्वार मषि के साप करें याशय में प्रविष्ट किया।
गावाग में प्रवेश करते ही पति ने देश की विधिपूर्वक पूजा पी और पदा-दे भगवन् । हे माना। चाहिये में आपापा ?
अविनाशी देषश्रेष्ठ ने देर तक इस फर तयाँ भरद्वाज पो देसर देत्यराज से कहा- मेरे गुरु के गुरु अग्निहोत्री हैं। वे दूसरे की भूमि में नअग्निस्थापन नही करते। (७)
है दानपपति । हे राजन् । उनके लिए मैं आपसे याचना करता हूँ कि मेरे शरीर पे परिमाण से आप तीन पग (भूमि) मुद्दो प्रदान पर। (८)
मुरारि फायपन मुनने के उपरान्त पति ने पत्नी को और पुर पाण को देखकर यह पपन कहा-
हे प्रिये। यह मामन फेपर प्रमाण पेशी छोटा नही है, अपितु पुछिपा भी पोटा है। पोंकि मूर्गताप याद गुप्तमे पेबल गीन पग (भूमि) माँगता है। (१२)
पिपा। माय .भपयुद्धि पाले भाग्यहीन परियों अधिक धनादि नही सादगी से रिणु ने किया
प्रयास नहीं किया। (११)
जिसका भाग्य विपरीत होता है, उसे विधाता नहीं देते हैं। मेरे ऐसा दाता होने पर भी आज ये तीन पग की याचना करते हैं। (१२)
ऐसा कह कर महात्मा पलि ने पुनः हरि से कहा- हे विष्णु ! हाथी, घोड़ा, भूमि, दासी तथा सुवर्ण आदि जो आप चाहते हों, यह मोंगिये । (१३)
आप विष्णु याचक और में जगत्पति दाता हूँ। ऐसी स्थिति में केवल तीन पग का दान करने में दाता त्वं याचक को क्यों लज्जा न होगी? (१४)
हे वामन ! आप याचना करें। रसातल, पृथ्वी, भुवर्लोक अथवा स्वर्गलोक में से में किस स्थान का दान करूँ। (१५)
यामन ने कहा-हाथी, घोड़ा, भूमि, सुवर्ण आदि वस्तुएँ उनके प्रार्थियों को दीजिये। हे राजन् ! में इतने का ही प्रार्थी हूँ। अतः मुझे तीन पग प्रदान (१६)
यामन के ऐसा पचन कहने पर महान् असुर यलि ने कमण्डलु लेकर विष्णु को तीन पग दान दिया। हाथ पर जल गिरते ही तीनों लोकों को नापने के लिये विष्णु ने वृहद् दिव्य विश्वमय रूप धारण किया। (१८)
उनके पेरमे भूमि, जंघाओं में त्रैलोक्य-पूजित आकाश, दोनों जानुओं में सत्यलोक और तपोलोक, दोनों ऊरुओं मे मेरु और मन्दर पर्वत, कटि प्रदेश में विश्वेदेव, वस्ति प्रदेश के शीर्षस्थान परमरुद्गण, लिङ्ग में कामदेव, वृषणों में प्रजा- पति, कुक्षियों मे सप्त समुद्र, जठर में समस्त भुवन, नियली मे नदियाँ एवं उनके जठर मै यज्ञ स्थित थे। (१९-२१)
जठर मे ही इष्टापूर्त आदि समस्त क्रियाएँ अवस्थित थीं। उनकी पीठ में यसुगण और देवगण और कन्धों में रद्रगण अधिष्टित थे। (२२)
सभी दिशायें उनके पादुरवरूप थीं। उनके हाथ में आठ वसुगण, हृदय में ब्रह्मा एवं हृदय की अस्थियों में पुलिश स्थित था। (२३)
उर के मध्य श्री सथा समुद्र, मन में चन्द्रमा, प्रीया में देवमाता अदिति, वथा यलयों में सारी विद्यार्य अवस्थित (२४)
मुस में अग्नि के सहित माक्षण, ओष्ठ में सभी धार्मिक संस्कार, स्लाट में लक्ष्मीसहित तथा पवित्रता
के साथ धर्म, अर्थ, काम एव मोक्ष सम्बधी शास्त्र, कों में अश्विनीकुमार, श्वास मे वायु एव सभी सन्धियों में मरद्गण स्थित थे। (२५-२६)
सनके दाँतों मे समस्त सूक्त, जिह्वा मे सरस्वती देवी, दोनों नेत्रों मे चद्र और सूर्य एष धरोनियों में वृत्तिका आदि नक्षम स्थित थे। (२७)
देवदेव पी शिसा में राजा ध्रुव, रोमकूपों में तारा और रोमों मे महर्पि रोग अवस्थित थे। (२८)
भूतभावन भगवान् ने गुणों के द्वारा सर्वमय होकर एक पद मे ही चराचर सहित पृथ्वी का हरण कर लिया। (२९)
भूमि को नापते समय उन विशाल रूपधारी के चन्द्रमा एव सूर्य दक्षिण तथा टत्तर स्तन हो गए। इसी प्रकार आकाश का अतिक्रमण करते समय सूर्य एव चन्द्रमा उनकी नाभि के वाम एव दक्षिण भाग में अवस्थित हुए। (३०)
तदन तर उन्होंने द्वितीय चरण के आधे से स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक और तपोलो का आकान्त कर शेष आधे से बेरोजोक तथा मध्यभाग से आमाश को आपूरिते (३१)
" हे प्रधा। तदुपरान्त विष्णु का प्रतापी विशाल धरण आकाश में ब्रह्माण्ड के उदर भाग को आहत र निरालोक में चला गया। (३२)
विष्णु के फैल रहे चरण में बलपूर्वक फटाह का भेदन कर दिया। विष्णु का चरण कुटिला नदी के समीप पहुंच गया । हे मुने। इससे फुटिला विष्णुपदी नाम ,से। प्रसिद्ध हुई। तपरवीजन सुरनदी के रूप में उसकी सेवा करने लगे। व्यापक भगवान् तीसरे चरण के पूर्ण न होने पर यलि के पास गए एव अधर को किंचित पुरित करते हुए बोले-हे दैत्येन्द्र । ऋण न चुकाने से भयर यधन होता है। अत तुम मेरे पद को पूर्ण करो अन्यथा बन्धन स्वीकार करो। (३३-३५)
मुरारि के उस वचन को सुनकर पलि के पुत्र घाण ने अमर पति से हँस र हेतुयुक्त वचन कहा- (२६)
माण ने पहा-हे जग पति। आपने स्वायम्भुयादि छ भुवनों का ही निर्माण पर पृथ्वी को छोटा धनाया है। आपने पहले ही भूमि को विपुल नहीं बनाया अते आप यलि से अधिक विस्तृत भूमि कैसे माँगते हैं । (३७)
" है विभो । भुवनान्तरारों सहित जितनी पृथ्वी को सृष्टि आपने पीथी उसे मेरे पिता ने ज आप वो दे
दिया। अतः आप वाक्छल द्वारा उन्हें क्यों बाँधते (३८)
हे मुरारे! जिस पृथिवी की कमी को आप पूर्ण नहीं कर सकते, उसको ये दानयपति कैसे विस्तृत कर सकेंगे. ये आपकी पूजा करने में समर्थ है। अतः आप प्रसन्न हो और चाँधने का आदेश न दें। (३९)
हे ईश! आपने ही श्रुति में यह कहा है कि पवित्र देश, काल एवं परदाता पात्र में दिया गया दान सुख । दायक होता है। हे चक्रपाणि ! यह सम्पूर्ण (योगा दिखलाई पड़ रहा है।। (४०)
'सर्वकामप्रदा भूमि का दान हो रहा है, देवाधिदेव । जितात्मा आप पात्र हैं, ज्येष्टा एवं मूल के योग में स्थित चन्द्रमा से युक्त काल है क्या प्रसिद्ध र पवित्र कुरुक्षेत्र का । देश है। (४२)
अथवा हम जैसे बुद्धिहीन लोगों द्वारा आप भगवान को उचित और अनुचित शिक्षा क्या दी जाय ? आप स्वयं वेदों के भी आदिकर्ता और सदसद् विश्व वो।
व्याप्त कर अवस्थित है। (४२)
आपने स्वयं अपने प्रमाण (शारीरिक आकार) को छोटा बनाकर चीन पग भूमि की याचना की थी। हे देव.! पया आप अपने, त्रैलोक्य पन्दितरूप से तीनों ओंकों को महण नहीं कर लिए हैं? (४३)
आपके तीन पगों को समम जगत् पूर्ण नहीं कर संका, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि अपने एक पग से ही आप इसका उलइन करने में समर्थ है। हे लोकनाथ ! आपने तो यह लीली ही की है। (४४)
हे माधय ! हे पद्मनाभ ! हे विष्णु ! पृथ्यो, को स्वयं ही लघुप्रमाण की यनाकर बलि को वोधना उचित नहीं। प्रभु,जो पाहते हैं यही करते है। (४५)
पुदम्य ने कहा-पलिपुन बाण के-ऐसा कहने पर आदिकर्ता,भावान् जनार्दन ने यह पचन,कहा। (४६)
त्रिविक्रम ने कहा है पलिनन्दन ! तुमने संप्रति इस प्रकार जिन पचनों को कहा है उनका हेनुसंयुक प्रत्युत्तर मुझ से सुनो। (४७)
मैने प्रथम ही तुम्हारे, पिता से यह पहा था कि हे राजन् । मेरे प्रमाणानुसार 'मुझे तीन पग भूमि हो। उन्होंने भलीभाँति उसका अनुष्ठान किया। (४८)
हे असुर । क्या तुम्हारे पिता पलि मेरा प्रमाण नहीं जानते थे जो उन्होंने नि शवभाव से मेरे अनन्त तीन पगों का दान किया। (४६)
यस्तुर अपने एक पैर से ही में समस्त भू भुव आदि जगत् को आमान्त कर सकता हूँ। बलि के हित के लिए ही मैंने तीन पगो को किया है। (५०)
अत हे पलिपुत्र ! क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे हाय में प्रशस्त जल दिया है अत इनकी आयु एक कल्प की होगी। (५१)
हे पाण। माखदेष का सम्प्रतिक मन्यन्तर व्यतीत हो जाने पे उपरान्त सापणिक मन्यनार के आने पर पलि इनबनंगे। (५२)
पलि के पुत्र याण से ऐसा कहने के उपरान्त प्रियिम्म देव पलि के समीप गये एवं उससे मधुर वचन बहा। (५३)
भीमराशन ने कहा है राइन् । दक्षिणा की पूर्ति होने तक तुम्हें यह महाफल प्राय करना होगा। तुम सुनल नामक पाताल मे व्याधि रहित होकर निरास करो। (५४)
पलि ने कहा-हे नाथ। सुतल में निवास करते समय निरामय रूप से रहने के लिये मुझे अक्षय भोग या से प्राप्त होंगे?
त्रिविक्रम ने कहा-हे देत्येन्द्र । में इस समय तुम्हारे सम्मुस उन समस्त बहुमूल्य भोगों का वर्णन करता हूँ जो सुनल में निपास परत समय तुम्हें उपलब्ध (५६)
अविधिपूर्वक किए गये दान, अनोत्रिय द्वारा रिये गए भार ब्रह्मचर्यग्रत-रहित अभ्ययन आप दो फल प्रदान करेंगे। (५७)
इन्द्र पूजन के अनन्नर आने वाली प्रतिपदा को तुम्हारे पूजन के निमित्त दूसरा उरसय मनाया जायणा, जिसका नाम द्वारप्रतिपदा होगा। (५८)
इस रसव के समय इष्ट-पुष्ट, नरमेष्ठ योग मुन्दर रूप से सम पर पुष्प और दोप देकर प्रयत्नपूर्वक वापी (५६)
आप के राज्य में इस समय जिस प्रकार अहोरात्र
पमा जनसमुदाय के कारण रमणीक महोत्सव मना दता है ही प्रकार एसयों में मेष्ठ यह कौमुदी नाम का परमप होगा। (६०)
मपुरन ने दानवेर यति में सर पर पगे परनी सहित गाल येक में भेज दिया। या ये भयभीम प-मगर में पिता भपन गये। (६१)
दमन ! मरे पाद विपरिम्पार भगवान विष्ण, पर पगं देर और देवताओं को या मागाभेला भनार पानी की निं भरप से (२२)
विभाग यादव के पर्ग पर जाने पर जाना हार मुरोकपड़ी मे सर गोम नाम अमित नगर भाग में विपाए(३) मम नपुर पर मान के ग अपण गुगन पहनेमा
पागापुर भी विष्णु के द्वारा पापीन लिये जाने पर सया पलिकपंधने तपा रगानल में रहने पर भाया सुरक्षित: गिा नागा पुर निमांजर दानों के माप रहने लगा।
इस प्रकार प्राचीन समय में पधारा विष्णु ने वामन रूप धारण कर इनकी भाई यात्री की पारि नया प्रा, पियों, गोभी भीर दिनों के दिल पे सिर मकोयोभाया (६१)
हे महर्षि मैंने माप में पान के पार, पियुष एवं पवित्र प्रादुर्भाव पारन रिया। मरे भास, मत न गे पार पि! पण र मन परीवार परिया। अपर गुना पा मेंगपत।