वामन महा पुराण
13 कुरुक्षेत्र के सात वनों और सात नदियों तथा तीर्थों का वर्णन
करके रन्तुक मे जाकर पुन पुन क्षमा प्रार्थना करने के वाद सरस्वती में स्नान कर यक्ष का दर्शन और प्रणाम करे तथा पुष्प, धूप एवं नैवेद्य देकर इस प्रकार वचनरहे-हे यक्षेन्द्र । आपकी कृपासे मैं वनों, नदियों और तीथों में भ्रमण करूँगा उसे आप सदा विघ्न रहित करे।(१९-२१)
१
ऋषियों ने कहा-उन सात वनों, नत्र नदियों, समप्र तीर्थों एव तीर्थ स्नान के फल का हमसे वर्णन करें। (१)
हे पौराणिकोत्तम । जिस जिस विधान से जिस तीर्थ फा जो फल होता है उन सबको विस्तार पूर्वक बतलायें । (२)
लोमहर्पण ने कहा-कुरक्षेत्र के मध्य मे जो सात वन हैं उन्हें सुनो। उनके नाम सभी पापों को नाश करने वाले तथा पवित्र हैं। (३)
पवित्र काम्यक वन, महान् अदिति वन, पुण्यप्रद व्यासयन, फलकी-चन, सूर्यवन, महान् मधुवन तथा सर्वकल्मष नाशक पवित्र शीतवन ये ही सात वन है।हे द्विजो । नदियों को मुझसे सुनो। पवित्र सरस्वती नदी, वैतरणी नदी, महापवित्र आपणा, मन्दाकिनी गङ्गा, मधुसवा, यासु नदी, पापनाशिनी कौशिकी, महापविन हपद्धती तथा हिरण्वती नदी। इनमें सरस्वती के अतिरिक्त सभी नदियाँ यकाल में बहने वाली है। (४-८)
वर्षकाल में इनका जल पवित्र माना जाता है। इनमे कभी भी रजस्वलत्य दोप नहीं होता। तीर्थ के प्रभाव
से ये सभी श्रेष्ट नदियाँ पवित्र है।
हे मुनियो । थापलोग प्रमन्न होकर नीस्नान या महान पल मुनें। यहां जाना एवं उनका स्मरंग फरना समस्त पापों का नाश होता है। (१०)
महारख्यान स्तुक नामक द्वारपाल या दर्शन करने फे उपरान्त यक्ष को प्रणाम कर तीर्थयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये। (११)
हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर महान् अदिनि-यन में जाना पाहिये, नहीं अदिति ने पुत्र के लिए अत्यन्न कठोर तप किया था। (१२)
यहाँ स्नानकर देवमाता अदिति का दर्शन परने से मनुष्य समस्त दोषों से रहित र पुन उत्पन्न करता है और सैकड़ों मयों के समान प्रकाशमान विमा। पर आस्ट होता है। (१३)
विप्रेन्द्रो। तदुपरान्न 'सा' नाम से प्रसिद्ध सर्ग सम विष्णुस्थान को पाना पाहिये, जहाँ मगयान दरि सदा समिहित हते हैं। (११)
विमलनीध में स्नान कर यिमनेपर या दर्शन करने से मनुष्य निर्मल स्वर्ग तथा रदरंक में जाता है। (११)
आसन पर एम्त्र आएपग और परदेव या दर्शन करने से मनुष्य यटिकामप-यम्भूत पापों से मुक्त हो जाता है।
तदनन्तर प्रैलोक्य प्रसिद्ध पारिप्य नामक तीर्थ में जाय । यहाँ स्नान करने के पश्चात् वेद सयुव ग्रामा फा दर्शन करने से मनान का फल एवं निर्मल स्वर्ग की प्राप्ति होती है। योशिका य तीर्थभून सद्गम में जाकर स्नान करने से मनुष्य परम पद प्राप्त करता है। (१७-१८)
सम्पापविनोचा घरगी के तीर्थ में जाकर स्नान परने से धमाशील मनुर परम पद प्रात परता है। (१६)
यहाँ स्नान करने मात्र से पृथ्य पर मनुष्य दारात समस अपराध श्रमित हाजार है। (२०)
सदनभर शाम में जारर दक्षरसर शिव कादर्शन करने से मनुष्य अधर्मध या का पल प्रान पाता है। (२१)
है दिनसमा । तदननरसाफिनी तीर्थ में जाकर स्नान करने पराल मक्कियकहर से सयुकदार का पूजन कर मनुष्य सर्पशयिनित अभिमत प्राप्त प्रता (२२)
सपिर्दधि नामक नागों के उत्तम तीर्थ मे जाकर स्नान करने से मनुष्य नाग भय से मुक्त हो जाता है। (२३)
हे विप्रश्रेष्ठो। तदनन्तर रन्तुक नामक द्वारपाल में जाना चाहिये। वहाँ एक राति निवास करे तथा कल्याण- कारी श्रेष्ठतीर्थ में स्नान करने के उपरान्त दूसरे दिन प्रयत्न पूर्वक द्वारपाल का पूजन करे एव वाद्वाणों को भोजन करावे। तदनन्तर प्रणाम कर इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे-'हे यक्षेन्द्र । तुम्हारी कृपा से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। मैं अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करूँ" इस प्रकार यझेन्द्र को प्रसन्न करने के पश्चात् पश्चनद तीर्थ मे जाना चाहिये । जहाँ भगवान रुद्र ने दानवों के लिये भयकर पाँच नदों या निर्माण किया है वहाँ समस्त ससार में प्रसिद्ध पश्चनद तीर्थ है। (२४-२७)
क्योंकि करोड़ों तीर्थों का समाहरण कर रुद्र वहाँ स्थित अत उसे त्रैलोक्य विख्यात कोटितार्थ कहा जाता (२८)
श्रद्धा-समन्वित मनुष्य उस तीर्थ में स्नान कर तथा कोटीश्वर हर का दर्शन कर पश्चयज्ञानुष्टान का फल प्राप्त करता है। (२६)
उसी स्थान पर सब देवताओं ने भगवान् वामनदेव की प्रतिक्षा की है। वहाँ भी स्नान करने से मनुष्य को अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। (३०)
श्रद्धावान जितेन्द्रिय मनुष्य अश्विनीकुमारों के तीर्थ में जाकर रूपवान् और यशस्वी होता है। (३१)
विष्णु द्वारा वर्णित प्रसिद्ध वाराह नामक तीर्थ में स्नान कर श्रद्धालु पुरुष परम पद प्राप्त करता है। (३२)
हे विप्रेन्द्रो । तदनन्तर सर्वश्रेष्ठ सोमतीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ पूर्वकाल मे तपस्या करने से चन्द्रमा व्याधि-मुक्त हुए थे।
उस शुभ तीर्थ में स्नान कर सोमेश्वर का दर्शन करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है तथा व्याधियों और सभी दोपों से मुक्त होकर सोमलोक में जाता है, एवं चिरकाल तक वहाँ रमण करता है। (३४-३५)
वहीं पर भूतेश्वर एव ज्वालामालेश्वर नामक लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गों की पूजा करने से पुनर्जन्म नहीं होता। (३६)
'एक्स' में स्नान कर मनुष्य हजारों गौवों के दान का फल प्राप्त करता है । 'कृतशौच' नामक तीर्थ में जाने से तीर्यसेवी द्विजोत्तम पुण्डरीक (यज्ञविशेष) के फल को प्राप्त
करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है। तदनन्तर बुद्धिमान् महादेव के मुअवट नामक तीर्थ मे एक राति निवास करके मनुष्य गाणपत्य प्राप्त करता है। षही ससारप्रसिद्ध महा प्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान करने के उपरान्त यक्षिणी को प्रसन्न र उपवास करने से महान् पातकों का नाश होता है। (३७-४२)
कुरुक्षेत्र के उस विश्रुत पुण्यवर्द्धक द्वार फी प्रदक्षिणा फर ब्राह्मणों को भोजन कराये । तदनन्तर पुपर पितृदेवों से अर्चना करे। (४१)
जामदग्न्य राम उस तीर्थ को लाये थे । यहाँ (जार) मनुष्य वरस्य होता है और राजा को अचमेध के फल की प्राप्ति होती है। (४२)
फार्तिकी पूर्णिमा को जो यहाँ कन्यादान करेगा, देवता उसके ऊपर प्रसन्न होकर उसे अभिमत फल देंगे। (४३)
यहाँ स्वयं कपिल नामक महायक्ष द्वारपालरूप से स्थित है, जो पापियों के मार्ग में विघ्न उपस्थित कर उनकी दुर्गति करते हैं। (४४)
उदूसलमेसला नामक उनी महायझी पत्नी दुन्दुभि पजा कर यहाँ नित्य भ्रमण करती रहती है। उस यक्षी ने पाप देश में उत्पन्न एक सपुना स्त्री को देखने के उपरान्त रात्रि में दुन्दुभि बजाकर उससे कहा- (४६)
युगन्धर में दही सारर तथा अच्युतस्थल में निवास करने के उपरान भूतालय में स्नान कर तुम पुत्र के साथ निरास करना चाहती हो। (१७)
मैंने दिन में यह यात कही है। रात्रि में में अवश्य तुमुमो खा जाऊँगी। उसरी यह यात सुनने के अनन्तर यक्षिगा यो प्रणाम कर उसने दीन यापी से यहा "हे भामिनी मेर ऊपर अनुप्रह करो।" तदनन्तर उस यक्षिणी ने उससे कृपापूर्वक कहा- (४८-98)
जब किसी समय सूर्य ग्रहण होगा उस समय सानिहत्य में स्नान पर पवित्र होकर तुम स्वर्ग जाओगी। (५०)