सुकेशि के वृत्तान्त के अन्तर्गत जम्बूद्वीप के वर्षो का वर्णन भुवनकोश में भारतवर्ष के द्वीपों, पर्वतों, नदियों तथा जनपदों का उल्लेख

कृतघ्न प्रधानतम पापी होता है। ब्रह्महत्या एवं गोहत्या आदि पापों की निष्कृति तो होती है किन्तु दुष्टचारी एव सुहृदू के किये को नष्ट करने वाले कृतघ्न की निष्कृति करोडों वर्षों में भी नहीं होती। (५५-१६)

सुकेशी ने कहा-हे ऋषिगग, आप लोगों ने पुष्कर द्वीप की घोर सस्थिति का वर्णन किया, अन जम्बूद्वीप के सस्थान का वर्णन करें।

ऋपियों ने कहा-जम्पद्वीप की स्थिति का वर्णन हम रोगों से मुनो। यह अति विस्तीर्ग द्वीप नर भागों में विमा जित है तथा रबर्ग मोक्ष के पल को देने वाला है। (२)

हे राक्षसेघर। इसके पीच में इलायव वर्ष, पूर्व में अद्भुत मद्राच पर्प, तथा पूर्वोत्तर में हिरण्य पर्प है। (३)

पूर्व-दक्षिण में किन्नर वर्ष, दक्षिण में भारतवर्ष तया दक्षिण-पश्चिम में हरिवर्ष यताया गया है।

पश्चिम में केतुमाल चर्प, पश्चिमोत्तर में रम्यक वर्ष और उत्तर में फल्पवृक्ष से समावृत कुरुवर्ष है। (५)

हे शालपटकट  ये ना पवित्र और रमणीय घर्ष हैं। भारतवर्ष के अतिरिक्त इलावादि आठ वर्षों में युगावस्या तथा जरामृत्यु का भय नहीं होता। उनमें विना प्रयत्न के साभाविक तथा सुख यहुल सिद्धि होती है तथा उनमें कोई विपर्यय (परिवर्तन) तथा उत्तम, मध्यम एवं अघमरा भेट भी नहीं होता। निशाचर | इस भारतवर्ष में नव द्वीप है। ये सभी द्वीप समुद्रों से व्ययहित है और परस्पर अगम्य है। (६-८)

भारतवर्ष के नवद्वीपों ये नाम इस प्रकार है-इन्द्रद्वीप,फसेरुमान, ताम्नवर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, क्टाइ, सिहल, और वारुण वया यह सागर से युक्त युमार नामक नवम द्वीप दक्षिण से उत्तर की ओर फैला है। (६-२०)

हे वीर । भारत के पूर्व की सीमा पर किरात, पश्चिम में ययन, दक्षिण मे आन्ध्र तथा उत्तर मे तुरुष्क लोग स्थित है। (११)

इसके अन्तर्भाग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र लोग रहते हैं। या, युद्ध एव पाणिज्य आदि वर्मों के द्वारा ये सभी पवित्र किये गये हैं। उनरा व्यवहार, स्वर्गापवर्ग की को प्राप्ति तथा पाप एवं पुण्य इन्दी फों द्वारा होता है। (१२-१३)

इस वर्ष में महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान् ऋक्ष, विन्ध्य एवं पारियान्न नाम पाले साव फुल (मुख्य) पर्वत है। (१४)

इसके मध्य में अन्य हासों पर्वत है जो अत्यन्त विस्तीर्ण, उत्तु, रम्य एवं सुन्दर ग्रहों पाले हैं। (१५)

कोलाहल, पेधाज, मन्दर, दुर्दर, यातंधम, येयुत, मैनारु, सरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, गोवर्धन पर्वत, उजायन, पुष्पगिरि, अर्बुद, रैयन, ऋष्यमूक, गोमन्त, चित्रमूट, फुतरमर, श्रीपर्वत, पोहण तथा सैकड़ों अन्य पर्वत (यहाँ है)। (१६-१८)

इनसे आयों और म्लेच्चों के विभागानुसार जनपद संयुक्त है। यहाँ के निवासी, जिन श्रेष्ठ नदियों पा जल पीते हैं उनका वर्णन भली भाँति सुनो। (१६)

सरस्वती, पनरूपा, पालिन्दी, हिरण्यती, शगु, थन्द्रिका नीला, वितस्ता, ऐरारती, धुर्, मधुरा, दाररावी, उशीरा, धातुकी, रसा, गोमती, पूनपापा, याहुदा, पद्वती, निश्चिरा, गण्डरी, चिना, कौशिकी, वधूसरा, सरयू तथा लोहित्या-ये नदियाँ हिमालय के पाद से निकली है। (२०-२२)

वेदरमृति, वेदसिनी, मनी, सिन्धु, पर्णाश, नन्दिनी, पायनी, मही, पाण, चर्मपती, लूपी, विदिशा, वेणुमती, सिमा तथा अमन्दी-ये नदियाँ पारियार पांव से मिस्टी हैं। (२३-२४)

महानद शोण, नर्मदा, मुरसा, पा, मन्दाकिनी, दशार्शा,