वामन महा पुराण
सुकेशि के उपाख्यान के अग्तर्गत ऋषियों द्वारा उसके लिये धर्मोपदेश तथा देवादि द्वादश योनियों के धर्म का कथन भुवनकोश एव इक्कीस नरकों का वर्णन
नारद ने कहा-"आपने जो यह कहा था कि सूर्यने | मुफेशी पे नगर को आकाश से पृथ्यी पर गिरा दिया था, तो यह घटना पर और यहाँ हुई ?
"यह मुकेशी कौन था ? उसे नगर किसने दिया था ? तथा भास्कर ने आकाश से पृथ्वी पर उससे क्यों गिरा दिया था ?" (२)
पुलम्स्य ने कहा-हे अनघ ! मघा ने मुझसे जिस प्रकार इस प्राचीन कथा को यहा था उसे में कह रहा हूँ श्राप सावधान होरर मुनें।
यिपुरेशी नाम का निशाचरों का एक प्रसिद्ध राजा था। उसने गुणों से वरिष्ठ मुरेशी नाम का पुत्र
उस पर प्रसन्न दोर शिव ने उसे एक आकाशपारी नगर और शत्रुओं से अमेय तथा अवश्य होने पर भी दिया।
यह घर से भेउ पाचगारी नगर पार राक्षसों के साथ सदा धर्म पथ पर रहते हुये आनन्द मनाने लगा। एक समप मापारण्य में जागर उस पसेपर ने यहाँ ध्यान परायण ऋपियों के आश्रमों को देखा। (७) उस समय महर्पियों यो देसम्र अभियादन और प्रणाम परने के उपरान्त आसन पर येठकर उसने समस्त पियों (८)
मुपेशी ने कहा-में आप पाता नहीं दे रहा हूँ, अपितु, मेरे इदय में यह संदेह है उसे में आपसे पूछना चाहता हूँ। धाप मुझसे कहिये ।
हे द्विजोत्तमो! इस शेर और परटोक में प्रेग क्या है? मनुष्य सप्तनों में प्रेमे पाय होता है और कैसे उसे मुग की लपटम्धि होती है? (१०)
पुन्टास्य ने कहा-मुरशी के इस प्रसार के पपनको मुनम भेट ऋपियों ने इसोक भोर परलोक में मेय पस्नु का विचार कराया।
ऋषियों ने था-"यस बेष्ठ! वीर! इस श्रेष्ट
और परलोक में जो श्रेय तथा अव्यय वस्तु है उसके विषय में हम कहते हैं । उसे सुनो। (१२)
हे निशाचर ! इस लोक और परलोक में धर्म श्रेय है। उसमे आश्रित व्यक्ति सजनों में पूज्य होता है तथा सुसी होता है। (१३)
सुकेशी ने कहा-"धर्म का लक्षण क्या है ? उसमें कौन से आचरण एव सकर्म होते हैं जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुसी नहीं होते। कृपया उसका वर्णन
ऋषियों ने कहा-सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णु पूजा मे रति-यह देवताओं का परम धर्म है।
पाहुबल, इष्योभाव, युद्धकाये, नीतिशास्त्र का ज्ञान और हर मक्ति-ये दैत्यों के धर्म कहे गये हैं। (१६)
श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, प्राविज्ञान और इन दोनों (विष्णु और शिव) में स्थिर भक्ति यह सिद्धों का धर्म कहा गया है। (१७)
उत्कृष्ट उपासना, नृत्य और पाय का ज्ञान तथा सरस्वती के प्रति स्थिर भक्ति-यह गन्धर्षों का धर्म कहा जाता है। (१८)
अतुलनीय विद्वत्ता, विज्ञान, पौरुषवुद्धि और भगानी के प्रति भक्ति-यह विद्याधरों का धर्म है। (१६)
गन्धर्वविद्या का ज्ञान, सूर्य के प्रति स्थिर भक्ति और सभी शिल्प कलाओं मे कुशलता-यह फिम्पुरुषों का धर्म माना जाता है। (२०)
ब्रह्मचर्य, अमानित्य, योगाभ्यास मे हद रति एव सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण-यह पितरों का धर्म कहलाता है । (२१)
हे राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान, और नियमानुसार धर्मज्ञान यह पियों का धर्म कहा जाता है। (२२)
स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यजन, अकार्पण्य, परिश्रम- रहित्य, दया, हिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य, तथा विष्णु, शकर, भारफर और देवी में भक्ति- यह मनुष्यों का धर्म है। (२३-२४)
घनाधिपत्य, भोग, स्वाध्याय, शंकरार्चन, अहंकार एवं अशौण्डीर्य (अवीरता) यह गुपकों का धर्म है। (२५)
परस्त्रीगमन, दूसरे के धन में लोलुपता, स्वाध्याय और शिवभक्ति यह राक्षसों का धर्म कहा जाता है। (२६)
अविवेक, अज्ञान, शौचहीनता,असत्यता एव सदा मास लोलुपता यह पिशाचों का धर्म है। (२७)
हे राक्षस। ये द्वादश योनियाँ है। पितामह ब्रह्मा ने उनके द्वादश पवित्र तथा उत्तम गतिदायक धर्मो वो कहा है।
सुकेशी ने कहा- आपने जिस शाश्वन एव अव्यय बारह धर्मो को कहा है उनमें मनुष्यों के धर्मो को पुन कहें।
ऋषियों नेकहा- हे निशाचर। पृथ्वी के सात द्वीपों में निवास करनेवाले मनुष्य आदि के धर्मों को सुनो।
पचास करोड़ योजन के विस्तारवादी यह पृथ्वी जल के ऊपर इस प्रकार स्थित है जैसे नदी पर वोक्या।
हे सजनश्रेष्ठ उसके ऊपर देवेश ब्रह्मा ने कर्णिका के आकार वाले अत्यव्कत ऊचे शैलेन्द्र को स्थापित किया है।
तदनन्तर उस पर ब्रह्मा ने चतुर्दिक पविन्न प्रजाओं का निर्माण तथा द्वीप सज्ञक स्थानों को भी बनाया है।
उसके मध्य में जम्बूद्वीप धनाथाष। इसका प्रमाण एक रुक्ष योजन का कहा जाता है। (३४)
उसके बाहर द्विगुण परिमाण में रौद्र समुद्र है तथा उसके उपरान्त उसका द्विगुण प्लक्ष द्वीप स्थित है। (३५)
उसके बाहर द्विगुण प्रमाण घाला वलयाकार इक्षु रस सागर है। इस महोदधि का दुगुना शाल्मलि द्वीप है । (३६)
उससे दुगुना सुरासागर है तथा उससे दुगुना कुश द्वीप है । कुशद्वीप से दुगुना घृतसागर है। (३७)
हे निशाचर । घृत सागर से दुगुना नौचद्वीप कहा गया है तथा उससे दुगुना दधि नामक समुद्र है। (३८)
दधिसागर से दुगुना शाकद्वीप है । एव शाकद्वीप से द्विगुण उत्तम क्षीरसागर है जिसमें शेष पर्यवशायी श्री हरि स्थित है। ये सभी परस्पर एक दूसरे से द्विगुण प्रमाण में स्थित हैं। (३६)
हे राक्षसेन्द्र । जम्बूद्वीपसे रेकर क्षीरसागर के अन तक का विस्तार चालीस करोड़ नब्बे लाख पाँच योजन है। (४०)
१. पोजन के अनेक परिमाग विभिन्न शास्त्रों में मिलते हैं, जिनमें बहुत मल्प परिमाण भी है।
हे राक्षस । इसके बाद पुष्करद्वीप एवं तदनन्तर सुस्वादु जल का सागर है। चार करोड बावन लाख योजन पुष्कर दोष का परिमाण है। तदुपरान्त उसी परिमाग का समुद्र भी है। इसका एक लक्ष योजन चतुर्दिक अण्डफटाह से परिपूर्ण है। (४१-५२)
इस प्रसर ये सात द्वीप पृथक धर्मों और पृथक क्रियाओं से युक्त है । हे निशाचर । हम इनका वर्णन करते हैं। उसे तुम सुनो। (४३)
हे वीर । प्लक्ष से शाम तक के द्वीपों मे जो सनातन पुरुप निवास करते हैं उनमे किसी प्रकार की युग की व्यवस्था नहीं है। (४४)
हे महाबाहो । वे देवताओं के समान आनन्द करते हैं। उनका धर्म दिव्य कहा जाता है। कल्प के अन्त में उनका प्रलय होना वर्णित है।
भयकर दीखने वाले पुष्काद्वीप में जो लोग रहते हैं वे पैशाचिक धर्मों के आश्रित होते हैं। कर्म के अन्त मे उनका नाश होता है। (४३)
मुकेशी ने कहा-आप लोगों ने पुष्करद्वीप को क्यों भयकरदर्शन, पवित्रतारहित, पोर एवं कर्म के अन्त में नाश करने वाला कहा है। (४७)
ऋपियों ने कहा-हे निशाचर । उस द्वीप में रौरव आदि भयानक नरक है। इसी से रौद्र पुष्कर द्वीप देखने में भयर है। (४८)
सुकेशी ने कहा- हे तपस्वीगण । वे रौद्र नरक क्तिने है ? उनका मार्ग कितना है? उनस स्वरूप कैसा है?
ऋपियों ने यहा हे राक्षसश्रेष्ठ । उन समस्त रौरव आदि नरकों का लक्षण और प्रमाण सुनो। उनकी सख्या इशीस है। (५०)
प्रथम रौरव नामक नरक कहा जाता है। यह दो हजार योजन विस्तृत एव ज्वलित अगार से युक्त है। (५१)
इससे द्विगुणित महारीख नामक द्वितीय नरक है। उसकी भूमि जलते हुये ताबे से बनी है, जो नीचे से अग्नि द्वारा तापित होती रहती है। (५२)
उससे द्विगुणित विस्तृत तीसरा तामिस्र नामक नरक कहा जाता है। उससे द्विगुणित अघतामिस्र नामक चतुर्थ नरक है। (५३)