वामन महा पुराण
देवी एवं महिषासुर में युद्ध तथा महिषासुर का वध
निम्न गगला कर दिया । उसके ऊग पर मुनिसंस्तुता दुर्गा दानवों के विनाशार्थ स्थित हुई। (३६)
देयता, सिद्ध, महानाग, विद्याधर एवं समस्त भूतगण अप्सराओं के सहित पात्यायनी को प्रसन्न करते हुए शोक-रहित होकर उनके निकट रहने लगे। (३७)
पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर उस श्रेष्ठ पर्वत-शिसर पर निधास करने पाली उस तपस्विनी पात्यायनी दो घण्ड और मुण्ड नामक दो श्रेष्ठ दानयों ने देखा। (१)
देखने के पश्चान् पर्वत से उतर कर दोनों देयशव अपने पर गए। महिषासुर के पण्ड मुण्ट नामक उन दोनों दूतों ने दैत्यराज के निष्ट जाम यह कहा- (२)
हेभसुरेन्द्र ! आप इस समय स्वस्थ वो है ? भाइये,हम- टोग यिभ्यपर्यत पर पलकर देरों। यहाँ मुरमुन्दरियों में रूप-बनी एक श्रेष्ठ लक्षणों वाली कन्या देवी अवस्थित है। (३)
उप्त कृशाद्गी सुन्दरी ने केशपाश के द्वारा मेघों को, मुख द्वारा शशाङ्क को, तीन नेत्रों द्वारा तीन (गाईपत्य, दक्षिण, आवहनीय) अग्नियों को और कंठ के द्वारा शंस को जीत (४)
उसके मग्नचुक पाने सुवृत्ताकार स्वन इस प्रकार पित है मानों उन्होंने हाथी के दोनों गण्डस्थलों को जीव लिया हो। यह प्रतीत होता है मानों आपको सर्ययिजयी
समझ कर कामदेय ने ही कुपरूपी दो मुन्दर दुर्गों की रपना की है।
उसी मोटी, परिप सदश सशास्त्र अधारद मुनाएँ इस प्रचार गुशोभित हो रही है मानों आपरा पराम्म जान कर कामदेव ने यन्त्र फे सरश ना निमांग किया है। (६)
देदेरयेन्द्र त्रियलो सेतशिन तथा मुन्दर रोमायलि पाला उसका मप्यभाग इस प्रकार मुशोभित हो रहा है मानों यह मयात तथा आरोहण के लिये अधीर शमदेय का सोपान हो। (७)
असुर! पीनापापउग्न उसको यह रोमाजि इस प्रयर मुभिा हो रही है मानों आरोदा परने में आप भय से प्रतर फामदेव का पेद प्रयाह हो । (८)
दक्षिण की ओर भी दुई गये गंभीर नाभि इम असा प्रतीत हो रही है मानो दर्षनरेश ने पर्व ही इस प्रयापद के ऊपर मुद्रा ख्याई हो।
चारों ओर मेराला से वेष्टित उम मृगाझीया रमणीय जपन मुशोभित हो रहा है। उसे हम कामनरेश का चहारदीगरी से मुरथित दुर्गम नगर मानते हैं। (१०)
उस कुमारी के पृत्तागर, रोमरहिन, कोमल नया उत्तम ऊरु इस प्रसर शोभित हो रहे हैं मानों मारपत्र ने मनुष्यों में निशमार्थ दो देशों का मप्रिवेश रिया । (११)
हे महिषणमुरेन्द्र । उममे अझैमा जानुयुगल इस प्रकार मुशाभित हो रहे हैं मानो उन (पना करने के उपरान्त भात विधाता ने निरसगार्थ अपना कराउ म्यात किया हो। (१२)
हेदैरयेपर! यसरी मुवृत्त प्यारोमदीन दोनों पाएँ इस प्रकार मुगंभित हो दी है मानों सोप्रतिषमा निर्मित हो गई नायिका के द्वारा नीपी की गई है। (13)
विधाता ने प्रपरन उसके घाटोदर हे समान पानियाने पाहपुगर का निर्मात
रुपी रत्नों की माला को इस प्रकार प्रकाशित किया मानों आकाश में नक्षत्रों की माला हो । (१४)
हे दनुनाथ । महान् एव उन शस्त्रों को धारण करने वाली वह कन्या ऐसे स्वरूपवाली है। उसे भरी. भौति देखकर भी हम यह न जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुनी या स्त्री है।
हे महासुरेन्द्र | स्वर्ग का परित्याग कर वह श्रेष्ठ रत्न भूतल में स्थित है। आप स्वयं विन्ध्याचल पर जाकर उसे देखें तथा जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह (१६)
उन दोनों से देवी विषयक कमनीय वार्ता को सुनने के उपरान्त "इस विषय में कुछ विचारणीय नहीं है" ऐसा कहकर (जाने का) निश्चय किया। अब महिप भी नहीं रहा (अर्थात् उसका भी अन्त आ गया)। (१७)
मनुष्य को ब्रह्मा ने पहले से ही तत्तत् स्थानों पर नियत कर दिया है जिस व्यक्ति को जहाँ पर या वहाँ से जिस प्रकार जो-जो (शुभाशुभ मिलने होते) हैं
वह वहाँ या तो ले जाया जाता है या स्वयं चला जाता है। (१८)
तदनन्तर महासुरेन्द्र ने मुण्ड, नमर, चण्ड, विडाछ- नेत्र, पिशगवानल, उपायुध, चिक्षुर और रक्तबीज को आदेश दिया। (१९)
रणवश वे सभी दानव भेरियाँ बजाने के उपरांत स्वर्ग का परित्याग कर पर्वत के निकट आकर उसके मूल मे शिविर का निवेश कर तैयार होकर स्थित हो गए। (२०)
तदुपरान्त महिषासुर ने दुन्दुभि-तुल्य शब्द करने वाले रिपुसैन्यमी तथा दानवों के सेनापति मयपुत्र दुन्दुभि को (देवी के पास) भेजा। (२१)
हे विष! दुन्दुभि ने देवी के निकट जाकर तथा आकाश मे स्थित होकर यह वचन कहा "हे कुमारी! युन में अप्रतिम तथा रम्भ के पुत्र महासुर का मैं दूत (२२)
कात्यायनी ने दुन्दुभि से कहा-“हे दैत्येन्द्र ! भय को
छोड़पर यहाँ आओ और एमपुत्र ने जो पचन कहा है से मोदरहित होकर सत्य-सत्य कहो।
शिया पे मक प्रसर के कयनोपरान्त देत्य भाकाश पर पृथ्वी पर आया एवं श्रेष्ठ आसन पर मुपपूर्वक येटकर स्मात्मज द्वारा फभिन दास्य को कक्षा । (२५)
दुन्दुभि ने कहा-हे देवि । सुगरि महिपामुर ने नुम्हें यह समाहापित दिया है कि मेरे द्वारा युद्ध म पिजिन पटहीन अमर टोग पूथ्यी पर भ्रम कर रहे हैं। (२५)
हेयाले । स्वर्ग, प्रयी, यायुमार्ग, पाता और म पादि सभी मेरे यार हो गए है। में ही इन्द्र, रुट, दिपार प सभी स्त्रों का अधिपति है। (२६)
स्वर्ग, प्रयी या रसााल में जीवित रहने छ पप्पापाला ऐसा ईषपोडा, भार, मूत या पक्ष नही जो युद्ध में मेप सामना करें। (२३)
हे मुग्धे। हे विशालनेने। पृथ्वी, स्वगं या पाताल में जितने भी रन हैं वे सभी पारमाजित होकर आज मेरे पास आ गए हैं। (२८)
आप स्पोररनों में मेष्टफया है। में आपके लिये पर्यत पर आया है। इसलिये मुन जगत्पति हो तुम सोया करो। पिमु एय प्रमु मैं तुम्हार योग्य पति हूँ। (२६)
एललय ने दा-दस्य के ऐसा पास यनी ने मप पे पुत्र से कहा- “यह सरय है कि दानपण्द पृथ्वी में प्रमु है एवं यह भी मश्य है कि (इसन) युस में देयों ग्रेजीन रिया।
रिगुई दावेश हमारे कुछ में गुजर नामक एक पमै प्रसिद्ध है। यदि मदिप प्रान मुन पद प्रदान करतो सत्य के द्वारा में इस यानि पनि शिधर र
इस वाक्य को मुन कर मयपुत्र ने कहा "हे कमल-पत्र के समान नेत्रवाली ! शुल्क को बताओ। वह तुम्हारे हेतु अपना मस्तक भी दे सकता है। शुल्क की तो यात ही क्या जो यहीं पर प्राप्य है। (३२)
पुलस्त्य ने कहा-दनुनायक के ऐसा कहने पर कात्यायनी ने उच्च स्वर से गर्जनकर हँसते हुए समस्त चराचर के हितार्थ यह वचन कहा । (३३)
श्रीदेवी ने कहा- "हे दैत्य । पूर्वजों ने हठपूर्वक हमारे कुल में जो शुल्क निर्धारित किया है उसे सुनो। हमारे कुल में उत्पन्न कन्या को जो युद्ध मे जीतेगा वही उसका पति होगा।" (३४)
पुलस्त्य ने कहा- देवी की वह बात सुन कर दानवेश्वर दुन्दुभि ने जाकर महिषासुर से उस पात को ज्यों का त्यों निवेदित कर दिया। (३५)
सभी दैत्यों के साथ उस महातेजस्वी दैत्य ने प्रयाप्प किया एवं सरस्वती से युद्ध करने की इच्छा से विन्ध्यशिखर पर पहुँचा। (३६)
हे नारद । उदुपरान्त सेनापति चिक्षुर नामक दैत्य ने नमर नामक दानव को सेना का अप्रगामी बनाया। (३७)
उससे अधिकृत होने के पश्चात् वह समस्त सेना के अतिऊर्जस्वित तथा चार अगों से युक्त एक अंश को रेकर वेगपूर्वक दुर्गा की ओर दौड़ा। (३८)
उसको आते देखकर ब्रह्मादि देवताओं ने महादेवी से कहा कि हे अम्बिके । आप कवच पाँध लीजिये। (३६)
तदनन्तर देवी ने देवताओं से कहा-“हे देवगण ! मैं कवच नहीं बाँधूंगी। यहाँ मेरे सम्मुख कौन दानवाधम ठहर सकता है ?" (४०)
जब देवी ने शस्त्रनिवारक चवच न पहना तो उनकी रक्षा के लिये (पूर्वोक्त) विष्णुपंजर स्तोत्र कहा गया। (४१)
हे ब्रह्मन् । उससे रक्षित होकर दुर्गा ने समस्त देवताओं के द्वारा अवध्य दानवश्रेष्ठ महिषासुर को अत्यन्त पीडित किया। (४२)
इस प्रकार पहले देवश्रेष्ठ शम्भु ने बड़े नेत्रों वाली (कात्यायनी) से उस वैष्णव पञ्जर को कहा था और