सरोमाहात्म्ये 28 चतुर्भुजो की उत्पत्ति के प्रसङ्ग मे व्रह्मकृत शिवस्तुति चतुर्मुखोत्पत्ति तथा स्थाग्गुतीर्थ माह्त्म्य

उसे देखकर महान् हर्ष से युक्त वेन ने कहा-हे वत्स । तुम जैसे सत्पुत्र ने नरक समुद्र से मेरी रक्षा की। (२७)

तीर्थ के तट पर रहते हुए तुम्हारे द्वारा नित्य अभिपि श्चित होने से, इस साधु का अनुपह तथा स्थाणु देव का दर्शन करने से पापमुक्त होकर मैं उस स्वर्लोक को जा रहा हूँ जहाँ शिव स्थित है। राजासे ऐसा कहने के उपरान्त उस पुनद्वारा तारित (वन ने) स्थाणु तीर्थ में महेश्वर को प्रतिष्ठापित रसिद्धि प्राप्त की । स्थाणु तीर्थ के प्रभाव से उस श्वान को भी परम सिद्धि प्राप्त हुई एव सभी कलुषों से विमुक्त होकर वह शिवलोक चला गया ।राना ने पितृऋणों से मुक्त होकर वसु न्धरा का पालन किया तथा धर्मपूर्वक पुत्रों को उत्पन कर निर्वाध यज्ञ किया। उन्होंने ब्राह्मणों को मनोभिलषित पदार्थों का दान दिया तथा अनेकविध भोगों का उपभोग किया । (२८-३२)

मित्रों को ऋण से मुक्त कर तथा स्त्रियों वे कामनाओं की सन्तुष्टि करने के उपरान्त पुर को राज्याभिषिक्त कर राजा कुरुक्षेत्र मे चल गये। (३३)

वहाँ पोर तप एव शङ्कर का पूजन कर स्वेच्छा से शरीर का त्याग कर वे परमपद को प्राप्त किये । (३४)

स्थाणुतीर्थ के इस प्रभाव कोसुनने वाला मनुष्य समस्त पापों से विनिर्मुक्त होकर परमगति प्राप्त करता है। (३५)

मार्कण्डेय ने कहा-हे अनघ। चतुर्मुखों तथा ब्रह्मेश्वरों की उत्पत्ति को विस्तार पूर्वक सुनने की मेरी इच्छा है। (१)

सनत्कुमार ने कहा-हे अनघ । सुनो । सष्टि की कामना वाने पद्मजन्मा ब्रह्मा का पूर्ण वृत्तान्त मैं तुमसे कहता हूँ। (२)

लोक-पितामह भगवान ब्रह्मा ने उत्पन्न होते ही स्थावर और जगम रूप समस्त भूतों की सृष्टि की।

पुन उन मुष्टि को चिन्ता परने पर एक नीलोत्पल दल पे समान श्याम, पनले मध्य भाग याली, मुलोचना, मुरी फल्या मृत्पन्न हुई। (४)

उस कमनीय पन्या को देखकर प्रधा ने उसे मेथुन के लिये पुलाया। उस महान पाप से प्रद्या या मस्तक गिर गया।

ये मी गिर शिर को लेकर प्रेगेपय विश्रुत सरंपाप अपनी साग्निदस्य सर नामा तीर्थ में गये। (६)

शपि तथा सिद्धों मे निविा उस पवित्र स्थाणुतीर्थ में सरम्यगी के दरारीर पर पतुर (शिला) को प्रतिष्ठा पितर प्रतिदिन मगोरम धूप, गन्ध, मुन्दर उपहारों एवं सर-गों मे उमारी आपपना करने लगे। नरे इम प्रगर भक्ति पूर्वर-शिवपूजा परापग होने पर भगवान नोटटोदित स्ययं ही पदों आये। (९)

सेपितामह मामाने आये हुए सिर को देश पर उन्हें दिर में माम किया एवं मन गुनि करने लगे।

ब्रह्म ने कहा- हे भूत अश्व तथा भव के आश्रय महादेव आप को नमाधर है। सुनिश्चित एवं ग्रेग्रेश्य पालक आप को नमस्कार है। (११)

पवित्रदेयारे एव सर्वकामपनाशक को नमस्कार है। हे पराचर के गुरु ! आप रहस्यों में भी रहस्य के प्रकाशक (१२)

भिपतों से दूर न होने पाले सभी रोगों के आप यिनाशक है । हे ररु मृग के धर्म को धारण परने याने ! शोरहित ! आप को नमस्कार है। (१३)

दे पारि-कल्लोलसंखुप महाबुद्धि के विघटनकारी देय ! आप के नाम का जप परने याले संसार में नहीं पदने। (१४)

आप नित्य-नित्य यो नमरगर है। भेटवय पालन! र, अप्रमेय और व्याधियों के नाश को गमस्या है।

पर, अपरिमेय, सर्पभूतप्रिय, योगेपर, देव एवं सर्व पापासांप्रेममाया है। (१६)

स्था. सिद्ध एवं सिटौ तपा तुनि-पाठो द्वारा ना को नमस्कार है। भूतमेसारदुर्ग पय विषाप थापये नमार।

मराजाय पमिदिमापाने, मराज के भारपारी एवं मर्पराजमाटा पारे एवं मारस्वाप बार समस्पर। (१८)

इस प्रकार स्तुति किये जाने पर शङ्कर ने ब्रह्मा से कहा-अपश्यंभावी अर्थ के विषय मे तुम्हें शोक नहीं होना चाहिए। (१६)

पहले धाराह कल्प में मैंने आप का जो शिर अपहृत किया था वह चतुर्मुख हो गया । अव वह कभी विनष्ट नहीं होगा। (२०)

इस साग्निहित तीर्थ में भक्ति पूर्वक मेरे लिङ्गों की प्रतिष्ठा करने से तुम सभी पापों से विमुक्त हो जाओगे। (२१)

प्राचीन काल मे सृष्टिकामना से तुमने मुझे प्रेरित किया । अतएव ऐसा ही होगा यह कहार भूतों के देश पर्ती के सदृश (मैं ) दीर्घराल तक तप करने के उपरान्त सनिहित में मग्न होकर स्थित रहा। तदनन्तर तुमने सुदीर्घ काल तक मेरी प्रतीक्षा की। (२२-२३)

तदनन्तर तुमने मन में सर्वभूतो के स्रष्टा का ध्यान किया। मुझे वहाँ जल में मग्न हुआ देसार उन्होंने तुमसे कहा- (२४)

यदि मेरा कोई दूसरा अग्रज न हो तो मैं प्रजा की सृष्टि काँगा। तुमने कहा-तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य अपज पुरुष नहीं है। (२५)

ये स्थाणु जल मे मग्न तथा विवश पदे हैं। आप मेरा उपकार करें। उन्होंने इस आदि प्रजापतियों तथा । समस्त भूतों की सृष्टि की। (२६)

इस प्रकार उन्होंने उनके द्वारा चतुर्विध भूतप्राम को उत्पन्न किया । हे ब्रह्मन् । सृष्टि होते ही चे सभी प्रजायें क्षुधित होकर प्रजापति को साने की इच्छा से दौड़ पड़ी। भक्ष्यमाण होने पर नाण की कामना से वे पितामह के पास भागे एय कहे-कि प्रजाओं की महान् वृत्ति का विधान करो। तुमने उन्हें अन्न प्रदान किया। महौषधियाँ स्थारों की तथा दुर्वल जगम प्राणी वख्यानों के अन्न बने। अन्न प्राप्त करने के उपरान्त सभी प्रजायें अपने स्थान को लौट गयीं। (२७-३०)

तदनन्तर वे सभी परस्पर प्रीतियुक्त होकर पढ़ने लगे। भूतसमूह के बढ़ने एवं आप लोकगुरु के सन्तुष्ट होने पर उस जल से निकल पर मैंने प्रजा को देसा । तदनन्तर अपने सेज से उत्पन्न नन प्रजाओं को देखकर महान् क्रोध से युक्त होकर लिग को उसाद फर पॅफ दिया। सर के मध्य क्षिप्त (रित) ऊपर स्थित

हो गया। (३१-३३)

तभी से यह लोक मे स्थाणु नाम से विख्यात हुआ। एक्यार भी इसका दर्शन करने से मनुष्य सभी पापों से मुफ होकर परम मोक्ष को प्राप्त करता है जहाँ से यह पुन आवर्तित नहीं होता। कृष्णाष्टमी के दिन समाहित चित्त से इस तीर्थ में निरास करने याला अगम्या- गमन से होने वाले सभी पापों से मुक्त हो जाता है। ऐसा पहकर भगान् महादेय पही अन्तर्हित हो गये। (३४-३६)

पाप से विशुद्ध ब्रह्मा ने भी चतुर्मुस महादेय रा पूजन कर सर के मध्य देवाधिदेय के लिङ्गों की ष्टि की। (३७)

प्रथम उन्होंने हरि के पार्ध में ब्रह्मसर को प्रतिष्ठित किया प्य तदनन्तर अपने झाक्षस में. मदन का निर्माण (३८)

उसी के पूर्व भाग में महा ने तृतीय लिन प्रतिष्ठित पिया सरत्यती नदी के तौर पर उन्होंने पतुर्थ लिद प्रतिष्टित किया। (३९)

निराहार रहकर इन पवित्र और पापनाशक प्रमतीयों गदर्शन करने वाले व्यक्ति परम गति प्राप्त करते हैं। (४०)

सतयुग में हार के पार्ध में, प्रेता में ब्रह्मा फे आप्रम मे, द्वापर मे उसके पूर्व तथा पलि में सरस्वती के तट पर स्थित लिङ्गों या भक्ति-पूर्वक पूजन एवं दर्शन करने से मनुष्य सभी पापों से विमुक्त होकर परम गति प्राप्त करते हैं। (४१-४२)

सष्टि के समय सरस्वती के उत्तरी तट पर भगवान् भझा से पूजित महेश्वर चतुर्मुस नाम से प्रसिद्ध हुये। (४३)

प्रद्धापूर्वक उनसे प्रणाम कर मनुष्य लोरासाय तथा भाण्डसाइय(१)से उत्पन्न सभी पापों से मुफ होता है (४४)

इसी प्रसर द्वापर आने पर अपने आश्रम में शहर का पूजन पर नया वर्णसार्य से उत्पन्न होने पाले राजस भावों से विमुक्त हुये। (४५)

पृष्ण चतुर्दशी में यहाँ पूजन करने से मनुष्य अमोग्य फे अग्न साने से होने वाले समस्त पापों से विमुक हो जाता है। (४६)

पटियाल आने पर पसिष्टाश्रम में स्थित प्रथा ने पतु- मुंख की स्थापना कर श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त की। (४)

यहाँ भी जो लोग निराहार, यमायुरु और जिनेन्द्रिय होर महादय की पूजा करते हैं ये परम पद वो प्राप्त करने 

है। (५८)

यह स्थाणु तीर्थ का माहात्य मैंने तुझे बताया।

इसे सुनकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। (४९)