वामन महा पुराण
मेना से तीन वश्याओं की उत्पत्ति, ब्रह्मा के शाप से कुटिला का आपोमयी होना, रागिणी को ब्रह्मा का शाप, उमा की तपश्चर्या, शिव का हिमवदाश्रम में निवास, शिव द्वारा तपस्विनी पार्धनी की परीक्षा, शिव का मन्दराचल पर गमन
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पुलस्त्य ने कहा-मेना को रूपगुणसम्पन्न तीन ] कन्यायें उत्पन्न हुई और सुनाभ नाम से विख्यात चौथा पुत्र उत्पन्न हुआ। (?)
हे मुनि । लाल अगों वाली, लाल नेत्रों वाली तथा लाल वात्रों से सुशोभित रागिणी नाम की मेना की ज्येष्ठ कन्या उत्पन्न हुई।
शुभाङ्गी, कमल-दल के समान नेत्रों वाली नीले एव पुंघराले केशों वाली तथा श्वेत माला एव पत्र धारण करने वाली दूसरी कुटिला नाम की कन्या थी।
मेना की छोटी कन्या का नाम काली था। उसका रंग नील अञ्जन पुञ्ज के समान तथा नेत्र नील कमल के समान थे। वह अनुपम रूपवती थी। (४)
हे मुनि । वे तीनों कन्यायें जन्म से ६ वर्ष के पश्चात् तपस्या करने चली गयीं। देवताओं ने उन सुन्दरी कन्याओं को देखा।
उसके बाद सभी आदित्य तथा वसुगण चन्द्र-किरण के सदृश प्रभा वाली तपस्विनी कुटिला को ब्रह्मलोक में ले गये। (६)
तदनन्तर सभी देवताओं ने ब्रह्मा से कहा-हे ब्रह्मन् ! आप बतलायें कि क्या यह महिपहप्ता पुत्र को उत्पन्न करेगी?
नव सुरपति ने कहा-यह तपस्विनी शर्व शिव का सेज नही
धारण कर सकती । इस बेचारी को छोड़ दो।
हे नारद ! तदनन्तर क्रोधित होकर कुटिला ने ब्रह्मा से कहा-हे भगवन् ! हे सत्तम ! सुनिये । मैं ऐसा प्रयत्न करूंगी जिससे शङ्कर के सुदुर्द्धर तेज को धारण कर सकूँ। हे पितामह ! में सत्य कहती हूँ कि घोर तप द्वारा जनार्दन की ऐसी आराधना करूँगी जिससे शङ्कर का मस्तक झुका दूंगी। (६-११)
पुलस्त्य ने कहा-हे महामुनि ! तदनन्तर क्रुश होकर सर्वेश, पितामह, आदिकर्ता, भगवान ब्रह्मा ने दारुण कुटिला (१२)
ब्रह्मा ने कहा-हे पापिनी कुटिले! क्योंकि तुमने मेरे वचन को सहन नहीं किया अतः मेरे शाप से निर्दग्ध होकर तुम पूर्ण रूप से जल हो जाओगी। (१३)
हे मुनि ! इस प्रकार ब्रह्मा से शापित हिमालय की पुत्री जलमयी होकर वेगपूर्वक ब्रझलोक को प्लावित करने लगी। (१४)
पितामह ने उसके उमदकर यह रहे जल-प्रवाह को देखार ऋक्, साम, अथर्व और यजुप्प वाजय के बन्धन द्वारा उसे दृढ़ता पूर्वक बाँध दिया । (१५)
हे ब्रह्मन् ! आपोमयी पह गिरिकायका बद्ध होकर ब्रह्मा की विमल जटा को आप्लावित करती हुई यहीं रहने लगी। (१६)
देवतागण रागवती को भी स्वर्ग में ले गये एवं ब्रह्मा को उसे निवेदित किया। उससे भी ब्रह्मा ने उसी प्रकार कहा।
उसने भी क्रुद्ध होकर कहा-मैं निश्चय ही ऐसा महान तप करूँगी जिससे महिप को मारने वाला मेरे नाम से संयुक्त होगा। (१८)
ब्रह्मा ने उसे भी शाप दिया-हे पापिनी ! देवों से अनुलनीय मेरे वचन का अहंकारवश उलइन करने से तुम सन्भ्या हो जाओगी। (१९)
हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर वह शैलपुत्री रागवती भी सन्म्या होकर दविप्रह कृत्तिकायोग की प्रतीक्षा करने लगी। (२०)
तदनन्तर दो कन्याओं को गई जानकर तपस्विनी मेना ने (एतीय कन्या काठी को) सप से रोका । उसने स मा ऐसा कहा। (२१)
पितरों की पुत्री, कल्याणमयी, माता ( मेना) मे कन्या का वही 'उमा' यह नाम रखा। वह भी तपोवन मे चली गयी। (२२)
तदनन्तर उसने मन में शूलपाणि वृपध्वज रुद्र को रखकर घोर तप किया। (२३)
तदुपरान्त ब्रह्मा ने देवताओं से कहा-तुम लोग हिमालय पर तप कर रही हिमालय की पुत्री काली के पास जाओ और उसे यहाँ लाओ। (२४)
तदनन्तर देवता आये और उन्होंने शैलनन्दिनी को देखा। किन्तु उसके तेज से विजित हो जाने से वे निकट न जा सके।
देवताओं के साथ इन्द्र उसके तेज से मिल हो गये । वे ब्रह्मा से उसके सेज की अधिकता का निवे. दन कर सड़े हो गये। (२६)
तदनन्तर ब्रह्मा ने कहा- यह अवश्य ही शङ्कर की पत्नी होगी। क्योंकि उसके सेज से तुम लोग विक्षिप्त और इतप्रभ हो गये हो। (२७)
अत. हे देवो! तुम लोग चिन्ता छोड़कर अपने-अपने स्थान को जाओ। युद्ध में तारक के साथ महिप को मारा गया समझो। (२८)
ब्रह्मदेष के ऐसा कहने पर इन्द्र सहित सभी देवता तुरन्त निश्चिन्त होकर अपने अपने स्थान पर चले गये। (२९)
तप करती हुई उमा को भी उस तप से निवर्तित कर पत्नी-सहित हिमवान् घर ले आये। (३०)
महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामक उस भयंकर प्रत का अवलम्बन कर मेरु आदि महाशैलों पर विचरण करने लगे। (३१)
एक समय वे महाशैल हिमाचल पर गये। उस (हिमालय ) से श्रद्धापूर्वक पूजित होने पर उन्होंने उस रात वहीं निवास किया। (३२)
दूसरे दिन गिरिराज ने महादेव को निमन्त्रित कर कहा-"हे विभु ! तपस्या-हेतु आप यहीं रहें।" (३३)
पर्वद के ऐसा कहने पर हर ने भी यही विचार किया एवं निराश्रयवास छोड़कर आश्रम में रहने लगे। (३४)
देवाधि देव त्रिशूलधारी शङ्कर के आश्रम में रहने पर गिरिराज पुत्री कल्याणी काली उस स्थान पर गयी । (३५)
पुन उत्पन्न प्रिया सती को आई हुई देख हर ने स्वागत द्वारा उनका सत्कार किया और पुनः योगरत हो गये। (३६)
जोद कर सखियों के साथ शिव के दोनों चरणों मे प्रणाम किया। (३७)
तदनन्तर गिरिकन्या को देर तक देखकर 'यह उचित नहीं है। ऐसा कहने के उपरान्त शङ्कर गणों के साथ अन्तर्दित हो गये। (३८)
शङ्कर के भयहर वचन को सुनकर अन्तर्दुःख से जलती हुई ज्ञान समन्वित उन पार्वती ने भी पिता से कहा- (३९)
हे तात! पिनाकधारी देव शङ्कर की आराधना-हेतु मैं महारण्य मे घोर तथा महान तप करने जाऊँगी । (४०)
पिता ने 'ठीक है यह कहा। तदनन्तर हर के आरा-धना की कामना से ललिता (पार्वती) उसी (हिमालय) की विस्तृत तलहटी में तप करने लगी। (४१)
उस समय उनकी सखियों समिधा, कुश, फल मूलादि सारर देयो की सेवा करने लगी। (४२)
(उन सखियों ने) पार्वती के विनोदार्थ मिट्टी के तेजस्वी त्रिशूलवारी शर का निर्माग किया। पार्वती ने भी 'ठीक है' कहा- (४३)
वे उसी की पूजा फरती एवं पुनः पुन: उसे देखती रहती थी। तदनन्तर उनकी श्रद्धा से त्रिपुरान्तकारी शंकर सन्तुष्ट हो गये। (४४)
वदुपरान्त वे पालाशदण्ड, मुझ को मेखला, यज्ञोपवीत छत्र एवं मृगचर्म धारण कर बटु के रूप में हाथ में कमण्ड लिए एवं शरीर में भस्म लगाये हुए प्रत्येक आश्रम भ्रमण करते हुए काली के आश्रम में पहुंचे। (४५-४६)
हे नारद ! तदनन्तर सखियों सहित काली ने उठ उनका यथोचित पूजन किया एवं तदनन्तर उनसे य पूछा। (४७)
उमा ने कहा-हे भिक्षु! आप शीघ्र मुझे पतला कि आप यहाँ से आ रहे हैं? आप का आश्रम कहाँ एवं आप वहाँ जायगे?
भिक्षु ने कहा-"हे पवित्रवतों यात्री बाले ! वाराणस में मेरा आश्रम है। मैं तीर्थयात्रा कर रहा हूँ। यहाँ से में
(४)
देवी ने कहा-हे विप्रेन्द्र ! पृथूदक में तुम्हें कौन सा पुण्य उपलब्ध होगा? मार्ग में किन-किन तीर्थों में
स्नान करने से तुम्हें कौन कौन फल प्राप्त हुआ ? (५०)
भिक्षु ने कहा-हे कृशोदरि मैंने पहले प्रयाग में स्नान किया है, तदनन्तर कुब्जाघ्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर पन्धुवृन्द, कर्वन्ध, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, भद्रा, निविष्टप,कोनट कोटितीर्थ और कुब्जक में निष्काम भाव से स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रम में आया हूँ। (५१-५३)
यहाँ स्थित तुमसे वार्ता करने के पश्चात् में पृथूदक तीर्थ में जाऊँगा। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ उस पर मोध न करना। (५४)
हे यशोदरि । बाल्यावस्था में भी सयत शरीर होकर मैं जो वपस्या से अपने को सुसा रहा हूँ यह तो ब्राह्मणों के लिए प्रशंसनीय ही है। (५५)
परन्तु, हे भीरु । इस प्रथमावस्था मे ही तुम क्यों भयर तप कर रही हो ? (इसमें मुझे) सशय हो रहा है। (५६)
हे स्थिरयौपने । हे विलासिनि । प्रथमावस्था के काल में पति के साथ स्रियाँ सुन्दर भोगों का भोग करती हैं। (५७)
हे गिरिजे। चराचर जीव तपस्या से ससार में रूप, सत्कुल और ऐश्वर्य चाहते हैं, वे सभी तुम्हें प्रचुर. मात्रा में प्राप्त हैं। (५८)
तो इन अलङ्कारों को छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण किया है ? चीनाशुक रेशमी वस्त्र का परित्याग कर तुम वल्कल क्यों पहन ली? (५६)
पुलस्त्य ने यहा-हे नारद । तदनन्तर पार्वती की, तप से युद्ध सोमप्रभा नामक सखी ने भिक्षु से वस्तुस्थिति का वर्णन किया। (६०)
सोमामा ने कहा-हे द्विजश्रेष्ठ । पार्वती जिस शरण से तपरया कर रही हैं, उसे सुनिये। यह काली शिव को अपना पति बनाना चाहती है।
युलस्त्य ने कहा-सोमप्रभा की बात सुनकर शिर हिलाते हुये घड़े जोर से हंसकर मिक्षु ने यह वचन (६२)
भिक्षु ने कहा- पार्वदि । मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ कि तुम्हें यह बुद्धि किसने दी? तुम्हारा पल्लव के समान कोमल हाथ शहर के सर्पयुक्क हाथ से कैसे मिलेगा। (६३)
(६१)
और तुम सुन्दरवस्त्र धारण करने पाली हो किन्तु रुद्र व्याघ्रचर्म धारण करते है। तुम चन्दन-चर्चित हो एवं शकर भरम भूपित हैं । अत मुझे यह उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। (६४)
पुलस्त्य ने कहा- हे विप्रेन्द्र । भिक्षु के ऐसा कहने पर पार्वती ने उससे कहा-हे भिक्षुक । तुम ऐसा मत कहो । शंकर सम गुणे में श्रेष्ठ है। (६५)
वे देवेश शिष या भयङ्कर, सधन या निधन तथा अलंकृत अथवा अलवार विहीन हों। वे जैसे तैसे क्यों न हों वे ही मेरे स्वामी होंगे। हे शशिप्रभे। इसे मना करो। यह भिशुरु पुन घुछ कहना चाहता है जिससे इसके ओठ फड़क रहे हैं। निन्दक येसा पापी नहीं ता जैसा (निन्दा को) मुनने पाय होता है। (६६-६७)
पुलस्त्य ने कहा-ऐसा कहकर परदा पार्वती ने यहाँ उठ कर जाना पाहा। सदनन्तर शकर मिक्षुरूप को त्याग स्यरूपस्थ हो गये। (६८)
वे स्वरूपस्य होकर पोल-हे प्रिये! अपने पिता के घर जाओ। तुम्हारे लिये मैं हिमवान् के घर पर मर्पियों को भेजूंगा। (६९)
रुद्र को चाहने पाली तुमने यहाँ जिस मृण्मय ईवर को बनाया है वे ससार में भद्रेश्वर नाम से प्रसिद्ध (७०)
देव, दानप, गन्धर्ष, यक्ष, किंनर, उरग एवं मनुष्य मगल की इच्छा से सदा उनकी पूजा करेंगे। (७१)
हे मुनि। शहर के ऐसा कहने पर हिमालय-पुत्री पार्वती आकाश मार्ग से अपने पिता के घर चली (७२)
महातेजस्वी शहर भी गिरिराज की पन्या ने विदाफर पृथूदक तीर्थ में गये एवं विधान पूर्पक स्नान (७३)
वदनन्तर देयप्रयर महेपर पृयूदक में स्नान से पाप विमुफ होकर नन्दी, गमों एवं याहन के सहित महापर्यंत मन्दर पर आये। (७४)