यज्ञ के लिए बलि का कुरुक्षेत्र मे आगमन एव वहाँ के निवासी मुनियों का पलायन, वामन जम्म, ब्रह्मा द्वारा वामन-स्तुति एव जात कर्म आदि क्रियायें, वामन की बलियज्ञ में जाने की इच्छा, भरद्वाज से वामन का स्वनिवास-कथन

नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्राक्ष, कोकनद तथा हरिशंकर को नमस्कार करता हूँ। (२४)

में अगरत्य, गरड़, विष्णु, कपिल, ब्रह्मवाड्मय, सनातन, ब्रह्मा तथा उस ब्रह्म तत्पर को नगरकार करता हूँ। (२५)

में अप्रतक्य, चतुर्भुज, सहस्रांशु, तपोमय, धर्मराज एवं गरड़वाहन देव को नमस्कार करता हूँ। (२६)

में सर्वभूतगत, शान्त, निर्मल, सर्वरक्षण, महायोगी, अव्यक्त एयं पापनाशन को नमस्कार करता हूँ। (२७)

मैं निरंजन, निराकार, निर्गुण, निर्मलपदस्यरूप, पापहारक को नमस्कार करता हूँ तथा शरण्य को शरण में जाता हूँ। (२८)

महर्षि अगस्त्य ने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्र को पहा था। इसके कथन, स्मरण तथा प्रवण करने से अनेक पापों का नाश होता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी होता है। (२९)

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पुलरत्य ने कहा-दामवेश्वर प्रसाद के दीर्थयात्रा के लिये पले जाने परविरोचन-पुत्र पलि फुरुक्षेत्र मे या करने के लिए गये।

उस महान् पर्मयुक्त तीर्थ में माझणश्रेष्ठ शुक्राचार्य ने द्विजातिश्रेष्ठ भार्गयों को आमन्त्रित किया । (२)

भृगुवंशीय प्रामगों का आमन्त्रित किया जाना सुनार अत्रि, गौतम, पौशिक एवं अगिय गोत्रिय प्रामगों ने इस्जाहल वा स्याग पर दिया। (३)

ये उपर दिशा में शतदु नदी के तट पर पहुंचे।

शत के जल में स्नान पर वे यहाँ से पिपाशा नदी के समीप गये। (४)

पदों भी मनोनुकूलता न होने के कारण ये लोग ग्नान करने के माद पिारों एवं देयों या अपन कर सूर्य की हिरणों से दमून फिरणा नदी ये निपट गये ।

ऐ देयापुसमें समान एवं अचन पर सभी महर्षि पुण्योदका ऐरावती नदी में समीप गपे एप इसमें स्नान पर ईश्वरी नदी पे तट पर पहुंचे। (६)

हे मुने । देपिरा और पयोगी में स्नान पर आप्रेय धादि सपरी शमा नदी में स्नान करने में रिए हारे।

दिन! जल में निमग्न उन सेगी ने जल में भीतर मदाम् आप्रयंपारक अपना-अपना प्रति पम्प गा।

मियान्या मदगियों में पाएर निरने पर पुन धेगाहोदया। सदनमा मा1 पर भी शशि पाहा नि (९)

हे महन् । तदननर मभी संग 'यह पारे?' गरिप मै आपूर्वर परापर भाराप एवं पिपार गए पते गये।

मगुपयन रन गो ने पूरी प्रतियिता  उकी हर रात पक्षियों निगेनिनाति प्फ यनराजि देसा। (११)

है नारद। पह पर अत्यधिक ऊँचा होने के पारण आशश को आधा करने याग था तथा उमरी नीगे पी भूमि यिरतून मूर्ग से ध्यान थी। (१२)

पह फानन पाच पों याने पुष्पित प्रश्नों में पारागों से मुशोभिन आगश के तुत्य अत्यन मुशोभिा हो रहा था। (२३)

पनयन ये महश फमलों में प्यान, पुरीकों मे अन्नपन एयं कोपनदी से भाकीर्ण उस पन को देगार से अरपन्न मगष्ट भई आहतादिन हो गये। प्रसन्न मन मे से स्टेग उसमें सवार मयिष्ट ए जमे हम मदामपेपर में अंग प्रवेश करने हैं। (११-१५)

हे मुनिरातम मनोगों ने नगरे मध्य में पारा पार पर्गा पर्म, अर्थ, पाम एवं म) टोधित पवित्र नाम देगा!

हे ब्रह्मन! पूर्व किनकी म मुरापाय पराग में मात पापन, परपमाभिमुगावन में पियांप्रम, दम भिनु पदरी वन में भाग पामा कम पारामिग एमापा ममाम्म

स्थित था। (१७-१८)

कृतयुग के अन्त मे मोक्ष अपने आश्रम में निवास करने लगता है, वेना में काम आश्रमवासी हो जाता है, द्वापर के अन्त में अर्थ आश्रमी धन जाता है एवं कलि के आदि मे धर्म आश्रम मे रहना प्रारम्भ करता है। (१९)

अव्यय आनेय आदि मुनियों ने उन पापमों को देखकर उस असण्ड जलपूर्ण स्थान में सुख से रहने का  निश्चय किया। (२०)

धर्म आदि के द्वारा भगवान् विष्णु अपण्ड नाम से विख्यात है। जगन्नाथ घार मूर्तियों वाले हैं यह पहले से ही प्रतिष्ठित है। (२१)

दे नारद । पहुभुत योगमा प्रपि लोग सेवा, तप और ब्रह्मचर्य द्वारा उनकी पूजा करते हैं। असुरों से भयभीत ये मुनिगण सम्मिलिन रूप से उस अपण्ड पर्वन का भलीभाँति आश्रयण पर रहने लगे। (२३)

हे ब्राह्मन् ! अरमयुट तथा पूर्व रश्मि पो पाले आदि अन्य ब्राह्मण पारिन्दी के जल में स्नान कर दक्षिण की ओर गये। (२१)

वे विष्णु की पृपा फे फारण महान् अमरों से दुष्पवेश्य अवन्ति नगरी में पहुंचे एवं विष्णु के समीप रहने (२५)

बालखिल्य आदि ब्रह्मचारी ऋपि दानवों के भय से विवश होकर रद्रयोटि चले गए और यहीं रहने लगे। (२३)

हे मुने ! इस प्रकार गौतम एवं आंगिरस आदि घामणों के चले जाने पर शुक्राचार्य समी भार्गव घंशीय ब्राह्मणों को यज्ञ-याये में ले गये। (२७)

हे अमिततेजस्वी! भार्गवशीय ब्राह्मणों से अधिष्ठित महायज्ञ में स्वयं शुमाचार्य ने यलि को विधियन् यज्ञदीक्षा दी। (२८)

घेतवस्त्रधारी, शेत माल्य पर्य अनुरेपन से युक्त, मृगचर्मायत एवं मयूरपुरख से बलात, देस्य पनि हामीर, प्रलम्य, मय एवं याण आदि सदस्यों से आवृत होकर विस्तृत यात-मण्डप में समासीन हुआ। (२९-३०)

उसकी पत्नी विनयापली भी यारर्म में दीक्षित दुई यह ऋपिकन्या सदसों एलनाओं में प्रधान थी।

गुमापार्य ने पेप्रमास में मुलभण पच पृथ्वी पर घूमने के लिये छोड़ा। सारफान नाम का अमुर उसरा

अनुसरण करने लगा। (३२)

इस प्रकार अच छोड़े जाने पर, यज्ञ कर्म के चलो रहने पर, अग्नि में हयन परते हुए तीन मास व्यतीत होने पर, दैत्यों के पूजित होने पर तथा सूर्य के मिथुन राशि मे सहममण परने पर देवमाता अदिति ने पामनासर माधय को जन्म दिया। (३३-३४)

हे महर्षि ! सम भगवान, ईश, नागयण, लोरपति पुरागपुरुष के उत्पन्न होते ही यदा महपियों के साथ उनके समीप गए एच विभु की स्तुति करने लगे-

हे सत्यमूर्न ! हे माधय । आपको नमस्कार है, ह शाश्यत! हे विधरूप! आपसे नमस्मार है। शष्टयनेन्धन के लिए अग्निस्यत्प। आपसे नमरमार है। हे पापरपी मन के लिये महादयाग्निग्यत्प। आपसे नमस्कार है। (३६)

हे पुण्डरीकाक्ष ! हे भापको नमस्कार है। यिष भारन! आपसे नमस्कार है। हे जगदाधार। आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। (३७)

हे नारायण !हे जगन्मूते! हे जगन्नाथ ! हे गदापर! है पीताम्बरधारी ! हे सरभीपति ! हे जनार्दन! आपको नमस्कार है। (३८)

आप त्राणा, रक्षक, विश्वात्मा, सर्यगामी, अव्यय, सर्वधारक, धगधारक तथा रूपधारक हैं। आप को नमसार है। (३६)

हे देवपूजित । हे अशेप त्रैलोक्य को बढ़ाने वाले ! आपया अभ्युदय हो। हे देयपति । आप इन्द्र के अश्रुओं का मार्जन करें। (४०)

आप भाता, विधाता, संहता, महेश्वर, महालय, महायोगी और योगशायी है । आप को नमस्कार है । (४१)

इस प्रकार स्तुति किए जाने पर सस्मिा, सगामी जगनाथ भगवान हरि ने कहा-हे विमो! मेरा उपनयन सार कीजिए। (४२)

सदनन्तर महाजिरपी तपोधन दरपतिषीय भरद्वाज ने यामम की जातकर्म आदि प्रियायें सम्पन्न भी। (४३)

तदुपरान्त समारनयेता भरद्वाज ने घर का प्रनयन्ध (यज्ञोपवीत किया। नदनन्तर अन्य सभी ने प्रमन्न होकर पटुमको प्रमश परदान दिया। (४४)

पुरद ने यज्ञोपवीत, मैं (पुरस्त्य) ने दो मुवल यरत्र, अगरत्य ने मृगचर्म तथा भरद्वाज ने मेरला दी। (४)

ब्रह्मा के पुत्र मचि ने पटापदण्ड, पारभि (यसिष्ट) ने

अक्षसूत्र एवं अंगिरा ने रेशमी वस्त्र तथा वेद दिया।(४६)

राजा रघु ने क्षन, नृग ने एक जोड़ा जूता एवं अति तेजस्वी वृहस्पति ने विष्णु को कमण्डलु दिया । इस प्रकार उपनयन संस्कार हो जाने पर ऋपियों से संस्तुत भगवान् भूतभावन ने (शिक्षा, पल्प, व्याकरण निरुक्त, चन्द और ज्योतिप) इन अगों के साथ पारों पेदों या अध्ययन किया। (४८)

हे मुनि ! उन्होंने आद्गिरस भरद्वाज से गन्धर्व विद्या सहित महान् आख्यानों से पूर्ण महावन्यात्मक सामवेद का अध्ययन किया। (४९)

इस प्रकार मानस्वरूप-श्रुति के महासमुद्र भगवान एक मास में लोगयार की प्रवृत्ति हेतु श्रुतिविशारद हो गये। (५०)

समस्त शास्त्रों में निपुण होरर अक्षय, अव्यय थामन ने ब्राह्मण श्रेष्ठ भरद्वाज से यह (५१)

श्रीवामन ने कहा-हे ब्रह्मन । में अत्यन्त उत्कृष्ट कुरोध तीर्थ जाना चाहता हूँ। आप आज्ञा दीजिए। यहाँ दैत्यराज बलि का पवित्र अश्यमेध यज हो रहा है।(५२)

देसिये, पप्पीतल पर जो पुण्यवर्धक मेरे स्थान है

उनमें सेजों का समावेश हो रहा है। यह ज्ञात हो रहा है कि बलि कुरक्षेत्र मे स्थित है। (५३)

भरद्वाज ने कहा-आप अपनी इच्छा से यहाँ रहें अथवा जायँ। में आप को आदेश नहीं दूंगा। हे विष्णु। हमलोग यलि के यज्ञ में जायेंगे। आप चिन्ता न करें। (५४)

हे देव! मैं आप से जो पृछता हूँ उसे पटायें। हे विभु! हे पुरपोचम ! में यथार्थरूप से यह जानना चाहता हूँ कि आप किन किन स्थानों में रहते हैं। (५५)

यामन ने यहा-हे गुरु! आप सुनें। अनेक रूपयुक्त में जिन जिन स्थानों मे में यहुन से रूपों को धारण कर रहता हूँ उनका वर्णन कर रहा हूँ। (५६)

हे भरद्वाज ! मेरे अनुरूप मेरे अवतारों से पृथिषी, आकाश, पाताल, समुद्र, स्पर्ग, सभी दिशय, पर्वत, वया मेप व्याप्त है।