प्रह्राद तीर्थयात्रा मे विविध तीर्थों का वर्णन

तदननर निरुपम पौरुषवाले उस चक ने दैत्य का शिर काट डाला। छिन्नमस्तक दैत्य पर्वत के ऊपर से इस प्रकार गिरा जैसे वन से आहत शैलशिखर गिरता है। (४२)

उस देय शत्रु के मारे जाने पर मुरारि ने विरूपाक्ष शकर की आराधना की एवं चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागर में स्थित अपने गृह को चले (४३)

हे पुत्र। ये वही देव देव महेश्वर विरूपाक्ष है। हे साधो! यदि तुम दूध के साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी आराधना करो।

माता के उस यचन को सुनकर बीतमन्यु के बलशाली पुत्र ने उन विरूपाक्ष शंकर की आराधना कर दुग्धयुक्त भोजन प्राप्त किया। (४५)

इस प्रकार प्राचीन काल में घटित शङ्कर के शरीर-छेदन विषयक परम पवित्र कथा को मैंने तुमसे कहा । वे महान असुर प्रहलाद सुन्दर पुण्य के लिये उस श्रेष्ट तीर्थ में गए।

पुलरत्य ने कहा-प्रहलाद ने उस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नानकर । त्रिलोचन महादेव का दर्शन किया तथा सुवर्णाक्ष की पूजा कर वे नेमिपारण्य चले गये।

यहाँ गोमती, फाञ्चनाक्षी और गुरुदा के मध्य में तीस हजार पाप नाशक तीर्थ है। (२)

उनमें स्नान कर उन्होंने पीताम्बरधारी देवेश्वर अच्युत की पूजा की। मैमिपारण्यपासी ऋपियों की पूजा करने के उपरान्त देवाधिदेव महेश का विधिपूर्वक अर्चन कर वे

महासुर गोपति का दर्शन करने के लिये गयातीर्थ में (३-४)

यहाँ नहा ध्वज में स्नान और उसरी प्रदक्षिणा कर उन्होंने पितरों के निमित्त पवित्र पिण्डदान दिया। (५)

यहाँ उदपान में स्नान कर जिनेन्द्रिय (प्रगद) ने पितरों, गदापाणि (विष्णु) एवं गोपति शहर की पूजा किया। (६)

इन्द्रतीर्थ में स्नान कर उन्होंने पितरों एवं देवों का तर्पण किया एव महानदी के जल मे स्नान र चे सरयू के समीप पहुंचे। (७)

उसमें मान पर उन्होंने गोमतार मे पुरेशर की पूजा पी एवं यहाँ एक रात्रि निवास पर वे शिरजा नगरी मे (८)

विरजातीर्थ मे स्नान करने में पश्चात् पितरों को पिण्डदान पर वे श्रीमान् पुरुषोत्तम अजित का दर्शन करने गये।

वे पापरहित प्रहलाद अक्षर पुण्डरीराक्ष का दर्शन करने के उपरान्त छ रात्रियों तक यहाँ निवास कर दक्षिण दिशा में स्थित महेन्द्र पर्वत पर गए । (१०)

(वे) यदी देवभेष्ठ अर्धनारीपर महादेव का दर्शन एवं पूजन कर पितरों की अर्चना किये एवं उत्तर दिशा की ओर चले गये। ((१)

वहाँ देवर शम्भु और सोमपायी गोपाल का दर्शन करने के पश्चात् सोमनीर्य में स्नान कर वे सहाचल पर गए । (१२)

वहाँ महोदशी मे स्नान करने के उपरान्त भक्तिपूर्वक विष्णु, देवों एवं पितरों का अर्चन कर वे पारियात्र पयत पर गए। (१३)

यहाँ लागलिनी में स्नान करने के उपरान्त उन्होंने अपराजित का पूजन किया एवं कशेरुदेश में जार विश्वरूप का दर्शन दिया। (२४)

यहाँ योगविन देववर शम्भु ने गणों से पूजित अपना विश्वरूप प्रदर्शिन किया था। (१५)

घदो मयुणिया के जल में स्नान करने के उपरान्त महेन्धर का पूजन कर प्रहलाद सुगन्धिपूर्णमलयाचल पर गए ।(१६)

तदननर मदाद में स्नान परने के उपरान दर की पूजा यर योगारमा प्रसाद सदाशिय का दर्शन करने विन्यपर्वत पर गये।

तदनन्तर विपाशा के जल में उन्होंने स्नान किया एवं सदाशिष या पूजन किया। तदुपरान्त तीन रानियों तक पहा नियास कर वे अपनी नगरी में गए। (१८)

यहॉ शिप्रा के जल में स्नान करने के उपरान्त भफिपूर्वक विष्णु का पूजन फर उन्होंने श्मशान में स्थित महाराल वारपारी का दर्शन किया। (१६)

यहाँ दस रूप में स्थित आत्मरशी शङ्कर तामसरूप धारण कर समस्त प्राणियों का संहार करते हैं। (२०)

यहाँ स्थित मुरेश ने सर्वभूतापहारी अन्ना को जला कर श्वेतकि नामक राजा की रक्षा की थी। (२१)

परोड़ों गों से आवृत एवं देवों से पूजित भगवान शहर उमा के साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वहां नित्य निवास करते हैं। (२२)

उन कालवाल, अनाना, यमनिगमक, मृत्यु के मृत्यु, चित्रविचित्र, श्मशानवासी, भूतनाथ जगत्पति, शूलधारी शङ्कर का दर्शन एवं पूजन कर वे निषध देश की (२३-२४)

यहाँ भक्तिपूर्वक अमरेश्वर देव का दर्शन प्यं पूजन करने के उपरान्त उन्होंने महोदय में जारर हयपोर का दर्शन किया। (२५)

तदनन्तर अश्यनीय में स्नान कर अश्वमुप पा दर्शन एवं मीपर का पूजन पर वे पानाल देश गए। ओर गए। (२६)

वहाँ अर्थपति कुवेर के पुत्र ईश्वर-गुण सम्पन्न पांचालिक का दर्शन कर जितेन्द्रिय प्रह्लाद प्रयाग चले गये। (२७)

निकटस्य यमुना के प्रसिद्ध तीर्य में स्नानोपरान्त वटेश्वर स्वयं योगशायी माघर का दर्शन एवं भक्तिपूर्वक उन दोनों पूच्चों का पूजन कर दन महासुर ने मापमास में यहाँ निरास दिया । तदनन्तर वे याराणसी गए । (२८-२९)

तदनन्तर असी और घरणा के सर्वपापहारी विभिन्न तीर्थों में स्नानोपरान्त पितरों एव देवों का पूजन पर उन्होंने पुरी की प्रदक्षिणा की। तदननर अविमुक्तेश्वर म्य फेशर की पूजा तथा लाला का दर्शन कर ये मधुरन चले गए। (३०-३१)

महातेजपी असुरश्रेष्ठ प्रहलाद यहाँ स्वयम्भू देय पा दर्शन एवं पूजन कर पुष्करारण्य में गए। (३२)

इन तीनों वीयों में स्नान करने के उपरान्त पिार प्य देवों वा अर्चन कर उन्होंने अयोगन्धि पुकाम तथा मझा का पूजन किया। (३३)

तदनन्तर सरस्वती के तौर पर स्थित मोरपित फोटितीर्थ में उन्होंने रदकोटि वृपमध्या या दर्शन किया। (३४)

(प्राचीन समय में) नैमिपारण्य, मगध, सिन्धु प्रदेश, धर्मारण्य, पुष्पर, दण्डकारण्य, चम्पा, भररन्छ एवं देविगतीर नियाती श्रेष्ठ प्राह्मण यहाँ शहर या दर्शन करने आये। (३५-३६)

देगुनिशिव फेदनरम्यायाने परोड़ों सिद्ध तपरपी ' पहल पर फरमा' 'मैं पहने न पगा' इम दियाद परने लगे। (२७)

दन पापरहिन मपियों को स्वा हुआ देगार सादर ने उन पर अनुरापा पर योरि मूर्तियाँ धारण दी।

तदनगर ये सभी मुनि प्रमालापर्य थर-थर । मौर्य यार महेपर की पूजा पर हुए रहने रंगे। इस प्रारम्भुपा नाग रदकोटि मा। (३९)

महाशायी भारतमान् जिमेन्द्रिय प्रागद ने इनाम ने किया एवं कोटितीर्थ में मान पर गानों व दिपा अपंग तथा रदयटि या पृतन पर ।पुराल में चले गए। (४०)

उन्होंने यहाँ सरी पं. जर में मग्न मुरपूजित पायागुरपान किया।

सरस्यनी के में स्नान पर उन्होंने भक्तिपूर्वक स्थागु की पूजा की तथा दशावमेघ में स्नान पर देयों एवं पितरी या पूजन दिया। (४२)

पन्याहद में स्नान करने के पश्चात् पवित्र होकर उन्होंने सहयरिङ्ग का पूजन रियाज्यं (शुक्रतीर्थ में) गुरु शुत्राचार्य को प्रणाम पर वे सोमतीर्थ चले गये। (५३)

यहाँ स्नान पर भक्तिपूर्वक पितरों एवं सोम का पृजन घर घे महायशस्वी क्षीरियायाम में जाकर पदों स्नान पिये।

पद से शो मदधिणार तथा यार की पूजा पाने फे पाद बुद्धिमान् प्रसार पुन' पुरष्यत पा रंग पर पद्मा नामक नगरी में गये।

पदों मोरपूजिरा जारी मित्रायरग या अर्थन परने प. उपरान्त गुमारधारा में जागर जिगेन्द्रिय प्रगर ने स्वामी पान दिया।

पापिलधारा में मान पर पितृतर्पण, देयपूजन एवं मन्द पान एवं अपेन पर नर्मदा के समीप (१७)

हममें स्नान तथा समीप पागुदंप दी पूना पर पपमपारी भूपर पारादेय पा पनप गये। (४८)

कोकामुख तीर्थ में स्नान और धरणीधर की पूजा कर वे अर्बुदेश निसौवर्ण महादेव के पास गये । (४९)

वहाँ नारीहुद मे स्नान तथा शङ्कर की पूजा करने के उपरान्त पालिअर में आकर उन्होंने नीलकण्ठ का दर्शन किया। (५०)

नीलतीर्थ के जल में स्नान करने के उपरान्त शिव का पूजन कर वे समुद्र के किनारे प्रभासतीर्थ में भगवान् का दर्शन करने गए। (५१)

यहाँ सरस्वती नदी और सागर के सगम में स्नान कर उन्होंने लोक्पति कपर्दी सोमेश्वर का दर्शन किया। (५२)

पर्दोशङ्कर एव विष्णु ने दक्ष के शाप से दग्धय क्षय रोगग्रस्त ताराधिप चन्द्रमा को पूर्ण किया था। (५३)

उन दोनों श्रेष्ठ देयों का अर्चन पर वे महालय गए। यहाँ रुद्र का पूजन कर वे उत्तरकुरु गए। (५४)

घहों पद्मनाभ का पूजन कर चे सप्तगे दायर तीर्थ में गए। यहाँ स्नान परान्त उन्होंन क्ययन्दित भीम विश्वेश्वर का अर्चन किया। (५५)

दास्पन मे जाफर श्रीमान् प्रहाद ने लिङ्ग का दर्शन किया। उनकी पूजा करने के उपरान्त प्रामणी (नदी) मे जार पदोंने स्नान और निदशेवर महादेय की

पूजा की।  (५६)

तदनन्तर प्लक्षारतरण में जार उन्होंने श्रीनिवास की पूजा की। तत्पश्चात् कुण्डिन में जाकर प्रायों को तृप्ति देने वाले देव । अर्चन किया। (५७)

शूर्पारक मे चतुर्भुज देय की विधिवत् पूजा कर मागधारण्य मे जार उन्होंने यसुधाधिप या दर्शन (५८)

उन विश्वेश का पूजन कर वे प्रजामुख मे गए। तदनन्तर महातीर्थ में स्नान कर उन्होंने यासुदेव को प्रणाम किया। (५६)

शोणतट पर जाकर उन्होंने स्वर्णाचच धारण करने यारे ईश्वर का अर्चन दिया। तदनन्तर भक्तिमान (प्रसाद) ने मक्षामोशी मेहंस नामक महादेव का पूजन किया एय घेछ सैन्धवारण्य में जाकर शह तथा शूलधारी मुनेत्र नामक पूज्य ईश्वर का अर्थन किया। तदनन्तर वे महानाहु त्रियिष्टप (६०-६१)

यहाँ सटाघर नाम से प्रसिद्ध महेशान देव या दर्शन और विष्णु की पूजा पर वे कनपल तीर्थ गये । (६२)

दानर प्रहलाद वहाँ भद्रकालीश पय वीरभद्र तथा पनाधिप

मेघाङ्क पी अर्चना कर गिरिबज गए ।(६३)

वहाँ विधिवत् लोकनाथ महेश्वर पशुपति देव का पूजन पर वे कामरूप गए। (६४)

यहाँ चन्द्र की पॉति से युक्त देवशेठ मिनेत्र शङ्कर की मृडानी (पार्वती) के साथ विधिवत् पूजा फर प्रहलाद श्रेष्ठ महाख्य तीर्थ मे गये और यहाँ पर उन्होंने महादेव की पूजा की। (६५)

तदनन्तर अत्रिपुत्र चम्पाणि विष्णु के दर्शनार्थ ये गिफूट पर्वत पर गये और भक्ति पूर्वक सनकी अर्चना पर उन्होंने परम पवित्र जपने योग्य गजेन्द्रमोक्षण  स्तव का पाठ किया। (६६)

मूल, फल एप पाल या भक्षण परते हुए देत्येवर पुन प्रसाद ने यहाँ तीन मास तक आदर पूर्वक निरास पिया। तदनन्तर श्रेष्ठ मानणों को सुपर्ण दान पर पे पोर दण्डकपन पत्रे गए। (६७)

उन्होंने यही महान हिंस पशुओं के निवारक, महान शासाओं से युक्त यनरपतिशारीरधारी पुण्डरीकाक्ष का दर्शन किया। (६८)

सारस्पत स्तोत्र का पाठ करते हुए महान् विष्णुभक्त असुर प्रहलाद ने तीन रानि पर्यन्त उसके नीचे आस्तरणदीन चबूतरे पर शयन किया। (६९)

विद्वान् दानव (प्रहलाद) यहाँ से सर्वपापहारी हरि का दर्शन करने सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थ में गए । (७०)

उन्होंने उनके सम्मुस प्राचीनकाल में कोडरूपी जनार्दन से कहे गए पापनाशक दो स्तोत्रों का पाठ किया।

तदनन्तर यहाँ से दैत्येन्द्र (प्रहलाद) महाफलदायक शालमाम तीर्थ मे गये। विष्णु यहाँ समस्त घर और स्थावर पदार्थों में विराजमान हैं। (७२)

हे मुने ! यहाँ महान विष्णुभक्त यलयान प्राराद विष्णु को सर्यगत जानार भगवान के चरणों की पूजा करते हुए उनमें अनुरक हुए। (७३)

मैंने तुमसे मुनियों के समूहों से सेवित अत्यन्त पवित्र प्रहलाद की तीर्थयात्रा का वर्णन किया। इनके कीर्तन, अयण एवं पर्श से मनुष्य पापरहित हो जाने हैं। (७४)