वामन महा पुराण
17 मङ्कगक वृत्तान्त
हुई। (३३)
वे महात्मा मकग द्वारा आहूत होकर ऋषि के सम्मा- नार्थ कुरुक्षेत्र के उत्तम तीर्थ में प्रविष्ट हुई। (३४)
केदार तीर्थ में जो सरस्वती "सुवेणु" नाम से प्रसिद्ध है वे ऋषियों और सिद्धों के द्वारा सेविन तथा सर्वपाप-नाशक रूप से विदित है।
उसे भी उन मुनि ने परमेश्वर की आराधना कर
ऋपियों के उपकारार्थ इस कुरुक्षेत्र में प्रविष्ट किया । (३६)
गङ्गाद्वार मे यज्ञ कर रहे दक्ष ने विमलोदा नामक भगरती मरस्वती को प्रकट किया। (३७)
कुरुक्षेत्र में कुरु द्वारा पूजित सरस्वती मङ्कण द्वारा बुलायी जानेपर यहाँ गई। (३८)
बुद्धिमान् माईण्डेय पवित्र जल वाली महाभागा सर-स्पती की स्तुति कर उन्हें सरोवर के मध्य में ले गये। वहीं सप्तसारस्वततीर्य में सिद्धि प्राप्तकर स्थित नृत्य कर रहे मङ्का को शंकर ने रोका था। (३९-४०)
ऋषियों ने कहा-मङ्कणक कैसे सिद्ध हुए ? वे महान् ऋपि किसके पुत्र हुए थे ? नृत्य कर रहे उन्हें महादेव ने क्यों रोका ?
लोमहर्षण ने कहा-मङ्कणक मुनि महर्षि कश्यप के मानसपुत्र थे। (एक समय ) वे द्विज वल्कल लेकर स्नान रम्भादि सुन्दरी अप्सरायें भी वहाँ गई एवं वे सभी अनिन्द्य, फोमल एवं मनोहर (अप्सराय) उनके साथ स्नान करने लगी।
तदनन्तर क्षोभवश मुनि का वीर्य जल मे स्खलित हो गया जिसे उन महातपस्वी ने घड़े में उठा लिया। (४)