क्षीग तेज की प्राप्ति के लिए शिव की तपस्या, शिव का तपश्चरण एव केदार तीर्थ की उत्पत्ति, शङ्कर के सरस्वती में निमग्न होने से मुषन का विक्षोभ, मुरासुरवध के प्रसङ्ग में विष्णु का चतुर्भूर्ति स्वरुप-वर्णन, सन्धकुमार का द्वादशपत्रक योग की प्राप्ति के लिए प्रयत्न एव ब्रह्मा से पुत्राम-नरक विषयक प्रश्न

एवं वृक्षों में होगा। अब तुम सभी निश्चित होकर जाओ। पार्वती के ऐसा कहने पर वे सभी अम्बिका को प्रणाम कर किन्नरों से स्तुत होती हुई समस्त दिशाओं में चली गयीं। अन्यक भी चेतना प्राप्त करने के उपरान्त गिरिजा को न देसकर तथा अपनी सेना को पराजित देखकर पाताल में चला गया। (४२-४६)

हे मुने! तदनन्तर कामयाण से आहत एवं काम के वेग से पीडित दुरात्मा अन्धक पाताल मे जाकर गौरी का स्मरण करता हुआ न दिन में पाता था और न यत में सोता था। (४७)

नारद ने कहा-आप मुझे यह घतलायें कि शङ्कर वहाँ चले गये थे जिससे नन्दी सहित अम्यिा ने युद्ध (१)

पुलस्त्य ने कहा- जिस समय एक सहस्र वर्प तय महामोह में स्थित थे उसी समय से वे निस्तेज एपं शक्ति हीन प्रतीत होने लगे। (२)

बुद्धिमानों मे भेष्ठ महेचर ने स्वयं अपने अह्नों को तेजरहिन देसार तपस्या करने का निश्चय किया। (3)

वे रिमु शहर महावत का आलम्बन करने के उपरान्त अम्यिरा को आश्वस्त किये और शैलादि (नन्दी) को रक्षक नियुक्त कर पृथ्वी पर घूमने लगे। (१)

उन्होंने गले में महामुद्रा धारण कर, महासों का कुण्डल एवं कटि-प्रदेश में महान की मेखला धारण की।

दाहिने हाथ में नरकपाल एवं बायें हाथ में कमण्डलु

लेकरर चे वृक्षों के नीचे, पहाडों के शिरसरों पर तथा नदियों पे किनारे घूमने लगे।

कमल मूल, अम्बु एवं वायु का आहार परते हुए वे तीनों लोरों में नौ सौ वर्ष व्यतीत पिये। (७)

तदनन्तर हिमालय के ऊपर रमणीय तथा सम शिलातल पर आसीन उन यति ने मुरस में योटा लगार श्वासाय रोध किया। (८)

तदुपरान्त शहर में पाल को विदारित वर ज्वालायुक्त यह बीटा जटा के मध्य से निकली एवं पृथ्वी पर गिर पड़ी।

उस योटा फे गिरने से परत विदीर्ण होकर समतल पृथ्वी यासा हो गया और यहाँ वेदार नामक विदयात (१०)

ममन् । तदनन्तर वृपयज महादेय ने फेदार को पुण्यपद्धक, पाप-नाशक और मोशसाधक पर दिया । (२१)

मधु, मासस्य परामभोजन का स्यायसर तथा प्रमचर्य प्रद धारण फर तुम्हारा जल पीने हुए जो सयमी मनुष्य यहाँ प मास तक स्थित रहेंगे उनके द्वापन में निथप ही मेरा शिस्ट होगा। (१२-१३)

वे कमी पाप में रत नहीं होंगे तथा नि सन्देह उनके द्वारा किया गया पितरों का माद अभय होगा। (१४)

मनुष्यों द्वारा यहाँ की गई स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदि क्रियायें अक्षय होंगी तथा मरने पर उनय पुनर्जन्म नहीं होगा।

महादेव से ऐसा पर पारर यह केदारतीय गिनत्र महादेव के पचन के अनुसार लोगों को पवित्र एवं देवताओं को पुष्ट करने लगा। पेदार को वा देकर महादेव सूर्यतनया पापविनाशिनी, देवी यालिन्दी यमुना में स्नान करने के लिए शीघ्र चले (१७)

वहाँ मानकर तथा पवित्र होकर भगगन् शब्दर सैकड़ों पुण्यतीयों से घिरी हुई पापनाशिनी प्लक्ष वृक्ष से एत्पन्न सरस्वती के पास गये। (१८)

सदनन्तर वे स्नानार्थ उतरे एवं महान् जल में निमग्न होयर दुपदा गायत्री का जप करने रगे। हे टिप्रिय । देयी सरस्वती के जल में शङ्कर निमग्न हुए एक वर्ष से अधिर थीत गया किन्नु भगवान् ऊपर नहीं पठे। (२०)

हे ब्रह्मन् ! उसी समय सागरों सहित सत भुवा हिलने लगे और तारों के साथ न पृथ्वी पर गिरने

लगे। (२१)

इन्द्रप्रमुख देवता अपने-अपने आसनों से हिल उठे और महर्षि गण 'ससार का भला हो' जप करने लगे। (२२)

तदनन्तर लोकों के क्षुब्ध होने पर देवगग ब्रह्मा के पास आये और उन्हें देखकर पूला-लोक क्षुब्ध होकर क्यों संशयास्त हुए हैं (२३)

पद्मयोनि ब्रह्मा ने उनसे कहा-इसका कारण में नहीं जानता। तुम लोग आओ, (इस के लिए) चक्र तथा गदा धारण करने वाले विष्णु के पास जाना उचित है। (२४)

पितामह के ऐसा कहने पर इन्द्रादि सभी देवता पितामह को आगे कर मुरारि के लोक मे गये । (२५)

नारद ने कहा-हे देवर्षि । आप यह बतलायें कि ये  मुरारि कौन है ? क्या देवता, यक्ष, किन्नर, दैत्य, राक्षस या मनुष्य है? (२६)

पुलस्त्य ने कहा-सत्त्व रज तममय, गुणमय, निर्गुण, सर्वव्यापी मधुसूदन ही मुरारि नाम से प्रसिद्ध है। (२७)

नारद ने कहा-आप मुझे यह बतलाये कि यह मुर नामधारी दानव किसका पुत्र था? विष्णु के द्वारा युद्ध में वह कैसे मारा गया। (२८)

पुलस्त्य ने कहा-सुनो। मैं मुरासुर के वय की विचित्र पवित्र रब पापनाशक कथा कहता हूँ । (२६)

दनु के गर्भ से कश्यप का मुर नामक औरस पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने श्रेष्ठ देवों द्वारा युद्ध में दैत्यों को पराजित देखा। (३०)

तदनन्तर मृत्यु के भय से डरकर उसने अनेक वर्षों तक तपस्या कर अपराजित विभु ब्रह्मा की आराधना किया । (३१)

तदनन्तर उसके ऊपर प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने कहा- वत्स । वर माँगो। उस दैत्य ने पितामह से यह पर मोगा। (३२)

दे विभो ! युद्ध में मैं जिसे करतल से स्पर्श करूँ वह मेरे हाथ के स्पर्श से अमर होते हुए भी मर जाय । (३३)

लोकपितामह भगवान ब्रह्मा ने कहा-ऐसा ही होगा। तदनन्तर महातेजस्यी घलवान मुर सुरगिरि पर (३४)

हे नारद । यहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदि को युद्ध के लिये ललकारा, किन्तु किसी ने भी उसके साथ युद्ध नहीं किया। (३५)

तदनन्तर क्रुद्ध होकर वह अमरावती में गया एवं इन्द्र

को युद्ध के लिए ललगरने लगा। किन्तु इन्द्र ने उसके साथ युद्ध करने का विचार नहीं किया। (३६)

तदुपरान्त हाथ उठाये हुए वह अमरावती में प्रविष्ट हुआ। किन्तु किसी ने भी उस प्रवेश करते हुए को रोकने का उत्साह नहीं किया। (३७)

तदन्तर इन्द्र के भवन में जाकर मुर ने इन्द्र से कहा- हे सहस्राक्ष  मुझसे युद्ध करो, अन्यथा स्वर्ग छोड़ दो। (३८)

हे ब्रह्मन् । मुर के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वर्ग का राज्य छोड़कर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। (३९)

तदुपरान्त शत्रु ने इन्द्र के गजराज और वन को छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओं के साथ कालिन्दी के दक्षिण कूल पर अपना नगर यसार रहने लगे एय मुर भी स्वर्ग में रहते हुए महान् भोगों का उपभोग करने लगा। (४०-४१)

मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुर के पास पहुँच कर स्वर्ग मे पुण्यवानों के समान आमोद प्रमोद करने लगे। (४२)

यह महासुर किसी समय पृथ्वी पर आया और अकेला हाथी पर सवार होकर सरयू नदी के तट पर उपस्थित हुआ।(४३)

उसने सरयू के तट पर सूर्यवश में उत्पन्न यज्ञकर्म में दीक्षित रघु नामक राजा को देखा। (४४)

उनके निकट जाकर उस दैत्य ने कहा-मुझ से युद्ध करो, नहीं तो यज्ञ बन्द कर दो। हुम देवताओं की पूजा नहीं कर सकते। (४५)

हे ब्रह्मन् । मित्रावरुणनन्दन, महातेजस्वी, बुद्धिमान और तपस्वियों में श्रेष्ठ वसिष्ट ने उस दैत्य के पास जाकर कहा- (४६)

दैत्य ! मनुष्यों को जीतने से तुम्हें क्या लाम होगा ? अजितों को पराजित करो। यदि आक्रमण करना चाहते हो तो उन यमराज को रोको ।

महासुर । वे बलपान हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनके जीत लेने पर समस्त भूतल को विजित हुआ समझो। (४८)

वसिष्ट का यह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्डधारी धर्मराज को जीतने के लिए गया । (४९)

उसे आता हुआ सुनकर तथा 'संग्राम मे वह अवध्य हैं'  ऐसा सोच कर वे यम महिष पर सवार होकर भगवान् केशव के पास गये।

उनके पास जाकर प्रणाम करने के उपरान्त (यमराज ने) मुर की चेष्टाओं को बताया। उन्होंने कहा-तुम जाकर

अभी उस महासुर को मेरे पास भेज दो। (५२)

वासुदेय के पाक्य शे सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतने मे मुर दैत्य उनकी नगरी में आया। (५२)

उसके आने पर यम ने कहा-हे मुर। बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? हे दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आजा का पालन करूँगा। (५३)

मुर ने कहा-हे यम ! तुम प्रजाओं का नियमन धन्द परो, नहीं तो मैं तुम्हारा मस्तक काट कर पृथ्वी पर गिरा दूंगा। (५४)

हे ब्रह्मन् ! धर्मराज ने उससे कहा- यदि तुम मेरे । नियामक से मेरी रक्षा कर ससे तो यस्तुत. में तुम्हारे वचन का पालन करूँगा। (५५)

मुर ने उनसे कहा-मुझे घतलाओ तुम्हारा नियामक फौन है? मैं निरसन्देह उसे पराजित कर रोक दूंगा । (५६)

यम ने उससे कहा-श्वेतद्वीपनिवासी, चम्गदाधर, अव्यय भगवान् विष्णु मुझे शासन मे रसते हैं। (५७)

दैत्यशार्दूल मुर ने यमराज से कहा-यह दुर्सय कहाँ रहता है? में वयं उसमा संयमन करने के लिए यहाँ (५८)

यमराज ने उससे कहा-तुम क्षीरसागर में जाओ। वहाँ लोकनाथ जगन्मय भगवान् विष्णु रहते है। मुर ने उनी बात सुनकर कहा-ई धर्मराज! में केशव के पास जाता हूँ। किन्तु तुम तब तक मनुष्यों का नियमन मत करना। (६०)

उस मुरु ने कहा-तुम जाओ। तब तक मैं तुम्हारे नियामक को जैसे भी हो जीतने का प्रयत्न करूँगा। तदनन्तर तुम युद्ध करना। (६१)

इतना कह कर, मुरु दैत्य क्षीर सागर मे पहुँचा । वहाँ चतुर्मूर्ति जनार्दन अनन्त नाग की शय्या पर (६२)

नारद ने कहा-आप यह बतलाएँ कि विष्णु को एक होने पर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहा जाता है। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होने से तो नहीं कहा जाता? (६३)

पुलस्य ने कहा-हे प्रदान ! अव्यक्त एव सर्वव्यापी होने पर भी वे एक ही है। जगन्नाथ जिस पर चतुर्मूनि कहे जाते हैं उसे मुनो। (६४)

वासुदेव नामर श्रेष्ठ पद अप्रतयं अनिर्देस्य, शुक्ल, शान्त, अध्यक्त एवं द्वादशपरक कहा गया है।

नारद ने कहा-किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्र- तर्य एवं अनिन्दित हैं ? मुझे बतलाएँ कि उनके तथा- कथित द्वादशपत्रक कौन है? (६६)

पुलस्त्य ने कहा-पितामह ब्रह्मा के द्वारा कथित वह गुप्त वाक्य सुनिए। सनत्कुमार ने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था । (६७)

नारद ने कहा--मुझे क्रमपूर्वक यह बतलायें स्वयं ब्रह्मा ने जिनसे कहा और जिन्होंने आपसे कहा वे सनत्कुमार कौन है? (६८)

पुलस्त्य ने कहा-धर्म की पत्नी अहिसा है। उससे चार पुत्र हुए । हे मुनिश्रेष्ठ । वे सभी योगशास्त्र में प्रवीण थे। (६९)

उनमे सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एव सनन्दन चतुर्थ हुए। (७०)

वे सभी साल्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एव योगयुक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पश्चशिख नामक (ऋपियों) को देसकर ( उनके पास गये) बड़ा होने पर भी उन लोगों ने अपने से छोटों को ज्ञानयोग का का उपदेश नही दिया। कपिलादि की उपासना करने वालों को महायोग का परिमाण मान बतलाया गया। (७२)

सनकुमार ने कमलोद्भव ब्रह्मा के पास जाकर योग विज्ञान पूला । प्रजापति ने उनसे कहा- (७३)

हे साध्य | यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा । इसे जिस किसी से नहीं रहना चाहिए। क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है। (७४)

सनत्कुमार ने कहा-हे देवेश । मैं पुत्र ही हूँ। क्यों कि हे विभो । मैं शिष्य हूँ। हे पितामह ! पुन और शिष्य मे कोई अन्तर नहीं होता । (७५)

ब्रह्मा ने कहा-हे धर्मनन्दन! धर्म कर्मों के अनुष्ठान के समय शिष्य और पुत्र मे कुछ अन्तर होता है। उसे बताता हूँ, सुनो। (७६)

यह वैदिकी श्रुति है कि पुम् नामक नरक से उद्धार करने से पुत्र कहलाता है एव शेप पापों का हरण करने वाला शिष्य कहलाता है। (७७)

कुमार ने कहा- देव! यह आप बतलाएँ कि पुत्र जिस नरक से त्राण करता है वह पुम् नामक नरक कौन है एव शिष्य किससे अवशिष्ट पाप का हरण करता है। (७८)