वामन महा पुराण
बदरिकाश्रम में वसन्त शोभा, नर नारायण की तपश्र्चर्या के प्रसङ्ग में काम की अनङ्गता का वर्णन, काम द्वारा अनङ्गता की प्राप्ति
कधवृप वे तुल्य तथा नेत्रगज तुल्य हैं । यह राशि नदी में विचरण करती तथा समुद्र में रहती है।
कुम्भ राशि रिक्त कुम्भ को स्वध पर धारण करने वाले जलाप्लुत पुस्प के आकार से युक्त है। इसका सचार स्थानबूतशाला एव निवास स्थान मद्यशाला है। (५८)
मीनराशि दो परस्पर संयुक्त मछलियों के आकार से युक्त है। तीर्थस्थान एव समुद्र इसके सचार-स्थान है। यह पवित्र देशों एव देव मन्दिरों तथा ब्राह्मणों के घरों में निवास करता है। (५९)
हे महामुने। मैंने आपको मेपादि राशियों का लक्षण बतलाया। आप इस पुरातन रहस्य को किसी से न कहिये। (६०)
हे देव । त्रिलोचन ने जिस प्रकार यज्ञ को प्रमथित किया उसका वर्णन मैंने आपसे कर दिया। इस प्रकार मैंने आपको श्रेयस्कर, पुरातन, परम पवित्र, पापहारी एव कल्याण प्रद आख्यान सुनाया। (६१)
पुलस्त्य ने कहा-हे मुने, ब्रह्म के हृदय से उत्पन्न | दिव्यदेहधारी जो धर्म था उसने दाक्षायणी नाम की अपनी भार्या सेहरि,कृष्ण, नर और नारायण नामक पुत्रों को उत्पन्न किया। हे देव। हरि और करण दोनों नित्य योगाभ्यास मे निरत हो गए । तथा पुरातन और ऋपियों में श्रेष्ठ शान्तमना नर और नारायण ससार के कल्याण की कामना से हिमालय पर्यत पर जाकर परिवाश्रम तीर्थ में गंगा के प्रशस्त तट पर उस परं ब्रह्म का जप करते हुए तपस्या करने लगे। (१-४)
हे ब्रह्मन , नर नारायण की तपस्या से यह चराचर जगत् तप्त हो गया। तब इन्द्र व्याकुल हो गए।
उन दोनों की तपस्या से अत्यन्त क्षुब्ध इन्द्र ने उन्हें क्षुब्ध करने के लिये रम्भा आदि श्रेष्ठ अप्सराओं को महान् आश्रम में भेजा।
आम्र के अकुर रूप महान् आयुधवाला अत्यन्त दुर्धर्प कन्दर्प भीअपन सहचर वसन्त के साथ आश्रम में गया ।(७)
तदनन्तर वसन्त, कन्दर्प तया वे श्रेष्ठ अप्सराएँ यदरिका
श्रम मे आर इच्छानुसार प्रोडा करने लगी। (८)
तदुपरान्त वसन्त ऋतु के आने पर अग्नि के सदृश कातिवाले पत्रहीन पलाशवृक्ष वसुधा की शोभा बढाते हुए निरन्तर सुशोभित हुए।
हे मुने । वसनरूप केसरी पलाश कुसुम रूप नसों से शिशिर रूपमातग को मानों विदीर्णवरवहाँ प्रस्ट हुआ।(१०)
मैंने अपने तेज से तुपार समूह रूपी हस्ती को जीत लिया है इस भाव से वसन्त, कुन्द की परियों के द्वारा जोर से उममा उपहास करने लगा। (११)
स्वर्णाभरणधारी रानपुनों के सदृश पुष्पित यर्णिसरों (अमलतास) के यन सुशोभित होने लगे। (२)
उनके पीछे क्दम्ब वृक्ष इस प्रशर सुशोभिव होते थे जैसे रामपुत्रों के पीछे स्वामी से सम्मानित सेवक शोभा (१३)
रक्त अशोक के वन इस प्ररार सहसा कुसुमित तथा उपल हो शोभित हो उठे मानों वसन्त राजा के भृत्य युद्ध में रक्त से परिप्लुत हो रहे हैं। (१४)
गहनधन में पिसरित मृगवृन्द इस प्रकार विराजित होने लगे जैसे मुहद् के आने से सजन पुलकित हो जाते है। (१५)
नदी के कूलरों पर अपनी मारियों के द्वारा वेतस इस प्रभार सुशोभित हो रहे थे मानों वे अंगुलियों के द्वारा यह कहना चाहते हैं कि हमारे सदृश अन्य कौन वृक्ष है। (१६)
हे देवर्षे । हे ब्रह्मन् । रक्ताशोक रूपी हाथ, पलाश रूपी पद, नीलाशोक स्पी फेश-क्लाप, विकसित कमलरूपी मुस, नील कमल रूपी नेन, बिल्वफ्ट रूपी स्तन, विकसित कुन्द फूल रूपी दन, मञ्जरी रुपी बन्धुजीव रूपी अपर, सिन्दुवार रूपी नस, नर कोयल की वारली रूपी स्वर, अकोल स्पी बघ, मयूर समूह रूपी आभरण, सारस के स्वर रूपी नूपुर, प्राग्यशस्पी करधनी, मत्त इस रूप गति, पुरजीर रूपी अशुझ (य) और भ्रमर रूपी रोमारी से पिराजित दिव्य, शुभ, तन्वी एव तरुणी वसन्त लक्ष्मी उस घरिमाप्रम मे प्रक्ट हुई। (१७-२१)
तदनन्तर नारायण ने आश्रम की पवित्रता देस तथा सभी दिशाओं की ओर देखर अनग (कामदेव) को देखा। (२२)
नारद ने कहा-“हे ब्रह्म । यह अनङ्ग कौन है ? जिसे अव्यय जगन्नाथ नारायण ने पदरिकाश्रम मे देसा।" (२३)
पुलस्त्य ने कहा-कन्दर्प हप यापुत्र है। उसे ही काम पदा जाता है। भार ( नेगनल) द्वारा दग्ध होरर यह अनह दो गया है। (२४)
नारद ने कहा -"आप यह बतला फिदेवाधिदेशर ने कामदेव को क्यों और रिस कारण से भस्म किया। (२५)
पुलस्त्य ने कहा-हे प्रक्षन् । दक्ष दुहिता सती ये प्राम त्याग करने पर विगेपन दस-या का ध्यस पर वितरण करने लगे। (२६)
तदनन्तर पृषभ्यन को अपत्नीक देवार कुसुमायुध कन्दप ने उन्हें उन्माद नामक अन के द्वारा आहत किया। (२७)
सदुपरान्त उन्माद शर से ताहत शार उन्मत्त होकर यनों धीर सरोवरों में विचरण परने लगे। (२८)
६ देय ! यागविद्ध गज के सहा न्माद शर से उस प्रकार तारिउ महादेय सती का स्मरण परत हुशागि नदी प्राप्त कर सके। (२६)
हे मुने । सदननर देवेश शर पारिन्दी नदी में गिर पदेशीर के निमग्न होने पर (नदी पा) जलदग्ध होरर पालादो गया। (३०)
उस समय से कारिन्दी नदी पाउन मुंग और अंजन
ये सदृश पाला हो गया एय यह पवित्र वीर्योवाट नदी पृथ्वी के येशपाश को सदृश प्रवाहित होने लगी। (३१)
तदनन्तर पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों, रमणीय नदी- तटों, यापियों, कमलपनों, पर्वतों, मनोहर यानो तथा पर्यन शृगों पर वेन्छ पूर्वक विचरण करते हुए महेश्वर पही भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सरे। (३२-३३)
हे देवरें। शार यमी गाते, पभी रोत और कभी पृशाशी मनोरमा दसमस्या का ध्यान परत थे। (३४)
ध्यान फररे फभी सात और कभी स्वप्न देसने गाने थे, सप्नगल में दक्ष की उस कन्या को देखकर यह इस भरार पदत थे (३५)
है निर्दये । को, हे मूढ़े। मुझ क्यों घोर रही हा ? हे अनिन्दित । हे मुग्य। तुम्हारे रिह में में कामाग्नि द्वारा दग्ध हो रहा हूँ।
हे सति । यया सुम पातुन मुख हो । मुन्दरिमोप मा परो । मैं तुम्हारे परणों में अपना होकर प्राम करता हूँ। मेरे साय तुम्हें सम्माप करना चाहिये ।(३०)
हे प्रिये। में सात तुम्हारी पात्र मुनना , नुरें देखता है, तुम्हारा स्पर्श करता है, तुम्हारी वन्दना करता हूँ
तथा तुम्हें आलिगित करता हूँ। तुम क्यों बात नहीं कर रही हो?" (३८)
"हे या । विलाप करने वाले व्यक्ति को देख कर किसे दया नही उत्पन्न होती? विशेषत अपने पति कोविरापरता देसर किसे दया नहीं आती ? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो। (३९)
हे यशोदरि। तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना में जीवित नहीं रदूँगी। उसे तुमन असत्य कर दिया। (४०)
"हे मुलोचने ! आआ आओ । कामसन्नत मुझ आलि- नित करो। हेप्रिये! में सत्य को शपथ पाकर कहना हूँ कि अन्य किसी प्रशर मेरा ताप नहीं शान्त होगा।' (४१)
इस प्रकार पिटाप पर वे स्वप्न के अत मे तत्क्षण छठ अरण्य में मुक्त कण्ठ से रोने लगे। मुक्तकण्ठ मे पिलाप करते हुए पतन को दूर से देख काम ने यापूर्वक धनुष झुका कर पुन उन्हें सन्ताप नामक पाण से थावित किया। (४३)
तब सन्तापनात्र से विद्ध होकर वे और भी अधिक सन्तप्त हो गये एवं मुख से घारम्बर पूकार कर समस्त जगन् को सन्तप्त करते हुये समय व्यतीत करने लगे।(४४)
तदनन्तर मदन ने उन्हे पुन विजुम्मण नामक अस्त्र से आहत किया जिसस उन्हें अम्हाई आने लगी। तदु- परान्त काम के यागों से अत्यन्त पीड़ित होकर विजृम्भण करते हुए तथा पतुदिक् परिभ्रमण करते हुए उन्होंने यक्षाधिपति के जगत् में प्रधान पावालिक नामक पुत्र को देखा। धनद के पुत्र को देस उसके पास जाकर त्रिनेत्र ने यह वचन कहा-दे भ्रातृव्य । तुम अमित विरमशाली हो, मैं जो आज पाव कहता हूँ उसे तुम करो। (४५-४६)
पाशालिक ने पहा-“हे नाथ । आप जो पहेंगे देवताओं द्वारा मुदुष्कर होने पर भी उसे मैं करूँगा । हे अतुलशक्तिशाली शभो! आदेश दीजिये। हे ईश! में आपका यक्तियुक्त दास हूँ।" (४७)
महेश्वर ने कहा-घरदायिनी अम्यिका के विनष्ट होने पर मेरा मुन्दर शरीर कामाग्नि से अत्यन्त दग्ध हो रहा है।
विजृम्भय और उन्माद चारों से विद्ध होने से मुझे धैर्य, रति या सुस नहीं प्राप्त हो रहा है। (४८)
"हे पुन । तुम्हारे अतिरिक्त अन्य बोई पुस्प, कामदेव से प्रेरित विजम्भश, सतापन और उन्माद नामक एम अस्न धारण करने में समर्थ नहीं है। अत तुम इन्हें प्रहण परो।" (४६)
पुलरत्य ने कहा-वृपमध्यज के ऐसा कहने पर उसयक्ष ने विज़म्मण आदि सभी आत्रों को ग्रहण कर लिया । इस से त्रिशूली को तत्काल सतोप प्राप्त हो गया और सन्तुष्ट होकर उन्होंने उससे इस प्रकार वचन कहा- (५०)
महादेव ने कहा-हे पुत्र । क्योंकि तुमने अति भयर यिम्भण आदि अरनों को ग्रहण कर लिया अन प्रतिपूज ना मैं तुम्हें सप लोगों के लिये आनन्ददायक वर दूंगा। (५१)
चैन्न मास में जो वृद्ध, पालक, युवक या लो तुम्हाप
स्पर्श या भक्ति पूर्वक पूजन करेंगे चे समी तरक्षण उन्माद- प्रस्त हो जायेंगे। (५२)
हे यक्ष । वे गायेंगे, नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणता के साथ याजे बजाएँगे। तुम्हारे सम्मुख हँसी की बात करते हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। (५३)
"मेरे ही नाम से तुम पूज्य होगे । ससार में तुम्हारा पाचालिश नाम प्रसिद्ध होगा। मेरे प्रसाद से तुम लोगों के वरदाता और पूज्यतम हागे । जाओ।"
महेश्वर के ऐसा कहने पर यह यक्ष सहसा सब देशों में गया । कालजर के उत्तर और हिमालय के दक्षिण जो परम पवित्र दश है- (५५)
उस पुण्यभूमि में यह अधिति हो गया। रुद्र पे प्रसाद से यह पूजित हुआ। उसके चले जाने पर भगगन त्रिनेत्र भी विन्यगिरि पर गए। (५६)
वहाँ भी मदन ने जाकर पकेनन को देखा । प्रहार
की कामनावाले उस (कामदेव) को देस हर भागने (५७)
तदनन्तर कामदेय के द्वारा पीछा किये जाते हुये महादेव पोर दारुबन में प्रविष्ट हुए जहाँ सपत्नीक ऋषिगण निवास करते थे। (५८)
उन ऋपियों ने भी उन्हें देखकर सिर झुका कर प्रणाम किया। तदनन्तर भगवान ने उनसे कहा-'मुझे भिक्षा दीजिए। (५६)
इस पर सभी महर्षि मौन रह गये। हे नारद । तदुप रान्त महादेय समस्त आश्रमों में भ्रमण करने लगे। (६०)
उस समय उन्हें प्रविष्ट हुआ देस अस्थती एव सुन्दरी अनुसूया को छोदकर, क्योंकि एनय मन पति की उनका पूजा एप भ्यान में लगा था, भार्गव और आरेय फ्री ममम्त पलिया प्रवन्ध ण्य सत्वहीन हो गई। (६१ ६२)
तदनन्तर महेश्वर जहाँ जाने वहीं वे संक्षुभित, कामात एवं मद से विकल इन्द्रियों यालीसभी स्त्रियाँ भी जाने लगी । (६३)
अपने आश्रमों को शून्य छोद मुनियों की वे नियों इस प्रकार उनका अनुसरण करने लगी जैसे इथिनियों मतयारे युअर का अनुसरण करती है। (६४)
हे मुने ! यह देखर मोधान्वित भार्गव एव आहिरस
ऋपियों ने कहा कि इनका लिंग भूमि पर गिर जाय । (६५)
तदनन्तर महादेव का लिंग पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ गिर गया । एव नीललोहित त्रिशूली वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
तदुपरान्त यह गिरा हुआ लिंग पृथ्वी का भेदन कर शीघ्र रसातल मे प्रविष्ट हो गया एव ऊपर की ओर उसने ब्रह्माण्ड का भेदन कर दिया। (६७)
तत्पश्चात् पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, पादप, तथा चराचर से पूर्ण समस्त पाताल एव लोक काँप उठे। (६८)
पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनों को सक्षुब्ध देस कर माघव को देसने क्षीरसागर पहुँचे। (६९)
वहाँ हपीकेश को देश भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उन्होंने कहा-“हे देय । हे विभो। समस्त भुवन क्यों विध हो गये हैं?" (७१)
तदतन्तर हरि ने कहा- हे ब्रह्मन् । महर्पियों ने शम्भु के लिंग को गिरा दिया है उसके भार से आतं यमुन्धरा विचलित हो रही है।" (७१)
तत्पश्चात् देव पितामह उस अद्भुत घात यो सुनकर पारबार कहने लगे-“हे देवेश । यहाँ चलें।" (७२)
तदुपरान्त देव पितामह और जगत्पति केशव वहाँ पहुँचे जहाँ शकर का यह लिंग था। (७३)
तदनन्तर उस अनन्त लिंग को देस कर विस्मयान्वित हरि गरड पर सवार हो पाताल में प्रविष्ट हुए। (७४)
पनयिमान के द्वारा ब्रह्मा सम्पूर्ण ऊर्ध्व देश को आक्रान्त करने पर भी उस लिंग का अन्त नहीं पा सके त हे ब्रह्मन् । आश्चर्यान्वित होर ये लौट आये। (७५)
लोक्रअक चक्रपाणि विष्णु सातों पातालों में जाकर (पुन) पाहर निकले । हे महामुने । वे भी (उसका) अन्त नहीं पा सके। (७६)
विष्णु और पितामह दोनों हा के लिंग के पास जाकर हाथ जोड़कर देव की स्तुति करने लगे। (७७)
हरि और ब्रह्मा ने कहा-'हे शूरपाणे । आपसे नमस्कार है। हे वृपमध्वज । हे जीमूतवाहन । हे कवि । हे शर्य। हे ध्यम्यक हे शकर। आपको नमस्कार है । (७८)
हेमहेश्वर हे महेशान सुवर्गाक्ष । हे वृपापे। हे दक्ष पसके षिध्यसका है कालरूप । आपको नमस्कार है। (७९)
हे परमेश्वर । आप इस जगत् के आदि मध्य एव अन्न हैं। आप भगवान् (पढेश्वयंपूर्ण) और सर्वव्यापी हैं। आपो नमस्कार है। (८०)
पुलस्त्य ने कहा-"उस दारुवन में इस प्रकार स्तुति किये जाने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ हर ने अपने सरूप मे आविर्भूत होकर (अर्थात् मूर्तिमान होकर) उन दोनों से कहा- (०१)
हर ने कहा-'हे युगलदेवतानाथ । यकी गति वाले, कामानल से दन्ध एय अत्यन्त अस्वस्थ मेरी यहाँ आप क्यों स्तुति कर रहे हैं? (८२)
दोनों देवों ने कहा-हे शंकर । पृथ्वी पर आपरा जो यह लिंग गिराया गया है उस पुन आप ग्रहण करें। इसी लिए हम आपरी स्तुति कर रहे हैं। (८)
हर ने कहा-“हे युगल सुरोत्तम । यदि देवता मेरे लिंग की अर्चना करें तभी में इसे पुन प्रहण फरूँगा अन्य किसी प्रकार नहीं।' (८५)
तब भगरान् केशर ने कहा-"ऐसा ही हो।" प्रशा ने स्वय उस वर्ण के सदृश पिंगल लिंग को प्रहा किया। (८५)
तय भावान ने पारों घों को हर लिंग की अर्चना का
अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकार के वचनों से प्रख्यात हैं। (८६)
हे मुने । (उन हरमत्तों का) प्रथम सप्रदाय)शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालवदन, और चतुर्थ कपाली नाम से विख्यात है। (८७)
वसिष्ठ के प्रियपुत्र शक्ति स्वय शैव थे एव उनका गोपायन नाम से प्रसिद्ध शिष्य था। (८८)
तपोधन भरद्वाज महापाशुपत ये और सोमकेश्वर राजा ऋपभ उनके शिष्य हुए। (८६)
हे मुने। ऐश्वर्ययुक्त तपोधन आपस्तम्व, फाटवदन सप्रदाय के आचार्य थे। माथेश्वर नाम का उनका एक वैश्य शिष्य था। (६०)
धनद (नाम पा) महानती (कपाली) था। शूद्र जाति महातपस्वी फोदर नामक उनका एक प्रसिद्ध (९१)
इस प्रकार भगवान प्रदा शिव पी पूजा के लिये चार आश्रमों या विधान कर अपने भवन को चले गए। (२)
प्रक्षा के चले जाने पर महादेव ने भी इस लिंग को उपसंहत कर रिया एय चित्रवन में सूक्ष्म लिंग प्रतिष्ठापित कर विचरण करने लगे। (९३)
उस समय महेश को विचरण करते देस पुष्पधन्वा कामदेव पुन उनके सम्मुख निकट स्थित होकर उन्हें सन्तापित करने को उद्यत हुआ। (६४)
तदुपरान्त महादेव ने उस कामदेव को सामने देखकर क्रोधपूर्ण दृष्टि से शिखा से चरण तक उसे देखा। (९५)
हे ब्रह्मन् । त्रिनेत्र द्वारा आलोकित होने पर द्युतिमान होने पर भी कामदेव पैर से लेकर कक्ष पर्यन्त दग्ध हो गया। (९६)
फुसुमायुध मदन ने अपने चरणों को जलमे हुए देख श्रेष्ठ धनुष को फेंक दिया जिसके पाँच टुकडे हो गए। (६७)
उस धनुष का परमप्रमायुक्त रुक्मपृष्ठ मुष्टियन्ध सुगन्ध से भरा सुन्दर चम्पक वृक्ष हो गया। (९८)
हे मुने। उस धनुष का यमभूपिन सुन्दर आकार वाला नाहस्थान केसरारण्य बकुल नाम का वृक्ष बना। (६६)
इन्द्रनील से विभूपित उसकी सुन्दर कोटि भृगों से विभूषित रमणीय पाटला (गुलाब) के रूप में परिणत हो गयी। (१००)
नाह के ऊपर मुष्टि में स्थित चन्द्रकान्तमणि की प्रभा से युक्त स्थान, शशिविरण के समान उज्ज्वल पञ्चगुल्मा जाती (जूही) पन गया। (१०१)
हे मुने । मुष्टि के उपर और दोनों कोटियों के नीचे वाले विद्रुममणि विभूपित स्थान से अनेक पुटों पाली मल्लिका (मारती) उत्पन्न हुई। (१०२)
हे नारद । देव के द्वारा जाती (जूही) के साथ अन्य मुन्दर तथा सुगन्धित पुप्पों की सृष्टि हुई । शरीर के दग्ध होते समय कामदेव ने अपने बाणों को पृथ्वी पर फेंका जिससे सहस्रों प्रकार के पलयुक्त वृक्ष उत्पन्न हुए। (१०३-१०४)
श्री हर के प्रसाद से श्रेष्ठ देवताओं द्वारा भी भोग्य अनेक प्रकार के सुगन्धित एवं स्वादिष्ट आम्रादि पल उत्पन्न हुए। (१०५)
इस प्रकार मदन को भस्म कर एवं अपने शरीर को सयत कर विभु अव्यय र पुण्य की कामना से हिमा लय पर तपस्या हेतु चले गए। (१०६)
पूर्व समय में इस प्रकार देवताओं में श्रेष्ठ शम्भु ने धनुप वाण सहित काम को दग्ध कर दिया। तत्पश्चात् देवताओं में प्रथम पूजिन यह महाधनुर्धर देवों द्वारा "अनङ्ग" कहा गया। (१०७)