अन्धक से युद्ध के लिए हर का प्रयाण, रुद्रगणो का दानवो से युद्ध, तुहुण्ड, कुजम्भ दुर्योधन, हस्ती आदि का वध

सभी गणपति मन्दरपर्वत को चतुर्दिक आकृत कर रहने लगे।(५८)

मेघाभ प्रमथों से आच्छादित शङ्करपादसेवी शुक्ल शरीर गिरिवर इस प्रकार सुशोभित हो रहा था जैसे नील मृगचर्म से आच्छादित शरीरवाला एवं शरदकालीन मेघ के वर्णवाला शङ्कर का बलवान् वृपभ सुशोभित होता है।(५६)

पुलस्त्य ने कहा-इसी बीच अन्धक दैत्यों के साथ प्रमों से सेवित कन्दराओं वाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दर पर आया। (१)

दानवों को देखकर, प्रमथों ने क्लिकिला ध्वनि की एक उत्तेजनापूर्वक अनेक तूर्य बजाने लगे।

उस प्रलय-तुल्य तुमुलध्वनि ने आकाश और पृथ्वी के अन्तराल को आवृत कर लिया। वायुमार्गस्थ विघ्न राज विनायक ने उस शब्द को सुना। (३)

प्रमयों से आवृत अत्यन्त क्रुद्ध वे पर्वत श्रेष्ठ मन्दर पर गये एवं अपने पिता को देखा। (४)

भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन्होंने महेश्वर से कहा-हे जगन्नाथ ! आप बैठे क्यों है? रण के लिए उत्सुक होकर आप उठे।

विघ्नेश्वर गणेश के कहने पर जगन्नाथ महादेव ने अम्बिका से कहा-मैं अन्धक को मारने के लिए जाऊँगा, तुम सावधानी से रहना।

तदुपरान्त गिरिनन्दिनी ने महादेव को यार-बार आलिङ्गन कर एवं सप्रेम दृष्टि से उन्हें देखकर कहा-

जाइए एय अन्धक पर विजय प्राप्त कीजिए। (७)

तदनन्तर गौरी ने देवश्रेष्ठ शङ्कर को चन्दन, रोचना एवं अअन लगाया एव अति प्रीतिपूर्वक उनके चरणों को वन्दना की।

तदनन्तर महादेव ने मालिनी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजिता से यह यशस्कर वचन कहा- (९)

तुम लोग सुरक्षित गृह में सावधानी से रहना एवं प्रयत्नपूर्वक गिरिपुत्री की प्रमाद करने से रक्षा करना । (१०)

उन सभी को ऐसा निर्देश देने के उपरान्त वृप पर आरूढ़ होरर शूलधारी पलवान् शङ्कर जय की आराक्षा से प्रसन्नतापूर्वक घर से निकले। (११)

गृह से निपल रहे शङ्कर को चारों ओर से आरत कर गणाधिपों ने "जय जयकार" किया। (१२)

है महर्पि! लोपाल शूलधारी महेश्वर के युद्धार्थ निक्लने पर उनकी जय के लिये शुभ, सौम्य और महलजनक चिह्न प्रकट हुए। (१३)

उनके पाम भाग मे शृगारिनी स्थित थी एवं पर करती हुई आगे जा रही थी। मांस-लोभी प्राणी प्रसन्नतापूर्वक रुधिर के लिये जा रहे थे। (१४)

शूलपाणि का दाहिना अग नख तक काँप उठा। हारीत पक्षी चुपचाप पीछे की ओर जा रहा था। (१५)

भूत, भविष्य एवं वर्चमानस्वरूप शशिशेखर विभु महादेव ने इस प्रकार के निमित्तों को देसफर शैलादि नन्दी से हास्ययुक्त वचन कहा। (१६)

शङ्कर ने कहा-हे नन्दी । हे गणेश्वर । यहाँ शुभ निमित्त दृष्टिगोचर हो रहे है। अत आज मेरी विजय होगी। किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। (१७)

शम्भु के उस वचन को सुनार शैलादि ने शङ्कर से पहा हे महादेव आप शत्रुओं को जीतेंगे इसमे सन्देश क्या है? (१८)

ऐसा कहकर नन्दी ने महापाशुपत सहित रुद्रगयों को युद्ध के लिए आदेश दिया।

नाना प्रकार के शरनों को धारण करने वाले ये वीर दानयसैन्य के निकट जार उसे इस प्रकार मर्दित करने लगे जैसे यथ वृक्षों को नष्ट करता है। (२०)

बलवान् प्रमयों द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य-दानय गण

हृदय में भेदन किया। घटोदर ने गदा से तथा राक्षसों के अधिपति सुकेशी ने खड्ग से प्रहार किया। (३५)

उन चारों द्वारा आघात किये जाने पर राहु ने गणाधि- पति को छोड़ दिया। छूटते ही उन्होंने फरसे से तुहुण्ड के शिर को काट दिया। (३६)

तुहुण्ड के मारे जाने प्य राहु फे विमुख हो जाने पर मोधरूपी यिप को छोड़ने की इच्छा याले फालानरतुल्य पाँचों गणेश्वर एक साथ दानयष्टों की सेना में प्रविष्ट हुए।

अपनी उस सेना को मारी जाती देसार यायु के सदृश वेगयाले यलयान् यलि ने गदा लेकर यिनायक के कुम्भस्थल, मस्तक एय ह पर प्रहार किया। (३८)

पुण्डोदर की पटि फो भग्न कर दिया, महोदर के शिर.कपाल को विशीर्ण कर दिया, युम्भध्यज के जोड़ों को पूर्ण पर डाटा एवं घटोदर फी जाँघों को सोद दिया। (३६)

उन गणाधिपों को विमुख कर पीर श्रेष्ठ यह बल्यान असुरेन्द्र शीघ्रता से स्मन्द, पिशास आदि प्रमुस गणेश्वरों को मारने के लिए दौड़ा। (४०)

भगवान् महेश्वर ने उसे आते हुए देखकर गणों में सर्वश्रेष्ठ शैलादि को बुलाकर कहा-हे धीर! जाओ और युद्ध में दैत्यों को मारो। (४१)

वृषभध्वज के ऐसा कहने पर शिलाद के पुत्र नन्दी यय लेकर घलि के समीप गये एवं उसके मस्तक पर प्रहार किया जिससे यह मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। (४२)

अपने भतीजे को भूठित जानवर यट्यान्' (जम्म ने शोधपूर्वक मुसल हैकर घुमाते हुये ससे नन्दी की ओर बेगपूर्वक पया। (५३)

भगवान् नन्दी ने आते हुये उस मुसल को शोप्रतापूर्वक हाय से पकड़ लिया एवं उसी से युद्ध में कुजम्भ

को मारा। यह निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। (४४)

वीर नन्दी ने मुसल से कुजम्भ को मार कर द्वारा सैकडों दानवों को मार डाला। गणनायक द्वारा मारे जा रहे ये दानव दुर्योधन की शरण मे गये। (४५)

दुर्योधन ने गणाधिप द्वारा यन्त्र प्रहार से दैत्यो को निहत देखकर बिजली के समान प्रकाश से युक्त प्रास लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुये उसे नन्दी की ओर (४६)

नन्दी ने आ रहे उस (प्रास ) को वस से इस प्रकार पाट दिया जैसे पिशुन व्यक्ति रहस्य का भेदन कर देता है। तदनन्तर उस पास को कटा हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँध कर गण नन्दी के पास गया। (४७)

तदनन्तर नन्दी ने देगपूर्वक फुलिश द्वारा वालफल के सदृश उसके मस्तक को काट डाला। मारे जाने पर वह भूमि पर गिर पड़ा एव भयभीत दैत्य वेगपूर्वक दसों दिशाओं में भाग गए। (४८)

हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्र को मारा गया देसकर नन्दी के पास आया। उसने धनुप लेकर नीववेग से यमदण्ड तुल्य बाणों से प्रहार किया। (४६)

मेघ जिस प्रकार जलधाराओं से पर्वतों को आच्छा दित परता है, उसी प्रकार उसने नन्दी के सहित वृषभध्वज के उन गणों को आच्छादित किया । अमुर के के बाणजाल से आच्छादित हो रहे वे विनायक आदि बल्वान् वीर सिह के द्वारा आक्रान्त वृपभों के सदृश भयातुर होकर चारों ओर भागने लगे। (५०)

कुमार ने गणों को पराङ्मुख देख शक्ति द्वारा बाणों को निवारित किया। व शीघ्रतापूर्वक शत्रु के पास पहुंचे तथा शक्ति से उसका हृदय भिन्न कर दिये। (५१)

शक्ति से हृदय के फट जाने पर हस्ती पृथ्वी पर गिर पड़ा एवं मर गया तथा शुनु सेना पुन पराङ्मुस हो गई।

दैत्यसेना को लिम्न भिन्न हुई देखकर क्रुद्ध गणेश्वर

नन्दी को आगे कर दानवों को मारने लगे। (५३)

प्रमथों द्वारा मारे जा रहे वे सभी पराड मुख बलवान कार्तवरादि दैत्य पुन' लौट पड़े।

उन्हें लौटते देखकर वेगवान् व्याघ्रमुख नन्दिपेण भी क्रोध से आँखे लालकर लम्बी साँस छोड़ते हुए लौट पड़ा। (५५)

हे नारद । तदनन्तर हाथ के अप्रभाग में पट्टिश लिये हुये उस गणाधिप के लोटने पर कारीस्वर गदा लेकर लौटा। (५६)

उस अग्नि के सदृश तेजस्वी महासुरेन्द्र को आते देखकर गणपति ने पटिश घुमाकर उसके शिर पर मारा। कार्चस्वर चीत्कार करता हुआ मर गया । (५७)

उस ममेरे भाई के मारे जाने पर वीर तुरङ्गकन्धर ने पाश को लेकर पहिश के सहित नन्दिपेण गणेश्वर को बाँध लिया।

नन्दिपेण को बँधा देखकर बलवानों में श्रेष्ठ विशाख क्रोधपूर्वक उसके समीप गए एव हाथ में शक्ति लिये हुए

( उसके सम्मुख ) खड़े हो गए। (५९)

उन्हें देखकर बलवानों में श्रेष्ठ अय शिरा हाथ में पाश लेर कुक्कुटध्वज विशाख के साथ युद्ध करने लगा। (६०)

विशाख को अय.शिरा के द्वारा युद्ध में अवरुद्ध हुआ देखकर शाख एव नैगमेय नामक गण शीघ्रतापूर्वक शनु की ओर दौड़ पड़े। (६२)

विशास का प्रिय करने की इच्छा से एक ओर से नेगमेय ने एवं दूसरी ओर से शास ने शक्ति द्वारा अय शिरा को मारा। (६२)

शङ्कर के तीनों पुत्रों द्वारा पीड़ित होने पर उस अय शिरा ने युद्ध छोड़ दिया। वे गणेश्वर शम्बर को देखकर शीघ्र उसके पास पहुंचे। (६३)

शम्बर ने उनपर पाश को घुमा कर चलाया शङ्कर के चारपुत्रों ने पाश पर प्रहार किया । ( इससे वह पाश ) आकाश से भूतल पर गिर कर नष्ट हो गया। (६४)

पाश के नष्ट हो जाने पर भयभीत शम्बर