वामन महा पुराण
चित्राङ्गदा आख्यान में विश्वकर्मा का वानर होना, वेदवती नम्दयन्ती, जाबालि एव देववती का उपाख्यान जावालि के जटामोधन का वर्णन
मुनि के ऐसा कहने पर बाला चित्राङ्गदा यहाँ से शीघ्र सप्तगोदावर नामक तीर्थ में गई। (८२)
वहाँ जाने के उपरान्त वह देवाधिदेव त्रिलोचन की पूजा करती तथा फल-मूल का भक्षण करती हुई पवित्रता-पूर्वक रहने लगी।
उन ज्ञान-सम्पन्न ऋषि ने उसकी हित-कामना से प्रेरित होकर श्रीकण्ठ के मन्दिर मे महाख्यानयुक्त एक श्लोक लिया। (८४)
ऐसा कोई देवता, असुर, यक्ष, मनुष्य या राक्षस नहीं जो अपने पराक्रम से मृगनेत्री का दुःख दूर कर सके। (८५)
ऐसा कहने के उपरान्त उस विशालाक्षी के विषय में विचार करते हुए चे मुनि पूज्य विभु पुष्कर-नाथ का दर्शन करने के लिये मुनिन्द से वन्द्य पयोष्णी नदी के तट पर गये।(८६)
दण्ड ने कहा-हे अरजे । वहाँ वीर सुरथ का भ्याग करते हुए सुखपूर्वक चित्रागदा को दीर्घ ममय व्यतीत हुआ।
मुनि से अभिशप्त विश्वकर्मा भी पानर हो गये। भवितव्यतावश ये मेरु शिखर से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर आ गये। (२)
हे सुन्दरि ! वे 'शाकिनी नदी के समीप पने गुल्मों से पूर्ण भयङ्कर यन याले पर्वत-श्रेष्ठ शाल्वेय पर रहने लगे।
हे वरारोहे ! उस वन में फल-मूल खाकर रहते हुए
उन्होंने अनेक वर्षों का समय व्यतीत किया ।
एक समय 'कन्दर' नामर श्रेष्ट दैत्य 'देवरती' नाम से प्रसिद्ध अपनी प्रिय पुत्री को साथ लेकर यहाँ आया।
तदनन्तर घानरश्रेष्ट ने पिता के साय धन मे आ रही उस सुन्दरी को देखा एवं बलपूर्वक उसका हाथ पकड़ (६)
हे शुभे । दैत्य कन्दर अपनी कन्या को पानर के द्वारा परड़ी गयी देसर अत्यन्त क्रोध से सड्ग उठाकर दौड़ा।
पलान् यानर उस दैत्येन्द्र को आने देखकर उस सुन्दरी कन्या के साथ हिमालय पर चला गया। उसने 'यमुना' तट पर महादेव श्रीरण्ठ का दर्शन रिया एव यहाँ से थोड़ी दूर पर ऋषिविरहित गहन आश्रम देखा।
उस पवित्र महाप्रम में देयवती को रसकर यह यानर दत्य फन्दर के सामने कारिन्दी (ये जल) में दूब गया। (१०)
उम कन्दर ने समझा कि उस कन्या उस घानर के साथ हूयं मरी। अत यह सेजाची पाचालस्थित अपने गृह में चला गया।
देवी कालिन्दी वेगपूर्वक उस बन्दर को शुभ व्यक्तियों से परिपूर्ण शिरि नाम से प्रसिद्ध देश मे यहा कर ले (१२)
तदनन्तर महातेजस्वी यानर ने वेगपूर्वक उसे तैर कर पार करने के बाद उस पर्वत पर जाने की इच्छा की जहाँ यह सुलोचना रखी गयी थी। (१३)
तदनन्तर उसने 'नन्दयन्ती' नामर पुत्री के साथ आने हुए श्रेष्ट गुह्यक 'अञ्जन' को देसा । जाने की इच्छा करने वाला वानर (उनके) निस्ट गया। (२४)
उसे देखकर श्रीमान् रपि ने सोचा रिवरतुन यह यही देवरती है। अत जल मे दूरने का मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया।
वह वानर ऐसा सोचता दुभा उस सुन्दरी की ओर दौड़ा। उसरे हर से वह कन्या हिरण्यदी नदी में गिर (१६)
कन्या को नदी-जल में गिरी हुई देसार गुह्यक दुःख और मोक से विखल होता हुआ अअन पर्वत पर पटा गया।
यहाँ महातेजस्वी यह पवित्रतापूर्वक मौन ग्रन पारण कर अनेक वर्षों तक तप करवा रहा। (२८)
हिरण्यती वेगपूर्वक नन्दयन्ती को यहार साघुओं से
युक्त महापविन कोशल देश मे ले गई। (१९)
जाते समय रोती हुई उसने एक वट वृक्ष को देखा। यह वट वृक्ष जटाधर महेश्वर के समान अनेक प्ररोहों से युक्त था। (२०)
यह सुन्दरमुखी विपुल-छाया युक्त उस वृक्ष को देख कर एक पत्थर पर विश्राम करने के लिए बैठ गयी। तदनन्तर उसने यह वाणी सुनी। (२१)
क्या ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो उस तपोधन (ऋतध्वज) से जाकर कहे कि तुम्हारा वह पुन वटवृक्ष में (२२)
उसने उस समय विशेष स्पष्ट अक्षर युक्त उस वाणी को सुनकर चारो ओर ऊपर नीचे देखा। (२३) हे शुभे । उसने वृक्ष के शिखर पर पिङ्गल जटाओं से यत्नपूर्वक आबद्ध एक पञ्चवर्षीग शिशु को देखा । (२४)
अत्यन्त दुखित नन्दयन्ती ने उस घोलने वाले को देसकर कहा-हे बालक ! बतलाओ तुम्हें किस पापी ने (२५)
उस शिशु ने उससे कहा-हे महाभागे। एक महादुष्ट वानर ने मुझे जटाओं के द्वारा इस बट में बाँध दिया है। मैं तपोबल से ही जी रहा हूँ। (२६)
पहले उन्मत्तपुर में देव महेश्वर प्रतिष्ठित थे।
यहाँ तपोराशि मेरे पिता ऋतध्वज निवास करते थे। (२७)
महायोग का जप कर रहे उन महात्मा का में सभी शास्त्रों में निपुण एवं भ्रमर समूह से युक्त पुत्र उत्पन्न (२८)
हे शुभानने। पिता ने मेरा जागालि नाग रसकर गुम से जो कुछ कहा उसे सुनो। (२९)
उन्होंने कहा तुम पाँच हजार वर्षों तक बालक रहोगे, एव दस हजार वर्षों तक कुमार रहोगे। (३०)
बीस हजार वर्षों तक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण यौवन रहेगा एय तदुपरान्त उसके द्विगुणित कालनक वार्धक्य की स्थिति रहेगी। बाल्यावस्था मे पाँच सौ वर्षों तक तुम्हें दृढ बन्धन भोगना पड़ेगा। (३१)
उसके बाद एक हजार वर्षों तक कुमार अवस्था मे तुम्हें शारीरिक क्लेश भोगना होगा तथा यौवन काल मे दो हजार वर्षों तक तुम उत्तम भोगों का आनन्द प्राप्त (३२)
वृद्धावस्था मे चालीस सौ वर्षों तक अत्यन्त क्लेश भोगना होगा। उस समय तुम्हें भूमि पर शयन तथा निकृष्ट अन्न का भोजन करना पड़ेगा। (३३)
पिता के ऐसा कहने के उपरान पाँच वर्ष की अवस्था
में मैं हिरण्यती में स्नानार्थ जाते हुए पृथ्वी पर विचरण कर रहा था। (३४)
उस समय मैंने एक श्रेष्ठ वानर देखा। उसने मुझ से कहा-हे मूढ ! इस महाश्रम में रखी हुई इस देवरती को लेकर कहाँ जा रहा है? (३५)
हे सुन्दरि! तदुपरान्त काँपने हुए मुझ को पकड़ कर उसने प्रयास पूर्वक इस वट वृक्ष के शिसर पर जटाओं से बाँध दिया।
हे मीरु ! उस दुष्टबुद्धि वानर ने अनेक लतापाशों से एक महान यन्त्र बनाकर उसके नीचे मुके रस दिया और निरन्तर मेरी रक्षा करता रहा। (३७)
सभी दिशाओं में अर्थान् चारों ओर से निर्मित किया गया यह लनायन्त्र अभेद्य है तथा ऊपर या नीचे से भी आक्रमण करने योग्य नहीं है। (३८)
वह श्रेष्ठ वानर मुझको पाँधकर स्वेच्छा से अमर पर्वत पर चला गया। हे शुभे ! मैंने जो कुछ देसा था उसे तुमसे कह दिया । (३६)
हे सुन्दरी ! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस घोर जंगल में अकेली तुम किसके साथ आयी हो। (४०)
उसने कहा-गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं।। मेरा नाम नन्दयन्ती है। मैं अम्लोचा के गर्भ से उत्पन्न (४१)
मेरे जन्म के समय मुद्गल ऋपि ने कहा था कि यह कन्या निस्सन्देह राजरानी बनेगी। (४२)
उनके कहने के समय ही स्वर्गीय दुन्दुभि का नाद हुआ और उसी समय शृगालीका अशुभ निर्योप हुआ। तदनन्तर मुनि ने पुन. कहा- (४३)
इसमें सन्देह हहीं कि यह कन्या महाराज की महारानी होगी। किन्तु कन्या अवस्था में यह घोर विपत्ति में पड़ जायेगी। इस प्रकार का अद्भुत वचन कहकर वे ऋपि चले गये। (४४)
तदनन्तर मुझे लेकर मेरे पिता तीर्थ जाने की इच्छा किये। इसी बीच हिरवती के तीर से वानर उछला।
उसके भय से मैंने अपने को नदी के जल में गिरा दिया । उस नदी के प्रयाह से में इस मनुष्य-रहित देश में आ गयी हूँ। (४६)
जागलि ने उसकी यही बात को सुनकर कहा-हे सुन्दरि! तुम यमुना तट पर श्रीकण्ठ के पास जाओ। (१७)
वहाँ मेरे पिता दोपहर को शिवपूजा करने के लिए आते हैं । तुम वहाँ जाकर उनको अपना वृत्तान्त सुनाओ। इससे तुम्हारा कल्याण होगा। (४८)
तदनन्तर नन्दयन्ती अपनी रक्षा हेतु शीघ्रतापूर्वक हिमाचल से निकली एव यमुना के तट पर स्थित तपोनिधि (ऋतध्वज ) के निकट पहुंची। (४९)
कन्द मूल फल खाती हुई वह अल्प काल मे शङ्कर के उस स्थान पर पहुंची जहाँ तपस्वी आया करते थे। (५०)
हे महामुने । तदनन्तर उसने लोकवन्दित देवदेवेश श्रीरण्ठ की पूजा कर उन अक्षरों को देखा। (५१)
उनका अर्थ जानकर उस सुन्दरी ने जाबालि द्वारा कथित श्लोक तथा अपना एक अन्य श्लोक लिखा। (५२)
महर्षि मुद्गल ने कहा था कि मैं राजपत्नी होऊँगी। किन्तु मैं इस अवस्था में पड़ी हूँ। क्या कोई मेरा उद्धार करने में समर्थ है? (५३)
शिलापट्ट पर यह लिखकर वह स्नानार्थ यमुना तट पर गयी एव वहाँ पर मत्त कोकिलों के स्वरों से पूर्ण एक सुन्दर आमम देखा। (५४)
तदनन्तर उसने सोचा-यहाँ पर श्रेष्ठ ऋषि अवश्य रहते है। इस नगर सोचती हुई वह महान् आश्रम में प्रविष्ट हुई।
तदनन्तर उसने दैवी शोभा से सम्पन्न शुष्क मुख एव चञ्चलनेत्रों वाली देववती को परिम्न पद्मिनी के सदृश वहाँ बैठी हुई देसा। (५६)
देवरती ने यक्षपुत्री को आती हुई देखा। 'यह कौन ऐसा विचार कर वह उठ खड़ी हुई। (५७)
तदनन्तर सखीभाव से उन दोनों ने परस्पर गाद आलिङ्गन किया और परस्पर पूछताछ और घातचीत करने लगी। (५८)
वे दोनों उत्तम ललनाऍ एक दूसरे की यथार्थ घटनाओं को जानकर बैठ गई एव आदरपूर्वक अनेक प्रकार की कथायें कहने लगी। (५६)
इसी बीच वे तत्त्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ श्रीकण्ठ के निकट स्नानार्थ आये और पत्थर पर लिखित अक्षरों को देखा। (६.)
उसे देखकर, पढ़कर और उसका अर्थ समझकर उस तपोनिधि ने एक क्षण ध्यान लगाया एव जान गये (६१)
तदनन्तर महर्षि ऋतध्वज शीघ्रता से देवेश्वर की पूजा कर राजा इक्ष्वाकु से मिलने के लिए शीघ्र अयोध्या चले गये। (६२)
श्रेष्ठ नरपति से मिल कर तापस ने कहा-हे नरशार्दूल! दे राजन मेरी विज्ञप्ति मुनिये। (६३)
हेराजन् ! आप फे राज्य की सीमा पर एक यानर ने मेरे सर्वशास्त्रविशारद, गुणयुक्त पुत्र को याँध रसा है। (६८)
हे राजेन्द्र! आप के अस्त्र-विधिपारगामी मानि नामक पुत्र के अतिरिफ दूसरा कोई उसे मुक्त नहीं पर सकता। (६५)
हे मोदरि! मुनि फे इस यचन को सुन कर मेरे पिता ने अपने पुत्र शनि को तपसी के पुत्र के सम्बन्ध में आदेश रिया। (६६)
तदनन्तर पिता द्वारा प्रेपित पराममी मेरा भाई भेष्ठ ऋपि फे साथ पन्धन के स्थान पर पहुँचा। (६७)
पतुर्दिप प्ररोहों से आग्न अत्युच घटपृश्न को देखने के उपरान्त उसने पृनशिमर पर पंपे हुए शपि के पुत्र यो देगा। (६८)
उसने (विस्तृत) उन समस्त समापाशों को पारों और से देग्ग एवं यट में अपनी जटाओं से पंधे मुनिघुन को देसर एस परयान में पनुप हेर उसी प्रत्यया को पमाया एवं पुत्र को पाने एटापरपूर्वक पानों से पार्श को पाटने लगा। (६९-७०)
पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर चतुर्दिक पानर द्वारा यनाया गया तापाश यागों से काट दिया गया। (७१)
तदनन्तर ऋपि प्रानघज शीघ्र ललाओं से याच्यात पटवृक्ष पर चढ़ गये। जापालि ने अपने पिता को आया देख कर यो रहने पर भी आदरपूर्वक यथाविधि शिरसा प्रणाम किया। उन मुनि ने मला मृघर पुत्र का आलिगन किया। (७२-७३)
तदुपरान्त ये यन्धन रोसने लगे। किन्तु अत्यन रद पन्धन पो सोल ने मरे। तय पलयान पानि शीप धनुर और पाणों को गर उटा सोलने लिए पट पर चढ़ गये। किन्तु (वे भी) घेष्ट पपि द्वारा दता पूर्वक बनाए गये पन्धन को नसोल सके। (७४-७१)
जर वे जटाओं ने नहीं रो सके तो भेट अपि के साथ शनि नीचे उतर गये। उन्होंने धनुष पं पाग टिया तथा एक समाप पनाया। सदनगर उन्होंने सापक भदंपन्द्र पारों से उस पासा से संन पनों में पाट