4 वामनचरित-ब्रह्मा के उपदेश से देवताओं का श्वेतद्वीप में आगमन तथा तपश्चरण

शनैश्चर और राहु ये सभी ग्रह भी वहाँ व्यवस्थित थे। मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, तथा छ' ऋतुएँ भी वहाँ उपस्थित थीं। (२७-३३)

अपने पुत्र देवताओं के साथ धार्मिकों में श्रेष्ठ कश्यप ने ब्रह्मा की उस सर्वकाममयी, सर्वतेजोमयी, दिव्य, ब्रह्मर्पिगण सेवित, ब्रह्मतेज से युक्त, अचिन्त्य एव खेदरहित सभा में प्रवेश किया तथा उन सभी देवें ने श्रेष्ठ आसन पर बैठे ब्रह्मा को देखकर ब्रह्मर्षियों के साथ शिरसे प्रणाम किया। (३४-३६)

परमात्मा के चरणों में प्रणाम कर नियमधारी वे सभी सर्वपापविमुक्त, विगतकल्मष एव शान्त हो गये । कश्यप के साथ आये हुये उन सभी देवताओं को देखया महारोजत्यो देवेश्वर प्रमुअक्षा के यहा- २)

ब्रह्मा ने कहा-“हे महाबलशाली देवगण | आप सभी जिस लिये यहाँ आये हैं में पहले से ही उसके विषय में विचार कर रहा हूँ।

हे सुरश्रेष्ठ । आपलोग जो चाहते हैं वह सब पूरा होगा। दानवराज बल को जीतने वाले विश्वरचयिता न केवल देवों की अपि तु मेरी भी गति हैं। वे त्रैलोक्य के भी नेता और देवों के भी प्रभु है। (२-३)

जो सब लोकों के प्रभु सनातन विश्वेश एवं पूर्वज हैं

उन्हें ही सनातन आदिदेव भी कहा जाता है। (४)

उन महात्मा को देवादि नहीं जानते कि ये कौन है किन्तु वे पुरुषोत्तम देवों को, मुझे, श्रुति एवं विश्व को भी जानते है।

उन्हीं के प्रसाद से मैं श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ। आप सभी लोग उत्तरदिशा मे क्षीरसागर के उत्तरी किनारे पर उस स्थान पर जाइये जिसे मनीषी लोग अमृत नाम फा श्रेष्ठ स्थान कहते है। विश्वकर्ता योगधारण कर यहाँ दुश्चर तप कर रहे हैं । तीक्ष्ण व्रतधारी आप लोग उस अमृत स्थान पर जाकर कठिन तप करें। (६-८)

तदनन्तर प्रीष्म के अन्त मे जलपूर्ण मेघ के गर्जन के समान देवाधिदेव की शब्दमयी, स्निग्ध गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेममयी, पुष्ट अक्षरों वाली, रमणीय, अभय, सर्वदामगल-मयी, उच्चारण कर रहे ब्रह्मवादियों की पाणी के समान परमसंस्कार से युक्त, दिव्य, सत्यकारिणी, सत्य एवं समस्त पापों को को नाश करनेवाली वाणी को सुनोगे। तदनन्तर भावितात्मा (आत्मज्ञ) कश्यप के योगवत के विसर्जन के अवसर पर व्रत की समाप्ति होने पर वे महात्मा विष्णु जिनका तेज अमोघ है आपसे कहेंगे "हे सुरश्रेष्ठो । मेरे समीप आये हुये आप लोगों का स्वागत है । में परदरूप से स्थित हूँ। किसे कौन सा वर दू । (६-१३)

तदनन्तर अदिति और कश्यप उनधीमान देव के चरणों मे शिरसे प्रणाम कर यह वर माँगे "भगवान ही हमारे पुत्र बनें एतदर्थ आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो" ऐसा कहते वे परावाणी से ऐसा ही हो' यह कहेंगे। (१४-१५)

कश्यप, अदिति एव सभी देवता 'ऐसा ही हो' यह कहने के उपरान्त प्रमु ( ब्रह्मा ) को शिरसे प्रणाम कर श्वेतदीप के उद्देश्य से उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान (१६)

वे अतिशीघ्र सत्यवादी भगवान् ब्रह्मा द्वारा बताये अनुसार क्षीरसमुद्र के तट पर पहुँच गये। (१७)

उन देव श्रेष्ठों ने पृथ्वी के सभी सागरों, कानन युक्त पर्वतों एव अनेक दिव्य नदियों को पार किया। (१८)

तदनन्तर उन लोगों ने समस्त प्राणियों से विहीन, सूर्यविहीन, सीमा रहित एवं चतुदिक् तमसू से घिरे हुये घोर अन्धकार को को देखा।(१६)