कुरुक्षेत्र निर्माण का वृत्तान्त एव पृथूदकतीर्थ वर्णन

देवदेव ने कहा-"उस तपती में नरोत्तम सवरण के द्वारा राजलक्षण युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ । जातकर्म आदि सस्कारों से सस्कृत होकर यह घृत डाले हुए अग्नि के सदृश वढने लगा। (१)

हे देवगण | मिनावरण के पुन विप्र वसिष्ठ ने उसका चूड़ाकरण सस्कार किया । नवें वर्ष में उसका उपनयन सस्कार हुआ और वह वेद तथा शास्त्रों का पारगामी विद्वान (२)

तदनन्तर वह चौबीस वर्षों मे सर्वज्ञ हो गया। ससार में सवरण का वह पुत्र पुस्पश्रेष्ठ कुरु नाम से प्रसिद्ध (३)

तदुपरान्त राजा शुभ धार्मिक पुत्र को देखकर किसी उत्तम कुल में उसके विवाह का यरन करने लगे। (४)

राजा ने सुन्दर स्वरूप वाली सुदामा की पुनी सौदामिनी को कुरु के लिये वरण किया और उन्होंने भी उसे कुरु के लिये प्रदान कर दिया। (५)

उस राजकुमारी को पाकर वह धर्म और अर्थ का विरोध हुए उस सन्यजी के साथ इस प्रकार रमण करने लगा जैसे पौलोमी (शची) के साथ इन्द्र रमण करता (६)

तदनन्तर बलवान् राजा ने पुत्र को राज्यभार के वहन में समर्थ जानकर विधानपूर्वक यौवराज्य पद पर उसे अभिषिक्त कर दिया।

पिता द्वारा अपने राज्यपद पर अभिषिक्त होकर कुरु स्वय ही सन्तान की भाँति प्रजा और पृथ्वी का पालन करने लगा। (८)

वही महायलयान क्षेत्रपाल, पशुपाल, सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुआ। (६)

तदनन्तर उसे यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि ससार में कीर्ति सर्वश्रेष्ठ होती है। कीर्ति जबतक भलीभाँति स्थित रहती है तभी तक देवताओं के साथ निवास होता है।

इस प्रकार याथातथ्य (यथार्थता) का विचार करने के उपरान्त घह नृपतिश्रेष्ठ कीर्ति के हेतु समस्त पृथ्वी पर विच रण करने लगा। (११)

तदनन्तर वह बली लोकेश्वर पवित्र द्वैतवन पहुँचा एव सुसन्तुष्ट होकर उसके भीतर प्रविष्ट हुआ। (१२)

वहाँ उसने पवित्र, पापनाशिनी, प्रम-वृक्ष से उत्पन्न, हरिजिद्धा, ब्रह्मपुत्री, सुदशन की जननी, सुविस्तृत हृद में स्थित, फूल पर करोड़ों तीर्थों से आयूत भगवती सरस्वती को देसा। (१३-१४)

उसके जल को देखते ही स्नान करवे राजा प्रसन्न हो गया एघ पुन भ्रझा की उत्तर दिशा मे अवस्थित वेदी [समन्वपश्चा) पर गया। (१५)

यह समन्तपश्वक नामक श्रेष्ठ धर्मस्थान चारों ओर से पाँच-पाँच योजन तक है। (१६)

देवताओं ने कहा-“हे पुरपोत्तम । ब्रह्मा की कितनी वेदियाँ है? क्योंकि आपने सर्वपश्नका वेदी को उत्तर वेदी (१७)

देवदेव ने कहा-टोकनाय ब्रह्मा की धर्म-सेतु स्वरूप पाँच वैदियों है जिन पर मुरेश रोकनाथ शम्भु ने यज्ञ  किया था। (१८)

प्रयाग मध्यवेदी है, गयाशिर पूर्ववेदी है, अनन्त फल- दायिनी विरजा द क्षणवेदी है, तीन कुण्डों से अलकृत पुष्कर पश्चिम वेदी है तथा अव्यय समन्तपश्चक को उत्तर वेदी कहा गया है। (१९-२०)

राजर्षि फुर ने सोचा कि इस क्षेत्र को महाफ्लदायी करूँगा (बनाऊँगा) और यहीं समस्त कामनाओं की खेती करूंगा। (२१)

अपने मन में इस प्रकार विचार कर वह राजश्रेष्ठ रथ से उतर पडा एव कीर्ति के लिये अतुलनीय स्थान का निर्माण किया। (२२)

सुवर्ण निर्मित इल बनाकर उसमे शङ्कर के पभ एप यमराज के पौण्डक नामक महिप को सयुक्त कर बह राजा स्वय कर्पण करने को उद्यत हुआ। (२३)

इन्द्र ने कर्पण कर रहे नरश्रेष्ठ के निट जाकर कहा "हे राजन् आप यहाँ यह क्या करने को उद्यत हुये है?" (२४)

राजा ने इन्द्र से कहा कि मैं तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य की कृषि फर रहा हूँ। (२५)

इन्द्र ने कहा-“हे मरेवर दम असायीज को आपने कहाँ से प्राप्त किया है ?" ऐसा कहने के उपरान्त हँस कर इन्द्र सहसा चले गये। (२६)

इन्द्र के चले जाने पर भा प्रतिदिन इलयारा राजा चनुदिन अन्य सात कोसी सक कर्पण परते रहे। (२७)

तत्पश्चा मेंने जारर उनसे कहा "हे पुरु। यह क्या कर रहे हो ?" राजा ने कहा में अटान महाधर्म का कर्षग में पर रहा हूँ। (२८)

मदनगर मैंने पनमे पूरा "हे नृप । यीज यहाँ है?" राजा ने कहा "पोज मेरे मारीर में है" मैंने उनसे कहा "मुमे यद दो। में पेऊँगा और तुम हल पलामो।" सम राजा ने अपना दाहिना हाय पेरा दिया । पैदाये हुये हाव देशकर मैंने पाक से भीम ही उसके दवारों दुरदे कर सुम लोगों को दे दिया । मदनन्तर राजा ने याम याद दिया । समे भी मैंने काट डाला। (२६-३१)

इसी प्रयासने दोनों ऊरओं को दिया इन दोनों ग्रे भी मैंने पाट दिया । उस धमने अपना मना दिया जिससे में के ऊपर प्रमस हो गया। मैं पर दूंगा' ऐसा मेरे कहने पर घुमने पर माँगा। (३२)

पुर ने कहा-जितने स्थान को मैंने जोता है यह धर्मोन हो जाय और यहाँ स्नान करने पारों तया मते यालों को महापुण्यपल की प्राप्ति हो। (३३)

हे माधष। विभा। हे शायझगदाधारीएपीरंश । परास, दान, स्नान, जप, होम, या आदि नया अन्य भी गुम या अगुम फर्म, इस पेठ क्षेत्र में थापी कृपा मे अजय य मदारप्रद हों। (३५-३५)

"तया दे पुण्दरीगा। हे अग्युन ' मेरे नाम थे. व्य इमोव कुरक्षेत्र) में आप देषों पं सर पे साप निवास फरें।" राजा ऐसा करने पर 'बडा ऐमा दी होगा' यह कहने के उपरान मैंने कहा कि महीपनि ! तुम पुन दिव्य शरीर पे हा जो स्यामुया अनकाल में तुम मेरे में हीन हो जानोगे।" (३६-३७)

"निरसन्देह (मुदाण) प्रतिसापती (मगययायिनी) होग' । यहाँ पर मदरसों या या परेंगे।" (10) इस संघकोरा के लिए पुरषोतम ने पन्द्रनामा या, बामुकि नामा सर्प, गुर्ग नाम पिपाप, गुरेश नामक

राक्षसेश्वर, अजावन नामक नृपति एव महादेव नामक  नाम पावक को दिया (नियुक्त किया)।

ये सभी तथा इनके अन्य बली भृत्य एव अनुयायी

आकर पुरजाङ्गल की सब ओर से रक्षा करते हैं। (४१)

आठ सहस्र धनुर्धर जो पापियों को यहाँ से निवारित  करते हैं वे उमरूपधारी भूत गण चराचर के दूसरों (पापियों) को भी स्नान नहीं करने देने । (४२)

 इसी के मध्य अति पविन, पापहर, कल्याणकारी पृथूदक (३६-४०)

नामक तीर्थ है। यहाँ शुभ जल से पूर्ण एक पवित्र नदी पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। (४३)

प्रपितामह ब्रह्मा ने सृष्टि के आदि में पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशादि ममस्त भूवों के साथ ही इसकी भी सष्टि की । यही पृथूदक है। (४४)

महाभुज ब्रह्मा ने पृथ्वी पर जिन महासमुद्रों, तीयों, नदियों, स्रोतों एवं सरोवरों की रचना की वे सभी जल इस मे एकत्व को प्राप्त है। (४५)