सर्वशी का निर्माण, प्रह्राद का राज्यभिषेक, प्रह्राद की नैमिष तीर्थ यात्रा एव नर नारायण के साथ युद्ध

पुलस्त्य ने कहा-हे ब्रह्मन् । इसके अनन्तर विभु नारायण मुनि ने अनंग को देखकर हँसते हुए इस प्रकार वचन कहा-हे कन्दर्प । यहाँ बैठो।"

काम उनकी उस अक्षुब्धता को देख कर विस्मयान्वित हुआ। हे महामुने । वसन्त को भी तसाल महनी चिन्ता हुई।

तदनन्तर अप्सराओं को देख कर स्वागत द्वारा उनकी पूजा पर भगवान् ने वसन्त से कहा-"आओ आओ वैठो।" (३)

तदुपरान्त भगवान नारायण मुनि ने हँस कर एक कुसुमावृत मञ्जरी ली और अपने ऊरु पर एक सुवर्णाङ्गो बाला की सुष्टि की। (४)

उरु से उत्पन्न उस सर्वाग-सुन्दरी को देखकर कन्दर्प मन में सोचने लगा-'क्या यह मेरी प्रिया रति है ?

वैसे ही सुन्दर नेत्र, भौंह एवं कुटिल अल्कों से युक्त, सुन्दर नासिका का वंश प्य अधरोष्ठ वाला तथा देसने मे अत्यन्त आम्र्पक यह मुख है।

इसके वे ही मनोहर, अस्यन्त तथा भग्नचूचुक वाले पीन कुच सजन पुरुषों के सदृश परस्पर संहत है। (७)

इस सुन्दरागी का वही कृश, त्रिवली विभूपित, कोमल तथा रोमावलि युक्त उदर शोभित हो रहा है। जघा से स्तनतट की ओर जाती हुई इसकी यह रोमावलि पुलिन से कमत्यकर की ओर जाती हुई भ्रमरमाला के सदृश सुशोभित हो रही है।

करधनी से आवृत अतिविस्तीर्ण इसका नितम्य प्रदेश इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानों क्षीरसागर के मन्थन काल में भुजगवेष्टित मन्दर पर्यंत हो । (१०)

कमल के केसर के समान गौरवर्ण वाली यह सुन्दरी कदली स्तम्भ के समान ऊर्यमूल ऊरुओं के द्वारा शोभित होरही है। (१२)

इसके दोनों घुटने, गूढगुल्फ, रोमहीन सुन्दर जघायें तथा आलक्तक के समान कान्ति वाले दोनों पाद अत्यन्न सुशोभित हो रहे है। (१२)

हे मुने! उस सुन्दर नेवाली के विषय में इस प्रकार

सोचते हुए जब यह कामदेव ही काममोहित हो गया तो फिर अन्य पुरुषों की क्या बात है। (१३)

हे नारद । वसन भी उस उशी को देसार सोचने लगा-"क्या यह कामनरेश की स्वयं राजधानी अपस्थित है? (१४)

अथवा रात्रि का अन्त होने पर सूर्य की किरणों के ताप के भय से चन्द्रमा की कान्ति शरणागत हुई है। (१५)

इस प्रकार सोचते हुए अप्सराओं को रोक कर वसन्त, मुनि के सदृश ध्यानस्थ हो गया। (१६)

हे महामुने । तदुपरान्त शुभवत नारायण मुनि ने कन्दर्पादि सभी को विस्मयाम्वित देख कर हँसते हुए कहा- (१७)

"हे काम, हे अप्सराओं, हे वसन्त, मेरे ऊरु से उत्पन्न इस बाला को सुरलोक मे ले जाओ और इन्द्र को देदो।" (१८)

ऐसा कहे जाने पर वे सभी कॉपते हुए उर्वशी को लेकर स्वर्ग में गए और इन्द्र को वह रूप यौवन शालिनी बाला दे दिया। (२६)

हे महामुने । कामादि ने इन्द्र से उन धर्मजों-(नर और नारायण) का चरित्र कहा जिससे उन्हें अत्यन्त

विरमय हुआ। (२०)

(नर और नारायण का) ऐमा चरित्र सर्वोच्च ख्याति को प्राप्त हुआ तथा वइ पाताल, मर्त्यलोक एव आठों दिशाओं में व्याप्त हो गया।

हे मुने । प्राचीन काल में अति भयकर हिरण्यकशिपु के मारे जाने पर प्रहलाद नामक दानव राज्याभिषिक्त (२२)

देवता और ब्राह्मण के पूजक उस दैत्येन्द्र के शासनकाल में पृथ्वी पर राजा लोग विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करते (२३)

ब्राह्मण लोग तपस्या, धर्मकार्य और तीर्थयात्रा, वैश्य लोग पशुपालन तथा शूद्र लोग शुश्रूषा करने लगे। (२४)

हे मुने। इस प्रकार चारों वर्ण अपने आश्रम मे अव-स्थित रह कर धर्मकार्यों के अनुष्ठान में तत्पर हुए। इससे देवता भी वृत्ति से युक्त हो गये । (२५)

तदनन्तर भार्गवश्रेष्ठ महातपस्वी च्यवन नामक ऋपि नर्मदा के अकुलीश्वर तीर्थ मे स्नान करने गये।

वहाँ महादेव का दर्शन कर वे नदी में स्नान करने के लिये उतरे। जल में अवतीर्ण ऋपि को केकरलोहित साँप ने पकड लिया। (२७)

उस सौंप द्वारा गृहीत ऋषिने मन मे हरि का स्मरण किया । पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करने पर वह महान नाग विषहीन हो गया। (२८)

उस महाभयकर विषहीन महानाग ने च्यवन ऋषि को रसातल में ले जाकर छोड दिया। (२६)

नाग से मुक्त होते ही भार्गवश्रेष्ठ च्यवन वहाँ चारों ओर से नागकन्याओं द्वारा पूजित होते हुए विचरण करने (३०)

विचरण करते हुए वे दानवों के विशाल नगर में प्रविष्ट हुए। वहाँ श्रेष्ठ दैत्यों द्वारा पृजित प्रसाद ने उन्हें देखा। (३१)

महातेजस्वी प्रहलाद ने भृगुपुत्र की यथायोग्य पूजा की। पूजोपरान्त उनके बैठने पर उनसे आगमन का कारण (३२)

उन्होंने कहा-हे महाराज | आज मैं महाफलदायक श्रेष्ठतीर्थ मे स्नान करने तथा अकुलीश्वर का दर्शन करने आया था। (३३)

नदी में उतरते ही एक नाग ने मुझे हठात् परद

लिया । वह मुझे पाताल मे लाया और मैंने यहाँ आप को

भी देखा।

(३४)

च्यवन की इस बात को सुन कर वाक्य-योविद् दिती- श्वर ने यह धर्मसयुक्त वाक्य कहा। (३५)

प्रहलाद ने कहा-हे भगवन् । कृपया मुझसे यह कहिये कि पृथ्वी, आकाश और पाताल में कौन कौन से (३६)

च्यवन ने कहा-हे महाबाहो । पृथ्वी में नैमिप, अन्तरिक्ष मे पुष्कर और रसातल मे पक्रतीर्थे प्रसिद्ध है। (३७)

पुरस्त्य ने कहा-हे महामुने। भार्गव को इस पात को सुन र नैमिष तीर्थ में जाने के लिए इच्छुक दैत्यराज (३८)

प्रहलाद ने कहा-"उठो, हम सभी नैमिपतीर्थ में स्नान करने जायेंगे तथा यहाँ पीताम्बरधारी अच्युत पुण्डरी- काक्ष के दर्शन करेंगे।" (३६)

पुलस्त्य ने कहा-दानवेन्द्र के ऐसा कहने पर वे सभी दैत्य और दानव विपुल उद्योग किए एव रसातल से बाहर निकले (४0)

उन महारलवान दितिनन्दनों एव दानों ने नैमिषारण्य मे आकर आनन्द से स्नान किया। (४१)

तदननर दितीश्वर श्रीमान् प्रहलाद मृगया करने के लिये विचरण करने लगे। भ्रमण करते हुए उहोंने पवित्र एष निर्मल जलयाली सरस्वती नदी को देसा। (४२)

वहाँ से थोड़ी दूर पर बाणों से विद्ध बड़ी घड़ी शाखाओं याले एफ शाल वृक्ष को देखा । अन्य बाण एक दूसरे के मुख से सलग्न थे। (४३)

तदनन्तर उन अद्भुत आकार वाले नागोपवीत चागों को देख कर दैत्येश्वर कोभयकर केध हुआ। (४४)

तदुपरान्त उन्होंने दूर से ही कृष्णाजिनधारी, समुन्नत जटायुक्त तथा तपस्या मे रहीन दो मुनियों को (४५)

उन दोनों के पार्थ में शाई और आजगव नामक सुलक्षणयुक्त दिव्य दो धनुष और दो अक्षय तथा षडे तरकस वर्तमान थे। (४६)

उन्हें देखकर दानव प्रहलाद ने उनको दाम्भिक समझा। तदनन्तर उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषों से कहा- (१७)

"तुम दोनों धर्मविनाशक दम्भ को क्यों कर रहे हो? कहाँ तुम्हारी तपस्वा, वहाँ तुम्हाय जटाभार और कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ आयुध?" (४८)

तदनन्तर नर ने दैत्य से कहा-'हे दितीश्वर । तुम क्यों चिन्ताकररहे हो?सामर्थ्य रहने पर व्यक्ति जो कर्म करता उसका वह कार्य उसको शोभा देता है। (४६)

तदुपरान्त दितीवर प्रहलाद ने उन दोनों से कहा- धर्मसेतुप्रवर्तक मुझ दैत्येन्द्र के रहते यहाँ तुम दोनों की क्या शक्ति है? (५०)

तदनन्तर नर ने उन्हें प्रत्युत्तर दिया-"हम प्रचण्ड शक्ति से युक्त हैं। हम दोनों नर और नारायण से समर में कोई भी युद्ध नहीं कर सकता।

तदुपरान्त दैत्येश्वर ने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा को-"मैं युद्ध में जिस किसी भी प्रकार नर और नारायण को जीतूंगा।" (५२)

ऐसा वचन कह कर महात्मा दितीश्वर ने वन की सीमा पर अपने सैन्य को स्थापित कर धनुष को फैलाया और प्रत्यश्चा चदा कर घोरतर तलम्पनि की।

तदनन्तर नर मे आजगव धनुप को झुका कर अनेक सुतीक्ष्ण वाणों को छोडा। किन्तु दैत्यपति ने अनेक स्वर्ण-

पुंख वाले अप्रतिम बाणों से उन बाणों को छिन्न भिन्न पर दिया। (५४)

तदुपरान्त नर ने युद्ध में अप्रतिम दैत्येश्वर के द्वारा बाणों को छिन्न हुआ देख मुद्ध होकर अपने महान् धनुष को झुकाते हुए अन्य अनेक बाणों को छोड़ा। (५५)

नर के एक याण छोडने पर दितीश्वर ने दो बाण छोड़ा, धर्मपुत के तीन घाणों पर दितीश ने चार बाण छोडा । तदनन्तर नर के पाँच बाण छोडने पर दैत्यश्रेष्ठ ने छ तीव्र बाणों को छोड़ा। (५६)

हे विप्रा ऋषिमुख्य के सात बाण छोडने पर दैत्य ने आठ घाण छोडा । नर के द्वारा दैत्य पर नव बाण छोड़े जाने पर दैत्यपति ने नर पर दश बाण छोड़ा। (५७)

नर के बारह बाण छोडने पर दानव ने पन्द्रह माप छोडा । नर के छत्तीस बाण छोडने पर दैत्यपति ने बहत्तर बाण चराया। (५८)

नर के सौ घाणों पर दैत्य ने तीन सौ बाण चलाया। धर्मपुत्र के छ सौ बाग पर दैत्यराज ने एक हजार पाण छोड़ा। तदनन्तर उन दोनों ने अत्यन्त क्रोध से असख्य बाण छोडे । (५६)

तदनन्तर नर ने असख्य वाणों से पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को आच्छन्न कर दिया। उस दैत्यप्रवर ने भी बड़े वेग से स्वर्णपुख वाले वाणों द्वारा उनके बाणों को काट दिया। (६०)

सदुपरान्त नर और दानव दोन चीर यावं तथा अय-पर श्रेष्ठ अस्त्रों से परस्पर सग्राम करने लगे। (६१)

वदतन्तर दैत्य ने श्रेष्ठ अस्त्र हाथ में लेकर धनुष पर है| ब्रह्मास्त्र नियोजित क्यिा एध पुरुषोत्तम नर ने माहेश्वरात्र का प्रयोग किया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक दूसरे को समाहत कर गिर गए। (६२)

ने ब्रह्मास्त्र व्यर्य होने पर क्रोधमूर्छित प्रहलाद वेग से गदा लेकर उत्तम रथ से कूद पड़े।