स्कन्दोपत्ति, स्कन्द के षण्मुख चतुर्मूर्ति होने का कारण, स्कन्द का सेनापति पद पर अभिषेक, स्कन्द के लिए गण, मयूर, शक्ति एव दण्डादि का समर्पण

यह प्राचीन, परम पवित्र, माग्यों को माल देने यात्री देवी पो विषयच्या र्मयापित्त मयों को सदा मुनी गया होगा चाहिये । भायान ने मेलोण रहा है।(३१)

करने लगी। भगवान् अग्नि भी इच्छानुसार भ्रमण करने लगे।

अग्नि ने उस तेज यो पाँच हजार वर्षों तक धारण किया था। इसरिए अग्नि के मांस, हड्डी, रुधिर, मेद, आँत, रेतस् , त्वचा, रोम, दादी, मुंछ मेत्र एवं केश आदि सभी मुवर्णमय यन गये । इसी से संसार में अग्नि को हिरण्यरेता कहा जाता है। (९-२०)

तदनन्तर अग्नि तुल्य उस गर्भ यो पाँच हजार वर्षों तक धारण करती हुई फुटिरा मझा के स्थान पर गई । (११)

पद्मजन्मा ब्रह्मा जी ने उस महानदी को सन्तप्त होती देगार पूछा तुम्हारा यह गर्भ सिके द्वारा स्थापित है? (१२)

उसने पहा-हे सत्तम ! अग्नि ने पिये हुए शङ्कर के उस सुक को असमर्थ होने के कारण मुफ में छोड़ दिया। (१३)

हे पितामह ! गर्भ धारण करते हुए पांच सइस वर्ष पासमय बीत गया, किन्तु किसी प्रकार इसरा निर्गमन नही हो रहा है। (१४)

यह सुनकर भगवान प्रदा ने कहा-तुम उदयाचल पर जामोपहा शनयोजन विस्तृत सरपनों का महान् भयंकर वन है। (१५)

हे सुन्दर कटि याली! उस विस्तृत गिरिशिसर पर इसे छोड़ दो ! दश हजार घों के बाद यह यालक हो जायेगा। (१६)

ब्रह्मा की बात सुनने के उपरान्त वह सुन्दरी पर्वतनन्दिनी पर्वत परगई एवं गुरु से ही (उसने) गर्भ का त्याग कर दिया ।(१७)

वह उस बालक को छोड़कर शीम ही ब्रह्मा के निकट गई। राती युटिला मन्त्र (शाप) के कारण जलगयी धन गई। (१८)

शंकर के तेज से यह विशाल सरपतों का पन सुवर्णमय यन गया। वहाँ के निवासी वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये।

तदनन्तर दश सहस वर्ष योतने पर पाउ सूर्य के समान सेजरची तया यमल के समान नेत्रोंवाला मालक सत्पन्न हुआ।

दिव्य शरवण में स्थित उत्तानशायी भगवान मुख में अंगूठा डालकर पढ़े मेघ के सदृश रदन करने लगे। (२१)

इसी योच स्वेच्छा से जाती हुई दिव्य तेजस्विनी पही कृत्तिकाओं ने रखा में स्थित उस पालक को देखा । (२२)

ये वृत्तिाएँ दयायुक्त होकर पो गई जहाँ युमार पद थे। उसे दुग्धपान पाने हेतु ये परस्पर 'हम पहले,

हम पहले' कहकर विवाद करने लगी। (२३)

उन्हें परस्पर विराद परती दुई देसकर यह कुमार पण्मुस (छः मुसयाले) यन गये। तदनन्तर उन वृत्तिाओं ने स्नेह पूर्शक शिशु या पोपण दिया। (२४)

हे मुने! उनके द्वारा पालिन होपर यह यालक पड़ा हुआ। यह पलयानों में रेष्ठ कार्तिकेय नाम से (२५)

हे ग्रझन् ! इसी बीच ब्रह्मा ने अग्नि से पूछा-तुम्हारा पुत्र गुह इस समय कितना पड़ा हुआ है। (२६)

प्रदा की यात सुनसरशर के उस पुर यो न जानने के कारण अग्नि ने पहा-हे देवेश ! मैं पुत्र को नहीं जानता गुह कौन हैं? (२७)

भगवान ने उनसे कहा- त्रिलोकेश। पूर्यकाल में तुम्हारे द्वारा पान किया गया शंकर का सेज शरयग में शिशुरूप से उत्पन्न हुआ है।

पितामह का पचन सुनने के उपरान्त अग्निदेव वेगवान् यहरे पर आरूद होकर चोम (वहाँ) गए। कुटिला ने उन्हें खाने दसा। (२९)

सदनन्तर पुटिला ने पूछा- अग्निदेय! आप कहाँ जा रहे है। उन्होंने पदा-दारपग में उत्पन्न पुत्र शिशु को देखने जा रहा हूँ। (३०)

उसने कहा कि पुन्न मेरा है एवं अग्नि ने कहा कि मेरा है। स्वेच्छा से घूम रहे जनार्दन ने उन दोनों को विवाद करते हुए देखा।

उन्होने उन दोनो से पूछा-तुम दोनो क्यो विवाद कर रहे हो उन दोनों ने कहा- रुद्र के शुक्र से उत्तपन्न पुन्न के लिये।

विष्णु ने उन दोनो से कहा- तुम लोग न्निपुरान्तक के समीप जाओ। वे देवेश जो कहे उसे निसन्देह करो।

हे नारद वासुदेव के ऐसा कहने पर कुटिठा एवं अग्रि शहद के निम्ब गए एवं उनसे यह तथ्य पूछा कि पुन्न किसका है

उनके वचन को सुनकर शङ्कर का मन आनन्द से परिपूर्ण हो गया। उन्होंने पुलग्नि होकर गिरजा से कहा- भाग्य की बात है, भाग्य की बात है।

तदन्नतर अम्बिका से शङ्कर से कहा- हे देव हम लोग उस बालक से पूछने चले। यह जिसका आश्रय मह्ण करेगा उसी का पुन्न होगा।

ठीक हे ऐसा कहने हुए बृषध्वज भगवान् शङ्कर पार्वती कुटिठा तथा बुद्धिमान पावक के साथ चल खड़े हुए।

शङ्कर पार्वती, बुटिला एवं पावक शरबग मे गये।

इन लोगों ने वृत्तिया की गोद में लेटे हुए उस शिशु यो देखा। (३८)

तदनन्तर वह पण्मुस बालक आदरपूर्वक उनके विचार को समझ कर शिशु होते हुए भी योगी सदृश चार मूर्तियों का हो गया। (३९)

घुमार शङ्कर के समीप, विशास गिरजा के निम्ट, शास पुटिला के पास एवं महासेन अग्नि के समीप (४०)

पदनन्तर प्रीतियुक्त रद्र, उमा, कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि ये चारों अत्यन्त आनन्दित हुए। (४१)

तदुपरान्त उन पृत्तिाओं ने पूछा-क्या पहानन शङ्कर फे पुन हे ? हे मुने । शङ्कर ने उन सभी से प्रीति- पूर्वक विधिषद् घचन पदा- (४२)

हे कृत्तिाओ। कार्तिकेय नाम से ये तुम्हारे पुन दोगे तया ये अपिनाशी कुमार नाम से पुटिया के पुत्र होंगे।

ये दी रहन्द नाम से विख्यात गौरी के पुत्र होंगे क्या गुह नाम से मेरे पुत्र होंगे। (४४)

महासेन नाम से ये अग्नि के विख्यात पुत्र होंगे तथा शारदूत इस नाम से विख्यात ये शरबग के पुत्र होंगे। (४५)

इस प्रकार ये महायोगी पृथ्वी मे विख्यात होंगे। छ मुस होने से महायाहु ये पण्मुस नाम से प्रसिद्ध होंगे। (४६)

इस प्रकार कह र शूलपाणि शङ्कर ने देवताओं सहित पितामह ब्रह्मा का स्मरण किया । वे सभी शीघ्रता से वहाँ आ गए। (४७)

कामारि शङ्कर और गिरिनन्दिनी पार्वती को प्रणाम पर तथा हुताशन, पुटिला तथा वृत्तिकाओं को प्रीतिपूर्वक देसकर उन देवों ने-अतिशय उप्र, सूर्य के समान एवं अपने तेज से सभी के नेत्रों को चुराने वाले उस पण्मुस यालक को देखा। (४८-४९)

यौतुरान्वित उन श्रेष्ठ देयों ने कहा-हे देय ! आपने, देवी ने एवं अग्नि ने देवताओं का कार्य पर दिया। (५०)

अत आप उठे। अब हम लोग अविनाशी औजस तीर्थ को चले। पुरुक्षेत्र में चल कर सरस्वती में हम लोग इस पण्मुस यो अभिपिधित करें। (५१)

हे देयो, गन्धयों और किन्नरो! ये हमारे सेनापति पनें और महिप तथा मयंकर नारक पाप करें। (१२)

शङ्कर ने कहा-बहुत अच्छा । तदनन्तर सभी देवता उठे और धुमार के सहित महाफलदायी कुरुक्षेत्र में

तथा ऊँचे विन्ध्याचल ने अतिशत नामक पार्षद को दिया।

वरुण ने सुवर्चा एवं अतिवचा को, समुद्र ने संगह तथा विग्रह पो एवं नागों ने जय तथा महाजय को दिया। (६८)

अम्बिका ने उन्माद, शकुर्ण और पुष्पदन्त को तथा पवन ने घस और अतिघस नामक दो अनुचरों को दिया। (६६)

अंशुमान् ने पण्मुस यो परिघ, घटक, भीम, दहति तथा दहन नामक पाँच प्रमों को दिया। (७०)

यमराज ने प्रमाथ, उन्माध फालसेन, महामुस, तालपत्र ने और नाडिजह नामक छः अनुचरों को दिया। (७१)

है द्विजोत्तम ! धाता ने सुप्रभ और सुषमा नामक गणेपरों को, तथा मित्र ने मुव्रत तथा सत्यसन्ध नामक अनुचरों को दिया। (७२)

पक्षों ने अनन्त, शापीठ, निकुम्भ, कुमुद, अम्युज, एकाक्ष, पुनटी, पा, पिरीटी, क्रशोद, मचीवक्त्र, फोकनद, महास, प्रिया एवं अच्युन-इन पन्द्रह गणों को कार्तिकेय  के लिये दिया। (७३-७४)

कारिन्दी ने पालान्द को, नर्मदा ने रणोत्स्ट को, गोदावरी ने सिद्धयान को एवं तमसा ने अद्रिकम्पक को दिया। (७१)

सीता ने सहस्राबाहु को, यक्षुला ने सितोदर को मन्दाकिनी ने नन्द को एवं विपाशा ने प्रियंकर को दिया।

ऐरावती ने चतुर्दष्ट्र को,वितस्ताने पोडशाक्ष को, कौशिकी ने मार्जार को एवं गोमती ने मथ और फ्रीश्च को दिया। (७७)

पाहुदा ने शतशोर्प को, याहा ने गोनन्द और नन्दिक को, भीमरथी ने भीम को, और सरयू ने घेगारि को दिया। (७८)

काशी ने अष्टपाहु को, गण्डकी ने सुबाहु को, महानदी, ने चित्रदेव को तथा चित्रा ने चितरथ को दिया। (७९)

युहू ने फुयलय को, मधूदका ने मधुवर्ण को, धूतपापा ने जम्यूफ को और वेणा ने श्वेतानन को समर्पित (८०)

पर्णासा ने ग्रुतपर्ण को, रेया ने सागरवेगी यो, प्रभाया ने अर्थ और सह को एवं फानना ने कनफेक्षण को दिया। (८१)

विमला ने गृधपत्र को, मनोहरा ने पास्यकत्र को, धूत.

पापा ने महारार को एधं कर्गा ने विद्रुमसग्निभ को दिया। (८२)

सुवेणु ने मुप्रसाद को, एवं ओघवनी ने जिष्णु को दिया। विशाला ने यज्ञयाहु को दिया। इस प्रकार इन नदियों ने अनेक गणों को दिया। (या सरस्पती नदियों ने अनेक गणों को दिया)(८३)

युटिला ने अपने पुत्र को कराल, सितफेश, फष्यकेश, जटाधर, मेघनाद, चतुर्दष्ट्र, विद्युजित, दशानन, सोमाप्यायन पर्व उप्र देवयाजी नामक दशगों को दिया । (८५-८५)

कृतिशओं ने अपने प्रश्न को इंसारय, कुण्डजठर, पहु-पीय, हयानन तया पूर्मप्रीय इन पाँच अनुचरों को प्रदान (८६)

पियों ने स्कन्द को स्थाणुज, पुम्भयरत्र, लोहजह, महानन और पिण्डागार इन पोप अनुपरों को दिया ।(८७)

पृथूदा तीर्थ ने नागजिद, चन्द्रभास, पाणिर्म, शशीक्षक, पापा सथा जापूक नामक अनुचरों को दिया।

पनी ने मुपमा तपागपाशिर ने मपए को और  कनगाउने पशिस नाम: अपने गए दिया।

वाजिशिर ने यन्धुदत्त और पुष्कर ने याहुशाल को सया मानस ने सजिस, माहिपक और पिसल यो (९०)

औशनस ने रद्र को दिया, तथा अन्यों ने मातृकाओं को दिया । सोमतीर्थ ने यसुदामा यो और प्रभास ने नन्दिनी को और इन्द्र तीर्थ ने विशोमा को अर्पित किया। उदपान ने पनरयना को प्र्य सप्तसारस्वत ने गीतप्रिया, माधषी, तीनेमि एयं स्मिवानना नामक पार अद्भुत माताओं को प्रदान किया। नागतीर्थ ने एकदा को एवं कुरक्षेत्र ने पलामदा को दिया। (९१-९३)

यनयोनि ने पण्डशिरा को, त्रियिष्टिप ने भद्रकाली यो तथा चरणपायन ने पौटी, भैढी तथा योगर्भटी को दिया। (९४)

मदी ने सोपानीया यो, मानसाद ने शालिन को एवं पदरिकाम्म ने तानन्दा, शतपण्टा, सूपरमेस्वारा, पद्मासी और माधरी को दिया। पेदार तीर्थ में मुषमा, एकदा, धमधमा देयी, उत्सायनी तया पेदमिया नाम माताओं को दिया। मदमदाटय ने मुनक्षत्रा, कन्या, मुप्रभाता, मुमङ्गटा, देय मित्रा और पत्रसेना को दिया। प्रय इंटरा उध्ययेनी, श्रीमती,

यहुपुत्रिया, पलिता तथा क्मलाक्षी नामक मातृकाओं को अपित किया। सर्वपापविमोचन ने सूपला, मधुकुम्भा, ख्याति, दहदहा, परा और खटकटा को दिया। क्रम ने सन्तानिरा, विरलिया और चत्वरवासिनी को प्रदान (९५-१००)

श्वेततीर्थ ने जलेश्वरी, पुक्युटिका, सुदामा, रोहमेखला, यपुप्मती, सल्मुकाक्षी, चोकनामा महाशनी रौद्रा, कटिका और तुण्डा नामक अनुचरियों को दिया । (१०१)

इन भूतों, गणों और मातृकाओं को देखकर विनतापुर गरुड ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूर को समपित किया और अरुण ने अपने पुत्र ताम्रचूड को दियो । (१०२)

अग्नि ने शक्ति, पार्वती ने वरन, वृहस्पति ने दण्ड, उस दुटिला ने कमण्डलु, विष्णु ने माला, शेर ने पताका तथा इन्द्र ने अपने पक्ष स्थल का हार कार्तिकेय के रण्ठ मे अर्पित किया। (१०३)

गणों से युक्त, मातृकाओं से अनुसरित, मयूर पर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्ति यो हाथ में लिये हुए महाशरीरधारी कुमार कार्तिकेय शंकर के द्वारा सेनाधिपत्ति के पद पर अभिपिक्त होकर सूर्य के समान प्रकाशित होने लगे। (१०४)