10 वामनचरित- वामन द्वारा तीन पग मात्र की याचना तथा अपने सर्वदेवमय विराट् रुप का प्रदर्शन, वामन का तीन पग में त्रैलोक्य को तापना बलि का पाताल-गमन

हे विप्रो । सि जिम भ भाग में पामन पर रग थे यहाँ यहाँ दपी हुई भूमि में पियर (गर्त ) हो जाता था। (४०)

उन मन्दगरि थामन ने मृदुभाय से पलो हुए ममुद्रों, द्वीपों तया पर्वतों याली समरा पृथ्वी यो प्राम्पित पर दिया। (५२)

बृहरपति धीरे धीरे उद शुम मार्ग दिग्गने लगे एवं व भी कीहायिनोदार्थ अत्यन्त मन्दगामी दो गए। (५२)

तदनन्तर मदानाग शेप रमातल से निकल कर देपदेय चमधारी की सहायता करने लगे।

आप भी यह पेट स्थान 'अहिपिल' नाम से प्रसिद्ध है। उस परमात्र से नागों से भय नही होता। (४)

१०

माग ने कहा-यन-पतों सहिन पृप्या फो से उन्ध दुई देगार पलि ने प्रगाम परसथा हाथ जोदर रमा पायरे पूछा-(११)

है आपाय । पया पारा कि ममुद्रों तया पर्वतों सहित यह प्यी शुम्प हो रही है और आग असुरों भागों को प्रहरा गद्दी पर रहे हैं? (२)

पलिप ऐगा पूली पर पेठ महानि गुमापार्य ने पितापान र देर से कहा- (३)

फाप प गृह में गयोनि (जगा के पारा) सनावन परमामा यामन रूप से अपी हुए हैं। (२)

दे दानोन्द्र । पिपरदीये गुग्दारे या में भा में हैं। पन्ही पैर गमे सस विनोम के प्रत पद पृथ्यो पम्पिादोरही है। (५)

ये पत्र पर दोदप ममा चम्प हो गए हैं। पद भूमि भूनपनि भर कर पदा करने में समर्थ नदी।

देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष राक्षस एवं पन्नों युक्त पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश, समस्त देवों, मनुष्यों एव महासुरों को ये ही धारण करते हैं। (७)

जगद्धाता कृष्ण की ही यह गभीर माया है जिसके द्वारा यह जगत् धार्यधारक भाव से सपीड़ित हो रहा है। (८)

उन्हीं का सामीप्य होने से देव शत्रु असुर लोग यज्ञ भाग योग्य नहीं रहे तथा उसी से अग्नित्रय भी असुरों के भाग का भोग नहीं कर रहे है। शुक्राचार्य के वचन को सुन र रोमाञ्चित होकर बलि ने कहा-हे ब्रह्मन् मैं धन्य एव सफल पुण्य वाला हूँ जो स्वय यज्ञपति मेरे यज्ञ मे आ रहे हैं। मुझ से कौन अन्य पुरुष श्रेष्ठ है ? (१०)

सदा जागरूक योगी लोग जिन अव्यय परमात्मा को देखना चाहते हैं वे ही देव मेरे यज्ञ में आ रहे हैं। हे आचार्य। आप मुझे आज्ञा दें कि मेरा क्या कर्तव्य है? (११)

शुक्र ने कहा-हे असुर । वेदप्रामाण्य से देवता यज्ञभाग के भोगी होते हैं। किन्तु हे दैत्य ! तुमने दानवों को यज्ञभाग का भोगी बना दिया है। (१२)

ये ही देव सत्त्व गुण का आश्रय लेकर स्थिति और पालन करते हैं तथा ये ही सृष्टि करते हैं और ये ही प्रभु स्वयं प्रजा का भक्षण करते हैं। (१३)

विष्णु स्थिति के कार्य मे तत्पर हुए हैं । अतः आप निश्चय ही वन्दी होने वाले है । हे महाभाग ! यह जानकर तुम्हारा जो अभीष्ट हो उसे करो। (१४)

हे दैत्यपति । तुम स्वल्प वस्तु के लिए भी उनसे प्रतिज्ञा न करना तथा फलहीन सान्त्वना युक्त मीठी बातें करना। (१५)

हे महासुर । कृतकृत्य, देवों का कार्य सम्पादन करने वाले तथा देवों की सम्पत्ति के लिए प्रयत्नशील देव कृष्ण के याचना करने पर तुम उनसे यह कहना कि मैं देव के हेतु पर्याप्त धन दूंगा।

बलि ने कहा-हे ब्रह्मन् । दूसरों अर्थात सामान्य जनों से याचित होने पर भी में "मेरे पास नहीं है" ऐसा कैसे कह सकता हूँ फिर ससार के पापों का सहार करने वाले देवेश्वर से ऐसा कैसे कहूँगा? (१७)

अनेक प्रकार के व्रतों एव उपवासों से जो प्रभु हरि प्राप्त किये जाते है जब वे ही गोविन्द मुझ से 'दो' ऐसा फहेंगे तो इससे बढ़ कर और क्या हो सकता है ? (१८)

जिनके निमित्त दम, शौच गुणों से युक्त लोग वृहत्

सभार वाले यज्ञ करते है वे ही यज्ञेश मुझसे "दो" ऐसा कहेंगे। (१९)

मेरा सुकर्म सफल है तथा मेरी तपस्या भी भली भाति आचरित है क्यों कि स्वयं विश्वेश मुझ से 'दो' ऐसा कहेंगे। (२०)

हे गुरु । क्या मैं उन अभ्यागत ईश्वर से "नहीं है" ऐसा कहूँ? मैं भले ही प्राणत्याग कर दूं किन्तु किसी मनुष्य से 'नहीं है' यह नहीं कह सकता । (२१)

दूसरों के भी माँगने पर जब मैंने "नहीं है" ऐसा नहीं कहा तो आज अच्युत देव के आने पर कैसे (२२)

वीर पुरुषों के लिये दान से आपत्ति का समागम होना श्लाघ्य ही होता है। किन्तु हे गुरो। जो दान बाधाकारी नहीं होता वह निस्सन्देह श्रेष्ठतर माना गया है। (२३)

मेरे राज्य में कोई भी असुसी, दरिद्र, आतुर (रोगी), दु.सित, उद्विग्न एवं शमादि गुणों से हीन नहीं है। हे महाभाग! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, सुगग्धी, तृप्त एवं सुखों से युक्त है ! अधिक क्या? मैं तो सदा सुखी हूँ। (२४-२५)

हे मुनिशार्दूल। आपके मुख से सुन कर मुझे यह ज्ञात हो गया कि में यहाँ पर विशिष्ट दानरूपी बीज का फल प्राप्त कर रहा हूँ। (२६)

वे मुझसे दान लेकर यदि देवताओं को पुष्ट करते हैं तो यज्ञ से आराधित हरि मुझ पर निश्चय ही प्रसन्न हैं । (२७)

यदि बीजवर, महान् पात्र, पूज्य जनार्दन में मेरे दान का बीज पड़ गया तो फिर मुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ ? मेरा यह दान विशिष्ट प्रकार का है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। उपभोग की अपेक्षा दान को सी गुना सुखकर माना गया है। (२८-२६)

यज्ञ से आराधित हरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। निरसदेह इसी से दर्शन द्वारा उपकार करने वाले वे आ रहे है।

देवभाग का उपरोध होने के कारण यदि वे योपयश मुझे मारने आ रहे हैं तो अच्युत से होने घाटा वध भी श्लाध्यतर होगा। (३१)

हे मुनिश्रेष्ठ! यह जानकर गोविन्द के समुपस्थित होने पर आप मेरे दान में विघ्न न करें। (३२)

लोमहर्षण ने कहा-उसके ऐसा कहने के समय ही सर्वदेवमय, अचिन्त्य माया से वामनरूपधारी जनार्दन यहाँ पहुंचे। (३३)

उग प्रभु को यज्ञस्थल मे प्रमिष्ट हुआ देख कर असुरलोग उनके प्रभाव से क्षुब्ध एव सेज से निष्प्रभ हो (३४)

उस महायज्ञ में उपस्थित घसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य मुनिश्रेष्ठ जप करने लगे। (३५)

बलि ने अपना सम्पूर्ण जन्म सफल माना । तदनन्तर सक्षोभमत होने से किसी ने कुछ नहीं कहा । (३६)

उनके तेज के कारण प्रत्येक ने देवदेवेश का पूजन किया। तदुपरान्त विनीत असुरपति एव उन मुनिवरों को देखकर देवदेवेश्वर वामनरूप धारण करने वाले साक्षात् विष्णु भगवान् ने पूजित होने के बाद यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्म मे अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्य सामग्रियों की स्तुति की। (३७-३८)

हे विप्रो । तत्क्षण सभी सदस्य लोग यज्ञमण्डप में उपस्थित पारस्वरूप वामन के प्रति 'साधु साधु' कहने लगे। (३९)

सस समय पुलकित महासुर बलि ने अर्घ लेकर गोविन्द की पूजा की और उनसे यह कहा। (४०)

बलि ने कहा-सुवर्ण और रत्नों का समूह, हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, भूपण, गायें तथा प्रामसमूह-ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपका जो अभीष्ट हो वह मैं देता आप अभीष्ट का वरण करें। मेरे प्रिय अर्थ आपके (४१-४२)

दैत्यपति के इस प्रकार प्रीति युक्त पचन कहने पर वामनाकृति भगवान ने हँसते हुए गम्भीर वचन कहा । (४३)

हे राजन् । मुझे अग्नि शाला के निमित्त तीन पग (भूमि) दें। सुवण, ग्राम एव रत्नादि उनके याचकों को (४४)

वलि ने कहा-हे पदधारियों में श्रेष्ठ ! तीन पग भूमि से आपका कौन प्रयोजन सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये।

श्रीवामन ने कहा-हे दैत्यपति । इतना पाने से ही मैं कृत्यकृत्य हूँ आप अन्य याचों को इच्छानुसार दान दीजियेगा। (४६)

महात्मा वामन का यह पचन सुनकर (बलि ने) उन महारमा वामन को वचन दे दिया।" (४७)

हाथ पर जल गिरते ही चामन अवामन (विराट् ) हो गये। तत्क्षण उन्होंने सर्वदेवमय स्वरूप को दिसाया । (४८)

चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश शिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैर की अंगुलियाँ एय गुह्यक होंथों की अँगुलियाँ थे। (४६)

जानु मे विश्वेदेवगण, दोनों जवाओं मे सुरश्रेष्ठ साध्य गण, नखों में यक्ष एव रेसाओं में अप्सरायें थीं।(५०)

 समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभु के केश, तारकायें उनके रोम कूप एव रोमों में मषिगण स्थित थे। (५१)

विदिशायें उनकी बाहें, दिशाएँ उन महात्मा के दोनों कर्ण, दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एव वायु उन महात्मा के नासिका स्थान पर थे। (५२)

उनके प्रसाद में चन्द्रदेव तथा मन में धर्म आश्रित थे। सत्य उनकी वाणी तथा जिह्वा सरस्वती देवी (५३)

देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी वलियाँ, स्वर्ग द्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एव पूषा उनकी भौहें (५४)

वैश्वानर उनके मुस तथा प्रजापति वृपण थे। पर ब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुस्त्व थे। (५५)

उनकी पीठ में पसु देवता, सभी सन्धियों मे मरुद्गण, वक्ष स्थल मे रुद्र, तथा उनके धैर्य मे महार्णव आश्रित थे। (५६)

उनके उदर मे गन्धर्व एव महाबली मरुद्गण स्थित थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एव सर्व विद्यायें उनकी कटि मे स्थित थीं।

समस्त ज्योतियाँ एव परम महत् तप उन देवाधिदेव के उत्तम तेज थे। (५८)

उनके शरीर एवं कुक्षियों में वेद थे, वथा बड़े बड़े यज्ञ इष्टियाँ,पशु एव ब्रह्मणों की चेष्टायें उनकी दोनों जानु थीं। (५९)

उन महात्मा विष्णु के सर्वदेवमय रूप को देखकर वे दैत्य उनके निकट उसा प्रकार जाते थे जिस प्रकार अग्नि के निकट पतग जाते है। (६०)

सहादैत्य चिक्षुर ने दाँतों से उनके पैर के अंगूठे को पकड लिया। भगवान ने अंगूठे से उसकी ग्रीवा को आहत किया। (६१)

अपने पैरों एव हाथों के तलवों से समस्त असुरों को मथित कर तथा महाकायरूप धारण कर शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वी को छीन लिया। (६२)

भूमि का मापन करते समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनों के मध्य स्थित थे तथा आकाश का मापन करते समय वे उनके सक्थि प्रदेश में स्थित हुए। (६३)

परम् (ऊर्य) लोक का विक्रमण करते समय देवपालन कर्म में स्थित श्रीविष्णु के जानुमूल में चन्द्र एव सूर्य स्थित हुए (६४)

उस्कम (भारी डगों वाले) विष्णु ने तीनों लोकों का जीत एवं उन बड़े-बड़े असुरों को मारकर इन्द्र को त्रैलोक्य दे दिया। (६५)

सामर्थ्यशाली भगवान् विष्णु ने वसुधातल के नीचे स्थित सुतल नामक पाताल बलि को दिया। (६६)

तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु ने दैत्येश्वर से कहा-"क्योंकि तुम्हारे द्वारा प्रदत्त जल को मैंने हाथ मे ग्रहण किया अत कल्पप्रमाण की तुम्हारी उत्तम आयु होगी तथा चैव- स्वत मन्वन्तर का काल व्यतीत होने तथा सावर्णिक मन्वन्तर आने पर तुम इन्द्र बनोगे। इस समय के लिये मैंने पहले ही समस्त भुवन इन्द्र को दे रक्खा है। (६५-६६)

इकहत्तर चतुर्युगी के काल से कुछ अधिक काल तक जो समय की व्यवस्था है अर्थात् एक मन्वन्तर के काल तक मैं उसके (इन्द्र के) विरोधियों का नियमन करूँगा । (७०)

हे बलि। पूर्वकाल में उसने परमभक्तिपूर्वक मेरी आराधना की थी। अत. मेरे कहने से सुतल नामक पाताल में जाकर मेरे आदेश का यथावत् पालन करते हुये देव-सुख से सम्पन्न सैकड़ों प्रासादों से पूर्ण विकसित कमलों वाले सरोवरों, हृदों एवं शुद्ध श्रेष्ठ सरिताओं वाले उस स्थान पर निवास करो। हे दानवेश्वर । सुगन्ध धारण कर,श्रेष्ठ आभरणों से भूपित एव माला तथा चन्दनादि से अलङ्कृत सुन्दर से तुम नृत्य और गीत से युक्त विविध प्रकार के महान् भोगों का उपभोग करते हुये सैकडों स्त्रियों से आवृत होकर इतने काल तक मेरी आज्ञा से वहाँ निवास करो। जब तक देवताओं एव ब्राह्मणों से तुम विरोध न करोगे से तर तक समस्त कामनाओं से युक्त भोगों को भोगोगे। किन्तु जब तुम देवों एव ब्राह्मणों के साथ विरोध करोगे तो देखने में भयकर वरुण के पाश तुम्हें बाँधेगे । (७१-७६)

बलि ने कहा-हे भगवन् । हे देव ! आपकी आज्ञा से वहाँ पाताल में निवास करने वाले मेरे भोगों की सामग्री क्या होगी जिससे तृप्त होकर मैं सदा आपका स्मरण

करूँगा। (७७)

श्रीभगवान् ने कहा--अविधिपूर्वक दिये गये दान, श्रोत्रिय ब्राह्मण रहित श्राद्ध तथा विना श्रद्धा के किये गये जो हवन हैं वे तुम्हें फल देगे। (७८)

दक्षिणा रहित यज्ञ, अविधिपूर्वक किये गये कर्म और प्रतरहित अध्ययन तुम्हें फल प्रदान करेंगे। (७९)

बलि । जल के विना की गई पूजा, विना फुश की की गई किया और विना घी के किये गये हवन तुमको फल (८)

इस स्थान का आश्रय कर जो मनुष्य किन्हीं भी क्रियाओं को करेगा, उसमे कभी भी असुरों का अधिकार न होगा (८१)

अत्यन्त पवित्र ज्येष्ठाश्रम तथा विष्णुपद सरोवर में जो घाद्ध, दान, व्रत, या नियम करेगा एव विधि या अविधि पूर्वक जो कोई क्रिया वहाँ को जायेगी उसके लिये यह सभी निरसदेह अक्षय फलदायी होगा। (८२-८३)

ज्येष्ठ मास के शुरू पक्ष में एकादशी के दिन उपवास फर द्वादशी के दिन विष्णुपद हुद में स्नान करके तथा थामन का दर्शन करने के उपरान्त यथाशक्ति दान देकर मनुष्य परम पद को प्राप्त करता है। लोमहर्षग ने कहा-थलि को यह वर तथा इन्द्र को त्रिविष्टप देकर भगवान उस सर्वव्यापी रूप से तिरोहित हो गये। (८५)

 (तदनन्तर) बलवान् इन्द्र पूर्ववत् त्रैलोक्य का शासन करने लगे एव बलि ने सम्पूर्ण समय पावाल मे निवास (८६)

इस प्रकार उन भगवान् (वामन) विष्णु का उत्तम माहात्म्य कहा गया जो इसे (वामन माहात्म्य को) सुनेगा यह सभी पापों से मुक्त हो जायेगा। (८७)

हे द्विजश्रेष्ठो। बलि एय प्रह्लाद के सम्बाद, यलि एवं शुक की मन्त्रगा तथा बलि एव विष्णु के चरित का जो मनुष्य स्मरण करेंगे उन्हें कभी काई आधि एष व्याधि न होगी तथा उनका मन भी मादावुल नहीं होगा। (८८-२६)

हे महामागो। इस कथा को सुनकर राग्यच्युन व्यक्ति अपने राग्य यो एव रियोगी मनुष्य अपने प्रिय को प्राप्त