शिव द्वारा सप्तर्षियों का हिमवान के यहाँ प्रेवण, सप्तर्षियों का हिमवान के गृह में आगमन एव शिव के लिए उमा की याचना, हिमालय द्वारा अपने ज्ञातियों का आमत्रण तथा सप्तर्षियों के सदेश का निवेदन, हिमालय का शिव के लिए कन्यादान की स्वीकृति, सप्तर्षियों द्वारा शिव से उस वृत्तान्त का निवेदन

तदनन्तर सुरपति शिवने विनयान्वित सप्तपियों से अपने यश का पृद्धिपारी, देयताओं के लिये हितार एष धर्म युक्त पचन कहा (८)

शहर ने कहा-हे कश्यप । हे अधि। हे पसिष्टहे विश्वामित्र। हे गौतम । हेभरद्वाज । हे अगिरा । आप लोग सुनें- (६)

प्राचीनकाल में दक्ष की पन्या सती मेरी प्रिया थी। उसने दक्ष के ऊपर मुख होकर योगदृष्टि से अपने प्रागों का त्याग कर दिया। (१०)

पही आज पुन उमा नाम से गिरिराज हिमालय की फया हुई है। हे द्विजसत्तमो | आप लोग मेरे लिए उसे पर्यतराज से माँग। (११)

इष्रस्याने महा-शेताकहे जाने पर सतारियों ने 'भरका' यह पचन कहा एवं नम शराप' कहकर हिमालय पे यहाँ गये। (१२)

तदनन्नर शहर ने अत्यती से कहा-हे मुन्दरि । नुम भी लाभो । खियों के धर्म की गति को त्रियों ही जानती है। (१३)

इम प्रसर दुदाय सोअपार जिनसे हा गया है ऐसी भएपनी 'नमस्ते में ऐमा कर अपने पति के साथ गई। (१४)

औषधियों से युक्त हिमायल के शिखर पर जाकर सुरः पुरी के सदृश शैलराज हिमालय की नगरी को देसा । (१५)

सदनन्तर शैलराज की पत्नियों, स्थिरचित्त पाले सुना- मादि पर्वतों, गन्धों, किमरों, पक्षों एवं अन्यों से पूजित होकर वे हिमालय के स्वर्ण की तरह प्रकाशमान रमणीय भवन में प्रविष्ट हुए। (१६-१७)

तदनन्तर तपस्या से पाप-रहित ये सभी महात्मा महाद्वार पर जाकर द्वारपाल के पास रुक गये। (१८)

सदुपरान्त हाय में पद्मरागमय महान् दण धारण किये हुए द्वार स्थित गन्धमादन पर्यत शीघ्र उनके निष्ट

तदनन्तर मुनियों ने उससे कहा-श्रीमान शेरपति से जाकर यह संवाद कहो कि हम लोग महान कार्य के निमित्त आये है। (२०)

ऋषियों फे ऐमा इन पर शैलेन्द्र गन्धमादन, पर्वतों से पिरे हुए शेलाज समीप गये । (२१)

पृथ्वी पर पुटनों पे बल बैठकर दोनों हाय मुन के के निम्ट ले जार यंदणप्रेस में बार उसने यह

वचन पदा।

गन्धमादन ने पहा- शैलराज। ये ऋषिगण किसी प्रयोजनयश आप के पास आये है और दर्शन करने की कामना से द्वार पर पड़े हैं।

पुलरत्य ने कहा- द्वारपाल यो यात मुनने के उपरान्त पर्यतराज उठकर तथा उत्तम अर्घ्य लेकर स्वयं द्वार पर (२४)

अर्य आदि द्वारा उनमा अर्थन करने के उपरान्त सभा में लाकर उन लोगों से याक्यात शेल ने उनके आसन ग्रहण करने पर यह याश्य पदा। (२५)

दिमयान ने कहा-यह बिना मेघ पी पप अपया विसापूल का फल फेसा क्योंकि आप लोगों का यह आग- मन कल्पनातीत एवं अपिन्य है। (२६)

सतमो। आज से मैं धन्य हुआ। शाज ही में रेलराज हुआ। आज ही मेरा शरीर शुद्ध हुआ है क्यों । हिद द्विजोत्तमो। आज आप ने मेरे ऑगर को पूत, पदासान्त एवं आरमसंसर्ग से सारस्वत तीर्थ के साश । शुद्ध किया है। (२७-२८)

है भाभो ! में आप से गोंप दास हूँ। मप्रति पुण्ययान हुआ हूँ। आप लोग जो पाहते हों उसके लिए मुझे आशा हैं। (२९)

हे महर्षियो । में स्त्री, पुत्र, नावी, भृत्यों के सहित आप पा आमाकारी सेवक हूँ। अन आना दें। (३०)

पुटरत्य ने कहा-गिरिराज की यात मुनार प्रशस्त ग्रत वाले पियों ने पृद्ध अङ्गिरा मुनि से पहा-हिम- यान को आप प्रयोजन यनलायें। (३१)

इस प्रकार पदयपादि ऋपियों से प्रेरित अद्विग ने उन गिरिराज हिमालय से यह श्रेष्ठ वचन कहा । (३२)

अगिरा ने कहा- पर्वतराजा हम लोग अमत्यती के साय आप फे पर जिस कार्य से आये हैं उसे सुनिये। (३३)

हे गिरीश्वर। जिन महात्मा, मर्यात्मा, दा-यात विनादामारी, शूलधारी,श, विनेत्र, वृपामयाहन, जीमूनरंतु, शत्रुघा, यामोसा, धर्मप्रगु, भगवान शहरदोग शिक, स्पाणु, भा, र, भीम, इम, महान, महादेय एष पशुपति पहते हैं उन्होंने ही दम टोगो को भार के गिफ्ट भेजा है। (३१-२६)

आप की इस समस्त लोगों में सुन्दरी पुत्री पारी को देवेश (शहर) मांगते हैं । थाप उसे प्रदान करें। (३७)

हे गिरिमत्तम । यही पिता धन्य होता है जिसकी पुत्री कुल और सम्पत्ति से युग गुम पति को प्राप्त करती है। (३८)

है रेल। गे देयी पतुर्विध समान पाचर जीयों की माता है क्योंकि दर ग्न (मागियों) पे पिता पहे (३९)

समान दंपता शहर को प्रगाम पर तुम्हारी पुत्री को प्रणाम परें। अपने शओं के शि पर अपना भाम पुए पैर रखो। (५०)

इम स्टेग यापना परत पान है, दादर भारदा और समस संगार को जननी मा आप जो भाया समो पर। (११)

पुराग ने कहा अहिरा पद पान मुनार पारी ने मुग पेपर टिगा। मदमा प्रसार ये पुन विप्न होगी। (४२)

तदन्नतर गिरिराज ने गन्धमादन पर्वत में कहा- जाओं। शख पर्वतो को पुत्रा आओ। (४३)

तदुपरान्त वेगान् पर्यत (गन्धमादन) शीघ्रता- पूर्वक घर घर जार मेरु आदि सभी श्रेष्ठ पर्वतों को चारों ओर से बुला लाया। (४१)

वे सभी पर्यत भी कोई महान् कार्य समम घर शीप्रता से आ गये और मुयमय आसनों पर विरमयपूर्वक बैठ (४५)

उदय, हेमस्ट, एयय, मन्दर, उहालक, यारण, पराह, गरदासन, मुक्तिमान, येगसानु, दराज, गयान, चित्राट, प्रिट, मन्दराचल, विभ्य, मलय, पारियार, दुर्दर, फेटास, महेन्द्र, निपध, अअन-वे सभी प्रमुख पर्यंत नया पोटे-छोटे अन्य पर्यत उन ऋपियों को प्रणाम समा में येठ गये। (०६-४६)

तदनतर उन गिरिराज ने अपनी मार्ग मेनाको घुल गया! ( यह ) कल्याणी भामिनी अपने पुत्र साप आई। (५७)

तदननर ये मानी रियों के परलों में प्रधाम फर ए ममरा गतियों से अनुमार पुत्र पे माप बैठ गई।

हे नारद तदुपरान्त सभी पर्वतो के बैठ जाने

पर उनकी अनुमति लेर पाक्यक्ष महाशैल ने मधुर यचन हिमयान ने कहा-ये पुण्यात्मा सप्तर्षि शङ्कर के लिए मेरी कन्या को मांग रहे हैं। यही आप लोगों से । निवेदन करना है। (५३)

आप ही मेरे शाति-बन्धु हे अत अपनी बुद्धि के अनुसार परामर्श दें। आप का उल्लहुन कर में (पन्या पा) दान नहीं पलंगा, अत आप लोग उचित परामर्श हैं। (५४)

पुलस्त्य ने पहा-हिमयान् पी यात सुनार मेरु प्रभूति सभी गिरियरों ने अपने-अपने आसन पर येठे हुए ही यहा-

याचना करने पाले सप्तर्षि ई, और त्रिपुरामुर या वध फरने याले शहर पर हैं। शैलराज ! इस कारी को आप प्रदान करें। जामाताहम लोगों को पसन्द है। (५६)

तदनन्तर मेना ने पति से कहा- शेग्न्द्र। मेरी पात मुनिये। पितरों की आराधना कर न देयों ने मुझे इसलिए दिया था कि भूतपति द्वारा इससे जो पुत्र  उत्तम होगा, पह दैत्येन्द्र महिप ९६ सारस का वध करेगा। (५४-५८)

मेना तथा पत्रों के इस प्रसार कहने पर हिमशन है ने अपनी कन्या से यहा-हे पुत्रि। अब मैंने तुम्हें शङ्कर (५९)

पियों से उन्होंने यहा-ई तपोधनो! यह मेरी पुत्री तथा शङ्कर की यधू काली भक्ति से नम्र हो पर आप लोगों को प्रणाम करती है। (६०)

तदनन्तर अस्थती ने लज्जित हो रही काली को गोद में येठा पर शङ्कर के शुभ नामों के पक्षारण से उसे समाधस रिया। (६१)

तदपरान्त सप्तर्षियों ने यहा-हे शैलराज जामिग्रगुणसयुक्त मगरमय पवित्र तिथि को मुनिये । तीसरे दिन चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र से योग करेगा। से मेन नामक मुहूर्त कहत हैं। (६२-६३)

उस तिथि में शहर मन्त्र पं साथ आप की पुत्री का पाणि महण करेंगे। आप अनुमति दें, हम साग (६४)

तदननर दराज ने मुन्दर परमूलों से विधिपूर्वक पूजा कर उन शपियों को विदा किया। (६५)

वे आकासमा मे अत्यन्न बैग में मदरगिरि पर आये एवं महेश को प्रणाम पछा-आप यर ज्य गिरिजा बधू है। प्रा सहित तीनों सोक पनवाहन (शिव)