वामन महा पुराण
8 वामनचरित- दैत्यों के तेज का विनाश, प्रहलाद द्वारा अदिति के गर्भ मे स्थित विष्णु की स्तुति
लोमहर्पण ने कहा-तदनन्तर असुरराज बलि ने समस्त असुरों को निस्तेज हुआ देख कर अपने पितामह प्रहलाद से पूछा। (१)
चलि ने कहा-हे तात। अग्निदग्ध के सदृश दैत्य निस्तेज हो गए हैं। ये आज सहसा ब्रह्मदण्ड से हत के सदृश क्यों हो गये है? (२)
क्या दैत्यों का कोई अनिष्ट उपस्थित हुआ है ? अथवा क्या इनके नाश हेतु विधिनिर्मित त्या समुद्भूत हुई है जिससे असुर लोग निस्तेज हो गए हैं। (३)
लोमहर्षण ने कहा हे ब्राह्मणो। पौत्र से इस प्रकार पूछे जाने पर असुरश्रेष्ठ प्रहलाद ने देर तक ध्यान लगाने के उपरान्त असुर बलि से कहा। (४)
प्रहलाद ने कहा-पर्वत डगमगा रहे हैं, पृथ्वी सहसा धैर्य को छोड़ रही है, समुद्र सद्य क्षुब्ध हो रहे हैं एवं दैत्य निस्तेज कर दिये गये हैं।
पहले के सदृश सूर्योदय होने पर प्रह नहीं चल रहे हैं। कारण के द्वारा देवताओं की उत्कृष्ट लक्ष्मी का अनु- मान होता है।
हे महाबाहु । हे दानवेश्वर । यह कोई महान कारण है । इसे कोई छोटी बात नहीं समझनी चाहिये और इसका आपको कोई उपाय करना चाहिये (अथवा इसके कार्य (परिणाम ) को आप क्सिी भी भाति छोटा न समझे)। (७)
लोमीण ने कहा-दैत्यराज बलि से ऐसा कह कर असुरश्रेष्ट महाभक्त प्रहलाद मन से भगवान के शरणागत हुए।
असुर प्रह्लाद मन को ध्यानपथगामी बना कर जनार्दन देव के स्वरूप का चिन्तन करने लगे।
उन्होंने अदिति के उदर में वामनाकृति ( भगवान् ) को देखा। उनके भीतर वसुगण, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों, मरुतों, साध्यों, विश्वेदेवगण, आदित्यों, गन्धों, उरगों,
राक्षसों, अपने पुत्र विरोचन, अमुरनाया घलि, जम्भ, कुजम्भ, नर, याग, अन्य अनेक अमुरोंय स्यय को तथा पृथ्यो, आगश, यायु, जल, अग्नि, समुद्रों, पर्वतों, नदियों, द्वीपों, सरों, पशुओं, पृप्यी, पक्षियों, समस्त मनुष्यों, सरी सपों, समस्त लोकों के सटा प्रमा, शिय, महों, गनी, तापमोतया पक्षादि प्रजापनियों को देखने से याद विस्मया पिट हो गए। कि क्षणमान में पुन प्रतिस्य होकर उन्होंने यिरोपनपुत्र दरयेन्द्र पलि से कहा- (२०-२५)
तुम लोगों को यह सेज हानि जिस कारण उत्पन्न हुई है उसे में पूरा जान गया। तुम लोग उसे पूर्णम्पेण सुनो- (१६)
देयदेय, जगदूयोनि,अयोनि, जगदादिम रत्पन्न, अनादि, विपके आदि, वरेण्य, परद, हरि, परापरों में सर्वश्रेष्ठ, पर- अपर-सम्मनों की गति,मानों के प्रमाणभूत प्रनु, सतलोक के गुरुत्रों के गुरु एवं अचिन्त्य जगमाय (जगत् में) स्थिति काने के निमित्त गर्भस्य हुए हैं। (१७-१८)
प्रगुओं के प्रमु, मेष्टों में भेट, आदि मप्प-दोन, अनन
महात्मा भगरान अफेजे जगत् को सनाथ करने रे लिये अदिति के पुत्र रूप में अशावतार प्रहण किये हैं। (१९)
हे दैत्याधिप । रद्र, प्रमा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा एय मरीचि आदि जिनके सम्प को नहीं जानने वे ही यासुदेय एक कटा से अपनीर्ण हुए है। (२०)
वेदन लोग जिन्हें अक्षर पहने है, मान से पापरहित हु" प्रागी निनमें प्रविष्ट होत हैं एवं जिनके भीतर प्रपिट हुए लोग पुन उत्पन्न नहीं होते मे उन पामुदय को में प्रणाम करता हूँ। (२१)
ममुद्र की तरको फेसशनिनसे रामस्नभूत सवत मापन होने तथा प्रलपाल में निनके भीतर यिटीन होते हैं उन अचिन्त्य पासुदेय को मैं मनाम करता हूँ। (२२)
ब्रह्मा आदि जिन परम पुरुष के रूप, पल, प्रभार और प्रताप को नहीं जानन ठन पायुदेय को मैं निरप प्रणाम करता हूँ(२३)
नेत्र को रूप देखने के लिये, त्वचा को स्पर्श प्रहण करने के लिये, जिह्वा को स्वाद लेने के लिये और नासिका को गध सूधने के लिये जिन्होंने नियुक्त किया है. उन्हें नासिका, नेत्र और श्रवण आदि नहीं है। (२४)
जो वस्तुत स्वय प्रकाश हैं वे सर्वेश्वर युक्ति से ज्ञेय है। उन समर्थ, स्तुत्य, निष्पाप, ग्राह्य, ईश हरि देव को मैं प्रणाम करता हूँ। (२५)
जिनके द्वारा एक दष्ट्रा से निकाली गई अचरा धरा सभी कुछ धारण करती है तथा जो समस्त जगत् को अपने में विलीन कर शयन करते हैं उन स्तुत्य ईश विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। (२६)
जिन्होंने अश से गर्भ में अवतीर्ण होकर महासुरों के तेज का हरण कर लिया उन समस्त ससाररूपी वृक्ष के कुठार स्वरूप अनन्त देवेश को मैं प्रणाम करता है। (२७)
हे महासुगे। जगद्योनिस्वरूप वे ही महात्मा देव अपनी पोडशाश कला से इन्द्र की माता के गर्भ मे प्रविष्ट हुए हैं एवं उन्होंने ही तुम लोगों के शरीर के बल का अपहरण किया है। (२८)
बलि ने कहा-हे तात । जिनसे हमें भय प्राप्त हुआ है वे हरि कौन है ? हमारे पास यासुदेव से अधिक वल वान् सैकडों दैत्य है। (२९)
विप्रचित्ति, शिवि, शङ्ख, अय शकु, यशिरा, अश्वशिरा, भगकार,महाहनु,प्रतापी, प्रघश,शम्भु, दुजेय एव कुक्कुराक्ष ये तथा अन्य भी मेरे अनेक दैत्य तथा दानव है। (३० ३१)
ये सभी महाबलवान् एव महापराक्रमी तथा भूभार को धारण करने में समर्थ है । इनमे से एक एक के आधे बल के भी तुल्य कृष्ण नहीं हैं। (३२)
लोमहर्षण ने कहा-पौत्र के इस वचन को सुन मुद्ध दैत्यश्रेष्ठ प्रहराद ने भगवान् पर आक्षेप करने वाले (३३)
तुझ दुर्बुद्धि एव अविवेकी राजा से युक्त ये सभी दैत्य एव दानव विनष्ट हो जायेंगे।(३४)
हे पापसङ्कल्प। तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है जो देवाधि-देव महाभागअज एव विभु वासुदेव को ऐसा कहेगा। (३५)
तुम्हारे द्वारा कथित ये सभी देव एवं दानर, ब्रह्मा सहित सभी देवता तथा स्थावरपर्यन्त विभूतियाँ, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और वन से युक्त जगत् , तथा समुद्रों एव: द्वीपों से युक्त यह लोक तथा सचराचर जिन वन्दनीय श्रेष्ठ सर्वव्यापी परमात्मा के एकाश की अशकला से उत्पन्न हुआ है उनके विपय में विनाशाभिमुस, अविवेकी, दुर्बुद्धि, अजितात्मा, वृद्धों के शासन का अतिक्रमण करने वाले तुम्हारे अतिरिक्त कौन ऐसा कहेगा ? (३६-३९)
मैं भी शोचनीय हूँ जिसके घर में तुम्हारा अधम पिता उत्पन्न हुआ जिसका तुम्हारे जैसा देवदेव (विष्णु) का अपमानरारी पुन है। (४०)
अनेक ससार समूह के प्रवाह के बिनाशक कृष्ण मे भक्ति करना तो अलग रहा तुम्हें क्या मेरा भी ख्याल नहीं करना चाहिये था? (४१)
हे दितिनन्दन । समस्त ससार एव तुम भी यह जानते हो कि मुझे मेरी यह देह भी कृष्ण से प्रियतर नहीं है। (४२)
जानमे हुए भी कि हरि मुझे प्राणों से भी प्रिय तर है तुम मेरा अनादर करते हुए उनकी निन्दा श्रीवामनपुरागरे सरोमाहात्म्य में कर रहे हो।
हे बलि । तुम्हारा गुरु (पिता) विरोचन है, उसका गुरु (पिता) में हूँ तथा मेरे भी गुरु सर्वजगन् के स्यामी नारायण हरि है। (४४)
यत तुम अपने गुरु (पिता विरोचन) के गुरु (पिता में प्रहलाद) के भी गुरु श्रीकृष्ण की निन्दा कर रहे हो अत तुम यहीं ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाओगे।
हे बलि । ये प्रभु जनार्दन देव जगत् के नाथ हैं। 'इसमे मेरा गुर (अर्थात् में) भक्तिमान् हूँ' यह समझर तुझे मेरी अपहेलना नहीं करनी चाहिए। (४६)
यत जगद्गुरु की निन्दा करने वाले तुमने मेरी इतनी भी अपेक्षा नहीं की अत में तुम्हें शाप देता हूँ। (४७)
हे बलि। या तुम्हारे द्वारा अच्युत के प्रति कहा गया आक्षेपयुक्त वचन मेरे शिरइछेद से भी गुस्तर है अत' तुम राज्यभ्रष्ट होकर गिर जाओ। (४)
क्योंकि भरसागर में कृष्ण को छोड़कर दूसरा कोई परिवाग नहीं है अत शीघ्र ही में तुम्हें राज्य से पिच्युत हुआ देगा। (४५)