वामन महा पुराण
ब्रह्मा द्वारा पुश्राम नरको का वर्णन, पुत्र और शिष्य में वैशिष्य, औरस इत्यादि द्वादश पुत्रों का वर्णन, सनत्कुमार द्वारा ब्रह्मा का दत्तक पुत्र होना, ब्रह्मा द्वारा सनत्कुमार के लिए द्वादशपत्रक योग का उपदेश विष्णु की चतुर्मूर्ति का वर्णन मरु वध
ब्रह्मा ने कहा-परस्त्रीगमन, पापियों की सद्गति और सब प्राणियों के प्रति परपता को प्रयम नरक यहा जाता है।
फलों की पोरी, स्पर्ध भमण एवं वृक्षों का काटना महा. पाप तथा द्वितीय नरक माना गया है। (२)
निपिछ यस्तुमों का प्रहण, अपप्य प्रागियों का यध और यन्धन तथा अर्थ के लि होने पाला पिरान दोषयुक्त वीय नरक होता है।
सभी प्रागियों को भय देना, संसार की विभूति का यिनाशन व्या स्पधर्म का न पतुर्थ नरक कहलाता है।
मारण, मित्र के साथ पुटिलता, मिथ्या शपष, तथा अपले मिष्टामा भक्षण पप्रम नृपापन (नरक) हा
यन्त्र, पलादि पादरण, रिमी को योधना, योगनाशन अर्थात् किसी पी अपात की प्राप्ति या पिच्छेद और यान के जूए की पोरी को घटौं नृपायन (नएफ) कहते हैं।
मूतासग राजा फे अंश पाहा, राज पत्नीगमन तया राय शहित करना सप्तम नरम पहा जाता है। (७)
लुब्धता, सोलुपता, प्राप्त धर्मयुक्त अर्थ का पिनाश और सामिभिनयागी को अष्टम नरक बने हैं। (८)
ग्रामग को देशनियाय देना, मामण का मन पुराना, प्रामगों को निन्दा करना तथा बन्धुओं से विरोध करने को नयम नरपाचन (नरक) ने है।
शिष्टापर नाश, शिष्टजनों से पिप, शिशु की हत्या, शास्त्र की पोरी या स्यधर्म के नाश एम नरक
कहते है। (१०)
पडद्वनिधन अर्थात् ६. अगों पाली वेद-विद्या का विनाश, एय पाहगुण्य अर्थान् मन्धि विग्रहादि राजगुणों के प्रतिषेध को सजनों ने ग्यारहवाँ घोर नरम यहा है। (११)
सननों से सदा देर-भाव, अनाचार, असतार्य एवं संस्थालरादित्य इन फो घारहयों नरय कहते हैं। (१२)
धर्म, अर्थ प्य काम की हानि, मोक्ष का नाश एवं इनके समूह में विरोध उत्पन्न करने को सेरहयों नरक पहा आता हे। (१३)
पण, धर्मदीन, पर्य एवं आग गाने चारे को गि- हित वीदयों नरक कहते है। (२४)
प्रधान, भमया, अगुभारी, अशीच प्य असत्यययनों पो पन्द्रयो नरफ यही हैं। (२५)
आटस्प, विशेष रूप से प्रोध, सभी के प्रति आततायित्व एवं गद में भाग टगाना सोरहयो नरक कहलाता है। (२६)
परनी की पामना, मत्य के सीईयाभाय पर्य निन्दिन एरण्ड प्यपदार नरक देने पाला पदा गया है। (१७) पुत्र के द्वारा देव जगत्पति जनार्दन को प्रसन्न करता है। (१८)
पापहारिणी भ सन्तति के द्वारा प्रसन्न जन्मार्दन पुग्नामक नरक यो पूर्णतया नष्ट कर देते है। (१९)
हे साध्य ! इसीलिए सुत को पुत्र कहा जातयोक्ति अर में शेप पाप या उक्षण बतलाता हूँ। (७४)
हे द्विजश्रेष्ठ! देवता, ऋषि, प्रानियों, वि मनुष्यों एवं पितरों का ऋण, सभी वर्गों में एकता, ओंभार का परित्याग, पापम का आचरण, मत्य भक्षण तथा गमन फे अयोग्य स्त्री के साय सध्यासन्ये महापाप हैं। (२१-२२१)
पृत आदि का विक्रय, घारडाल आदि का दान महा परना, अपना दोप छिपाना और दूसरे पा दोष प्रस्ट करना-ये पोर पाप है। (२३)
मारमर्य, पटु-मापण, मिष्टुरता, नाम कहने से भी अधर्मजनक दायिता और ताल्यादिता, भयरता सया अधार्मिकता के कार्य नरक फे हेतु हैं। इन पापों से युध मनुष्य यदि परमसानी शहर पो प्रसन्न फरता तो शेष पाप पो यह पूर्ण रुप मे जीत लेता है। धर्मपुत्र !
उस जन्म में किये गये सभी कायिक, याचिक एवं मानसिक कर्म माता, पिता तथा आश्रित जन और भाई एवं बान्धयों द्वारा किये गये कर्म विलीन हो जाते हैं। हे साध्य ! सुत एवं शिष्य का यही धर्म है। इसके विपरीत होने पर विपरीत गति प्राप्त होती है। (२४-२८)
अतएव विद्वान् व्यक्ति को पुन और शिष्य की (परम्परा) बनानी चाहिए। इसी प्रयोजन की दृष्टि से शिष्य की अपेक्षा पुत्र श्रेष्ठ होता है। क्योंकि शिप्य शेप पापों से मुक्त करता है और पुत्र सभी पापों से पचाता है। (२९)
पुलरत्य ने पहा-पितामह या वचन सुनकर तपोधन सनत्युमार ने कहा-हे देव । तीन बार सत्य उच्चारण करके कहता हूँ कि में आप का पुन हूँ। अत मुझे आप योग का उपदेश दीजिए। तप महायोगी पितामह ने उनसे कहा-हे पुन! तुम्हारे माता पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे दायाद पुत्र हो जाओगे। (३१)
सनत्कुमार ने पदा-हे भगवन् ! आप ने जो दायाद शम्द फदा है उसका अर्थ क्या है? यह मुझें बतलाइने। (३०)
हे नारद । भगवान् पिनामह साध्यप्रधान सनत्कुमार का वचन सुनकर हँसते हुए बोले-हे यत्स ! सुनो। (३३)
ब्रह्मा ने कहा-औरस, क्षेत्रज, दुस, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध-ये छ. बान्धव दायाद होते है। (३४)
इन छ' पुत्रों से ऋण, पिण्ड, धन की क्रिया गोत्रसाम्य, मुलगृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (३५)
इसके अतिरिक्त कानीन, सहोद, क्रीन, पीनर्भय, स्वयंदत्तं और पारशन ये छ अदायाद यान्यन कहे जाते हैं।
इनके द्वारा ऋग एवं पिण्डादि का कार्य नहीं होता। ये मामधारी-मात्र होते है। गोत्र एव पुल से ये सम्मन नहीं होते। (३७)
सनत्युमार ने उनी यात सुनकर यहा-प्रक्षन् ! आप इन सभी का विशेष लक्षण मुझ पतलाएँ। (३८)
तदनन्तर मुरपति ब्रह्मा ने कहा-दे पुत्र ! में विरोपरूप से बतलाता हूँ। मुनो। अपने द्वारा उपप्त किया गया पुत्र औरस कहलाता है। यह अपना प्रतिविम्य होता
पति के नपुसक, उन्मत्त या व्यसनी होने पर उसी आज्ञा से अनातुरा (निष्काम भाव से) पत्नी (अन्य पुरुष के संयोग से) जो पुत्र उत्पन्न करती है उसे क्षेत्रज (४०)
माता-पिता यदि दूसरे को अपना पुत्र दे दें तो यह दत्तक फहा जाता है। मित्र के पुत्र और मित्र द्वारा दिये गये पुन यो उत्तम पुरप कृत्रिम पुत्र कहते है। (४१)
यह पुत्र गूढ़ होता है जिसके विषय में यह क्षात न हो कि गृह में रिसके द्वारा यह उत्पन्न हुआ है। भाइर से स्वयं लाये हुए पुत्र को अपविद्ध कहते (४२)
धुमारी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र का नाम कानीन है। गर्भिणी पन्या से विवाह के अनन्तर उत्पन्न पुत्र पो सहोद कहते है। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुन मीत पुन पहलाता है। पुनर्भय पुत्र दो प्रकार पा होता है। (४३)
एक फन्या वो एक पति के हाथ में देकर पुनः एससे छीनकर दूसरे पति के हाथ में देने पर लो पुत्र उत्पन्न होता है उसे पुनर्भय पुन करते है। (४४)
दुर्भिश, ध्यसन या अन्य किसी कारण से जो स्वयं को (किसी दूसरे के हाथ में ) समर्पित कर देता है. उसे स्वयंदत्त पुत्र कहते हैं। (४५)
हे सुव्रत ! विवाहित या अविवाहित शूद्रा के गर्भ से ब्राह्मण का जो पुत्र होता है उसका नाम पारशय (४६)
हे पुत्र ! इन कारणों से तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते । अत शीघ्र जाकर अपने माता पिता को (४७)
हे मुनि! तदनन्तर सनत्कुमार ने विभु ब्रह्मा के कहने से अपने माता-पिता का स्मरण किया। हे मुनि! वे दम्पती पितामह का दर्शन करने के लिए यहाँ आ (४८)
धर्म और अहिंसा प्रद्मा को प्रणाम कर बैठ गये। उनके से बैठ जाने पर सनत्कुमार ने यह यपन कहा-
सनकुमार ने कहा-हे वात! मैंने योग जानने यो लिए पितामह से प्रार्थना की थी। उन्होंने मुमसे अपना पुत्र होने के लिए कहा। अतः आप मुझे प्रदान कर दें।(५०)
पुत्र के ऐसा कहने पर उन दोनों ने योगाचार्य पितामह से कहा- हे प्रभो! हम दोनों पा यह पुत्र
आप का हो। (५१)
हे ब्रह्मन् । आज से यह पुत्र आप का होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्ग से आये थे उसी से चले गये। (५२)
पितामह ने भी उस विनय युक्त पुन सनत्कुमार को द्वादशपत्र योग का उपदेश किया। (५३)
भगवान् यासुदेव की शिसा में स्थित 'ओंगर', शिर पर स्थित मेप राशि और वेशास मास ये इसके प्रथम पत्र है। (५४)
मुर में स्थित 'नर' और वहीं पर विद्यमान पराशि तथा ज्येष्ठ मास ये उनो द्वितीय पत्र कहे गये हैं। (५५)
दोनों भुजाओं में स्थित 'मोकार', मिथुन राशि एय आषाढ मास-ये उनके तृतीय पत्र हैं। (५६)
उनके नेत्र युगल में विद्यमान 'भरार', कर्क राशि और प्रावण माप्त-ये चतुर्थ पनर हैं। (५७)
(उनके) हृदय ये रूप में विद्यमान 'गार', सिंहराशि और भाद्रपद मास-ये पधम पर हैं। (उनके) पयर के रूप में विद्यमान 'यार', न्याराशि और आश्विन मास-ये पष्ठ पत्रक है। (५९)
(उनके) अस्त्र-समूह के रूप में विद्यमान 'तेगार, तुरा-राशि और कार्तिक मास-ये सप्तम पत्रक है। (६०)
हे मुनि। (उनके) नाभि रूप में विद्यमान 'यार', वृश्चिक राशि और मार्गशीर्ष मास-ये अष्टम पत्रक है। (६१) (उनके) जघनरूप में विद्यमान 'सुमार', धनुराशि और पौष मास ये नाम पता है। (६२)
(उनने) अरु युगर-रूप मे विद्यमान 'देकार', मार राशि और माघ मास-ये दशम पत्रक है। (६३)
(उनके) दोनों घुटनों के रूप मे विधमान 'सार', कुम्भ राशि और फाल्गुन मास ये ग्यारहवें पता हैं। (६४)
(उनके) चरणद्वय रूप में विद्यमान 'यार', मीन राशि और चैन मास ये पारहवें पता है। ये दी केशर के द्वादश पत्र है। (६५)
उन पर यारह अरों, पारद-नाभियों और प्रिव्यूह से युक्त है। इस प्रगार यी उन परमेश्वर की एकमूर्ति है। (६६)
हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने तुमसे भगवान के इस द्वादशा पत्रक स्यस्प का यर्णन किया जिसमें जानने से पुन मरण
नहीं होता।
उनरा द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी अविनाशी स्वरूप, चतुर्वर्ण, चतुर्मुस, चतुर्याहु ए५ उदार अह्नों से युक्त हैं।(६०)
सहस्र पैरों एवं सहस्र मुखरों से सम्पन्न श्रीसयुक्त तमोगुणमयी उनी तृतीय शेपमूर्ति प्रजाओं का प्रल्य परती है। (६९)
उनका पतुर्थ प रानस है। यह रक्तवर्ण, चार मुस एय दो भुवाओं से सम्पन्न तथा माला से अर ड्यूत है।। यही रूप सटिकत्ता आदिपुरुष है। (७)
हे महामुनि । ये तीन व्यक्त मूत्तियाँ अव्यक्त से उत्पन्न होती हैं। इनसे ही मरीचि आदि ऋपि तथा अन्यान्य हजारों पुरप उत्पन्न हुए हैं। (७२)
हे मुनिर । तुम्हारे सामने मैंने विष्णु के अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टि-बर्द्धक रूप का वर्णन क्यिा। दुरात्मा मुरु यमराज के फहने से पुन उन चतुर्भुज (विष्णु) के (७२)
हे मुनि । मधुसूदन ने आये हुए उससे पूछा-देअसुर।' तुम किस लिए आये हो ? उसने कहा-तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ । असुरारि ने उससे पुन कहा- (७३)
यदि तुम मेरे साथ युद्ध करने आये हो तो ज्वरातुर के सदृश तुम्हारा हदय वारम्वार क्यों कम्पित हो रहा है? अत में कातर पे साथ युद्ध नहीं करूँगा। (७४)
मधुसूदन के ऐसा पहने पर 'कैसे ? कहाँ ? सिका?' ऐसा पार यार कहने हुए नष्ट बुद्धि मुरु ने अपने हृदय पर हाथ रखा।
इसे देसार हरि ने धीरे से चक्र निकालार उस शत्रु के हदय कमल को दिन कर दिया। तदनन्तर सभी देवता दुस रहित होरर भगवान् पद्मनाभ विष्णु की प्रशंसा करने लगे। (७६)
मैंने तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करने याले विष्णु द्वारा युधिपूर्वक किये गए मुर दैत्य के विनाश का वर्णन किया। इसी से विमु नृसिह 'मुरारि' नाम से प्रसिद्ध हु। (७७)