बलि, भय आदि दानवो का देवो से युद्ध कालनेमि का युद्ध, कालनेमि से विष्णु का युद्ध एव कालनेमि का वध

श्रीमान् अपि इस प्रकार शाप देकर अपने आश्रम में गये। तदनन्तर सप्त सरस्थतियों से सात मरुत् उत्पन्न (७५)

हेमति ! पूर्घ काल में अन्तरिक्ष व्यापी मरुद्गण जिस प्रकार उत्पन्न हुए थे उसे मैंने आप से कहा। इन का वर्णन मुनने से पाप का नाश तथा धर्म का महान् अभ्युदय होता है। (७६)

४७

पुन्टम्य ने कहा- पटिप्रिय! इसीलिए पलि देय । पो राजा बनाया गया था। प्रसाद उसफे मन्त्री तथा शुफ पुरोहित थे।

 विरोषन फे पुत्र देश्य पनि पो अभिपिक हुआ जानर मय सहित सभी देरप उसे देखने कीया मे

आये। (२)

अपने पुरुषों को आया देगार (परि ने) यपान हमरी पूजा की एवं उनसे पूछा-मेरे लिए क्या भयार? (२)

उन सभी ने उससे कहा-रे देयमन! तुम्हारे लिए जो भेयरकर तथा हमारे सिप हितायद फर्म है न सुनो।

पलान् पीर दानयपाल दिण्यकशिपु तुम्हारे पितामह थे। ये तीनों लोगों में इन्द्र थे।

सिंदारीरधारी मुर विष्णु ने थायर भेट दानों सम्मुग्य उन्हें ना से विदोर दिया।

देमदापाटु ! तन (देषों) के लिए प्रिनरी हरने महात्मा अधिक चराग्य ले लिया था।

इसी प्रकार ए ने तुम्हारे पिता के माई जम्म

मारा तथा विष्णु ने तुम्हारे सम्मुस कुजम्भ को पशु की तरह मारहाणथा। (८)

शम्भु, पाक और तुम्हारे भाई सुदर्शन को महेन्द्र ने निहत किया था। तुम्हारे पिता विरोचन भी मारे गये थे।

हे वहन् । शम द्वारा किये गये गोरक्षय को सुनकर दानय ने समस्त महान असुरों से युद्ध का उद्योग (१०)

पतिपय अमुर रयों पर, कुछ हाधियों पर, फुल पोदों पर तथा पुछ पैदल ही देयों से युद्ध करने के लिए गये। (११)

सेना के अप्रभाग में भयवर एवं घलयान सेनापति मय चला। सेना ये मध्य में पलि, पृष्ठ मे पाटनेमि, पामभाग में प्रसिद्ध पराक्रमी शास्य तथा दक्षिण पार्थ में मयपूर सारक नामक असुर स्थिन हुआ। (१२-१३)

हे कसिप्रिय (नारद)। हजारों, प्रयुतों एवं अचुदो दानय देषताओं से रहने के लिए प्रयाग किये। (२४) अनु या पुरोधोग मुगार मुरपति पद ने देवताओं से कहा-मोना से युक्त दन दरयों से लाने फेरिए इम मप पलें। (१५)

ऐसा वचन कहकर यख्यान भगवान सुरपति इन्द्र मातलि द्वारा नियन्त्रित अश्वों याले रथ पर समारूढ़ हुए। (१६)

इन्द्र के रथारुद होने पर देवगण अपने-अपने यादनों पर आरूढ़ हो युद्ध की इच्छा से पाहर निकले। (१७)

आदित्य, पसु, रुद्र, साध्य, विधेदेव, अधिनीकुमार, विद्याधर, गुधक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, राजर्पि, सिद्ध तथा नाना प्रकार के भूत समवेत हुए। कुछ हाधियों पर, फुछ रयों पर तथा कुछ घोड़ों पर आस्द (१८-१९)

हे नारद! पतिपय देवगग पक्षियों द्वारा ढोये जाने याले शुध पिमानों पर आरूद होकर यहाँ गये जहाँ दैत्य सेना रिपत थी। (२०)

इसी बीच बुद्धिमान गरड आये। सुरश्रेध विष्णु उस पर आल्द होकर चले। (२१)

सभी देवताओं के साथ शिर पुकार सहसास इन्द्र ने आये हुए प्रैलोक्यपति अश्यय ( विशु) की वन्दना की। (२२)

तदनन्तर फार्तिकेय देय-सेना के अममाग में, गदापर विष्णु सेना के परपार भाग में तथा

सहस्रलोसन इन्द्र मध्यभाग की रक्षा करते हुए चले। (२३)

हे मुनि ! जयन्त घामपार्थ को घेर कर चले एवं घलयान वरुण दक्षिण पार्थ में स्थित होकर चल । (२१) ' तदनन्तर नाना प्रकार के अनशनों को धारण करने पालों से युक्त तथा स्कन्द, विष्णु, परुण एवं सूर्य से पालित देषों की यशस्विनी सेना पर्यत पर शनुसैन्य के निकट पहुँची। (२५)

वृक्ष एवं पक्षियों से रहित उदयाचल के रमणीय, शुभ एवं सम शिलातल पर देवों एवं असुरों का महान् युद्ध हुआ। (२६)

है मुनि! पूर्वगल में जैसा युद्ध शानर एवं हाधियों फे पीच हुआ था येसा ही भयदर संघर्प उन दोनों सेनाओं में हुआ।

हे सुरतापस! प्य से उड़ी हुई युद्ध की पिहल्यण धूलि युर-भूमि के ऊपर आकाश में स्थित सन्ध्याचलीन साल मेघ की तरह प्रतीत होने लगी। (२८)

इस समय हो रहे तुमुटयुद्ध में कुछ भी नहीं मान हो रहा था। सभी ओर निरन्तर 'बाटो' 'मारों का शब्द सुनाई पड़ता था। (२९)

धूलि को शान्त करने याला रधिर-प्रयाह उत्पन्न (३०)

धूलि के शान्त होने पर देवताओं ने बुद्धिमान कार्तिकेय के साथ महान् दानव-दल पर आयमण (३२)

फुमार कार्तिकेय के याहुयल से रक्षित देयताओं ने दैत्यों को मारा तथा मय के द्वारा रक्षित प्रहार परने पाले दैत्यों ने देवताओं को मारा। (३२)

हे नारद ! तदनातर अमृतरस के आस्वाद के बिना सन्द सहित श्रेष्ठ देयगण युद्ध में दैत्यों द्वारा पराजित हो गये। (३३)

देयों यो पराजित हुआ देसर शनुसूदन गरसम्पन शाई धनुप को मुगार चारों तरफ यागों थी वर्ग करने लगे। (३४)

विष्णु द्वारा हमुरस पाणों से मारे जा रहे दैत्य फालनेमि नामक महान् अमुर की शरण में (३५)

हे अझन् ! उन्हे अभय प्रदान कर तथा मापर को अजेय जानकर (यह) उपेशित व्याधि ये सहा पदने या।

यह बलवान जिम देपना, यक्ष या किसर हाथ से

स्पर्श करता उसे लेकर अपने विस्तृत मुख मै फेकने लगा।

यह देत्येन्द्र कालनेमि अखहीन होने पर भी दानवों के साथ मिलकर क्रोध से हाथ, पैर और नस के प्रहार से इन्द्र, सूर्य, चन्द्र सहित देव सेना को वेग से मारने लगा। यह अग्नि तुल्य चरों द्वारा आकाश एव पृथ्वी पर नीचे ऊपर चतुर्दिक प्रहार करने लगा। उस समय उसरा रूप प्रलय काल मे समस्त जगत् को दुग्ध करने की इच्छा वाले अग्नि के सदृश था। (३८)

उस अति पलान् शन को बढते देसर देवता, गन्धर्व, सिद्ध साध्य, अश्विनीकुमार आदि भय से घचल दृष्टि याले होकर चारों ओर भागने लगे। दते हुए दैत्यों ने अस्यन्त गर्वित होकर अमरों से पूजित तथा सुन्दर मुकुट वाले यिष्णु पे सामने जारर विविध शरमानों के आपात से उनके यश को समाप्त कर दिया। (३६)

मय, पलि एय कालनेमि आदि दैत्यों को इस प्रकार देसार विष्णु के नेत्र प्रोध से लाल हो गये। उन्होंने अपनी दृष्टि से रथ, हाथी और पोदों को वीर्यहीन कर दिया एप जैसे भेष आकाश को आच्छादित करने है उसी प्रकार मुन्दर पुखों से युक्त नाराच नामक याणों द्वारा पर्वत को आच्छादित कर दिया । (४०)

विष्णु के हाथों से छोडे गये कालदण्ड तुल्य अर्धचन्द्राकार उन नाराच नामक चाणों से आच्छादित यलि एव मय आदि दैत्यों ने मयमीत होर शीघ्रता से पहले दानवेन्द्र शतमुस कालनेमि को प्रेपित किया। वह देव सेनाधिप अति घलपान लोकनाथ केशव के सम्मुख गया। (४१)

गदा उठाये हुये सौ शिर पाले पर्यंतशृङ्ग के सदृश कालनेमि को देखकर विष्णु ने शाई धनुप को छोदारहाथ में शीघ्र ही चक्र को लिया। इनको देसार यहुत देर तक जोर से हँसते हुए मेव के समान शब्द पाले उस दानय ने दैत्यरूपी वृक्षों के नाशक मनायी हरि से पहा- (४२)

यही दानव सेना को प्रस्त करने वाला शत्रु, अत्यन क्रोधी, मधु को मारने वाला, हिरण्याक्ष का नाशक तथा पुष्पों द्वारा की गई पूजा से प्रसन्न होने वाला है यह सल मेरी ऑसों के सामने आ कर अब कहाँ जाता है। (४३)

यह फमलाक्ष (विष्णु) यदि इस समय मेरे साथ युद्ध फरे तो अपने घर नहीं जायेगा और देवता भयातर नेत्र से मेरी मुट्ठी में पिसार शिथिल आहों याने इस (विष्णु) को धूलिधूसरित देखेंगे। (४४)