कूर्म महा पुराण
3 अध्याय
आश्रमधर्मका वर्णन, संन्यास ग्रहण करनेका क्रम, ब्रह्मार्पणका
लक्षण तथा निष्कामकर्मयोगकी महिमा
ऋषय ऊचुः
वर्णा भगवतोद्दिष्टाश्चत्वारोऽप्याश्रमास्तथा।
इदानीं क्रममस्माकमाश्रमाणां वद प्रभो॥१॥
ऋषियों ने कहा-प्रभो! आपने चारों वर्गों तथा चारों आश्रमों का वर्णन किया। अब हमें आश्रमों का क्रम बतलायें ॥१॥
श्रीकूर्म उवाच
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
क्रमेणैवाश्रमाः प्रोक्ताः कारणादन्यथा भवेत्॥२॥
श्रीकूर्म बोले-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास-ये क्रमसे आश्रम कहे गये हैं। किसी कारण से (इस क्रममें) परिवर्तन भी होता है ॥२॥
उत्पत्रज्ञानविज्ञानो वैराग्यं परमं गतः ।
प्रव्रजेद् ब्रह्मचर्यात् तु यदीच्छेत् परमां गतिम्॥३॥
दारानाहृत्य विधिवदन्यथा विविधैर्मखैः।
यजेदुत्पादयेत् पुत्रान् विरक्तो यदि संन्यसेत्॥४॥
जो ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न हो तथा परम वैराग्य को प्राप्त हो गया हो ऐसा ब्रह्मचारी यदि परमगति को प्राप्त करना चाहे तो वह ब्रह्मचर्य-आश्रमसे (सीधे) संन्यास ग्रहण कर ले। इसके विपरीत (अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रम से सीधे संन्यास न ग्रहण कर) विधिपूर्वक स्त्रीसे विवाह कर विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए पुत्रोंको उत्पन्न करे और विरक्त होनेपर संन्यास ग्रहण करे ॥३-४॥
अनिष्ट्वा विधिवद् यज्ञैरनुत्पाद्य तथात्मजम्।
न गार्हस्थ्यं गृही त्यक्त्वा संन्यसेद् बुद्धिमान् द्विजः॥५॥
अथ वैराग्यवेगेन स्थातुं नोत्सहते गृहे।
तत्रैव संन्यसेद् विद्वाननिष्ट्वापि द्विजोत्तमः॥६॥
बुद्धिमान् गृहस्थ द्विजको चाहिये कि वह विधिपूर्वक यज्ञों का अनुष्ठान तथा पुत्रोंको उत्पन्न किये बिना गृहस्थ-आश्रम का परित्यागकर संन्यास ग्रहण न करे। श्रेष्ठ विद्वान् द्विज यदि तीव्र वैराग्यके वेगके कारण गृहस्थाश्रम में रहनेके लिये उत्सुक न हो तो यज्ञ किये बिना भी वहीं संन्यास ग्रहण कर ले॥५-६॥
अन्यथा विविधैर्यज्ञैरिष्ट्वा वनमथाश्रयेत्।
तपस्तप्त्वा तपोयोगाद् विरक्तः संन्यसेद् यदि॥७॥
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा न गृहं प्रविशेत् पुनः।
न संन्यासी वनं चाथ ब्रह्मचर्यं न साधकः॥८॥
अन्यथा विविध यज्ञोंका सम्पादन कर वनका आश्रय लेना चाहिये एवं तपोयोगद्वारा तप करनेके बाद यदि विराग हो जाय तो संन्यास लेना चाहिये। वानप्रस्थ-आश्रम ग्रहण कर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश नहीं करना चाहिये, न संन्यासी वानप्रस्थ-आश्रममें वापस आये और न साधक गृहस्थ ब्रह्मचर्याश्रममें वापस लौटे ॥७-८॥
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा द्विजः।
प्रव्रजेत गृही विद्वान् वनाद् वा श्रुतिचोदनात्॥९॥
प्रकर्तुमसमर्थोऽपि जुहोतियजतिक्रियाः।
अन्धः पंगुर्दरिद्रो वा विरक्तः संन्यसेद् द्विजः॥१०॥
सर्वेषामेव वैराग्यं संन्यासाय विधीयते।
पतत्येवाविरक्तो यः संन्यासं कर्तुमिच्छति॥११॥
विद्वान् गृहस्थ द्विज प्राजापत्य इष्टि अथवा आग्नेयी इष्टिका सम्पादन कर संन्यास ग्रहण करे या वैदिक विधानसे वानप्रस्थसे (संन्यास-आश्रममें) प्रवेश करे। हवन तथा यज्ञ-सम्बन्धी क्रियाओंको करनेमें असमर्थ होनेपर भी अन्धा, लँगड़ा अथवा दरिद्र द्विज वैराग्य होनेपर संन्यास ग्रहण करे। सभीके लिये संन्यास के निमित्त वैराग्यका विधान किया गया है। जो आसक्तियुक्त पुरुष संन्यास-आश्रम ग्रहण करना चाहता है वह अवश्य ही पतित हो जाता है ॥९-११॥
एकस्मिन्नथवा सम्यग् वर्तेतामरणं द्विजः।
श्रद्धावानाश्रमे युक्तः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१२॥
न्यायागतधनः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः।
स्वधर्मपालको नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१३॥
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि निःसंग: कामवर्जितः।
प्रसन्नेनैव मनसा कुर्वाणो याति तत्पदम्॥१४॥
अथवा निष्ठावान् द्विजको चाहिये कि किसी भी एक आश्रममें वह यावज्जीवन ठीक-ठीक व्यवहार करता रहे तो मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। न्यायमार्ग (ईमानदारी)-से धन प्राप्त करनेवाला, शान्त, ब्रह्म-विद्यापरायण तथा नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। अपने समस्त कर्मोको ब्रह्ममें अर्पित कर आसक्तिरहित तथा निष्काम व्यक्ति प्रसन्न-मनसे कर्मोंको करते हुए उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है । १२-१४॥
ब्रह्मणा दीयते देयं ब्रह्मणे सम्प्रदीयते।
ब्रह्मैव दीयते चेति ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥१५॥
नाहं कर्ता सर्वमेतद् ब्रह्मैव कुरुते तथा।
एतद् ब्रह्मार्पणं प्रोक्तमृषिभिः तत्त्वदर्शिभिः॥१६॥
प्रीणातु भगवानीशः कर्मणानेन शाश्वतः।
करोति सततं बुद्ध्या ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥१७॥
यद्वा फलानां संन्यासं प्रकुर्यात् परमेश्वरे।
कर्मणामेतदप्याहुः ब्रह्मार्पणमनुत्तमम्॥१८॥
देने योग्य पदार्थ ब्रह्मके द्वारा ही प्राप्त होता है, ब्रह्म को ही दिया जाता है और ब्रह्म ही दिया भी जाता है-यही श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण (-की भावना) है। मैं कर्ता अर्थात् करनेवाला नहीं हूँ और जो कुछ भी किया जाता है वह ब्रह्म ही करता है-इसे तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने 'ब्रह्मार्पण' नाम से कहा है। 'मेरे इस कर्मसे सनातन भगवान् ईश्वर प्रसन्न हों' इस प्रकारकी बुद्धिसे निरन्तर किया गया कर्म श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण है। अथवा परमेश्वरमें सभी कर्मोंके फलोंका संन्यास करे-यह भी श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण कहा गया है ॥ १५-१८॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं संगवर्जितम्।
क्रियते विदुषा कर्म तद्भवेदपि मोक्षदम्॥१९॥
अन्यथा यदि कर्माणि कुर्यान्नित्यमपि द्विजः।
अकृत्वा फलसंन्यासं बध्यते तत्फलेन तु॥२०॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन त्यक्त्वा कर्माश्रितं फलम्।
अविद्वानपि कुर्वीत कर्माप्नोत्यचिरात् पदम्॥२१॥
कर्मणा क्षीयते पापमैहिकं पौर्विकं तथा।
मनः प्रसादमन्वेति ब्रह्म विज्ञायते ततः॥२२॥
विद्वान् व्यक्तिके द्वारा आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-बुद्धि से जो कर्म नियमतः किया जाता है, उसका वह कर्म भी मोक्ष देनेवाला होता है। इसके विपरीत यदि द्विज नित्य कर्मोको करता भी रहे तो कर्मफल का संन्यास न करने के कारण वह उस कर्मफलके बन्धन से बँधा रहता है। इसलिये अविद्वान् व्यक्तिको भी चाहिये कि सभी प्रकारके प्रयत्नसे कर्मके आश्रित फलका त्यागकर कर्म करता रहे, इससे उसे शीघ्र ही (परम) पद प्राप्त होता है। (निष्काम) कर्म से व्यक्ति के इस जन्म तथा पूर्व-जन्म का पाप नष्ट हो जाता है, तदनन्तर चित्तकी प्रसन्नता प्राप्त होती है और फिर (उसे) ब्रह्म का परिज्ञान हो जाता है। १९-२२॥
कर्मणा सहिताज्ज्ञानात् सम्यग् योगोऽभिजायते।
ज्ञानं च कर्मसहितं जायते दोषवर्जितम्॥ २३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र तत्राश्रमे रतः।
कर्माणीश्वरतुष्ट्यर्थं कुर्यान्नैष्कर्म्यमाप्नुयात्॥ २४॥
सम्प्राप्य परमं ज्ञानं नैष्कर्म्यं तत्प्रसादतः।
एकाकी निर्ममः शान्तो जीवन्नेव विमुच्यते॥२५॥
कर्मयुक्त ज्ञानसे सम्यक् योगकी प्राप्ति होती है और कर्मयुक्त ज्ञान दोषरहित होता है। इसलिये किसी भी आश्रममें रहते हुए सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे भगवान्की प्रसन्नता के लिये कर्मो को करता रहे। (इससे) नैष्कर्म्य की प्राप्ति हो जाती है। परम ज्ञान को प्राप्त करने के अनन्तर उसके प्रभावसे नैष्कर्म्यकी सिद्धि कर वह एकाकी, ममता शून्य तथा शान्त (व्यक्ति) जीवनकालमें ही मुक्तिको प्राप्त कर लेता है अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ २३-२५॥
वीक्षते परमात्मानं परं ब्रह्म महेश्वरम्।
नित्यानन्दं निराभासं तस्मिन्नेव लयं व्रजेत्॥२६॥
तस्मात् सेवेत सततं कर्मयोगं प्रसन्नधीः ।
तृप्तये परमेशस्य तत् पदं याति शाश्वतम् ॥ २७॥
(ऐसा व्यक्ति) नित्यानन्दस्वरूप, निराभास (स्वतः-प्रकाश), महेश्वर, परम ब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर उसीमें लीन हो जाता है। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर परमेश्वर की संतुष्टिके लिये निरन्तर कर्मयोग का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। (इससे वह परमेश्वर के) उस सनातन पद को प्राप्त करता है॥ २६-२७॥
एतद् वः कथितं सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।
न ह्येतत् समतिक्रम्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥२८॥
इस प्रकार आप लोगों को यह चारों आश्रमों का सम्पूर्ण श्रेष्ठ क्रम बतलाया। इस क्रमका अतिक्रमण करके कोई भी मनुष्य सिद्धिको प्राप्त नहीं कर सकता ॥२८॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे तृतीयोऽध्यायः॥३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३ ॥
Summary of chapter 3 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Kūrma clarifies the sequential progression of the four Āshramas and the rare exception where direct Saṁnyāsa may be embraced from Brahmacharya upon attaining intense Vairāgya. A spiritual seeker must discharge the three debts owed to Devas, Ṛshis, and Pitṛs through righteous Yajñas, progeny, and Vedic study before renouncing family life, unless unattached dispassion dawns prematurely. The chapter outlines specific subdivisions within each Āshrama: Udāsīna and Sādhaka among householders, Ascetic-Hermits among Vānaprasthas, and Pārameshṭhika, Veda, Karma, and Jñāna Saṁnyāsins, alongside Bhautika, Sāṁkhya, and Āshrama Yogins. Bhagavān stresses that all actions performed with the spirit of Brahmārpaṇa, surrendering fruits to Parameshvara without egoism, purify the mind and cleanse past accumulated sins. Such selfless action combined with Jñāna grants the divine grace of Mahādeva, conferring Jīvanmukti and ultimate absorption into the imperishable Supreme Being.