कूर्म महा पुराण
3 अध्याय
अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष
एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण
ईश्वर उवाच
अव्यक्तादभवत् कालः प्रधानं पुरुषः परः।
तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥१॥
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२॥
ईश्वरने कहा- -अव्यक्त (तत्त्व)-से काल, प्रधान तथा परम पुरुष उत्पन्न हुए। उन (कालादि)-से यह समस्त जगत् उत्पन्न हुआ, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है। जिसके हाथ और पैरका प्रसार सर्वत्र है, जिसके नेत्र, मस्तक, मुख एवं कर्ण सर्वत्र वर्तमान हैं एवं जो समस्त (विश्व)-को आवृतकर स्थित है, वही (ब्रह्म) है॥ १-२॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
सर्वाधारं सदानन्दमव्यक्तं द्वैतवर्जितम्॥३॥
सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम्।
निर्विकल्पं निराभासं सर्वावासं परामृतम्॥४॥
अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।
निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः॥५॥
वह सभी इन्द्रियोंके गुणोंके आभासवाला है, अर्थात् सभी इन्द्रियोंके गुण उसमें प्रतीत होते हैं; किंतु सभी इन्द्रियोंसे रहित है। वह सभीका आधार है, सदा आनन्दस्वरूप, अव्यक्त और द्वैतसे रहित (अद्वैत तत्त्व) है। वह सभी उपमानोंसे रहित (निरुपमेय) इन्द्रियोंद्वारा प्रमाणोंसे ज्ञात न होने योग्य, निर्विकल्प, निराभास, सभीका आश्रय, परम अमृतस्वरूप, अभिन्न, भिन्न रूप से स्थित (प्रतीत), शाश्वत, ध्रुव, अव्यय, निर्गुण और परम व्योमरूप है, उसे विद्वान् लोग जानते हैं॥३-५॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यन्तरः परः।
सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः॥६॥
मया ततमिदं विश्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित्॥७॥
प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम्।
तयोरनादिरुद्दिष्टः कालः संयोजकः परः॥८॥
वह सभी प्राणियोंका आत्मा है, वह बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला परम तत्त्व है। मैं (भी) वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ। मुझ अव्यक्त स्वरूपवाले के द्वारा ही इस विश्वका विस्तार हुआ है। सभी प्राणी मुझमें ही अवस्थित हैं, जो उसे जानता है, वह वेदज्ञ है प्रधान और पुरुष-ये ही दो तत्त्व कहे गये हैं। अनादि उत्कृष्ट काल को ही उन दोनोंका परम संयोजक कहा गया है॥६-८॥
त्रयमेतदनाद्यन्तमव्यक्ते समवस्थितम्।
तदात्मकं तदन्यत् स्यात् तद्रूपं मामकं विदुः॥ ९ ॥
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत्।
या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥१०॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान्।
अहंकारविमुक्तत्वात् प्रोच्यते पञ्चविंशकः ॥११॥
(प्रधान, पुरुष और काल-)ये तीनों तत्त्व अनादि, अन्तरहित, अव्यक्त (परम तत्त्व)-में स्थित हैं। वह (परम तत्त्व) तदात्मक (प्रधान आदिका प्रेरक होते हुए भी) तद्भिन्न (उनसे सर्वथा असंस्पृष्ट) है, वह (परम तत्त्व) मेरा ही रूप है, यह विद्वान् लोग ही जानते हैं। जो महत् (तत्त्व)-से लेकर विशेषपर्यन्त समस्त संसारको उत्पन्न करती है, वह सभी देहधारियों को मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। जो प्रकृतिस्थ होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है, वह पुरुष है। अहंकार (अहं-तत्त्व)-से विमुक्त होनेके कारण वह पुरुष पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है॥९-११॥
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते।
विज्ञानशक्तिर्विज्ञाता ह्यहंकारस्तदुत्थितः ॥१२॥
एक एव महानात्मा सोऽहंकारोऽभिधीयते।
सजीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः ।।१३॥
प्रकृतिके प्रथम विकारको महान् आत्मा (महत्तत्त्व) कहते हैं। उस विज्ञानशक्तिसे सम्पन्न विज्ञाता ('अहम्' अर्थात् अभिमानका मूल कारण) अहंकार उत्पन्न होता है। वही एक महान्* आत्मा 'अहंकार' कहलाता है। तत्त्वचिन्तकोंके द्वारा वह 'जीव' तथा 'अन्तरात्मा' इस नामसे कहा गया है। १२-१३॥
तेन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु।
स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम्॥१४॥
तेनाविवेकतस्तस्मात् संसारः पुरुषस्य तु।
सचाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात् कालेन सोऽभवत्॥१५॥
कालः सृज भूतानि कालः संहरति प्रजाः ।
सर्वेकालस्य वशगान कालः कस्यचिद्द्वशे॥१६॥
जीवनमें उसीके द्वारा सुख एवं दु:ख आदि सभी का अनुभव होता है। वह विज्ञानस्वरूप (विविध सांसारिक ज्ञानका मूल) है। उस (अहंकार)-का उपकारक मन है। उससे अविवेक उत्पन्न होता है और फिर उस अविवेकसे पुरुषका संसार बनता है। प्रकृति से काल का सम्पर्क होनेसे वह अविवेक उत्पन्न होता है। काल ही प्राणियोंकी सृष्टि करता है और काल ही प्रजाओं का संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं, काल किसी के वशमें नहीं है॥१४-१६॥
सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः।
प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषोत्तमः ॥१७॥
सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मन आहुर्मनीषिणः।
मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः॥१८॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुषाद् भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्॥१९॥
प्राणात् परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः।
सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।
नास्ति मत्तः परं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते॥२०॥
वह सनातन (काल) अन्तःप्रविष्ट होकर इस सम्पूर्ण (विश्व)-का नियमन करता है। इस कालको भगवान्, प्राण, सर्वज्ञ तथा पुरुषोत्तम कहा जाता है। मनीषियों ने मनको सभी इन्द्रियोंसे उत्कृष्ट एवं मनसे अधिक उत्कृष्ट अहंकारको और अहंकारसे उत्कृष्ट महान्को (महत्तत्त्व) बतलाया है। महत्से उत्कृष्ट अव्यक्त, अव्यक्तसे उत्कृष्ट पुरुष तथा पुरुषसे उत्कृष्ट भगवान् प्राण हैं। यह सम्पूर्ण संसार उसीसे है। प्राणसे परतर व्योम है और व्योम से अतीत अग्नि ईश्वर है। मैं वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हूँ। मुझसे उत्कृष्ट और कोई तत्त्व नहीं है। मुझे जान लेनेसे मुक्ति हो जाती है। १७–२० ॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम्॥२१॥
सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत्।
मायी मायामयो देवः कालेन सह सङ्गतः ॥२२॥
मत्संनिधावेष काल: करोति सकलं जगत्।
नियोजयत्यनन्तात्मा ह्येतद् वेदानुशासनम्॥ २३॥
इस संसारमें एकमात्र मुझ अव्यक्त, व्योमरूप महेश्वरको छोड़कर कोई भी स्थावर-जंगमात्मक तत्त्व नित्य नहीं है अर्थात् महेश्वरको छोड़कर सब कुछ अनित्य है। वही मैं मायावी तथा मायामय देव काल के संसर्गसे सम्पूर्ण (संसार)-की सदा सृष्टि करता हूँ और (फिर) संहार करता हूँ। मेरे सांनिध्यमें ही यह काल (तत्त्व) सम्पूर्ण जगत्की (सृष्टि) करता है। वेदका यह कथन है कि अनन्तात्मा ही उस (काल) को (इस कार्यमें) नियोजित करता है॥ २१-२३॥
Summary of chapter 52 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta explains how in every Dvāparayuga, Bhagavān Nārāyaṇa incarnates in the form of Maharshi Kṛshṇa-Dvaipāyana Vyāsa to divide the single eternal Veda into four collections—Ṛgveda, Yajurveda, Sāmaveda, and Atharvaveda—to suit the diminishing mental capacities of human beings. Vyāsa imparted the Ṛgveda to Paila, Yajurveda to Vaishampāyana, Sāmaveda to Jaimini, and Atharvaveda to Sumantu, while entrusting the Itihāsa and Purāṇas to Sūta Lomaharshaṇa.