43 अध्याय

चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन,

विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण

सूत उवाच

एतदाकर्ण्य विज्ञानं नारायणमुखेरितम्।

कूर्मरूपधरं देवं पप्रच्छुर्मुनयः प्रभुम्॥१॥

सूतजीने कहा-नारायणके मुखसे कहे गये इस विशिष्ट ज्ञानको सुनकर मुनियोंने कूर्मरूप धारण करनेवाले प्रभु देवसे पूछा- ॥१॥

मुनय ऊचुः

कथिता भवता धर्मा मोक्षज्ञानं सविस्तरम्।

लोकानां सर्गविस्तारं वंशमन्वन्तराणि च ॥२॥

प्रतिसर्गमिदानीं नो वक्तुमर्हसि माधव।

भूतानां भूतभव्येश यथा पूर्वं त्वयोदितम्॥३॥

मुनियोंने कहा-(सूतजी!) आपने विस्तारपूर्वक धर्म, मोक्ष, ज्ञान, लोकोंकी सृष्टिके विस्तार, वंश और मन्वन्तरोंको हमें बतलाया। माधव! भूतभव्येश! जैसा आपने पूर्वमें (पुराण-लक्षणके प्रसंगसे प्रतिसर्गके विषयमें) बतलाया है, तदनुसार अब हमें प्राणियोंके प्रतिसर्ग के विषयमें बतलायें ॥ २-३॥

सूत उवाच

श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् कूर्मरूपधृक् ।

व्याजहार महायोगी भूतानां प्रतिसंचरम्॥४॥

सूतजीने कहा-तब उनके उस वचनको सुनकर कूर्मरूपधारी महायोगी भगवान्ने भूतोंके प्रतिसंचर अर्थात् प्रलयका वर्णन किया॥४॥

कूर्म उवाच

नित्यो नैमित्तिकश्चैव प्राकृतात्यन्तिकौ तथा।

चतुर्धायं पुराणेऽस्मिन् प्रोच्यते प्रतिसंचरः॥५॥

योऽयं संदृश्यते नित्यं लोके भूतक्षयस्त्विह।

नित्यः संकीर्त्यते नाना मुनिभिः प्रतिसंचरः॥६॥

ब्राह्मो नैमित्तिको नाम कल्पान्ते यो भविष्यति।

त्रैलोक्यस्यास्य कथितः प्रतिस! मनीषिभिः॥७॥

महदाद्यं विशेषान्तं यदा संयाति संक्षयम्।

प्राकृतः प्रतिसर्गोऽयं प्रोच्यते कालचिन्तकैः॥८॥

ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।

प्रलयः प्रतिसर्गोऽयं कालचिन्तापरैर्द्विजैः॥९॥

कूर्म बोले-इस पुराणमें नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत तथा आत्यन्तिक-इस प्रकारसे चार प्रकारका प्रतिसंचर (प्रलय) कहा गया है। लोकमें यहाँ जो प्राणियोंका नित्य क्षय दिखलायी देता है, उसे मुनियोंने नित्य-प्रलय के नामसे कहा है। कल्पान्तमें ब्रह्मा (की निद्रा) के निमित्तसे होनेवाले तीनों लोकोंके प्रतिसर्ग-प्रलय को विद्वानोंने (नैमित्तिक प्रलय) कहा है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका जो क्षय हो जाता है, उसे कालचिन्तकोंने प्राकृत प्रतिसर्ग कहा है और ज्ञानद्वारा परमात्मामें होनेवाले योगियोंके आत्यन्तिक प्रलयको* कालचिन्तक द्विज आत्यन्तिक प्रतिसर्ग (प्रलय) कहते हैं॥५-९॥

आत्यन्तिकश्च कथितः प्रलयोऽत्र ससाधनः।

नैमित्तिकमिदानी वः कथयिष्ये समासतः ॥१०॥

यहाँ साधनसहित आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्ष का वर्णन किया गया है। अब मैं संक्षेपमें आप लोगों को नैमित्तिक प्रलयके विषयमें बतलाऊँगा॥१०॥

चतुर्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।

स्वात्मसंस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रतिपेदे प्रजापतिः॥११॥

ततो भवत्यनावृष्टिस्तीवा सा शतवार्षिकी।

भूतक्षयकरी घोरा सर्वभूतक्षयंकरी॥१२॥

ततो यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले।

तानि चाने प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥१३॥

सप्तरश्मिरथो भूत्वा समुत्तिष्ठन् दिवाकरः ।

असारश्मिर्भवति पिबन्नम्भो गभस्तिभिः॥१४॥

तस्य ते रश्मयः सप्त पिबन्त्यम्बु महार्णवे।

तेनाहारेण ता दीप्ताः सूर्याः सप्त भवन्त्युत॥१५॥

ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्या भूत्वा चतुर्दिशम्।

चतुलॊकमिदं सर्वं दहन्ति शिखिनस्तथा॥१६॥

एक हजार चतुर्युग (सत्य-त्रेता-द्वापर तथा कलियुग)-के अन्तमें प्रलयकाल उपस्थित होने पर प्रजापति समस्त प्रजाको आत्मस्थ करनेकी इच्छा करते हैं। इसके बाद सौ वर्षोंतक तीव्र अनावृष्टि होती है, वह भूतों एवं सभी प्राणियोंका विनाश करनेवाली तथा अत्यन्त भयंकर होती है। तदनन्तर भूमिपर जो अल्पसार अर्थात् निर्बल प्राणी होते हैं, सबसे पहले उनका लय होता है और वे भूमिमें मिल जाते हैं। तब सात रश्मियोंवाले रथपर आरूढ़ होकर सूर्य उदित होते हैं। उनकी किरणें असह्य हो जाती हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जल पीने लगते हैं। उनकी वे सातों रश्मियाँ महासमुद्रमें स्थित जलको पीती हैं। उस आहारसे उद्दीप्त होकर वे (सात) रश्मियाँ पुन: सात सूर्य बन जाती हैं। तदनन्तर सूर्यरूप वे सातों रश्मियाँ चारों दिशाओं तथा सम्पूर्ण इस चतुर्लोकको अग्निके समान दग्ध करने लगती हैं ॥११-१६॥

व्याप्नुवन्तश्च ते विप्रास्तूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः।

दीप्यन्ते भास्कराः सप्त युगान्ताग्निप्रतापिनः॥१७॥

ते सूर्या वारिणा दीप्ता बहुसाहस्ररश्मयः।

खं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम्॥१८॥

ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुंधरा।

साद्रिनद्यर्णवद्वीपा निस्नेहा समपद्यत॥१९॥

दीप्ताभिः संतताभिश्च रश्मिभिर्वै समन्ततः।

अधश्चोर्ध्वंच लग्नाभिस्तिर्यक् चैव समावृतम्॥२०॥

ब्राह्मणो! प्रलयकालीन अग्निके तेजसे युक्त वे सातों सूर्य अपनी-अपनी रश्मियोंके द्वारा ऊर्ध्व तथा अधोभाग को व्याप्तकर अतिशय उद्दीप्त हो जाते हैं। जलसे प्रदीप्त अनेक सहस्र रश्मियोंवाले वे सूर्य आकाशको आवृतकर स्थित रहते हैं और पृथिवीको जलाने लगते हैं। तदनन्तर उनके तेजसे जलती हुई पृथ्वी पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपोंके साथ स्नेह (द्रवभाव)-से रहित हो जाती है अर्थात् अत्यन्त सूख जाती है। सतत प्रदीप्त रहनेवाली वे रश्मियाँ ऊपर-नीचे तथा आड़े-तिरछे सभी ओर व्याप्त हो जाती हैं ॥ १७-२०॥

सूर्याग्निना प्रमृष्टानां संसृष्टानां परस्परम्।

एकत्वमुपयातानामेकज्वालं भवत्युत॥२१॥

सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वा सुकुण्डली।

चतुलॊकमिदं सर्वं निर्दहत्यात्मतेजसा ॥२२॥

सूर्यरूप अग्निके द्वारा प्रकृष्टरूपसे शोधित और परस्पर संसृष्ट संसारके समस्त पदार्थ एक ज्वालाके रूपमें एकाकार हो जाते हैं। सभी लोकोंको नष्ट करनेवाली वह सूर्यरूप अग्नि एक मण्डलके रूप में होकर अपने तेजसे इस सम्पूर्ण चतुर्लोकको दग्ध करने लगती है॥२१-२२॥

ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा।

निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठा प्रकाशते॥ २३ ॥

अम्बरीषमिवाभाति सर्वमापूरितं जगत्।

सर्वमेव तदर्चिभिः पूर्ण जाज्वल्यते पुनः॥२४॥

तब सम्पूर्ण स्थावर एवं जंगम पदार्थों के लीन हो जानेपर वृक्षों तथा तृणोंसे रहित भूमि कछुएके पीठ के समान दिखलायी देती है। (किरणोंसे) व्याप्त समस्त जगत् अम्बरीष (भड़-भूजेकी कड़ाही)-के सदृश वर्णवाला दिखलायी देता है। उन ज्वालाओंके द्वारा सभी कुछ पूर्णरूपसे प्रज्वलित होने लगता है॥ २३-२४॥

पाताले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च।

ततस्तानि प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥२५॥

द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधीन्।

तान् सर्वान् भस्मसात् कृत्वा सप्तात्मा पावकः प्रभुः ॥२६॥

समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः।

पिबन्नपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन्॥ २७॥

तदनन्तर पातालमें तथा महासमुद्रोंमें जो प्राणी रहते हैं, उनका लय होता है और वे सभी भूमि के रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं। सात (सूर्यो)-के रूप में प्रदीप्त हो रहे प्रभु पावक (अग्निदेव) उन सभी द्वीपों, पर्वतों, वर्षों तथा महासमुद्रोंको भस्मसात् कर देते हैं। समुद्रों, नदियों तथा पातालोंके सम्पूर्ण जल का शोषण करती हुई प्रदीप्त अग्नि (सूर्यकी ज्वाला) पृथ्वीपर प्रज्वलित होने लगती है अर्थात् पृथ्वी को जलाने लगती है ॥ २५-२७॥

ततः संवर्तकः शैलानतिक्रम्य महांस्तथा।

लोकान् दहति दीप्तात्मा रुद्रतेजोविजृम्भितः ।। २८॥

स दग्ध्वा पृथिवीं देवो रसातलमशोषयत्।

अधस्तात् पृथिवीं दग्ध्वा दिवमूर्ध्वं दहिष्यति॥२९ ।।

योजनानां शतानीह सहस्राण्ययुतानि च।

उत्तिष्ठन्ति शिखास्तस्य वह्नः संवर्तकस्य तु॥३०॥

तदनन्तर महान् संवर्तक नामक अग्नि पर्वतों का अतिक्रमण करते हुए रुद्रके तेजसे पुष्ट होनेके कारण दीप्त आत्मावाला होकर लोकोंको जलाने लगती है। (सम्पूर्ण) पृथ्वीको दग्धकर वे अग्निदेव रसातल को शोषित करते हैं। पृथ्वीके नीचेके भागको जलाकर ऊपरके धुलोकको जलाने लगते हैं। उस संवर्तक अग्निकी शिखाएँ सैकड़ों, हजारों तथा दस हजार योजन ऊपरतक उठने लगती हैं ॥ २८-३०॥

गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च सयक्षोरगराक्षसान्।

तदा दहत्यसौ दीप्तः कालरुद्रप्रचोदितः॥३१॥

भूलॊकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च तथा महः ।

दहेदशेष कालाग्नि: कालो विश्वतनुः स्वयम्॥३२॥

व्याप्तेष्वेतेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना।

तत् तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः।

अयोगुडनिभं सर्वं तदा चैकं प्रकाशते॥ ३३॥

तब कालरुद्रद्वारा प्रेरित होकर यह उद्दीप्त अग्नि गन्धर्वो, पिशाचों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंको जलाती है। कालाग्निस्वरूप विश्वात्मा स्वयं काल भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोकको सम्पूर्णरूपसे जला देता है। इन लोकोंमें तिरछे तथा ऊँचे सब जगह अग्नि के द्वारा व्याप्त कर दिये जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् उस तेजसे धीरे-धीरे पूरित होकर (जलते हुए) एक अय:पिण्ड (लोहपिण्ड)-के समान प्रकाशित होने लगता है॥३१-३३॥

ततो गजकुलोन्नादास्तडिद्भिः समलंकृताः।

उत्तिष्ठन्ति तदा व्योम्नि घोराः संवर्तका घनाः॥३४॥

तदनन्तर हाथियोंके समूहके समान नाद करनेवाले विद्युत्से अलंकृत संवर्तक नामक भयंकर मेघ आकाश में प्रकट होते हैं॥३४॥

केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः।

धूम्रवर्णास्तथा केचित् केचित् पीताः पयोधराः॥३५॥

केचिद् रासभवर्णास्तु लाक्षारसनिभास्तथा।

शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे॥३६॥

मनःशिलाभास्त्वन्ये च कपोतसदृशाः परे।

इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा।

इन्द्रचापनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ति घना दिवि ॥३७॥

उन मेघोंमेंसे कुछ नीलकमलके समान श्यामवर्णके, कुछ कुमुदके समान श्वेत वर्णके, कुछ धूम्रवर्णके, कुछ पीतवर्णके, कुछ रासभ (धूसर) वर्णके, कुछ लाक्षारस के समान, कुछ दूसरे शंख तथा कुन्द (पुष्प)-के समान रंगवाले, कुछ जाती पुष्प (चमेली)-के तथा अञ्जन (काजल)-के समान, कुछ मनःशिला (मैनसिल)-के समान रंगवाले और कुछ दूसरे कपोतके समान वर्णवाले, कुछ इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)-के समान, कुछ हरतालके समान और कुछ इन्द्रधनुषके समान वर्णवाले मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं॥३५-३७॥

केचित् पर्वतसंकाशा: केचिद् गजकुलोपमाः।

कूटाङ्गारनिभाश्चान्ये केचिन्मीनकुलोद्वहाः।

बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥ ३८॥

तदा जलधराः सर्वे पूरयन्ति नभःस्थलम्।

ततस्ते जलदा घोरा राविणो भास्करात्मजाः।

सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयन्त्युत॥३९॥

कुछ मेघ पर्वतके तुल्य, कुछ हाथियोंके समूहके समान, कुछ कूटाङ्गारके समान और कुछ मछलियोंके समूहके आकारके होते हैं। वे मेघ अनेक रूप धारण करनेवाले, भयंकर आकारवाले तथा घोर गर्जना-जैसी ध्वनि करनेवाले होते हैं। उस समय वे सभी बादल आकाशको व्याप्त कर लेते हैं, तदनन्तर भास्करसे उत्पन्न गर्जना करनेवाले वे सात प्रकारके भयंकर बादल एकत्रित होकर उस अग्निको शान्त करते हैं ॥ ३८-३९ ।।

ततस्ते जलदा वर्षं मुञ्चन्तीह महौघवत्।

सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम्॥ ४०॥

प्रवृष्टे च तदात्यर्थमम्भसा पूर्यते जगत्।

अद्भिस्तेजोऽभिभूतत्वात् तदाग्निः प्रविशत्यपः ॥४१॥

तदुपरान्त वे मेघ महान् बाढ़के समान जलकी वर्षा करते हैं और अत्यन्त भयंकर, अकल्याणकारी उस सम्पूर्ण अग्निको नष्ट कर देते हैं। अतिशय वृष्टि होनेके कारण जगत् जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जलके द्वारा तेज (अग्नि)-के अभिभूत होनेके कारण उस समय वह अग्नि जलमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४०-४१॥

नष्टे चाग्नौ वर्षशतैः पयोदाः क्षयसम्भवाः ।

प्लावयन्तोऽथ भुवनं महाजलपरिस्रवैः॥ ४२ ॥

धाराभिः पूरयन्तीदं चोद्यमानाः स्वयम्भुवा।

अत्यन्तसलिलौघैश्च वेला इव महोदधिः॥४३॥

इस तरह अग्निके शान्त हो जानेपर स्वयम्भू- ब्रह्माके द्वारा प्रेरित मेघ अत्यधिक जलके प्रवाहों से समस्त भुवनको आप्लावित करते हुए वैसे ही अपनी जलधाराओंसे इस भुवनको परिपूर्ण कर देते हैं, जैसे समुद्र अत्यधिक जलोंके प्रवाहोंसे अपने तटोंको आप्लावित कर देता है। ये मेघ इतने जलसे भरपूर हैं कि इनका क्षय दिव्य सैकड़ों वर्षों में कदाचित् सम्भव है। ४२-४३ ॥

साद्रिद्वीपा तथा पृथ्वी जलैः संच्छाद्यते शनैः।

आदित्यरश्मिभिः पीतं जलमभ्रेषु तिष्ठति।

पुनः पतति तद् भूमौ पूर्यन्ते तेन चार्णवाः॥४४॥

ततः समुद्राः स्वां वेलामतिक्रान्तास्तुकृत्स्नशः।

पर्वताश्च विलीयन्ते मही चाप्सु निमज्जति॥ ४५॥

धीरे-धीरे पर्वतों तथा द्वीपोंवाली पृथ्वी जलसे ढक जाती है और सूर्यकी रश्मियोंद्वारा गृहीत वह जल बादलोंमें स्थित रहता है। पुनः वह जल पृथ्वीपर गिरता है और उससे समुद्र इतने आपूरित हो जाते हैं कि सर्वत्र अपने तटोंका अतिक्रमण कर वे जलमय हो जाते हैं, पर्वत जलमें विलीन हो जाते हैं और पृथ्वी भी जलमें डूब जाती है॥ ४४-४५ ॥

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।

योगनिद्रां समास्थाय शेते देवः प्रजापतिः॥४६॥

उस भयंकर एकार्णव (महासमुद्र)-में स्थावर-जंगम सभीके लीन हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय ग्रहणकर देव प्रजापति शयन करते हैं ॥ ४६॥

चतुर्युगसहस्त्रान्तं कल्पमाहुर्महर्षयः।

वाराहो वर्तते कल्पो यस्य विस्तार ईरितः ॥ ४७॥

असंख्यातास्तथा कल्पा ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाः।

कथिता हि पुराणेषु मुनिभिः कालचिन्तकैः॥४८॥

सात्त्विकेष्वथ कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।

तामसेषु हरस्योक्तं राजसेषु प्रजापतेः॥४९॥

योऽयं प्रवर्तते कल्पो वाराहः सात्त्विको मतः।

अन्ये च सात्त्विकाः कल्पा मम तेषु परिग्रहः॥५०॥

महर्षियोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है। अभी जिसका विस्तार बतलाया गया है, वह वाराह कल्प इस समय चल रहा है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवात्मक असंख्य कल्प हैं। पुराणोंमें काल-चिन्तक मुनियोंने उनका वर्णन किया है। सात्त्विक (सत्त्वप्रधान) कल्पोंमें हरिका अधिक माहात्म्य होता है। तामस (तम:प्रधान) कल्पोंमें शंकरका और राजस (रजः-प्रधान) कल्पोंमें प्रजापति ब्रह्माका अधिक माहात्म्य होता है। इस समय प्रवर्तमान वाराह कल्प

सात्त्विक कल्प है। अन्य भी सात्त्विक कल्प हैं, उनमें मुझे कूर्मभगवान्का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ।। ४७-५०॥

ध्यानं तपस्तथा ज्ञानं लब्ध्वा तेष्वेव योगिनः।

आराध्य गिरिशं मां च यान्ति तत् परमं पदम्॥५१॥

सोऽहं सत्त्वं समास्थाय मायी मायामयीं स्वयम्।

एकार्णवे जगत्यस्मिन् योगनिद्रां व्रजामि तु॥५२॥

मां पश्यन्ति महात्मानः सुप्तं कालं महर्षयः।

जनलोके वर्तमानास्तपसा योगचक्षुषा॥५३॥

उन कल्पोंमें योगीजन ध्यान, तप तथा ज्ञान प्राप्तकर उनके द्वारा शंकरकी तथा मेरी आराधना करके परमपद को प्राप्त करते हैं। जगत्के एकार्णव हो जानेपर माया का अधिष्ठाता मैं सत्त्वका आश्रय ग्रहणकर मायामय योगनिद्रा में स्थित हो जाता हूँ। उस समय जनलोकमें विद्यमान महात्मा, महर्षिगण तपस्या तथा योगरूपी नेत्रोंके द्वारा निद्रालीन कालस्वरूप मेरा दर्शन करते हैं ॥ ५१-५३॥

अहं पुराणपुरुषो भूर्भुवः प्रभवो विभुः।

सहस्रचरणः श्रीमान् सहस्रांशुः सहस्रदृक् ॥५४॥

मन्त्रोऽग्निर्ब्राह्मणा गावः कुशाश्च समिधो ह्यहम् ।

प्रोक्षणी च स्रुवश्चैव सोमो घृतमथास्म्यहम्॥५५॥

संवर्तको महानात्मा पवित्रं परमं यशः।

वेदो वेद्यं प्रभुर्गोप्ता गोपतिर्ब्रह्मणो मुखम्॥५६॥

अनन्तस्तारको योगी गतिर्गतिमतां वरः।

हंसः प्राणोऽथ कपिलो विश्वमूर्तिः सनातनः ॥५७॥

क्षेत्रज्ञः प्रकृतिः कालो जगबीजमथामृतम्।

माता पिता महादेवो मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥५८॥

मैं पुराणपुरुष, भूर्भुवः, प्रभव तथा विभु हूँ, मैं हजारों चरणोंवाला, श्रीसम्पन्न, हजारों किरणोंवाला तथा हजारों नेत्रोंवाला हूँ। मैं ही मन्त्र, अग्नि, ब्राह्मण, गौ,

कुश एवं समिधा हूँ और प्रोक्षणी, नुव (यज्ञीय पात्र) सोम तथा घृत भी मैं ही हूँ। मैं ही संवर्तक (अग्नि), महान् आत्मा, पवित्र तथा परम यश हूँ। वेद-वेद्य (जिसे जाना जाता है), प्रभु, गोप्ता (रक्षक), गोपति (इन्द्रियों एवं वाणीके स्वामी) और ब्रह्माका मुख (आविर्भावस्थल) भी मैं ही हूँ। मैं अनन्त, तारक, योगी, गति, गतिशीलोंमें श्रेष्ठ, हंस, प्राण, कपिल, विश्वमूर्ति, सनातन, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, काल, जगदीज और अमृतस्वरूप हूँ। मैं ही माता, पिता तथा महादेव हूँ, मुझसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है॥५४-५८॥

आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता

नारायणः पुरुषो योगमूर्तिः।

मां पश्यन्ति यतयो योगनिष्ठा

ज्ञात्वात्मानममृतत्वं व्रजन्ति॥५९॥

मैं आदित्यके समान वर्णवाला, भुवनोंका रक्षक, नारायण पुरुष तथा योगमूर्ति हूँ। योगपरायण यतिजन मेरा दर्शन करते हैं और अपनी आत्माका ज्ञान प्राप्तकर अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं॥५९॥