21 अध्याय

चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान,

परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा

विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको

उपदेश करना और जयध्वजको विष्णुका दर्शन

रोमहर्षण उवाच

ऐल: पुरूरवाश्चाथ राजा राज्यमपालयत्।

तस्य पुत्रा बभूवुर्हि षडिन्द्रसमतेजसः॥१॥

आयुर्मायुरमावायुर्विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।

शतायुश्च श्रुतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः॥२॥

रोमहर्षणने कहा-इलाका पुत्र राजा पुरूरवा राज्यका पालन करने लगा। उसको इन्द्रके समान तेजस्वी आयु, मायु, अमावायु, वीर्यवान् विश्वायु, शतायु तथा श्रुतायु नामवाले छः पुत्र हुए। ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे॥१-२॥

आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।

स्वर्भानुतनयायां वै प्रभायामिति नः श्रुतम्॥३॥

नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।

नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः॥४॥

उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महाबलाः।

यतिर्ययातिः संयातिरायतिः पञ्चकोऽश्वकः॥ ५ ॥

तेषां ययातिः पञ्चानां महाबलपराक्रमः।

देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः।

शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः॥ ६ ॥

हमने सुना है कि आयुको स्वर्भानु (राहु)-की कन्या प्रभासे पाँच महान् ओजस्वी पुत्र हुए थे। उनमें नहुष प्रथम (पुत्र) था, जो धर्मज्ञ और लोकमें विख्यात था। पितरोंकी कन्या विरजासे नहुषको यति, ययाति, संयाति, आयाति तथा पाँचवें अश्वक नामवाले इन्द्रके समान तेजस्वी महाबलशाली पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इन पाँचोंमेंसे ययाति महान् बलशाली और पराक्रमी था। उसने शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा वृषपर्वा की असुर-वंशमें उत्पन्न शर्मिष्ठा नामकी कन्याको पत्नी रूप में प्राप्त किया ॥३-६॥

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।

द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा चाप्यजीजनत्॥ ७ ॥

सोऽभ्यषिञ्चदतिक्रम्य ज्येष्ठं यदुमनिन्दितम्।

पूरुमेव कनीयांसं पितुर्वचनपालकम्॥ ८ ॥

देवयानीने यदु तथा तुर्वसुको जन्म दिया। इसी प्रकार शर्मिष्ठाने भी द्रुह्यु, अनु तथा पूरुको उत्पन्न किया। उस (ययाति)-ने अनिन्दित ज्येष्ठ पुत्र यदुका अतिक्रमण कर पिताके वचनका पालन करनेवाले छोटे पुत्र पूरुको ही (राजपदपर) अभिषिक्त किया॥७-८॥

दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं पुत्रमादिशत्।

दक्षिणापरयो राजा यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्।

प्रतीच्यामुत्तरायां च द्रुयुं चानुमकल्पयत्॥ ९ ॥

तैरियं पृथिवी सर्वा धर्मतः परिपालिता।

राजापि दारसहितो वनं प्राप महायशाः॥१०॥

यदोरप्यभवन् पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः।

सहस्त्रजित् तथा ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽजितो रघुः॥११॥

राजा ययातिने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसु नामक पुत्रको, दक्षिण-पश्चिम दिशामें ज्येष्ठ पुत्र यदुको, पश्चिम में | द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको (राजाके रूप में) नियुक्त किया। उन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। महायशस्वी राजा (ययाति) भी पत्नीसहित वन चले गये। यदुके भी देवपुत्रोंके समान सहस्रजित्, क्रोष्ट, नील, अजित तथा रघु नामक पाँच पुत्र हुए, उनमें सहस्रजित् सबसे बड़ा था॥९-११॥

सहस्रजित्सुतस्तद्वच्छतजिन्नाम पार्थिवः ।

सुताः शतजितोऽप्यासंस्त्रयः परमधार्मिकाः॥१२॥

हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहयः परः।

हैहयस्याभवत् पुत्रो धर्म इत्यभिविश्रुतः॥१३॥

सहस्रजित्का उसीके समान शतजित् नामका पुत्र राजा था। शतजित्के भी हैहय, हय और वेणुहय नामक परम धार्मिक तीन पुत्र थे। हैहयका पुत्र 'धर्म' नाम से विख्यात हुआ।। १२-१३॥

तस्य पुत्रोऽभवद् विप्रा धर्मनेत्रः प्रतापवान्।

धर्मनेत्रस्य कीर्तिस्तु संजितस्तत्सुतोऽभवत्॥१४॥

महिष्मान् संजितस्याभूभद्रश्रेण्यस्तदन्वयः।

भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दमो नाम पार्थिवः॥१५॥

दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम वीर्यवान्।

धनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकसम्मताः॥१६॥

कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।

कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कार्तवीर्योऽर्जुनोऽभवत् ॥१७॥

सहस्रबाहुर्युतिमान् धनुर्वेदविदां वरः।

तस्य रामोऽभवन्मृत्युर्जामदग्न्यो जनार्दनः॥१८॥

विप्रो! उसका (धर्मका) धर्मनेत्र नामवाला प्रतापी पुत्र हुआ। धर्मनेत्रका कीर्ति और उसका पुत्र संजित हुआ। संजितका महिष्मान् हुआ और उसका पुत्र भद्रश्रेण्य था। भद्रश्रेण्यका दुर्दम नामका पुत्र राजा था। दुर्दमका धनक नामवाला बुद्धिमान् और वीर्यवान् पुत्र था। धनकके लोकमें सम्मानित चार पुत्र हुए-कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा चौथा कृतौजा। कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन हुआ। वह हजार बाहुओंवाला, द्युतिमान् तथा धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। जमदग्निके पुत्र जनार्दन परशुराम उस (सहस्रार्जुन)-के लिये मृत्युरूप हुए। (अर्थात् परशुरामके द्वारा वह मारा गया)॥१४-१८॥

तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः।

कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः॥१९॥

उस (सहस्रबाहु)-के सौ पुत्र थे, जिनमें पाँच पुत्र महारथी, अस्त्र-सम्पन्न, बली, शूर, धर्मात्मा तथा मनस थे॥१९॥

शूरश्च शूरसेनश्च धृष्णः कृष्णस्तथैव च।

जयध्वजश्च बलवान् नारायणपरो नृपः॥२०॥

शूरसेनादयः सर्वे चत्वारः प्रथितौजसः।

रुद्रभक्ता महात्मानः पूजयन्ति स्म शंकरम्॥२१॥

जयध्वजस्तु मतिमान् देवं नारायणं हरिम्।

जगाम शरणं विष्णुं दैवतं धर्मतत्परः॥२२॥

तमूचुरितरे पुत्रा नायं धर्मस्तवानघ।

ईश्वराराधनरतः पितास्माकमभूदिति ॥२३॥

शूर, शूरसेन, धृष्ण, कृष्ण तथा पाँचवाँ पुत्र राजा जयध्वज बलवान् तथा नारायणका भक्त था। शूरसेन आदि चार पुत्र महात्मा एवं अति तेजस्वी और रुद्रके भक्त थे। वे सभी शंकरकी पूजा करते थे। धर्मपरायण एवं बुद्धिमान् जयध्वज नारायण देव हरि विष्णु देवताकी शरणमें गया। अन्य पुत्रों (उसके चार भाइयों)-ने उससे हा-अनघ! यह तुम्हारा धर्म नहीं है। हमारे पिता शंकरकी आराधना करते थे। २०-२३॥

तानब्रवीन्महातेजा एष धर्मः परो मम।

विष्णोरंशेन सम्भूता राजानो यन्महीतले॥२४॥

राज्यं पालयतावश्यं भगवान् पुरुषोत्तमः।

पूजनीयो यतो विष्णुः पालको जगतो हरिः॥२५॥

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च स्वयम्भुवः।

तिस्त्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तहेतवः॥२६॥

सत्त्वात्मा भगवान् विष्णुः संस्थापयति सर्वदा।

सृजेद् ब्रह्मा रजोमूर्तिः संहरेत् तामसो हरः॥२७॥

तस्मान्महीपतीनां तु राज्यं पालयतामयम्।

आराध्यो भगवान् विष्णुः केशवः केशिमर्दनः॥२८॥

इसपर महातेजस्वी (जयध्वज)-ने उनसे कहा- यही मेरा श्रेष्ठ धर्म है। पृथ्वीपर जो भी राजा हुए हैं, वे सभी विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। राज्यका परिपालन करनेवालोंको चाहिये कि भगवान् पुरुषोत्तमकी अवश्य आराधना करें। क्योंकि हरि विष्णु संसारके पालनकर्ता हैं। स्वयम्भू (विष्णु)-की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी- ये तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं, जो क्रमशः सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली हैं। सत्त्वगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु नित्य पालन करते हैं। रजोमूर्ति ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और तमोगुणात्मक हर संहार करते हैं। अतएव राज्यका

पालन करनेवाले राजाओंके लिये केशीका मर्दन करनेवाले केशव भगवान् विष्णु आराधनीय हैं ॥ २४-२८॥

निशम्य तस्य वचनं भ्रातरोऽन्ये मनस्विनः।

प्रोचुः संहारकृद् रुद्रः पूजनीयो मुमुक्षुभिः ॥२९॥

अयं हि भगवान् रुद्रः सर्वं जगदिदं शिवः।

तमोगुणं समाश्रित्य कल्पान्ते संहरेत् प्रभुः॥३०॥

या सा घोरतरा मूर्तिरस्य तेजोमयी परा।

संहरेद् विद्यया सर्वं संसारं शूलभृत् तया॥३१॥

उस (जयध्वज)-का वचन सुनकर उसके दूसरे मनस्वी भाइयोंने कहा-मुक्तिप्राप्तिकी इच्छा करनेवालों के लिये संहार करनेवाले रुद्र ही पूजनीय हैं। ये ही कल्याणकारी प्रभु भगवान् रुद्र कल्पान्तमें तमोगुण का आश्रय लेकर इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। इनकी जो अति घोर तेजोमयी परा मूर्ति है, वही विद्या (ज्ञान-विवेक)-स्वरूप है। शक्ति-रूपमें उसीके द्वारा त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर सम्पूर्ण संसारका संहार करते हैं॥ २९-३१॥

ततस्तानब्रवीद्राजा विचिन्त्यासौ जयध्वजः।

सत्त्वेन मुच्यते जन्तुः सत्त्वात्मा भगवान् हरिः॥३२॥

तब वह राजा जयध्वज कुछ विचार करके उनसे बोला-सत्त्वगुणद्वारा ही प्राणी मुक्त होता है और वे भगवान् सत्त्वात्मक हैं॥३२॥

तमूचुर्धातरो रुद्रः सेवितः सात्त्विकैर्जनैः।

मोचयेत् सत्त्वसंयुक्तः पूजयेशं ततो हरम्॥३३॥

अथाब्रवीद् राजपुत्रः प्रहसन् वै जयध्वजः।

स्वधर्मो मुक्तये पन्था नान्यो मुनिभिरिष्यते॥३४॥

इसपर भाइयोंने उससे कहा-सात्त्विकजनोंके द्वारा सेवित रुद्र सत्त्वगुणसे सम्पन्न होकर मुक्त करते हैं, अतः ईश्वर हरकी पूजा करो। तब राजपुत्र जयध्वजने हँसते हुए कहा- -मुक्तिके लिये स्वधर्म-पालन ही एकमात्र मार्ग है। मुनिलोग अन्य (धर्म)-की इच्छा नहीं करते ॥३३-३४॥

तथा च वैष्णवी शक्तिर्नृपाणां देवता सदा।

आराधनं परो धर्मो मुरारेरमितौजसः॥३५॥

साथ ही राजाओंके लिये वैष्णवी शक्ति ही सदा देवता-रूप है। अमित तेजस्वी मुरारिकी आराधना करना परम धर्म है।॥ ३५॥

तमब्रवीद् राजपुत्रः कृष्णो मतिमतां वरः।

यदर्जुनोऽस्मज्जनकः स्वधर्मं कृतवानिति॥३६॥

एवं विवादे वितते शूरसेनोऽब्रवीद् वचः।

प्रमाणमृषयो ह्यत्र ब्रूयुस्ते यत् तथैव तत्॥ ३७॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजपुत्र कृष्ण (जयध्वज के भाई)-ने उससे (जयध्वजसे) कहा-हम लोगोंके पिता अर्जुनने (सहस्रार्जुन या कार्तवीर्यार्जुनने) जिसे स्वधर्म माना है (वही हम लोगोंको भी मान्य होना चाहिये)। इस प्रकार विवादके बढ़ जानेपर शूरसेन (जयध्वज के दूसरे भाई)-ने यह बात कही-इस विषयमें ऋषि ही प्रमाण हैं, अत: वे जैसा कहेंगे, हम लोगोंको वैसा ही करना चाहिये ।।३६-३७॥

ततस्ते राजशार्दूलाः पप्रच्छुर्ब्रह्मवादिनः।

गत्वा सर्वे सुसंरब्धाः सप्तर्षीणां तदाश्रमम्॥३८॥

तानब्रुवंस्ते मुनयो वसिष्ठाद्या यथार्थतः।

या यस्याभिमता पुंसः सा हि तस्यैव देवता॥३९॥

किन्तु कार्यविशेषेण पूजिताश्चेष्टदा नृणाम्।

विशेषात् सर्वदा नायं नियमो ह्यन्यथा नृपाः॥४०॥

नृपाणां दैवतं विष्णुस्तथैव च पुरंदरः।

विप्राणामग्निरादित्यो ब्रह्मा चैव पिनाकधृक्॥४१॥

देवानां दैवतं विष्णुर्दानवानां त्रिशूलभृत्।

गन्धर्वाणां तथा सोमो यक्षाणामपि कथ्यते॥४२॥

तदनन्तर वे सभी राजश्रेष्ठ तैयार होकर सप्तर्षियों के आश्रममें गये और (उन) ब्रह्मवादियोंसे पूछा-वसिष्ठ आदि उन मुनियोंने तत्त्वकी बात बताते हुए उनसे कहा-जिस पुरुषको जो देवता अभिमत हो, वही उसका अभीष्ट देवता है। किंतु किसी विशेष कार्य से पूजित (तत्तद्-देवता) मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। राजाओ! विशेष अर्थात् किसी उद्देश्यसे की जानेवाली पूजा सदा नहीं की जाती, क्योंकि कामनापरक आराधनाके नियम दूसरे प्रकारके होते हैं (वे सदा सब स्थितियोंमें पालनीय नहीं हो सकते)। राजाओंके देवता

विष्णु और इन्द्र हैं। ब्राह्मणोंके देवता अग्नि, सूर्य, ब्रह्मा तथा पिनाकधारी शिव हैं। देवताओंके देवता विष्णु और | दानवोंके त्रिशूलधारी शिव हैं। गन्धर्षों और यक्षों के देवता सोम कहे गये हैं ॥३८-४२॥

विद्याधराणां वाग्देवी साध्यानां भगवान् रविः।

रक्षसां शंकरो रुद्रः किंनराणां च पार्वती॥४३॥

ऋषीणां दैवतं ब्रह्मा महादेवश्च शूलभृत्।

मनूनां स्यादुमा देवी तथा विष्णुः सभास्करः॥४४॥

गृहस्थानां च सर्वे स्युर्ब्रह्मा वै ब्रह्मचारिणाम्।

वैखानसानामर्कः स्याद् यतीनां च महेश्वरः॥४५॥

भूतानां भगवान् रुद्रः कूष्माण्डानां विनायकः।

सर्वेषां भगवान् ब्रह्मा देवदेवः प्रजापतिः॥४६॥

विद्याधरोंके देवता वाग्देवी तथा साध्योंके भगवान् सूर्य हैं। राक्षसोंके शंकर रुद्र और किंनरोंकी देवता पार्वती हैं। ऋषियोंके देवता ब्रह्मा और त्रिशूलधारी महादेव हैं। मनुष्योंके देवता उमा देवी, विष्णु तथा सूर्य हैं । गृहस्थों के लिये सभी देवता (पूज्य) हैं। ब्रह्मचारियोंके देवता ब्रह्मा, वैखानसोंके सूर्य तथा संन्यासियोंके महेश्वर देवता हैं। भूतोंके भगवान् रुद्र, कूष्माण्डों के विनायक और देवाधि-देव प्रजापति भगवान् ब्रह्मा सभीके देवता हैं ॥ ४३-४६॥

इत्येवं भगवान् ब्रह्मा स्वयं देवोऽभ्यभाषत।

तस्माज्जयध्वजो नूनं विष्ण्वाराधनमर्हति॥४७॥

तान् प्रणम्याथ ते जग्मुः पुरीं परमशोभनाम्।

पालयाञ्चक्रिरे पृथ्वी जित्वा सर्वरिपून रणे॥४८॥

 (सप्तर्षियों ने कहा) स्वयं भगवान् ब्रह्माने ही यह कहा है, इसलिये निश्चित ही जयध्वज विष्णुकी आराधना करनेके योग्य हैं। तब वे सभी उन्हें प्रणामकर परम सुन्दर अपनी पुरीको चले गये और युद्धमें सभी शत्रुओं को जीतकर पृथ्वीका पालन करने लगे॥ ४७-४८ ॥

ततः कदाचिद् विप्रेन्द्रा विदेहो नाम दानवः।

भीषणः सर्वसत्त्वानां पुरीं तेषां समाययौ॥४९॥

दंष्ट्राकरालो दीप्तात्मा युगान्तदहनोपमः।

शूलमादाय सूर्याभं नादयन् वै दिशो दश॥५०॥

तन्नादश्रवणान्मास्तत्र ये निवसन्ति ते।

तत्यजुर्जीवितं त्वन्ये दुद्रुवुर्भयविह्वलाः॥५१॥

विप्रेन्द्रो! तदनन्तर किसी दिन सभी प्राणियोंके लिये भयंकर विदेह नामका दानव उनकी पुरीमें चला आया। भयंकर दाढ़ोंवाला, प्रलयकालीन अग्निके समान उद्दीप्त (वह दानव) सूर्यके समान चमकते हुए शूलको लेकर दसों दिशाओंमें गरजने लगा। उसकी (भयंकर) गर्जना को सुनकर वहाँ रहनेवाले कुछ मनुष्योंने प्राण त्याग दिये और दूसरे भयसे विह्वल होकर भाग पड़े ॥ ४९-५१॥

ततः सर्वे सुसंयत्ताः कार्तवीर्यात्मजास्तदा।

युयुधुर्दानवं शक्तिगिरिकूटासिमुद्गरैः॥५२॥

तान् सर्वान् दानवो विप्राः शूलेन प्रहसन्निव।

वारयामास घोरात्मा कल्पान्ते भैरवो यथा॥५३॥

शूरसेनादयः पञ्च राजानस्तु महाबलाः।

युद्धाय कृतसंरम्भा विदेहं त्वभिदुद्रुवुः॥५४॥

तब कार्तवीर्यके सभी पुत्र सावधान होकर शक्ति (सेना), पर्वतशिला, तलवार तथा मुद्गरोंसे उस दानव के साथ युद्ध करने लगे। ब्राह्मणो! उस भयंकर दानव ने शूलसे उन सभीका हँसते हुए वैसे ही निवारण कर दिया जैसे प्रलयकालमें भैरव करते हैं। तब महाबली शूरसेन आदि वे पाँच राजा युद्धके लिये तैयारी कर विदेह दानवपर टूट पड़े।५२-५४॥

शूरोऽस्त्रं प्राहिणोद्रौद्रं शूरसेनस्तु वारुणम्।

प्राजापत्यं तथा कृष्णो वायव्यं धृष्ण एव च॥५५॥

जयध्वजश्च कौबेरमैन्द्रमाग्नेयमेव च।

भञ्जयामास शूलेन तान्यस्त्राणि स दानवः॥५६॥

ततः कृष्णो महावीर्यो गदामादाय भीषणाम्।

स्पृष्ट्वा मन्त्रेण तरसा चिक्षेप च ननाद च॥५७॥

सम्प्राप्य सा गदाऽस्योरो विदेहस्य शिलोपमम्।

न दानवं चालयितुं शशाकान्तकसंनिभम्॥५८॥

शूरने रौद्रास्त्र, शूरसेनने वारुणास्त्र, कृष्णने प्राजापत्यास्त्र, धृष्णने वायव्यास्त्र और जयध्वजने कौबेर, ऐन्द्र तथा आग्नेयास्त्र चलाया, किंतु उस दानवने शूलसे उन सभी अस्त्रोंको तोड़ डाला। तब महावीर्यशाली कृष्णने भीषण गदा लेकर मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित कर वेगपूर्वक फेंका और गर्जना की। वह गदा उस विदेहकी पत्थरके समान छातीपर लगकर भी यमराज-तुल्य उस दानव को विचलित करने में समर्थ न हो सकी॥५५-५८॥

दुद्रुवुस्ते भयग्रस्ता दृष्ट्वा तस्यातिपौरुषम्।

जयध्वजस्तु मतिमान् सस्मार जगतः पतिम्॥५९॥

विष्णुं ग्रसिष्णुं लोकादिमप्रमेयमनामयम्।

त्रातारं पुरुषं पूर्वं श्रीपतिं पीतवाससम्॥६०॥

ततः प्रादुरभूच्चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम्।

आदेशाद् वासुदेवस्य भक्तानुग्रहकारणात्॥६१॥

जग्राह जगतां योनिं स्मृत्वा नारायणं नृपः।

प्राहिणोद् वै विदेहाय दानवेभ्यो यथा हरिः॥६२॥

उसके महान् पौरुषको देखकर भयग्रस्त हो वे सभी भागने लगे। तब बुद्धिमान् जयध्वजने अप्रमेय, अनामय, लोकादि, ग्रसिष्णु, त्राणकर्ता, पूर्वपुरुष, श्रीपति और पीताम्बरधारी जगत्पति विष्णुका स्मरण किया। स्मरण करते ही भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये वासुदेवकी आज्ञा से दस हजार सूर्योंके समान प्रकाशमान चक्र प्रकट हुआ। राजा (जयध्वज)-ने जगद्योनि नारायणका ध्यानकर उस चक्रको ग्रहण किया और विदेह (दानव)-पर उसी प्रकार चलाया जैसे विष्णु दानवोंपर चलाते हैं॥५९-६२॥

सम्प्राप्य तस्य घोरस्य स्कन्धदेशं सुदर्शनम्।

पृथिव्यां पातयामास शिरोऽदिशिखराकृति॥६३॥

तस्मिन् हते देवरिपौ शूराद्या भ्रातरो नृपाः।

समाययुः पुरीं रम्यां भ्रातरं चाप्यपूजयन्॥६४॥

श्रुत्वाजगाम भगवान् जयध्वजपराक्रमम्।

कार्तवीर्यसुतं द्रष्टुं विश्वामित्रो महामुनिः॥६५॥

द्विजोत्तमो! आहुकके दो पुत्र हुए-उग्रसेन और देवक। देवक के देवताओंके समान देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित नामवाले चार वीर पुत्र हुए। इनकी सात बहनें थीं-वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा, सुव्रता तथा देवकी। इनमें सुन्दर मध्यभागवाली देवकी सबसे बड़ी थी। ये सभी वसुदेवको दी गयीं॥६३-६५ ॥

तमागतमथो दृष्ट्वा राजा सम्भ्रान्तमानसः।

समावेश्यासने रम्ये पूजयामास भावतः॥६६॥

उवाच भगवान् घोरः प्रसादाद् भवतोऽसुरः।

निपातितो मया संख्ये विदेहो दानवेश्वरः॥६७॥

त्वद्वाक्याच्छिन्नसंदेहो विष्णुं सत्यपराक्रमम्।

प्रपन्नः शरणं तेन प्रसादो मे कृतः शुभः॥ ६८॥

उग्रसेनके न्यग्रोध, कंस, सुभूमि, राष्ट्रपाल, तुष्टिमान् तथा शङ्कु नामवाले पुत्र थे। भजमानका प्रख्यात विदूरथ नामवाला पुत्र हुआ। उसका पुत्र शूर, उससे शमि और शमिका प्रतिक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (प्रतिक्षत्र) से स्वयम्भोज और उससे शत्रुओंको ताप पहुँचानेवाला पुत्र हृदिक हुआ। उसका पुत्र कृतवर्मा और उसका पुत्र देवर कहलाया। उस शूरसे धीमान् हुआ और उसका पुत्र वसुदेव था॥ ६६-६८॥

यक्ष्यामि परमेशानं विष्णुं पद्मदलेक्षणम्।

कथं केन विधानेन सम्पूज्यो हरिरीश्वरः॥६९॥

कोऽयं नारायणो देवः किम्प्रभावश्च सुव्रत।

सर्वमेतन्ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ॥७०॥

विश्वामित्र उवाच

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां यस्मिन् सर्वमिदं जगत्।

स विष्णुः सर्वभूतात्मा तमाश्रित्य विमुच्यते।।७१॥

देवताओं के प्रार्थना करने पर महाबाहु जगद्गुरु वासुदेव विष्णु वसुदेवसे देवकी-पुत्रके रूपमें प्रकट हुए। वसुदेव की महाभाग्यशालिनी सुन्दर रोहिणी नामक पत्नीने हल को आयुधके रूपमें धारण करनेवाले ज्येष्ठ पुत्र संकर्षण राम (बलराम)-को जन्म दिया। वह परमात्मा (विष्णु) ही ये जगन्मय (वसुदेवपुत्र) वासुदेव हैं। हलायुध (बलराम) संकर्षण स्वयं साक्षात् प्रभु शेष हैं ॥ ६९-७१॥

स्ववर्णाश्रमधर्मेण पूज्योऽयं पुरुषोत्तमः।

अकामहतभावेन समाराध्यो न चान्यथा॥७२॥

एतावदुक्त्वा भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः।

शूराद्यैः पूजितो विप्रा जगामाथ स्वमालयम्॥७३॥

भृगुके शापके कारण वे माधव विष्णु भी मनुष्य शरीर स्वीकार कर उन देवकी तथा रोहिणीसे उत्पन्न हुए। उमाकी देहसे उत्पन्न योगनिद्रारूप कौशिकी देवी वासुदेवकी आज्ञासे यशोदाकी पुत्री हुई ॥७२-७३ ।।

अथ शूरादयो देवमयजन्त महेश्वरम्।

यज्ञेन यज्ञगम्यं तं निष्कामा रुद्रमव्ययम्॥७४॥

तान् वसिष्ठस्तु भगवान् याजयामास सर्ववित्।

गौतमोऽत्रिरगस्त्यश्च सर्वे रुद्रपरायणाः॥७५॥

विश्वामित्रस्तु भगवान् जयध्वजमरिंदमम्।

याजयामास भूतादिमादिदेवं जनार्दनम्॥७६ ॥

मुनिश्रेष्ठो! वसुदेवके अन्य जो वासुदेव नामवाले ज्येष्ठ पुत्र थे उन सबको कंसने पहले ही मार डाला। सुषेण, उदायी, भद्रसेन, महाबल, ऋजुदास, भद्रदास और पूर्व में उत्पन्न कीर्तिमान्-इन सभी (वासुदेवके बड़े भाइयों) के मारे जानेपर रोहिणीने वसुदेवसे संसारके स्वामी हलायुध बलभद्र राम (बलराम)-को जन्म दिया॥७४-७६ ॥

तस्य यज्ञे महायोगी साक्षात् देवः स्वयं हरिः।

आविरासीत् स भगवान् तदद्भुतमिवाभवत्॥७७॥

राम (बलराम)-के उत्पन्न होनेके पश्चात् देवकी ने देवताओंके आदि कारण, आत्मरूप, श्रीवत्स-चिह्न से सुशोभित वक्षःस्थलवाले अच्युत कृष्णको जन्म दिया।।७७॥

य इमं शृणुयान्नित्यं जयध्वजपराक्रमम्।

सर्वपापविमुक्तात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥७८॥

बलरामकी सुन्दर गुणोंसे युक्त रेवती नामकी भार्या थीं। उन्होंने उनसे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया॥७८॥