39 अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थों का विस्तारसे वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापविनाशिनी।

मुनिभिः कथिता पूर्वमीश्वरेण स्वयम्भुवा॥१॥

मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।

रुद्रगात्राद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥२॥

सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।

संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥३॥

मार्कण्डेयने कहा मुनियों ने तथा उनसे पूर्व स्वयम्भू ईश्वरने नर्मदाका वर्णन सभी पापोंका नाश करनेवाली सर्वश्रेष्ठ नदीके रूपमें किया है। मुनियोंद्वारा स्तुति करने पर यह श्रेष्ठ नर्मदा नदी लोगोंके कल्याणकी कामनासे रुद्र के शरीर से निकली है। यह नित्य सभी पापोंको हरनेवाली है, सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है और देवताओं, गन्धर्वो तथा अप्सराओंके द्वारा स्तुत्य है॥१-३॥

उत्तरे चैव तत्कूले तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।

नाम्ना भद्रेश्वरं पुण्यं सर्वपापहरं शुभम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते॥४॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थमानातकेश्वरम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥५॥

इस (नर्मदा) नदीके उत्तरी किनारेपर तीनों लोकों में विख्यात भद्रेश्वरनामका तीर्थ है, जो पवित्र, शुभ तथा सभी पापोंका हरण करनेवाला है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दित होता है। राजेन्द्र! वहाँसे आम्रातकेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य हजार गौओंके दान का फल प्राप्त करता है॥४-५॥

ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।

सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते॥६॥

तदनन्तर संयमपूर्वक नियत आहार करते हुए अङ्गारेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इससे (तीर्थ-विधि सम्पन्न करनेसे) सभी पापोंका शोधन होता है और रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥६॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र केदारं नाम पुण्यदम्।

तत्र स्नात्वोदकं कृत्वा सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७ ॥

पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।

तत्र स्नात्वा महाराज रुद्रलोके महीयते॥ ८॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्।

तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ ९ ॥

ततः पुष्करिणीं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र इन्द्रस्यार्धासनं लभेत्॥१०॥

राजेन्द्र! इसके बाद पुण्य प्रदान करनेवाले केदार नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ स्नान करके उदकदान (तर्पण आदि क्रिया) करनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सभी पापोंका विनाश करनेवाले पिप्पलेश (तीर्थ)-में जाना चाहिये। महाराज! वहाँ स्नान करनेसे रुद्रलोकमें आदर प्राप्त होता है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ विमलेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे रुद्रलोक प्राप्त होता है। इसके बाद पुष्करिणीमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य इन्द्रका आधा आसन प्राप्त करता है॥७-१०॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र शूलभेदमिति श्रुतम्।

तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥११॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र बलितीर्थमनुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत्॥१२॥

शक्रतीर्थं ततो गच्छेत् कूले चैव तु दक्षिणे।

उपोष्य रजनीमेकां स्नानं कृत्वा यथाविधि॥१३॥

आराधयेन्महायोगं देवं नारायणं हरिम्।

गोसहस्रफलं प्राप्य विष्णुलोकं स गच्छति॥१४॥

राजेन्द्र ! ऐसी श्रुति है कि वहाँसे शूलभेद नामके तीर्थ में जाना चाहिये। वहाँ स्नान करके देवाराधना करनी चाहिये। इससे हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम बलितीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य सिंहासनाधिपति अर्थात् राजा होता है। इसके उपरान्त (बलितीर्थके) दक्षिणी किनारेपर स्थित शक्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ एक रात्रि उपवास करके यथाविधि स्नान करना चाहिये तथा महायोगस्वरूप नारायण हरिकी आराधना करनी चाहिये। इनसे हजार गौओंके दानका फल प्राप्तकर मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है॥११-१४॥

ऋषितीर्थं ततो गत्वा सर्वपापहरं नृणाम्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोके महीयते॥१५॥

नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत्॥१६॥

यत्र तप्तं तपः पूर्वं नारदेन सुरर्षिणा।

प्रीतस्तस्य ददौ योगं देवदेवो महेश्वरः॥१७॥

ब्रह्मणा निर्मितं लिङ्गं ब्रह्मेश्वरमिति श्रुतम्।

यत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥१८॥

तदनन्तर मनुष्योंके समस्त पापोंको हरनेवाले ऋषि तीर्थ में जाकर वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य शिवलोकमें पूजित होता है। वहींपर नारदजीका परम शोभन तीर्थ है। वहाँ स्नानमात्र करके मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। पूर्वकालमें इसी तीर्थमें देवर्षि नारद ने तपस्या की थी और इसी तपस्याके फलस्वरूप देवाधिदेव महेश्वरने प्रसन्न होकर उन्हें योग प्रदान किया था। राजन्! ब्रह्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग ब्रह्मेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥१५-१८॥

ऋणतीर्थ ततो गच्छेत् स ऋणान्मुच्यते ध्रुवम्।

महेश्वरं ततो गच्छेत् पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥१९॥

तदनन्तर ऋणतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ जानेवाला निश्चित ही ऋणसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद महेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर तीर्थसेवन करने से जन्म का अन्तिम फल (महेश्वर का दर्शन) प्राप्त होता है॥१९॥

भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥२०॥

तदुपरान्त सभी व्याधियोंका विनाश करनेवाले भीमेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करने से मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है॥२०॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।

अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्॥२१॥

तस्मिस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।

यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च।

तावद् वर्षसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते॥२२॥

यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप।

अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥२३॥

नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठन्ते ये तु मानवाः।

ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥२४॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम पिङ्गलेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। वहाँ अहोरात्रका उपवास करनेसे त्रिरात्र (उपवास) का फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला (गौ)-का दान करता है, वह उस कपिलाके तथा उसके कुलमें उत्पन्न संतानोंके शरीरोंपर जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षपर्यन्त रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नराधिप! वहाँ जो प्राणोंका त्याग करता है, वह जबतक सूर्य-चन्द्रमा हैं, तबतक अक्षय आनन्द प्राप्त करता है। जो मनुष्य नर्मदाके तटका आश्रयकर (वहाँ) रहते हैं, वे मरनेपर पुण्यवान् संतोंके समान स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥२१-२४॥

ततो दीप्तेश्वरं गच्छेद् व्यासतीर्थं तपोवनम्।

निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।

हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता॥२५॥

प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर।

प्रीतस्तस्य भवेद् व्यासो वाञ्छितं लभते फलम्॥२६॥

तदनन्तर व्यासतीर्थ नामक तपोवनमें स्थित दीतेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। प्राचीन कालमें वहाँ व्यासजी से भयभीत होकर महानदी (नर्मदा) वापस हो गयी थी और व्यासके द्वारा हुंकार किये जानेपर (अर्थात् रोष प्रकट करनेपर) वहाँसे दक्षिणकी ओर चली गयी। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो प्रदक्षिणा करता है, प्रसन्न होकर व्यासजी उसे अभिलषित फल प्रदान करते हैं। २५-२६ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र इक्षुनद्यास्तु संगमम्।

त्रैलोक्यविश्रुतं पुण्यं तत्र संनिहितः शिवः।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्॥२७॥

स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्

आजन्मनः कृतं पापं स्नातस्तीवं व्यपोहति ॥२८॥

तत्र देवा: सगन्धर्वा भवात्मजमनुत्तमम्।

उपासते महात्मानं स्कन्दं शक्तिधरं प्रभुम्॥२९॥

ततो गच्छेदाङ्गिरसं स्नानं तत्र समाचरेत्।

गोसहस्रफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति॥३०॥

राजेन्द्र! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात तथा पवित्र इक्षुनदीके संगमपर जाना चाहिये। वहाँ शिव प्रतिष्ठित हैं। राजन्! वहाँ मनुष्य स्नानकर (शिवका) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंका विनाश करनेवाले स्कन्दतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करने से जन्मभरका किया हुआ पाप शीघ्र ही दूर हो जाता है। वहाँ शंकरजीके पुत्र, श्रेष्ठ महात्मा, शक्तिसम्पन्न प्रभु स्कन्दकी गन्धर्वांसहित देवता उपासना करते हैं। तदनन्तर आङ्गिरस तीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवाला व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त कर रुद्रलोकमें जाता है ।। २७-३०॥

अङ्गिरा यत्र देवेशं ब्रह्मपुत्रो वृषध्वजम्।

तपसाराध्य विश्वेशं लब्धवान् योगमुत्तमम्॥३१॥

कुशतीर्थ ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।

स्नानं तत्र प्रकुर्वीत अश्वमेधफलं लभेत्॥३२॥

वहाँ ब्रह्माजीके पुत्र (महर्षि) अङ्गिराने तपस्या के द्वारा देवेश वृषध्वज विश्वेश्वरकी आराधना कर उत्तम योग प्राप्त किया था। तदनन्तर समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले कुशतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करने से व्यक्ति अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥३१-३२॥

कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।

तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः॥३३॥

इसके पश्चात् सभी पापोंको नष्ट करनेवाले कोटितीर्थ में जाना चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संदेह नहीं॥३३॥

चन्द्रभागां ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते॥३४॥

नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ ३५॥

नर्मदायोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्।

आदित्यायतनं रम्यमीश्वरेण तु भाषितम्॥३६॥

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दत्त्वा दानं तु शक्तितः।

तस्य तीर्थप्रभावेण लभते चाक्षयं फलम्॥३७॥

दरिद्रा व्याधिता ये तु ये च दुष्कृतकारिणः ।

मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं प्रयान्ति च ॥३८॥

तदुपरान्त चन्द्रभागामें स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे ही मनुष्य सोमलोकमें आदर प्राप्त करता है। राजन् ! नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर उत्तम संगमेश्वर (तीर्थ) है। वहाँ स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। नर्मदाके उत्तरी किनारे पर अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँ आदित्यका रमणीय मन्दिर है। यह स्वयं ईश्वरने बताया है। राजेन्द्र! वहाँ स्नान कर यथाशक्ति दान देनेपर उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय फल प्राप्त होता है तथा जो लोग दरिद्र, व्याधियुक्त और दुष्कर्म करनेवाले हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको जाते हैं ॥ ३४-३८॥

मार्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात्॥३९॥

ततः पश्चिमतो गच्छेन्मरुदालयमुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा प्रयत्नतः॥४०॥

काञ्चनं तु द्विजो दद्याद् यथाविभवविस्तरम्।

पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति॥४१॥

तदनन्तर मार्गेश्वर (तीर्थ) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। इसके पश्चात् पश्चिमकी ओर स्थित श्रेष्ठ मरुदालयमें (वायुके स्थानमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नान करके प्रयत्नपूर्वक पवित्र होकर अपनी सम्पत्तिके विस्तारके अनुसार द्विजको स्वर्ण प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य पुष्पक-विमानके द्वारा वायुलोक जाता है॥ ३९-४१॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र अहल्यातीर्थमुत्तमम्।

स्नानमात्रादप्सरोभिर्मोदते कालमक्षयम्॥४२॥

चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे त्रयोदशी।

कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत्॥४३॥

यत्र तत्र नरोत्पन्नो वरस्तत्र प्रियो भवेत्।

स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः॥४४॥

अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्त्रफलं लभेत्॥४५॥

राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अहल्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य अक्षय (अनन्त) काल तक अप्सराओं के साथ आनन्द करता है। चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी कामदेवका दिन है। उस दिन इस अहल्यातीर्थ में जो मनुष्य अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होता है, श्रेष्ठ तथा प्रिय होता है और विशेषरूपसे दूसरे कामदेवके समान हो जानेसे श्री शोभासम्पन्न तथा स्त्रीवल्लभ होता है। इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है॥ ४२-४५ ॥

सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥४६॥

सोमनहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं भवेत्।

त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थ महाफलम्॥४७॥

तदनन्तर सोमतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता । राजन्! तीनों लोकोंमें विख्यात सोमतीर्थ महान् फल देनेवाला है॥ ४६-४७॥

यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तत्र तीर्थे समाहितः।

सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति॥४८॥

अग्निप्रवेशं यः कुर्यात् सोमतीर्थे नराधिप।

जले चानशनं वापि नासौ मर्योऽभिजायते॥४९॥

स्तम्भतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते॥५०॥

राजेन्द्र! वहाँ चन्द्रग्रहण (-का स्नान) पापोंका क्षय करनेवाला होता है। उस तीर्थमें जो एकाग्र-मनसे चान्द्रायणव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर सोमलोकको जाता है। नराधिप! जो सोमतीर्थमें अग्निप्रवेश, जलप्रवेश अथवा अनशन करता है, वह मनुष्य पुनः उत्पन्न नहीं होता। तदनन्तर स्तम्भतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सोमलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है अर्थात् पूजित होता है॥ ४८-५०॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्।

योधनीपुरमाख्यातं विष्णोः स्थानमनुत्तमम्॥५१॥

असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः।

तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुश्रीको भवेदिह।

अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥५२॥

नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्।

कामतीर्थमिति ख्यातं यत्र कामोऽर्चयद् भवम्॥५३।।

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा उपवासपरायणः ।

कुसुमायुधरूपेण रुद्रलो के महीयते॥५४॥

राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम विष्णुतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ योधनीपुर नामक विष्णुका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था। अतः वह स्थान (वासुदेवकी पवित्र संनिधिके कारण) तीर्थ (पुण्यमय) हो गया है। जो मनुष्य उस तीर्थका सेवन करता है, वह विष्णुके समान श्रीसम्पन्न हो जाता है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर कामतीर्थ नाम से प्रसिद्ध एक अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँपर कामदेव ने शंकरकी आराधना की थी। उस तीर्थ में स्नानकर उपवासपरायण रहनेवाला मनुष्य कामदेवके समान रूपवाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।५१-५४॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्।

उमाहकमिति ख्यातं तत्र संतर्पयेत् पितॄन्॥५५॥

पौर्णमास्याममावास्यां श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि।

गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये व्यवस्थिता॥५६॥

तस्मिंस्तु दापयेत् पिण्डान् वैशाख्यां तु विशेषतः।

स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः।

तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावत् तिष्ठति मेदिनी॥५७॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाना चाहिये। वह तीर्थ 'उमाहक' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ पितरों का तर्पण करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावास्या को विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ जलके भीतर हाथी के आकारकी शिला स्थित है। उस शिलापर विशेष रूपसे वैशाख पूर्णिमाको स्नानके अनन्तर दम्भ तथा मात्सर्य से रहित होकर एकाग्रमनसे पिण्डदान करना चाहिये। इससे पिण्डदाताके पितर जबतक पृथ्वी रहती है, तबतक तृप्त रहते हैं॥५५-५७॥

सिद्धेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र गाणपत्यपदं लभेत्॥५८॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः ।

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते॥५९॥

यत्र नारायणो देवो मुनीनां भावितात्मनाम्।

स्वात्मानं दर्शयामास लिङ्गं तत् परमं पदम्॥६०॥

इसके बाद सिद्धेश्वर (तीर्थमें) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर जहाँ जनार्दन लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठित हैं, वहाँ जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे विष्णुलोकमें आदर प्राप्त होता है। यही एकमात्र वह स्थान है, जहाँ नारायणदेवने भक्तिपूर्ण मुनियोंको अपना दर्शन कराया था। यह लिङ्ग विष्णुरूप होनेसे परमपद है॥५८-६० ॥

अङ्कोलं तु ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।

स्नानं दानं च तत्रैव ब्राह्मणानां च भोजनम्।

पिण्डप्रदानं च कृतं प्रेत्यानन्तफलप्रदम्॥६१॥

त्रैयम्बकेन तोयेन यश्चरुं श्रपयेत् ततः।

अङ्कोलमूले दद्याच्च पिण्डांश्चैव यथाविधि।

तारिताः पितरस्तेन तृप्यन्त्याचन्द्रतारकम्॥६२॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र प्राप्नुयात् तपसः फलम्॥६३॥

तदनन्तर सभी पापोंको नष्ट करनेवाले अंकोल तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ किया गया स्नान, दान, ब्राह्मण-भोजन तथा पिण्डदान परलोकमें अनन्त फल

प्रदान करनेवाला होता है। जो त्रैयम्बक (त्र्यम्बक) मन्त्रके द्वारा जलसे चरु पकाकर उससे अंकोल (वृक्ष) के मूलमें यथाविधि पिण्डदान करता है, उसके द्वारा तारे गये पितर जबतक चन्द्रमा तथा तारे रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम तापसेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नानमात्र करने से व्यक्ति तपस्याका फल प्राप्त करता है॥६१-६३॥

शुक्लतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।

नास्ति तेन समं तीर्थं नर्मदायां युधिष्ठिर॥६४॥

दर्शनात् स्पर्शनात् तस्य स्नानदानतपोजपात्।

होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थे महत् फलम्॥६५॥

योजनं तत् स्मृतं क्षेत्रं देवगन्धर्वसेवितम्।

शुक्लतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापविनाशनम्॥६६॥

पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति।

देव्या सह सदा भर्गस्तत्र तिष्ठति शंकरः॥६७॥

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां वैशाखे मासि सुव्रत।

कैलासाच्चाभिनिष्क्रम्य तत्र संनिहितो हरः॥६८॥

देवदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा।

गणाश्चाप्सरसां नागास्तत्र तिष्ठन्ति पुंगव॥६९॥

इसके पश्चात् सभी पापोंका नाश करनेवाले शुक्लतीर्थ में जाना चाहिये। युधिष्ठिर! नर्मदामें उसके समान कोई तीर्थ नहीं है। उस शुक्लतीर्थके दर्शन करने, स्पर्श करने तथा वहाँ स्नान, दान, तप, जप, होम और उपवास करनेसे महान् फल प्राप्त होता है। देवताओं तथा गन्धर्वां से सेवित वह एक योजनका क्षेत्र शुक्लतीर्थ इस नामसे विख्यात है। वह समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है। (इस तीर्थमें स्थित) वृक्षके अग्रभागको भी देखने से ब्रह्महत्या दूर हो जाती है, वहाँ देवी (पार्वती)के साथ भर्ग (तेजोमय) शंकर सदैव निवास करते हैं। सुव्रत! वैशाख मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ कैलाससे आकर हर (शंकर) स्थित होते हैं। श्रेष्ठ ! वहाँ देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, अप्सराओं के समूह तथा नाग रहते हैं ॥ ६४-६९॥

रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा।

आजन्मनि कृतं पापं शुक्लतीर्थे व्यपोहति।

स्नानं दानं तपः श्राद्धमनन्तं तत्र दृश्यते॥७०॥

शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।

पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः ।

अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति॥१॥

कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी।

घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम्।

एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदैश्वरात् पदात्॥७२॥

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञदानेन वा पुनः।

न तां गतिमवाप्नोति शुक्लतीर्थे तुयां लभेत्॥७३॥

जिस प्रकार रजक (धोबी)-के द्वारा जलसे (धोनेसे) वस्त्र स्वच्छ (मलरहित) हो जाता है, उसी प्रकार शुक्लतीर्थ में स्नानसे जन्मभरका किया हुआ पाप हो जाता है, वहाँ किया गया स्नान, दान, तप तथा श्राद्ध अनन्त फलदायक हो जाता है। शुक्लतीर्थ-सा परम तीर्थ न कोई हुआ न होगा। मनुष्य पूरी अवस्थाभरमें किये गये पापोंको शुक्लतीर्थमें एक अहोरात्रके उपवाससे दूर कर देता है। कार्तिक मास में कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको उपवासकर परमेश्वर देवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। इससे मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ ईश्वरके लोकमें निवास करता है। कभी भी वहाँसे च्युत नहीं होता। शुक्लतीर्थमें जो गति प्राप्त होती है, वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा दानसे प्राप्त नहीं होती॥७०-७३ ॥

शुक्लतीर्थं महातीर्थमृषिसिद्धनिषेवितम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुनर्जन्म न विन्दति॥७४॥

अयने वा चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।

स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः॥७५॥

दानं दद्याद् यथाशक्ति प्रीयेतां हरिशंकरौ।

एतत् तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥७६ ॥

अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।

उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु॥७७॥

यावत् तद्रोमसंख्या तु तत्प्रसूतिकुलेषु च।

तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥७८॥

ऋषियों तथा सिद्धोंसे सेवित शुक्लतीर्थ महान् तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता। वहाँ अयन, चतुर्दशी, संक्रान्ति तथा विषुव (योग) में स्नानोपरान्त उपवास करते हुए विजितात्मा पुरुषको समाहित होकर यथाशक्ति दान देना चाहिये। इससे विष्णु तथा शिव प्रसन्न होते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे सब कुछ अक्षय होता है। अनाथ, दुर्गतिको प्राप्त अथवा सनाथ ब्राह्मणका भी इस तीर्थमें विवाह करानेसे जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, उसे सुनो-उसके (विवाह सम्पन्न करानेवालेके) शरीरमें तथा उसके कुलकी संतानों के शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षांतक वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥७४-७८॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र यमतीर्थमनुत्तमम्।

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां माघमासे युधिष्ठिर ।

स्नानं कृत्वा नक्तभोजी न पश्येयोनिसङ्कटम्॥७९॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र एरण्डीतीर्थमुत्तमम्।

संगमे तु नरः स्नायादुपवासपरायणः।

ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिताः॥८॥

एरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावात् तुरञ्जितः।

मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य अवगाह्य च तजलम्।

नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥८१॥

राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम यमतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी को इस यमतीर्थमें स्नान करके रात्रिमें भोजन करनेवाले को गर्भके संकटका सामना नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ एरण्डी-तीर्थमें जाना चाहिये। व्यक्ति वहाँ संगममें स्नानकर उपवासपरायण रहते हुए एक ब्राह्मण को भोजन कराये, इससे करोड़ों (ब्राह्मणों)-को भोजन करानेका फल मिलता है। एरण्डी-संगममें स्नान करके भक्तिभावसे परिपूर्ण होकर मस्तकमें वहाँकी मिट्टी लगानेसे तथा नर्मदाके जलसे मिश्रित उस (एरण्डी- संगम) के जलमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।७९-८१॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं कार्णाटिकेश्वरम्।

गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः॥८२॥

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च दत्त्वा चैव यथाविधि।

सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥८३॥

नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

प्रीयते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते॥८४॥

राजेन्द्र! इसके पश्चात् कार्णाटिकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पुण्य (पर्व)-दिनमें निश्चित रूपसे गङ्गा अवतरित होती हैं। वहाँ स्नानकर, (जल) पीकर और विधिपूर्वक दान देनेसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। तदनन्तर नन्दितीर्थ में जाकर स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे उस पर नन्दीश्वर प्रसन्न होते हैं और वह सोमलोकमें आदर प्राप्त करता है॥८२-८४॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्वनरकं शुभम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् नरकं नैव पश्यति॥८५॥

तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र स्वान्यस्थीनि विनिक्षिपेत्।

रूपवान् जायते लोके धनभोगसमन्वितः॥८६॥

राजेन्द्र! तदुपरान्त शुभ अनरक नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य नरकका दर्शन नहीं करता। राजेन्द्र! उस तीर्थमें अपनी अस्थियों के विसर्जनकी प्रेरणा अपने परिजनोंको देनी चाहिये। (वहाँ जिसकी अस्थि विसर्जित होती है) वह जन्मान्तरमें दिव्य रूप एवं विविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है ॥ ८५-८६ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥८७॥

ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।

तत्रोपोष्य नरो भक्त्या दद्याद् दीपं घृतेन तु॥८८॥

घृतेन स्नापयेद् रुद्रं सघृतं श्रीफलं दहेत्।

घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां वै प्रदापयेत्॥८९॥

सर्वाभरणसंयुक्तः सर्वदेवनमस्कृतः।

शिवतुल्यबलो भूत्वा शिववत् क्रीडते चिरम्॥९०॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम कपिलातीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। ज्येष्ठ मासके आनेपर विशेषरूपसे चतुर्दशी तिथिको वहाँ उपवास कर मनुष्यको भक्तिपूर्वक घृतका दीप-दान करना चाहिये। घृतसे ही रुद्रका अभिषेक करना चाहिये, घृतयुक्त श्रीफलका हवन करना चाहिये और घंटा तथा आभरणोंसे सम्पन्न कपिला गौका दान करना चाहिये। इससे मनुष्य सभी अलंकारोंसे युक्त, सभी देवताओंके लिये वन्दनीय और शिवके समान तुल्य बलवाला होकर चिरकालतक शिवके समान क्रीडा करता है।। ८७-९०॥

अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः ।

स्नापयित्वा शिवं दद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु भोजनम्॥ ९१ ॥

सर्वभोगसमायुक्तो विमानैः सार्वकामिकैः ।

गत्वा शक्रस्य भवनं शक्रेण सह मोदते ॥ ९२॥

ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो धनवान् भोगवान् भवेत्।

अङ्गारकनवम्यां तु अमावास्यां तथैव च।

स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ ९३॥

विशेषरूपसे मंगलके दिन चतुर्थी पड़नेपर (इस | कपिलातीर्थमें) शिवका अभिषेककर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी भोगों से समन्वित होकर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र अप्रतिहतगति एवं सभी प्रकारकी सुविधाओंसे परिपूर्ण विमानोंके द्वारा इन्द्रके भवनमें जाकर इन्द्रके साथ आनन्दित होता है। स्वर्गसे च्युत होनेपर इस लोकमें भी धनवान् और भोगवान् होता है। अङ्गारक-नवमी (मंगलवारयुक्त नवमी) तथा अमावास्याको भी वहाँ (कपिलातीर्थमें) प्रयत्नपूर्वक अभिषेक करनेसे व्यक्ति रूपवान् तथा सौभाग्यशाली होता है॥९१-९३॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र गणेश्वरमनुत्तमम्।

श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी॥ ९४॥

स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते।

पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यतेऽसावृणत्रयात्॥ ९५॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम गणेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। श्रावण मास आनेपर कृष्णपक्षकी चतुर्दशी को वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है और पितरोंका तर्पण करनेसे तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है।९४-९५॥

गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम्।

अकामो वासकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः ।

आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ९६ ॥

गणेश्वर (तीर्थ)-के समीप श्रेष्ठ गङ्गावदन नामक तीर्थ है। वहाँ मनुष्य कामनापूर्वक अथवा निष्कामभाव से स्नान करके जन्मभरके किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ९६ ।।

तस्य वै पश्चिमे देशे समीपे नातिदूरतः।

दशाश्वमेधिकं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥९७॥

उपोष्य जनीमेकां मासि भाद्रपदे शुभे।

अमावस्यां नरः स्नात्वा पूजयेद् वृषभध्वजम्॥९८॥

उस (गङ्गावदन)-के पश्चिमी भागमें बहुत दूर नहीं अपितु समीपमें ही तीनों लोकोंमें विख्यात दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ है। वहाँ शुभ भाद्रपद मासकी अमावास्या को एक रात्रिका उपवासकर स्नानपूर्वक वृषभध्वज का पूजन करना चाहिये॥९७-९८॥

काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना।

गत्वा रुद्रपुरं रम्यं रुद्रेण सह मोदते ॥ ९९ ॥

सर्वत्र सर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत्।

पितॄणां तर्पणं कुर्यादश्वमेधफलं लभेत्॥१००॥

ऐसा करनेसे किंकिणीके समूहसे अलंकृत सोने के विमानसे रमणीय रुद्रपुरमें पहुँचने तथा वहाँ रुद्रके साथ आनन्दानुभव करनेका सुअवसर प्राप्त होता है। उस (दशाश्वमेधिक) तीर्थमें सर्वत्र सभी दिनोंमें स्नान करना चाहिये और पितरोंका तर्पण करना चाहिये, इससे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है॥९९-१००॥