कूर्म महा पुराण
34 अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें प्रयाग, गया, एकान तथा पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमाका
वर्णन, सप्तसारस्वत-तीर्थके वर्णनमें शिवभक्त मङ्कणक मुनिका आख्यान
ऋषय ऊचुः
तीर्थानि यानि लोकेऽस्मिन् विश्रुतानि महान्ति च।
तानि त्वं कथयास्माकं रोमहर्षण साम्प्रतम्॥१॥
ऋषियोंने कहा-रोमहर्षण! अब आप हमें इस संसारमें जो महान् तथा प्रसिद्ध तीर्थ हैं, उन्हें बतलायें ॥१॥
रोमहर्षण उवाच
शृणुध्वं कथयिष्येऽहं तीर्थानि विविधानि च ।
कथितानि पुराणेषु मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः॥२॥
यत्र स्नानं जपो होमः श्राद्धदानादिकं कृतम्।
एकैकशो मुनिश्रेष्ठाः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥३।।
रोमहर्षण बोले-हे श्रेष्ठ मुनियो! आप लोग सुनें, मैं पुराणोंमें ब्रह्मवादी मुनियोंद्वारा बताये गये विविध तीर्थोंको बताऊँगा, जिनमें एक बार भी किया गया स्नान, जप, होम, श्राद्ध तथा दान आदि कर्म सात कुलोंको पवित्र कर देता है ॥ २-३॥
पञ्चयोजनविस्तीर्णं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
प्रयागं प्रथितं तीर्थं तस्य माहात्म्यमीरितम्॥४॥
अन्यच्च तीर्थप्रवरं कुरूणां देववन्दितम्।
ऋषीणामाश्रमैर्जुष्टं सर्वपापविशोधनम्॥५॥
परमेष्ठी ब्रह्मका पाँच योजनमें फैला हुआ प्रयाग नामक प्रसिद्ध तीर्थ है, उसका माहात्म्य बतलाया जा चुका है। दूसरा कुरुओंका श्रेष्ठ तीर्थ (कुरुक्षेत्र) है, जो देवताओंद्वारा वन्दित, ऋषियोंके आश्रमोंसे परिपूर्ण और सभी पापोंकी शुद्धि करनेवाला है॥४-५॥
तत्र स्नात्वा विशुद्धात्मा दम्भमात्सर्यवर्जितः।
ददाति यत्किञ्चिदपि पुनात्युभयतः कुलम्॥ ६ ॥
गयातीर्थं परं गुह्यं पितॄणां चातिवल्लभम्।
कृत्वा पिण्डप्रदानं तु न भूयो जायते नरः॥ ७ ॥
सकृद् गयाभिगमनं कृत्वा पिण्डं ददाति यः।
तारिताः पितरस्तेन यास्यन्ति परमां गतिम्॥ ८ ॥
तत्र लोकहितार्थाय रुद्रेण परमात्मना।
शिलातले पदं न्यस्तं तत्र पितॄन् प्रसादयेत् ॥ ९ ॥
गयाऽभिगमनं कर्तुं यः शक्तो नाभिगच्छति।
शोचन्ति पितरस्तं वै वृथा तस्य परिश्रमः॥१०॥
वहाँ स्नान करके विशुद्धात्मा व्यक्ति दम्भ और मात्सर्यसे | रहित होकर जो कुछ भी दान करता है, उससे वह दोनों (माता-पिताके) कुलोंको पवित्र करता है॥६॥
गया नामक परम गुह्य तीर्थ पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ पिण्डदान करके मनुष्यका पुनः जन्म नहीं होता। जो एक बार भी गया जाकर पिण्डदान करता है, उसके द्वारा तारे गये पितर (नरक आदि कष्टप्रद लोकोंसे मुक्त होकर) परम गतिको प्राप्त करते हैं। वहाँ (गयामें) संसारके कल्याणकी कामनासे परमात्मा रुद्रने शिलातलपर चरण (-का चिह्न) स्थापित किया है। वहाँपर पितरोंको (पिण्डदान आदिद्वारा) प्रसन्न करना चाहिये। गयाकी यात्रा करने में समर्थ होनेपर भी जो वहाँ नहीं जाता, उसके सम्बन्धमें पितर शोक करते हैं, उसका (अन्य सभी) परिश्रम व्यर्थ ही होता है॥७-१०॥
गायन्ति पितरो गाथा: कीर्तयन्ति महर्षयः।
गयां यास्यति यः कश्चित् सोऽस्मान् संतारयिष्यति॥११॥
यदि स्यात् पातकोपेतः स्वधर्मरतिवर्जितः।
गयां यास्यति वंश्यो यः सोऽस्मान् संतारयिष्यति ॥१२॥
एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः।
तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥१३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणस्तु विशेषतः।
दद्याद् विधिवत् पिण्डान् गयां गत्वा समाहितः॥१४॥
धन्यास्तु खलुते मा गयायां पिण्डदायिनः।
कुलान्युभयतः सप्त समुद्धृत्याप्नुयात् परम्॥१५॥
पितर इस गाथाका गान करते हैं और महर्षि इसका कीर्तन करते हैं कि जो कोई भी गया जायगा, वही हमें तारेगा अर्थात् असद्गतिसे मुक्त करेगा। मेरे वंशमें उत्पन्न व्यक्ति किसी कारण भले ही पापयुक्त हो, स्वधर्ममें निष्ठा न रखता हो, तब भी यदि गया-तीर्थकी यात्रा करेगा तो वह हम लोगोंका तारक होगा। शीलवान् तथा गुणवान् बहुतसे पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उन सभीमेंसे कोई एक तो गया जायगा। इसलिये सभी प्रयत्नोंके द्वारा विशेषरूपसे ब्राह्मणको तो गया जाकर समाहित-मनसे विधिवत् पिण्डदान करना चाहिये। वे मनुष्य धन्य हैं जो गयामें पिण्डदान करते हैं। वे दोनों (माता-पिताके) कुलकी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर स्वयं भी परमगति प्राप्त करते हैं॥११-१५॥
अन्यच्च तीर्थप्रवरं सिद्धावासमुदाहृतम्।
प्रभासमिति विख्यातं यत्रास्ते भगवान् भवः॥१६॥
तत्र स्नानं तपः श्राद्धं ब्राह्मणानां च पूजनम् ।
कृत्वा लोकमवाप्नोति ब्रह्मणोऽक्षय्यमुत्तमम्॥१७॥
तीर्थं त्रयम्बकं नाम सर्वदेवनमस्कृतम्।
पूजयित्वा तत्र रुद्रं ज्योतिष्टोमफलं लभेत्॥१८॥
सुवर्णाक्षं महादेवं समभ्यर्च्य कपर्दिनम्।
ब्राह्मणान् पूजयित्वा तु गाणपत्यं लभेध्रुवम्॥१९॥
अन्य प्रभास नामक प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसे सिद्धोंका निवास स्थान बतलाया गया है। वहाँ भगवान् भव (शंकर) स्थित हैं। वहाँ स्नान, तप, श्राद्ध तथा ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे ब्रह्माके अक्षय्य और उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। त्रयम्बक नामक तीर्थ सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत है। वहाँ रुद्रकी आराधना करने से ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ कपर्दी तथा सुवर्णाक्ष महादेवको भलीभाँति आराधना करने तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे निश्चय ही गाणपत्य-पदकी प्राप्ति होती है॥१६-१९॥
सोमेश्वरं तीर्थवरं रुद्रस्य परमेष्ठिनः।
सर्वव्याधिहरं पुण्यं रुद्रसालोक्यकारणम्॥२०॥
परमेष्ठी रुद्रका सोमेश्वर नामक श्रेष्ठ तीर्थ सभी प्रकारकी व्याधियोंका हरण करनेवाला, पवित्र तथा रुद्रलोककी प्राप्ति करानेका साधन है॥२०॥
तीर्थानां परमं तीर्थं विजयं नाम शोभनम्।
तत्र लिङ्गं महेशस्य विजयं नाम विश्रुतम्॥२१॥
षण्मासान् नियताहारो ब्रह्मचारी समाहितः।
उषित्वा तत्र विप्रेन्द्रा यास्यन्ति परमं पदम्॥२२॥
अन्यच्च तीर्थप्रवरं पूर्वदेशे सुशोभनम्।
एकानं देवदेवस्य गाणपत्यफलप्रदम्॥२३॥
दत्त्वात्र शिवभक्तानां किञ्चिच्छश्वन्महीं शुभाम्।
सार्वभौमो भवेद् राजा मुमुक्षुर्मोक्षमाप्नुयात्॥२४॥
महानदीजलं पुण्यं सर्वपापविनाशनम्।
ग्रहणे समुपस्पृश्य मुच्यते सर्वपातकैः॥२५॥
विजय नामका एक सुन्दर तीर्थ है जो तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। वहाँ महेश्वरका विजय नामक प्रसिद्ध लिङ्ग है। वहाँपर छः महीनेतक संयत आहार करते हुए ब्रह्मचर्य-
व्रत धारणकर, एकाग्र-मनसे उपवास कर श्रेष्ठ ब्राह्मण परम पद प्राप्त करते हैं। पूर्व दिशामें अत्यन्त सुन्दर एक दूसरा एकाम्र नामक श्रेष्ठ तीर्थ है जो देवाधिदेव
(शंकर)-के गाणपत्यपदरूपी फलको प्रदान करनेवाला है। वहाँ शिवभक्तोंको थोड़ी-सी भी स्थिर तथा सुन्दर भूमि दान करनेसे (दाता) चक्रवर्ती सम्राट होता है और मोक्षकी इच्छा रखनेवाला मोक्ष प्राप्त करता है। वहाँ महानदीका जल पवित्र और सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है, ग्रहणके समय उसका स्पर्श (स्नान आदि) करनेसे सभी पातकोंसे मुक्ति हो जाती है। २१-२५॥
अन्या च विरजा नाम नदी त्रैलोक्यविश्रुता।
तस्यां स्नात्वा नरो विप्रा ब्रह्मलोके महीयते॥२६॥
तीर्थं नारायणस्यान्यन्नाम्ना तु पुरुषोत्तमम्।
तत्र नारायणः श्रीमानास्ते परमपूरुषः ।। २७॥
पूजयित्वा परं विष्णुं स्नात्वा तत्र द्विजोत्तमः ।
ब्राह्मणान् पूजयित्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥२८॥
तीर्थानां परमं तीर्थं गोकर्णं नाम विश्रुतम्।
सर्वपापहरं शम्भोर्निवासः परमेष्ठिनः॥२९॥
दृष्ट्वा लिङ्गं तु देवस्य गोकर्णेश्वरमुत्तमम्।
ईप्सिताल्लभते कामान् रुद्रस्य दयितो भवेत्॥३०॥
उत्तरं चापि गोकर्ण लिङ्गं देवस्य शूलिनः।
महादेवस्यार्चयित्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥३१॥
विप्रो! दूसरी विरजा नामकी एक नदी है जो तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। नारायणका पुरुषोत्तम नामक एक दूसरा तीर्थ है, वहाँ परम पुरुष श्रीमान् नारायण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके श्रेष्ठ विष्णुकी अर्चना और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे द्विजोत्तम विष्णुलोक प्राप्त करता है। सभी पापोंको हरनेवाला तीर्थों में श्रेष्ठ गोकर्ण नामका
एक प्रसिद्ध तीर्थ है। वहाँ परमेष्ठी शम्भुका निवास है। वहाँ देव (शंकर)-के गोकर्णेश्वर नामक उत्तम लिङ्गका दर्शनकर मनुष्य अभीप्सित कामनाओंको प्राप्त करता है और रुद्रका प्रिय होता है। उत्तर गोकर्णमें भी त्रिशूलधारी शंकर महादेवका लिङ्ग है। उसकी अर्चनासे शिव-सायुज्यकी प्राप्ति होती है॥ २६-३१॥
तत्र देवो महादेवः स्थाणुरित्यभिविश्रुतः।
तं दृष्ट्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते तत्क्षणान्नरः॥३२॥
अन्यत् कुब्जाममतुलं स्थानं विष्णोर्महात्मनः।
सम्पूज्य पुरुषं विष्णुं श्वेतद्वीपे महीयते॥३३॥
यत्र नारायणो देवो रुद्रेण त्रिपुरारिणा।
कृत्वा यज्ञस्य मथनं दक्षस्य तु विसर्जितः॥३४॥
देवाधिदेव महादेव वहाँ स्थाणु' इस नामसे विख्यात हैं। उनका दर्शनकर मनुष्य तत्क्षण ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। महात्मा विष्णुका एक दूसरा कुब्जाम्र
नामक अतुलनीय स्थान है, वहाँ विष्णु (-स्वरूप) पुरुषका पूजन करनेसे व्यक्ति (भगवान्के धाम) श्वेतद्वीपमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यहाँ त्रिपुरारि रुद्रने ही दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेके अनन्तर नारायणदेवको प्रतिष्ठित किया है॥ ३२-३४॥
समन्ताद् योजनं क्षेत्रं सिद्धर्षिगणवन्दितम्।
पुण्यमायतनं विष्णोस्तत्रास्ते पुरुषोत्तमः॥३५॥
यहाँ चारों ओर एक योजनमें फैला क्षेत्र है जो सिद्धों तथा ऋषिगणोंसे वन्दित है। यहींपर विष्णुका पवित्र मन्दिर है, जिसमें पुरुषोत्तम (विष्णु) स्थित हैं॥ ३५॥
अन्यत् कोकामुखं विष्णोस्तीर्थमद्भुतकर्मणः।
मृतोऽत्र पातकैर्मुक्तो विष्णुसारूप्यमाप्नुयात्॥३६॥
शालग्रामं महातीर्थं विष्णोः प्रीतिविवर्धनम्।
प्राणांस्तत्र नरस्त्यक्त्वा हृषीकेशं प्रपश्यति॥३७॥
अश्वतीर्थमिति ख्यातं सिद्धावासं सुपावनम्।
आस्ते हयशिरा नित्यं तत्र नारायणः स्वयम्॥३८॥
अद्भुतकर्मा विष्णुका एक दूसरा कोकामुख नामका तीर्थ है, यहाँ मृत मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है और विष्णुके सारूप्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करता है। शालग्राम नामका महातीर्थ विष्णुको प्रीतिको बढ़ानेवाला है। वहाँ प्राणोंका त्यागकर मनुष्य हृषीकेशका दर्शन प्राप्त करता है। अश्वतीर्थ नामका एक अन्य तीर्थ है जो सिद्धोंका निवास-स्थल तथा अत्यन्त पवित्र है। वहाँ स्वयं नारायण हयग्रीव-रूपसे नित्य स्थित रहते हैं॥३६-३८॥
तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
पुष्करं सर्वपापघ्नं मृतानां ब्रह्मलोकदम्॥३९॥
मनसा संस्मरेद् यस्तु पुष्करं वै द्विजोत्तमः ।
पूयते पातकैः सर्वैः शक्रेण सह मोदते॥४०॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।
उपासते सिद्धसङ्घा ब्रह्माणं पद्मसम्भवम्॥४१॥
तत्र स्नात्वा भवेच्छुद्धो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
पूजयित्वा द्विजवरान् ब्रह्माणं सम्प्रपश्यति॥४२॥
तत्राभिगम्य देवेशं पुरुहूतमनिन्दितम्।
सुरूपो जायते मर्त्यः सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥४३॥
परमेष्ठी ब्रह्माका पुष्कर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा वहाँ मरनेवालोंको ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला है। जो द्विजोत्तम मनसे भी पुष्करका स्मरण करता है, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है और (इन्द्रलोकमें देवराज) इन्द्रके साथ आनन्द करता है। वहाँ गन्धर्वो, यक्षों, नागों, राक्षसों तथा सिद्धोंके समूहोंके साथ देवता पद्मजन्मा ब्रह्माकी उपासना करते हैं। वहाँ स्नानसे शुद्ध होकर परमेष्ठी ब्रह्मा तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे ब्रह्माजीका साक्षात्कार प्राप्त होता है। वहाँ जाकर अनिन्दित देवराज इन्द्रका दर्शन करनेसे मनुष्य सुन्दर रूपसे सम्पन्न हो जाता है और सभी कामनाओंको प्राप्त करता है॥३९-४३॥
सप्तसारस्वतं तीर्थं ब्रह्माद्यैः सेवितं परम्।
पूजयित्वा तत्र रुद्रमश्वमेधफलं लभेत्॥४४॥
यत्र मङ्कणको रुद्रं प्रपन्नः परमेश्वरम्।
आराधयामास हरं पञ्चाक्षरपरायणः॥४५॥
नमः शिवायेति मुनिः जपन् पञ्चाक्षरं परम्।
आराधयामास शिवं तपसा गोवृषध्वजम्॥ ४६ ।।
ब्रह्मा आदिके द्वारा सेवित सप्तसारस्वत नामक एक श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ रुद्रकी पूजा करनेसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ मङ्कणक (नामक शिवभक्त मुनि) परमेश्वर रुद्रके शरणागत हुए थे और पञ्चाक्षर-मन्त्र (नमः शिवाय)-का जप करते हुए उन्होंने शिवकी आराधना की थी। (वहाँ) मुनि (मङ्कणक)-ने 'नमः शिवाय' इस श्रेष्ठ पञ्चाक्षर-मन्त्रका जप करते हुए तपस्याद्वारा गोवृषध्वज शिवकी आराधना की थी॥ ४४-४६॥
प्रजज्वालाथ तपसा मुनिर्मङ्कणकस्तदा।
ननर्त हर्षवेगेन ज्ञात्वा रुद्रं समागतम्॥४७॥
तं प्राह भगवान् रुद्रः किमर्थं नर्तितं त्वया।
दृष्ट्वापि देवमीशानं नृत्यति स्म पुनः पुनः॥४८॥
तदनन्तर रुद्रको आया हुआ जानकर मङ्कणक मुनि तपस्याके तेजसे उद्दीप्त हो गये और आनन्दातिरेकसे नृत्य करने लगे। भगवान् रुद्रने उनसे पूछा-'आप क्यों नृत्य कर रहे हैं।' (किंतु वे कुछ बोले नहीं और) देव ईशानको देखनेपर भी (अपनी नृत्यकलाको सर्वोत्तम समझकर) बार-बार नृत्य करते ही रहे ॥ ४७-४८॥
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सोऽन्वीक्ष्य भगवानीशः सगर्वं गर्वशान्तये।
स्वकं देहं विदार्यास्मै भस्मराशिमदर्शयत्॥४९॥
पश्येमं मच्छरीरोत्थं भस्मराशिं द्विजोत्तम।
माहात्म्यमेतत् तपसस्त्वादृशोऽन्योऽपि विद्यते॥५०॥
यत् सगर्वं हि भवता नर्तितं मुनिपुंगव।
न युक्तं तापसस्यैतत् त्वत्तोऽप्यत्राधिको ह्यहम्॥५१॥
तब भगवान् शंकर उन्हें गर्वयुक्त देखकर उनके गर्वको दूर करनेके लिये अपने शरीरको विदीर्ण कर (उसमेंसे निकलती हुई) भस्मराशि उन्हें दिखलायी (और कहा) हे द्विजोत्तम! मेरे शरीरसे निकलती हुई इस भस्मराशिको देखो। यह तपस्याका माहात्म्य है। आपके समान दूसरा भी है। मुनिपुंगव! आप (तपस्याके) गर्वसे गर्वित होकर नृत्य कर रहे हैं, यह एक तपस्वीके लिये उचित नहीं है, मैं आपसे भी अधिक (नृत्यकला में कुशल-बड़ा तपस्वी) हूँ॥ ४९-५१॥
इत्याभाष्य मुनिश्रेष्ठं स रुद्रः किल विश्वदृक् ।
आस्थाय परमं भावं ननर्त जगतो हरः॥५२॥
सहस्रशीर्षा भूत्वा सहस्राक्षः सहस्रपात्।
दंष्ट्राकरालवदनो ज्वालामाली भयंकरः॥५३॥
सोऽन्वपश्यदशेषस्य पार्वे तस्य त्रिशूलिनः।
विशाललोचनामेकां देवीं चारुविलासिनीम्।
सूर्यायुतसमप्रख्यां प्रसन्नवदनां शिवाम्॥५४॥
सस्मितं प्रेक्ष्य विश्वेशं तिष्ठन्तीममितद्युतिम्।
दृष्ट्वा संत्रस्तहृदयो वेपमानो मुनीश्वरः।
ननाम शिरसा रुद्रं रुद्राध्यायं जपन् वशी॥५५॥
मुनिश्रेष्ठ (मङ्कणक)-से ऐसा कहकर वे विश्वद्रष्टा तथा संसारके संहारक रुद्र परम भावमें स्थित होकर नृत्य करने लगे। (वे रुद्र) हजारों सिर, हजारों आँख और हजारों चरणवाले, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले, ज्वालामालाओंसे व्याप्त तथा अत्यन्त भीषण रूपवाले हो गये। तदनन्तर उन मङ्कणकने उन अशेष (विराट् शरीरवाले) त्रिशूलधारीके पार्श्व-भागमें विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर विलासयुक्त, हजारों सूर्योंके समान तेजवाली और प्रसन्न मुखवाली देवी शिवाको देखा। मुसकराते हुए विश्वेश्वर (शिव) तथा अमित द्युतिसम्पन्न (शिवा)-को स्थित देखकर मुनीश्वर (मङ्कणक)-का हृदय भयभीत हो गया और वे (अपने गर्वको ध्यानमें रखकर) काँपने लगे तथा संयमित होकर रुद्राध्यायका जप करते हुए उन्होंने रुद्रको सिरसे प्रणाम किया॥५२-५५॥
प्रसन्नो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः।
पूर्ववेषं स जग्राह देवी चान्तर्हिताभवत्॥५६॥
आलिङ्गय भक्तं प्रणतं देवदेवः स्वयं शिवः।
न भेतव्यं त्वया वत्स प्राह किं ते ददाम्यहम्॥५७॥
उन भक्तवत्सल त्र्यम्बक भगवान् शिवने प्रसन्न होकर अपना पूर्वरूप धारण किया और देवी अन्तर्हित हो गयीं। साक्षात् देवाधिदेव शिवने शरणागत भक्त का आलिङ्गनकर कहा-वत्स! तुम डरो मत! मैं तुम्हें क्या प्रदान करूँ? ॥५६-५७॥
प्रणम्य मूर्जा गिरिशं हरं त्रिपुरसूदनम्।
विज्ञापयामास तदा हृष्टः प्रष्टुमना मुनिः॥५८॥
नमोऽस्तु ते महादेव महेश्वर नमोऽस्तु ते।
किमेतद् भगवद्रूपं सुघोरं विश्वतोमुखम्॥५९॥
काचसा भगवत्पावें राजमाना व्यवस्थिता।
अन्तर्हितेव सहसा सर्वमिच्छामि वेदितुम्॥६०॥
तब प्रसन्न मुनि (मङ्कणक)-ने त्रिपुरका नाश करनेवाले गिरिश हरको सिरसे प्रणामकर पूछने की इच्छासे कहा-महादेव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! आपको नमस्कार है। सभी ओर मुखवाला आपका यह भयंकर कौन-सा रूप है? और आपके पार्श्वभाग में स्थित होकर सुशोभित होनेवाली वे देवी कौन हैं? जो सहसा अन्तर्धान हो गयीं। मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ॥५८-६०॥
इत्युक्ते व्याजहारेमं तथा मङ्कणकं हरः।
महेश: स्वात्मनो योगं देवीं च त्रिपुरानलः॥६१॥
अहं सहस्रनयनः सर्वात्मा सर्वतोमुखः।
दाहकः सर्वपापानां कालः कालकरो हरः॥१२॥
मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं चेतनाचेतनात्मकम्।
सोऽन्तर्यामी स पुरुषो ह्यहं वै पुरुषोत्तमः॥६३॥
तस्य सा परमा माया प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका।
प्रोच्यते मुनिभिः शक्तिर्जगद्योनिः सनातनी॥६४॥
स एष मायया विश्वं व्यामोहयति विश्ववित्।
नारायणः परोऽव्यक्तो मायारूप इति श्रुतिः॥६५॥
एवमेतजगत् सर्वं सर्वदा स्थापयाम्यहम्।
योजयामि प्रकृत्याऽहं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥६६॥
(मङ्कणकके) इतना कहनेपर त्रिपुरदाहक महेश्वर हरने मङ्कणकसे अपने योग तथा देवीका इस प्रकार वर्णन किया। मैं हजार नेत्रोंवाला, सर्वात्मा, सभी ओर मुखवाला, सभी पापोंको जलानेवाला, काल, काल को भी उत्पन्न करनेवाला हर हूँ। मेरे द्वारा ही समस्त चेतन एवं अचेतन-स्वरूप (जगत्) प्रवृत्त किया जाता है। मैं ही वह अन्तर्यामी और मैं ही वह पुरुष तथा पुरुषोत्तम हूँ, जिसकी त्रिगुणात्मिका प्रकृति-रूप परम माया मुनियोंके द्वारा सनातनी शक्ति और जगत्का मूल कारण कही जाती है। मैं वही सर्वज्ञ (पुरुष) हूँ जो माया द्वारा विश्वको व्यामोहित करता है और जिसे श्रुति नारायण, पर, अव्यक्त तथा मायारूप कहती है। मैं इसी प्रकार सदा इस जगत्की स्थापना करता हूँ। मैं प्रकृतिसे उस पुरुषको संयुक्त करता हूँ (जो पचीस तत्त्वोंमें एक-मात्र चेतन प्रमुख तत्त्व है।)॥६१-६६॥
तथा वै संगतो देवः कूटस्थः सर्वगोऽमलः।
सृजत्यशेषमेवेदं स्वमूर्तेः प्रकृतेरजः॥६७॥
स देवो भगवान् ब्रह्मा विश्वरूपः पितामहः।
तवैतत् कथितं सम्यक् स्रष्टुत्वं परमात्मनः।। ६८॥
एकोऽहं भगवान् कालो ह्यनादिश्चान्तकृद् विभुः।
समास्थाय परं भावं प्रोक्तो रुद्रो मनीषिभिः॥६९॥
इस प्रकार यह देव (चेतन), कूटस्थ (निर्विकार), सर्वत्र विद्यमान, निर्मल, नित्यपुरुष अपनी ही मूर्ति 'प्रकृति से संगत होकर समस्त जगत्की सृष्टि करता है। इसी पुरुषको देव, भगवान्, ब्रह्मा, विश्वरूप एवं पितामहके रूपमें समझना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपको भलीभाँति परमात्माके सृष्टिकर्तृत्वको बतलाया। मैं अद्वितीय, अनादि, संहार करनेवाला, विभु तथा भगवान् काल हूँ। परम भावका आश्रय ग्रहण करने पर मनीषी लोग मुझे रुद्र कहते हैं॥६७-६९॥
मम वै सापरा शक्तिर्देवी विद्येति विश्रुता।
दृष्टा हि भवता नूनं विद्यादेहस्त्वहं ततः॥७०॥
एवमेतानि तत्त्वानि प्रधानपुरुषेश्वराः।
विष्णुब्रह्मा च भगवान् रुद्रः काल इति श्रुतिः॥७१॥
त्रयमेतदनाद्यन्तं ब्रह्मण्येव व्यवस्थितम्।
तदात्मकं तदव्यक्तं तदक्षरमिति श्रुतिः॥७२॥
आत्मानन्दपरं तत्त्वं चिन्मानं परमं पदम्।
आकाशं निष्कलं ब्रह्म तस्मादन्यन्न विद्यते॥७३॥
एवं विज्ञाय भवता भक्तियोगाश्रयेण तु।
सम्पूज्यो वन्दनीयोऽहं ततस्तं पश्य शाश्वतम्॥७४।।
मेरी ही अपरा शक्ति विद्यादेवीके नामसे प्रसिद्ध है। मेरे विद्या-रूप देहका और मेरा आपने दर्शन किया है। इस प्रकार ये सभी तत्त्व प्रधान, पुरुष और ईश्वररूप हैं। श्रुतिने इन्हें ही विष्णु, ब्रह्मा और कालरूप भगवान् रुद्र कहा है। ये तीनों ही अनादि तथा अनन्त ब्रह्म में ही स्थित हैं। अतः श्रुतिका कथन है कि ये तीनों देव तदात्मक, (परमपुरुष ईश्वररूप), वही अव्यक्तरूप, वही अक्षररूप, आत्मानन्दस्वरूप, परमतत्त्व, चिन्मात्र और परम पदरूप हैं, आकाशरूप एवं निष्कल ब्रह्म है। वास्तवमें परमतत्त्व ईश्वरके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। ऐसा जानकर आपको भक्तियोगका अवलम्बन लेकर मेरी पूजा तथा वन्दना करनी चाहिये। तदनन्तर आपको उस शाश्वत (पुरुष)-के दर्शन होंगे॥७०-७४॥
एतावदुक्त्वा भगवाञ्जगामादर्शनं हरः।
तत्रैव भक्तियोगेन रुद्रमाराधयन्मुनिः ॥७५॥
एतत् पवित्रमतुलं तीर्थं ब्रह्मर्षिसेवितम्।
संसेव्य ब्राह्मणो विद्वान् मुच्यते सर्वपातकैः॥७६ ॥
इतना कहकर भगवान् हर अदृश्य हो गये। मुनि (मङ्कणक) वहीं (सप्तसारस्वत तीर्थ)-पर भक्तियोग के द्वारा रुद्रकी आराधना करने लगे। यह अतुलनीय पवित्र तीर्थ ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित है। इसका सेवनकर विद्वान् ब्राह्मण सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है । ७५-७६ ॥
Summary of chapter 83 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa outlines the arduous penances required to cleanse the severe karmic pollution caused by Mahāpātakas. He details extreme vows, long-term fasting, continuous chanting of sacred Vedic Mantras, pilgrimage to holy Tīrthas, and grand charitable acts that burn away dark karmic impressions and restore spiritual eligibility.