34 अध्याय

प्रयागका माहात्म्य, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवाद, प्रयागमें संगम-स्नानका फल

ऋषय ऊचुः

माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् तदुदीरितम्।

इदानीं तु प्रयागस्य माहात्म्यं ब्रूहि सुव्रत ॥१॥

यानि तीर्थानि तत्रैव विश्रुतानि महान्ति वै।

इदानीं कथयास्माकं सूत सर्वार्थविद् भवान्॥२॥

ऋषियोंने कहा-सुव्रत ! अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी) के माहात्म्यका आपने भलीभाँति वर्णन किया। अब इस समय प्रयागका माहात्म्य बतलायें। सूतजी! आप समस्त अर्थों को जाननेवाले हैं, अब आप वहाँ (प्रयाग) के जो महान् प्रसिद्ध तीर्थ हैं, उन्हें हमें बताइये ॥ १-२॥

सूत उवाच

शृणुध्वमृषयः सर्वे विस्तरेण ब्रवीमि वः।

प्रयागस्य च माहात्म्यं यत्र देवः पितामहः॥३॥

मार्कण्डेयेन कथितं कौन्तेयाय महात्मने।

यथा युधिष्ठिरायैतत् तद्वक्ष्ये भवतामहम्॥४॥

सूतजी बोले-ऋषियो! आप सभी सुनें। मैं विस्तारसे आप लोगोंको प्रयागका माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पितामह देव स्थित हैं। (महर्षि) मार्कण्डेय ने कुन्ती के पुत्र महात्मा युधिष्ठिरसे जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंको बताता हूँ॥३-४॥

निहत्य कौरवान् सर्वान् भ्रातृभिः सह पार्थिवः।

शोकेन महताविष्टो मुमोह स युधिष्ठिरः॥५॥

अचिरेणाथ कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।

सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे स तिष्ठति॥६॥

भाइयोंके साथ सभी कौरवोंको मारनेके उपरान्त राजा युधिष्ठिर महान् शोकसे आविष्ट होकर मोह से ग्रस्त हो गये। तदनन्तर थोड़े ही समय बाद महान् तपस्वी मार्कण्डेय मुनि हस्तिनापुरमें आये और राजमहल के द्वारपर खड़े हो गये॥५-६॥

द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।

मार्कण्डेयो द्रष्टुमिच्छंस्त्वामास्ते द्वार्यसौ मुनिः॥७॥

त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमेत्याह तत्परम्।

स्वागतं ते महाप्राज्ञ स्वागतं ते महामुने॥८॥

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।

अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि तुष्टे महामुने॥९॥

उन्हें देखकर द्वारपालने भी शीघ्र जाकर राजा (युधिष्ठिर) से कहा-आपके दर्शनकी इच्छासे मुनि मार्कण्डेय द्वारपर खड़े हैं। धर्मपुत्र युधिष्ठिर शीघ्र ही तत्परतापूर्वक द्वारपर गये और कहने लगे-महाप्राज्ञ! महामुने! आपका स्वागत है, स्वागत है। आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा कुल तर गया। महामुने! आपके प्रसन्न होनेपर आज मेरे पितृगण संतुष्ट हो गये॥७-९॥

सिंहासनमुपस्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः।

युधिष्ठिरो महात्मेति पूजयामास तं मुनिम्॥१०॥

महात्मा युधिष्ठिरने उन मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन, पूजन इत्यादिके द्वारा उनका सम्मान किया ॥१०॥

मार्कण्डेयस्ततस्तुष्टः प्रोवाच स युधिष्ठिरम्।

किमर्थं मुह्यसे विद्वन् सर्वं ज्ञात्वाहमागतः॥११॥

ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्याह महामुनिम्।

कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषैः ॥१२॥

तब प्रसन्न होकर मार्कण्डेयने युधिष्ठिरसे कहा-विद्वन्! आप मोह क्यों कर रहे हैं? सभी कुछ जानकर ही मैं यहाँ आया हूँ। तदनन्तर राजा युधिष्ठिर ने प्रणामकर महामुनिसे कहा-आप संक्षेपमें (कोई उपाय) बतलायें, जिससे मैं पापोंसे मुक्त हो सकूँ॥११-१२॥

निहता बहवो युद्धे पुंसो निरपराधिनः।

अस्माभिः कौरवैः सार्धं प्रसङ्गान्मुनिपुंगव ॥१३॥

येन हिंसासमुद्भूताजन्मान्तरकृतादपि।

मुच्यते पातकादस्मात् तद् भवान् वक्तुमर्हति॥१४॥

हे मुनिश्रेष्ठ! हमने (युद्धके) प्रसंगवश कौरवों के साथ अनेक निरपराध मनुष्योंको युद्धमें मारा है, अतः आप वह (कोई उपाय) बतलायें, जिससे हिंसाजनित दोष एवं जन्मान्तरमें किये गये पापों तथा इस पापसे भी मुक्ति मिले ॥१३-१४॥

मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन् महाभाग यन्मां पृच्छसि भारत।

प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पापनाशनम्॥१५॥

तत्र देवो महादेवो रुद्रो विश्वामरेश्वरः।

समास्ते भगवान् ब्रह्मा स्वयम्भूरपि दैवतैः॥१६॥

मार्कण्डेयने कहा-हे राजन् ! भारत! महाभाग! आप जो मुझसे पूछते हैं उसे सुनें-मनुष्योंके लिये पापको नष्ट करने-हेतु प्रयागकी यात्रा करना श्रेष्ठ (उपाय) है। वहाँ सभी देवताओंके ईश्वर महादेव रुद्रदेव और स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा देवताओं के साथ विराजमान हैं ॥१५-१६॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवञ्च्छ्रोतुमिच्छामि प्रयागगमने फलम्।

मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानामपि किं फलम्॥ १७॥

ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां तु किं फलम्।

भवता विदितं ह्येतत् तन्मे ब्रूहि नमोऽस्तु ते॥१८॥

युधिष्ठिर बोले-भगवन्! मैं सुनना चाहता हूँ कि प्रयाग जानेका क्या फल है? वहाँ मरनेवालों की कौन गति होती है और वहाँ स्नान करनेवालोंको क्या फल

मिलता है? जो प्रयागमें निवास करते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, आपको यह सब कुछ ज्ञात है, अत: मुझे वह सब बतायें, आपको नमस्कार है॥ १७-१८॥

मार्कण्डेय उवाच

कथयिष्यामि ते वत्स या चेष्टा यच्च तत्फलम्।

पुरा महर्षिभिः सम्यक् कथ्यमानं मया श्रुतम्॥१९॥

एतत् प्रजापतिक्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।

अत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ॥२०॥

तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः।

बहून्यन्यानि तीर्थानि सर्वपापापहानि तु॥२१॥

कथितुं नेह शक्नोमि बहुवर्षशतैरपि।

संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्येह कीर्तनम्॥ २२॥

मार्कण्डेयने कहा-वत्स! प्राचीन काल में महर्षियों द्वारा कही गयी (प्रयागकी महिमा) एवं प्रयाग-निवासका फल आदि जो कुछ मैंने सुना है, उसे मैं भलीभाँति आपको बतलाऊँगा। यह प्रजापति- क्षेत्र तीनों लोकोंमें विख्यात है। यहाँपर स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते

हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ ब्रह्मा आदि देवता मिलकर (प्रयाग-निवासियोंकी) रक्षा करते हैं और सभी पापोंको दूर करनेवाले अन्य भी अनेक तीर्थ यहाँ हैं। मैं सैकड़ों वर्षों में भी उनका वर्णन नहीं कर सकता तथापि संक्षेपमें ही प्रयाग (-की महिमा) का कीर्तन करता हूँ॥१९-२२॥

षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम्।

यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः ॥२३॥

प्रयागे तु विशेषेण स्वयं वसति वासवः ।

मण्डलं रक्षति हरिः सर्वदेवैश्च सम्मितम्॥२४॥

साठ हजार धनुष जाह्नवी (गङ्गा)-की रक्षा करते हैं और सात अश्वोंको वाहन बनानेवाले सवितादेव सदा यमुना की रक्षा करते हैं। प्रयागमें विशेषरूपसे इन्द्र स्वयं निवास करते हैं। समस्त देवोंसे युक्त विष्णु प्रयागमण्डल की रक्षा करते हैं ॥ २३-२४॥

न्यग्रोधं रक्षते नित्यं शूलपाणिमहेश्वरः।

स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥२५॥

स्वकर्मणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।

स्वल्पं स्वल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।

प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥२६॥

(प्रयागके विशाल) वटवृक्षकी रक्षा हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले महेश्वर नित्य करते हैं और सभी पापों को हरनेवाले इस शुभ स्थानकी रक्षा सभी देवता करते हैं। हे नराधिप! जो लोग अपने कर्मोंसे घिरे हैं तथा जिनका छोटेसे भी छोटा पाप बचा रहता है, वे लोग उस मोक्ष-पदको प्राप्त नहीं करते, किंतु प्रयाग का स्मरण करनेवालेका यह सभी कुछ (पाप एवं कर्म) नष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥

दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि।

मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥२७॥

पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।

प्रयागं विशतः पुंसः पापं नश्यति तत्क्षणात्॥२८॥

योजनानां सहस्त्रेषु गङ्गां यः स्मरते नरः।

अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमां गतिम्॥ २९ ।।

इस (प्रयाग) तीर्थके दर्शन करनेसे, नामका संकीर्तन करने से अथवा यहाँकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे भी मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र ! यहाँ (प्रयाग में) पाँच कुण्ड हैं, जिनके बीच में जाह्नवी (गङ्गा) स्थित है। प्रयाग में प्रवेश करनेवालेका पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है। सहस्रों योजन दूरसे भी जो मनुष्य गङ्गाका स्मरण करता है, वह दुष्कृत करनेवाला होनेपर भी परम गतिको प्राप्त करता है॥ २७-२९ ॥

कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।

तथोपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोके महीयते॥३०॥

हे राजेन्द्र! (प्रयागका नाम-) कीर्तन करने से (मनुष्य) पापसे मुक्त हो जाता है और इसका दर्शन करनेसे (उसे सर्वत्र) मङ्गल-ही-मङ्गल दिखलायी पड़ता है तथा यहाँ आचमन (इसके जलसे स्नान) करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥ ३०॥

व्याधितो यदि वा दीनः क्रुद्धो वापि भवेन्नरः ।

गङ्गायमुनमासाद्य त्यजेत् प्राणान् प्रयत्नतः॥३१॥

दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानै नुवर्णिभिः

ईप्सितॉल्लभते कामान् वदन्ति मुनिपुंगवाः ॥३२॥

कोई मनुष्य व्याधिग्रस्त हो, दीन हो अथवा क्रुद्ध हो, यदि वह प्रयत्नपूर्वक गङ्गा-यमुनाके समीप पहुंचकर प्राण-त्याग करता है तो वह सूर्यके समान उद्दीप्त, स्वर्णिम आभावाले विमानोंसे युक्त होकर अभीष्ट पदार्थों को प्राप्त करता है-ऐसा श्रेष्ठ मुनिजनोंका कहना है ॥ ३१-३२॥

सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः

वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते

शुभलक्षणः॥३३॥

गीतवादित्रनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।

यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥३४॥

वह शुभ लक्षणोंवाला (मनुष्य) सभी रत्नोंसे युक्त अनेक प्रकारकी दिव्य ध्वजाओंसे परिपूर्ण और वराङ्गनाओं से समन्वित होकर आनन्दित होता है। शयन करनेपर वह गीत और वाद्यकी ध्वनिसे जगाया जाता है, जबतक वह जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठित रहता है॥३३-३४॥

तस्मात् स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा नरोत्तम।

हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले॥३५॥

तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति।

देशस्थो यदि वारण्ये विदेशे यदि वा गृहे ॥३६ ।।

प्रयागं स्मरमाणस्तु यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।

ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति मुनिपुंगवाः॥३७॥

सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।

ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥३८॥

नरोत्तम! (पुण्य) कर्मोके क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर वह स्वर्ण तथा रत्नोंसे परिपूर्ण समृद्ध कुलमें जन्म लेता है और इसी तीर्थ (प्रयाग)-का स्मरण करता है। स्मरण होनेपर पुनः वहाँ जाता है। अपने देश, विदेश, अरण्य अथवा घरमें जो प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्याग करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है, ऐसा श्रेष्ठ मुनि कहते हैं। वह उस लोकमें जाता है, जहाँके सभी वृक्ष इच्छानुसार फल देते हैं, जहाँ की भूमि स्वर्णमयी है और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धजन रहते हैं ॥ ३५-३८॥

स्त्रीसहस्राकुले रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।

मोदते मुनिभिः सार्धं स्वकृतेनेह कर्मणा ॥३९॥

सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः ।

ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ४०॥

ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः ।

गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः।

कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः।। ४१॥

अपने किये कर्मोक कारण वह सहस्रों स्त्रियों से रमणीय मन्दाकिनी के शुभ तटपर मुनियोंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। वह स्वर्गमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा देवताओं से पूजित होता है, तदनन्तर स्वर्गसे च्युत होनेपर वह (पुरुष) जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। तदुपरान्त वह बार-बार शुभ कर्मों का चिन्तन करता हुआ गुणवान् तथा धनसम्पन्न हो जाता है और मन, वाणी तथा कर्मसे सत्यधर्मपर प्रतिष्ठित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥३९-४१॥

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु ग्राम प्रतीच्छति।

सुवर्णमथ मुक्तां वा तथैवान्यान् प्रतिग्रहान्॥४२॥

स्वकार्ये पितृकार्ये वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।

निष्फलं तस्य तत् तीर्थ यावत् तत्फलमश्नुते॥४३॥

अतस्तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्वायतनेषु च।

निमित्तेषु च सर्वेषु अप्रमत्तो द्विजो भवेत्॥४४॥

जो व्यक्ति स्वकार्य, पितृकार्य अथवा देवताकी पूजा करते समय गङ्गा और यमुनाके मध्यमें ग्राम, सुवर्ण, मोती या अन्य कोई पदार्थ प्रतिग्रह (दान)-में लेता है, उसे तीर्थका पुण्य उस समयतक नहीं मिलता है, जबतक वह दानमें लिये हुए पदार्थका भोग करता रहता है । अतः तीर्थों तथा पवित्र मन्दिरोंमें दान नहीं लेना चाहिये। द्विजको सभी प्रकार के प्रयोजनोंमें सावधान रहना चाहिये ॥ ४२-४४॥

कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।

स्वर्णशृङ्गी रौप्यखुरां चैलकण्ठां पयस्विनीम्॥ ४५ ॥

यावद्रोमाणि तस्या वै सन्ति गात्रेषु सत्तम।

तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥४६॥

श्रेष्ठ (युधिष्ठिर)! जो व्यक्ति (प्रयागमें) कपिल अथवा पाटलवर्णकी, सुवर्णमण्डित सींगवाली, रजतमण्डित खुरोंवाली, वस्त्रसे आच्छादित कण्ठवाली पयस्विनी गायका दान करता है, वह उतने हजार वर्षां तक रुद्रलोक में पूजित होता है, जितने उस गायके शरीर में रोम होते हैं॥ ४५-४६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहनयां संहितायां पूर्वविभागे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥