कूर्म महा पुराण
48 अध्याय
पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन
सूत उवाच
शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन व्यवस्थितः।
क्षीरार्णवं समाश्रित्य द्वीपः पुष्करसंवृतः॥ १ ॥
एक एवात्र विप्रेन्द्राः पर्वतो मानसोत्तरः।
योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।
तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः॥ २ ॥
स एव द्वीपः पश्चार्धे मानसोत्तरसंज्ञितः।
एक एव महासानुः संनिवेशाद् द्विधा कृतः॥ ३ ॥
तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।
अपरौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ।
महावीतं स्मृतं वर्ष धातकीखण्डमेव च॥ ४ ॥
स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।
तस्मिन् द्वीपे महावृक्षो न्यग्रोधोऽमरपूजितः ॥ ५ ॥
सूतजी बोले-शाकद्वीपके दुगुने विस्तारमें क्षीरसागरके आश्रित पुष्कर नामक द्वीप स्थित है। हे विप्रेन्द्रो! यहाँ मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह साढ़े पचास हजार योजन ऊँचा है और चारों ओर विस्तारमें इसका परिमण्डल अर्थात् घेरा भी उतने ही परिमाणका है। इस
द्वीपके ही पश्चिमकी ओर आधे भागमें मानसोत्तर नामसे एक ही महापर्वत अपनी विशेष स्थितिके कारण दो भागोंमें बँटा है। इस द्वीपमें दो शुभ एवं पवित्र जनपद कहे गये हैं। वे दोनों मानस पर्वतके अनु-मण्डल हैं। (ये) महावीत तथा धातकी खण्ड नामक वर्ष कहे गये हैं। पुष्करद्वीप (स्वादूदक समुद्र) स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे चारों ओरसे घिरा है। उस द्वीपमें देवताओं द्वारा पूजित न्यग्रोध (वट)-का एक महान् वृक्ष है॥ १-५॥
तस्मिन् निवसति ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।
तत्रैव मुनिशार्दूलाः शिवनारायणालयः॥ ६ ॥
महादेवो हरोऽर्धहरिरव्ययः।
सम्पूज्यमानो ब्रह्माद्यैः कुमाराद्यैश्च योगिभिः।
गन्धर्वैः किंनरैर्यक्षैरीश्वरः कृष्णपिङ्गलः॥ ७ ॥
स्वस्थास्तत्र प्रजाः सर्वा ब्रह्मणा सदृशत्विषः।
निरामया विशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ८ ॥
सत्यानृते न तत्रास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।
न वर्णाश्रमधर्माश्च न नद्यो न च पर्वताः॥ ९॥
परेण पुष्करस्याथ समावृत्य स्थितो महान्।
स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्ताद् द्विजसत्तमाः॥१०॥
उसी (द्वीप)-में विश्वभावन विश्वात्मा ब्रह्मा रहते हैं। मुनिश्रेष्ठो! वहींपर शिवनारायणका मन्दिर है। यहाँ आधे भागमें हर (एवं आधेमें) अव्यय हरिके रूपमें (अर्थात् हरिहरात्मक रूपमें) महादेव निवास करते हैं। यहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं, कुमार (सनत्कुमार) आदि योगियों, गन्धों तथा किंनरों एवं यक्षोंद्वारा ईश्वर कृष्णपिङ्गल पूजित होते हैं। यहाँकी सारी प्रजा स्वस्थ है, ब्रह्माके समान प्रभावान् है और रोग, शोक, राग तथा द्वेषसे रहित है। वहाँ सत्य, असत्य, उत्तम, मध्यम, अधम (-का विभेद) नहीं है। न वर्णाश्रम धर्म है, न नदियाँ हैं और न पर्वत हैं। हे द्विजसत्तमो! पुष्कर द्वीप के परे उसे चारों ओरसे घेरते हुए महान् स्वादूदक सागर स्थित है॥६-१०॥
परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।
काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैव शिलोपमा॥११॥
वसत्यत्र
तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादात्मात्ममण्डलः।
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥१२॥
योजनानां सहस्राणि दश तस्योच्छ्यः स्मृतः।
तावानेव च विस्तारो लोकालोको महागिरिः॥१३॥
उसके अनन्तर महती लोकस्थिति दिखलायी पड़ती है। वहाँकी द्विगुणित समस्त भूमि स्वर्णमयी और शिलाके समान है। उसके आगे सूर्यमण्डल की मर्यादास्वरूप एक मर्यादा पर्वत है। (इसका एक भाग) प्रकाशित (तथा दूसरा) अप्रकाशित रहता है। इसीलिये वह लोकालोक (पर्वत) कहलाता है, लोकालोक नामक इस महान् पर्वतकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है और उतना ही इसका विस्तार (फैलाव) भी है॥११-१३॥
समावृत्य तु तं शैलं सर्वतो वै तमः स्थितम्।
तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात् परिवेष्टितम्॥१४॥
एते सप्त महालोकाः पातालाः सप्त कीर्तिताः।
ब्रह्माण्डस्यैष विस्तारः संक्षेपेण मयोदितः॥१५॥
अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः ।
सर्वगत्वात् प्रधानस्य कारणस्याव्ययात्मनः ॥१६॥
इस पर्वतको सभी ओरसे आवृतकर अन्धकार स्थित है और यह अन्धकार अण्डकटाह (चारों ओर विद्यमान ब्रह्माण्डरूपी कटाह)-के द्वारा चारों ओरसे परिवेष्टित है। यह अण्डकटाह ही सात महालोक और सात पातालके रूपमें प्रसिद्ध है। मैंने संक्षेपमें ब्रह्माण्ड का यह विस्तार बतलाया। प्रधान, कारणरूप और अव्ययात्मा के सर्वव्यापी होनेके कारण इस प्रकारके हजारों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं, ऐसा समझना चाहिये ।। १४–१६॥
अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश।
तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा रुद्रा नारायणादयः ।। १७॥
दशोत्तरमथैकैकमण्डावरणसप्तकम्
समन्तात् संस्थितं विप्रा यत्र यान्ति मनीषिणः॥१८॥
अनन्तमेकमव्यक्तमनादिनिधनं महत्।
अतीत्य वर्तते सर्वं जगत् प्रकृतिरक्षरम्॥१९ ।।
अनन्तत्वमनन्तस्य यतः संख्या न विद्यते।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं तद् ब्रह्म परमं पदम्॥२०॥
इन सभी ब्रह्माण्डोंमें चौदह भुवन होते हैं, इन सभीमें चतुर्मुख ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि होते हैं। हे विप्रो! (ब्रह्माण्डके) चारों ओर सात आवरण हैं, वे परिमाणमें क्रमशः एक दूसरेसे दस गुना अधिक हैं। यहाँ मनीषी लोग जाते हैं। अनन्त, अद्वितीय, अव्यक्त, अनादिनिधन, महत् और जगत्के प्रकृतिस्वरूप अक्षर (ब्रह्म) इन सभी (आवरणों)- का अतिक्रमण-
कर विद्यमान रहते हैं। इनकी कोई संख्या नहीं होती, इसीलिये इन्हें अनन्त कहा जाता है। इन्हें ही अव्यक्त समझना चाहिये। ये ही ब्रह्म परम पद (अन्तिम प्राप्तव्य) हैं ॥ १७-२०॥
अनन्त एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु पठ्यते।
तस्य पूर्वं मयाप्युक्तं यत्तन्माहात्म्यमव्ययम्॥२१॥
गतः स एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु वर्तते।
भूमौ रसातले चैव आकाशे पवनेऽनले।
अर्णवेषु च सर्वेषु दिवि चैव न संशयः ॥२२॥
तथा तमसि सत्त्वे च एष एव महाद्युतिः।
अनेकधा विभक्ताङ्गः क्रीडते पुरुषोत्तमः॥२३॥
महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।
अण्डाद् ब्रह्मा समुत्पन्नस्तेन सृष्टमिदं जगत्॥२४॥
ये अनन्त सर्वत्र सभी स्थानोंमें हैं, ऐसा कहा गया है। इनका जो अव्यय माहात्म्य है, मैंने भी पूर्वमें उसका वर्णन किया है। वही ये (परमात्मा) ही भूमि, रसातल, आकाश, वायु, अग्नि, सभी समुद्रों तथा स्वर्ग- सर्वत्र, सभी स्थानोंमें विद्यमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये ही महाद्युतिमान् पुरुषोत्तम अन्धकार तथा (प्रकाशात्मा) सत्त्वमें विद्यमान होते हुए अपने अङ्गोंको अनेक रूपों में विभक्तकर क्रीडा करते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न होता है। अण्डसे ब्रह्मा उत्पन्न हैं और उन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है। २१-२४॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहसयां संहितायां पूर्वविभागे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥४८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥४८॥
Summary of chapter 46 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta details the glorious celestial cities of the eight Ashṭadikpālas located atop the peaks surrounding Mount Meru: Indrapurī, Agnipurī, Yamapurī, Nirrtipurī, Varuṇapurī, Vāyupurī, Kuberapurī, and Īshānapurī. Each guardian deity upholds cosmic order under the supreme command of Mahādeva and Vishṇu.