29 अध्याय

व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न,

व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका

माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल

ऋषय ऊचुः

प्राप्य वाराणसी दिव्यां कृष्णद्वैपायनो मुनिः।

किमकार्षीन्महाबुद्धिः श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ १ ॥

ऋषियोंने कहा-(सूतजी!) महाबुद्धिमान् कृष्ण-द्वैपायन (व्यास) मुनिने दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुंचकर क्या किया? इस विषयको सुननेके लिये हम लोगों को कौतूहल है॥१॥

सूत उवाच

प्राप्य वाराणसी दिव्यामुपस्पृश्य महामुनिः।

पूजयामास जाह्नव्यां देवं विश्वेश्वरं शिवम्॥ २ ॥

तमागतं मुनिं दृष्ट्वा तत्र ये निवसन्ति वै।

पूजयाञ्चक्रिरे व्यासं मुनयो मुनिपुङ्गवम्॥ ३ ॥

पप्रच्छुः प्रणताः सर्वे कथाः पापविनाशिनीः ।

महादेवाश्रयाः पुण्या मोक्षधर्मान् सनातनान्॥ ४ ॥

स चापि कथयामास सर्वज्ञो भगवानृषिः ।

माहात्म्यं देवदेवस्य धर्मान् वेदनिदर्शितान्॥ ५ ॥

तेषां मध्ये मुनीन्द्राणां व्यासशिष्यो महामुनिः।

पृष्टवान् जैमिनिर्व्यासं गूढमर्थं सनातनम् ॥ ६ ॥

सूतजी बोले-दिव्य वाराणसीमें पहुँचकर महा-मुनि ने गङ्गामें आचमनकर (स्नानकर) विश्वेश्वर देव शिवका पूजन किया। उन मुनि (व्यासजी)-को आया देखकर वहाँ निवास करनेवाले मुनियोंने मुनिश्रेष्ठ व्यासकी पूजा की। उन सभीने महादेवसे सम्बद्ध पापोंका नाश करनेवाली पुण्यदायिनी कथा तथा सनातन मोक्ष धर्मों को विनयपूर्वक पूछा। सर्वज्ञ उन भगवान् (व्यास) ऋषिने भी देवाधिदेव (शिव)-का माहात्म्य तथा वेदमें निर्दिष्ट धर्मोंका वर्णन किया। उन मुनियों के मध्य व्यासके शिष्य महामुनि जैमिनिने व्यासजी से सनातन गूढ अर्थ पूछा ॥२-६॥

जैमिनिरुवाच

भगवन् संशयं त्वेकं छेत्तुमर्हसि तत्त्वतः।

न विद्यते ह्यविदितं भवता परमर्षिणा॥ ७ ॥

केचिद् ध्यानं प्रशंसन्ति धर्ममेवापरे जनाः।

अन्ये सांख्यं तथा योगं तपस्त्वन्ये महर्षयः॥ ८ ॥

ब्रह्मचर्यमथो मौनमन्ये प्राहुर्महर्षयः।

अहिंसां सत्यमप्यन्ये संन्यासमपरे विदुः॥ ९ ॥

केचिद् दयां प्रशंसन्ति दानमध्ययनं तथा।

तीर्थयात्रां तथा केचिदन्ये चेन्द्रियनिग्रहम्॥१०॥

किमेतेषां भवेज्यायः प्रब्रूहि मुनिपुङ्गव।

यदि वा विद्यतेऽप्यन्यद् गुह्यं तद्वक्तुमर्हसि ॥११॥

जैमिनिने कहा-भगवन् ! एक संशयको आप यथार्थ रूप से दूर करें, क्योंकि आप परम ऋषि को कुछ भी अविदित नहीं है। कुछ लोग ध्यान की प्रशंसा करते हैं, कुछ दूसरे धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्य लोग सांख्य तथा योगको, कुछ महर्षि तपको, कोई ब्रह्मचर्य को और दूसरे महर्षि मौन धारणको, कुछ अहिंसा एवं सत्यको तथा कुछ विद्वान् संन्यासको श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ लोग दयाकी प्रशंसा करते हैं तो कुछ दान तथा अध्ययनकी। इसी प्रकार कुछ तीर्थयात्राको तथा दूसरे लोग इन्द्रियनिग्रहको महत्त्व देते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इनमें से बतलायें कि कौन सर्वाधिक श्रेष्ठ है अथवा अन्य भी यदि कोई गुह्य साधन हो तो उसे आप बतलायें ।।७-११॥

श्रुत्वा स जैमिनेर्वाक्यं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।

प्राह गम्भीरया वाचा प्रणम्य वृषकेतनम्॥१२॥

जैमिनि की बात सुनकर वे कृष्ण द्वैपायन मुनि वृषभध्वज (शंकर)-को प्रणाम करते हुए गम्भीर वाणीमें बोले- ॥१२॥

भगवानुवाच

साधु साधु महाभाग यत्पृष्टं भवता मुने।

वक्ष्ये गुह्यतमाद् गुह्यं शृण्वन्त्वन्ये महर्षयः॥१३॥

भगवान् (व्यास)-ने कहा-महाभाग्यशाली मुने! आप धन्य हैं, धन्य हैं। आपने जो पूछा है, मैं उस गुह्यतमसे भी गुह्य (तत्त्व)-को कहता हूँ, अन्य सभी महर्षि भी सुनें-॥१३॥

ईश्वरेण पुरा प्रोक्तं ज्ञानमेतत् सनातनम्।

गूढमप्राज्ञविद्विष्टं सेवितं सूक्ष्मदर्शिभिः॥१४॥

नाश्रद्दधाने दातव्यं नाभक्ते परमेष्ठिनः ।

न वेदविद्विषि शुभं ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्॥१५॥

मेरुशृङ्गे पुरा देवमीशानं त्रिपुरद्विषम्।

देवासनगता देवी महादेवमपृच्छत ॥ १६ ॥

अज्ञानी लोग जिससे द्वेष करते हैं और सूक्ष्मदर्शी जिसका सेवन करते हैं, वह गूढ सनातन ज्ञान प्राचीन कालमें ईश्वर (शंकर)-के द्वारा कहा गया है। जो श्रद्धारहित हो, परमेष्ठी (शंकर)-का भक्त न हो और वेदसे द्वेष रखता हो, ऐसे व्यक्तिको सभी ज्ञानोंमें उत्तम इस शुभ ज्ञानको नहीं प्रदान करना चाहिये। प्राचीन कालमें मेरु-शिखरपर भगवान् शंकरके साथ एक ही आसनपर स्थित देवी पार्वतीने त्रिपुरारि देव, ईशान महादेवसे पूछा- ॥ १४–१६ ॥

देव्युवाच

देवदेव महादेव भक्तानामार्तिनाशन।

कथं त्वां पुरुषो देवमचिरादेव पश्यति॥१७॥

सांख्ययोगस्तथा ध्यानं कर्मयोगोऽथ वैदिकः।

आयासबहुला लोके यानि चान्यानि शंकर ॥१८॥

येन विभ्रान्तचित्तानां योगिनां कर्मिणामपि।

दृश्यो हि भगवान् सूक्ष्मः सर्वेषामथ देहिनाम्॥१९॥

एतद् गुह्यतमं ज्ञानं गूढं ब्रह्मादिसेवितम्।

हिताय सर्वभक्तानां ब्रूहि कामाङ्गनाशन ।। २०॥

देवीने कहा-देवाधिदेव महादेव! आप भक्तों के कष्टको दूर करनेवाले । पुरुष किस प्रकार शीघ्र ही आप देवका दर्शन कर सकता है? कामदेवका विनाश करनेवाले शंकर! लोकमें सांख्ययोग, ध्यान, वैदिक कर्मयोग और अन्य भी अनेक अधिक परिश्रमसाध्य (उपाय) बतलाये गये हैं। (उनमें) जो ब्रह्मा आदि द्वारा सेवित उपाय या अत्यन्त गुह्य एवं गूढ ज्ञान हो, उसे आप हम सभी भक्तोंके कल्याणके लिये बतलायें, जिससे भ्रान्तचित्तवालों अथवा कर्मयोगी मनुष्यों एवं समस्त देहधारियोंको सूक्ष्म भगवान्का दर्शन हो सके। १७–२०॥

ईश्वर उवाच

अवाच्यमेतद् विज्ञानं ज्ञानमज्ञैर्बहिष्कृतम्।

वक्ष्ये तव यथातत्त्वं यदुक्तं परमर्षिभिः ॥२१॥

परं गुह्यतमं क्षेत्रं मम वाराणसी पुरी।

सर्वेषामेव भूतानां संसारार्णवतारिणी॥२२॥

तत्र भक्ता महादेवि मदीयं व्रतमास्थिताः।

निवसन्ति महात्मानः परं नियममास्थिताः॥२३॥

उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च तत्।

ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानमविमुक्तं परं मम॥२४॥

ईश्वर बोले-परम ऋषियों ने जिस विज्ञान को कहा है, अज्ञानियोंने जिस ज्ञानका विरोध किया है और जो अकथनीय है, उसे मैं तत्त्वतः तुमसे कहता हूँ। पुरी वाराणसी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। यह सभी प्राणियों को संसार सागर से पार उतारनेवाली है। महादेवि! यहाँ मेरे व्रतको धारण करनेवाले भक्त तथा श्रेष्ठ नियमका आश्रय ग्रहण करनेवाले महात्मा निवास करते हैं। यह मेरा अविमुक्त (काशीक्षेत्र) सभी तीर्थोंमें उत्तम, सभी स्थानों में श्रेष्ठ और सभी ज्ञानोंमें उत्तम ज्ञानरूप है ॥ २१-२४॥

स्थानान्तरं पवित्राणि तीर्थान्यायतनानि च।

श्मशानसंस्थितान्येव दिव्यभूमिगतानि च ॥ २५ ॥

भूलॊके नैव संलग्नमन्तरिक्षे ममालयम्।

अयुक्तास्तन्न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥२६॥

श्मशानमेतद् विख्यातमविमुक्तमिति श्रुतम्।

कालो भूत्वा जगदिदं संहराम्यत्र सुन्दरि॥ २७॥

इस दिव्य भूमिमें महाश्मशानरूपी* काशीमें अन्य अनेक पवित्र स्थान, तीर्थ तथा मन्दिर प्रतिष्ठित हैं। मेरा गृहस्वरूप (यह वाराणसी क्षेत्र) भूलोकसे सम्बद्ध नहीं है, अपितु अन्तरिक्षमें (अवस्थित) है, अयोगियोंको इसके दर्शन नहीं होते। जो योगी हैं वे ध्यानमें इसका दर्शन करते हैं। सुन्दरी! यह महाश्मशानके नामसे विख्यात है और इसे अविमुक्त (क्षेत्र) भी कहा जाता है। मैं कालरूप होकर यहाँ इस संसारका संहार करता हूँ। २५-२७ ।।

देवीदं सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतमं मम।

मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति मामेव प्रविशन्ति ते॥२८॥

दत्तं जप्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

ध्यानमध्ययनं ज्ञानं सर्वं तत्राक्षयं भवेत्॥२९॥

जन्मान्तरसहस्त्रेषु यत्पापं पूर्वसंचितम्।

अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम्॥३०॥

देवि! सभी गुह्य स्थानोंमें यह मेरा सर्वाधिक प्रिय स्थान है। मेरे भक्त यहाँ आते ही मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यहाँ किया हुआ दान, जप, होम, यज्ञ, तप, कर्म, ध्यान, अध्ययन और ज्ञानार्जन-सब कुछ अक्षय हो जाता है। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रविष्ट होनेवालेका हजारों जन्मान्तरोंमें किया हुआ जो पूर्वसंचित पाप है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २८-३०॥

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये वर्णसंकराः।

स्त्रियो म्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः॥३१॥

कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः ।

कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते वरानने॥३२॥

चन्द्रार्धमौलयस्त्र्यक्षा महावृषभवाहनाः।

शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः॥३३॥

नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी।

ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम्॥ ३४॥

मोक्षं सुदुर्लभं मत्वा संसारं चातिभीषणम्।

अश्मना चरणौ हत्वा वाराणस्यां वसेन्नरः॥३५॥

वरानने! अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें कालवश मृत्युको प्राप्त-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री, म्लेच्छ, अन्य संकीर्ण पाप योनिवाले सभी मानव प्राणी, कीड़े, चींटी तथा जो भी अन्य मृग-पक्षी आदि हैं-ये सभी सिरपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, त्रिनेत्र तथा महावृषभ (नन्दी)- को वाहन बनानेवाले (शिव-स्वरूप) मानव बनकर मेरे कल्याणमय पुरमें उत्पन्न होते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें मरा हुआ कोई पापी नरक में नहीं जाता है, ईश्वर (शंकर)-से कृपा-प्राप्त वे सभी परम गति प्राप्त करते हैं। मोक्षको अत्यन्त दुर्लभ और संसार को अत्यन्त भीषण समझकर पत्थरद्वारा पैरोंको तोड़कर मनुष्य को वाराणसी में निवास करना चाहिये॥ ३१-३५॥

दुर्लभा तपसा चापि पूतस्य परमेश्वरि।

यत्र तत्र विपन्नस्य गतिः संसारमोक्षिणी॥३६॥

प्रसादाज्जायते ह्येतन्मम शैलेन्द्रनन्दिनि।

अप्रबुद्धा न पश्यन्ति मम मायाविमोहिताः॥३७॥

अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः।

विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः॥ ३८॥

हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि।

सयाति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति॥३९॥

परमेश्वरी! तपस्याद्वारा पवित्र हुए प्राणीके लिये भी जहाँ-कहीं मरनेपर संसारसे मुक्त करनेवाली गति दुर्लभ होती है। शैलपुत्री! मेरे अनुग्रहसे (वह गति) यहाँ प्राप्त हो जाती है। मेरी मायासे विमोहित अज्ञानी लोग इस तत्त्वको नहीं समझते हैं। अज्ञानसे आवृत मूढ़ लोग अविमुक्त क्षेत्रका सेवन नहीं करते, वे मल-मूत्र और रजोवीर्य (-से युक्त नरक)-के बीच बार-बार निवास करते हैं। सैकड़ों विघ्नोंसे आहत होने पर भी जो विद्वान् (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे उस परम स्थानको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ३६-३९॥

जन्ममृत्युजरामुक्तं परं यान्ति शिवालयम्।

अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाक्षिणाम्।

यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्यन्ति पण्डिताः॥४०॥

न दानैर्न तपोभिश्च न यज्ञैर्नापि विद्यया।

प्राप्यते गतिरुत्कृष्टा याविमुक्ते तु लभ्यते॥४१॥

 (वे) जन्म, मृत्यु और जरारहित होकर शिवके श्रेष्ठ निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। पुनः मरणको न प्राप्त करनेवाले मोक्षार्थियोंकी वह सद्गति होती है, जिसे प्राप्तकर पण्डित लोग (स्वयंको) कृतकृत्य मानते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें जो उत्कृष्ट गति प्राप्त होती है, वह न दानोंसे, न विविध तपोंसे, न यज्ञोंसे और न विद्याद्वारा ही प्राप्त की जा सकती है॥४०-४१॥

नानावर्णा विवर्णाश्च चण्डालाद्या जुगुप्सिताः।

किल्बिषैः पूर्णदेहा ये विशिष्टैः पातकैस्तथा।

भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः॥४२॥

अविमुक्तं परं ज्ञानमविमुक्तं परं पदम्।

अविमुक्तं परं तत्त्वमविमुक्तं परं शिवम्॥४३॥

कृत्वा वै नैष्ठिकी दीक्षामविमुक्ते वसन्ति ये।

तेषां तत्परमं ज्ञानं ददाम्यन्ते परं पदम्॥४४॥

विद्वानोंका यह कहना है कि अनेक (ब्राह्मणादि) वर्णवाले मनुष्यों, वर्णरहित चण्डालादिकों, घृणित व्यक्तियों तथा जो पापों तथा विशिष्ट पापों (महापापों)-से युक्त देहवाले हैं, उनके लिये अविमुक्त क्षेत्र (वाराणसी का सेवन ही) परम ओषधि है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम ज्ञान है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम पद है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम तत्त्व है और अविमुक्त (क्षेत्र) परम कल्याण है। नैष्ठिकी दीक्षा ग्रहण कर जो अविमुक्त (क्षेत्र)-में निवास करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ ज्ञान और अन्तमें परम पद प्रदान करता हूँ॥ ४२-४४॥

प्रयागं नैमिषं पुण्यं श्रीशैलोऽथ महालयः।

केदारं भद्रकर्णं च गया पुष्करमेव च॥४५॥

कुरुक्षेत्रं रुद्रकोटिर्नर्मदानातकेश्वरम्।

शालिग्रामं च कुब्जानं कोकामुखमनुत्तमम्।

प्रभासं विजयेशानं गोकर्णं भद्रकर्णकम्॥४६॥

एतानि पुण्यस्थानानि त्रैलोक्ये विश्रुतानि ह।

नयास्यन्ति परं मोक्षं वाराणस्यां यथा मृताः॥४७॥

वाराणस्यां विशेषेण गङ्गा त्रिपथगामिनी।

प्रविष्टा नाशयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम्॥४८॥

प्रयाग, पुण्यदायी नैमिषारण्य, महालय श्रीशैल, केदार, भद्रकर्ण, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, रुद्रकोटि, नर्मदा, आम्रातकेश्वर, शालिग्राम, कुब्जाम्र, श्रेष्ठ कोकामुख, प्रभास, विजयेशान, गोकर्ण तथा भद्रकर्ण-ये सभी पवित्र तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात हैं, किंतु जिस प्रकार वाराणसीमें मरे हुए व्यक्तियोंको परम मोक्ष प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र प्राप्त नहीं होता। वाराणसीमें प्रविष्ट त्रिपथगामिनी (स्वर्ग, पाताल एवं भूलोक इस प्रकार तीन पथोंमें प्रवाहित होनेवाली) गङ्गा सैकड़ों जन्मोंमें किये हुए पापोंको नष्ट करनेमें अपना विशिष्ट स्थान रखती है ॥ ४५-४८॥

अन्यत्र सुलभा गङ्गा श्राद्धं दानं तपो जपः।

व्रतानि सर्वमेवैतद् वाराणस्यां सुदुर्लभम्॥४९॥

यजेत जुहुयान्नित्यं ददात्यर्चयतेऽमरान्।

वायुभक्षश्च सततं वाराणस्यां स्थितो नरः॥५०॥

यदि पापो यदि शठो यदि वाऽधार्मिको नरः।

वाराणसी समासाद्य पुनाति सकलं नरः॥५१॥

वाराणस्यां महादेवं येऽर्चयन्ति स्तुवन्ति वै।

सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते विज्ञेया गणेश्वराः ॥५२॥

गङ्गा, श्राद्ध, दान, तप, जप तथा व्रत वाराणसी में सभी सुलभ हैं, परंतु अन्यत्र दुर्लभ हैं। वाराणसी में स्थित मनुष्य ऐसा ज्ञान अत्यल्प परिश्रमसे प्राप्त कर लेता है, जिसके सहारे वायुभक्षी होकर नित्य हवन करता है, यज्ञ करता है, दान देता है तथा देवताओंकी पूजा करता है। मनुष्य पापी हो, शठ हो अथवा अधार्मिक हो, तब भी वाराणसीमें पहुंचकर अपने संसर्गमें रहनेवाले सबको पवित्र कर देता है। वाराणसीमें जो महादेवकी स्तुति करते हैं, अर्चना करते हैं, उन्हें सभी पापोंसे मुक्त (शंकरके) गणेश्वर समझना चाहिये॥ ४९-५२॥

अन्यत्र योगज्ञानाभ्यां संन्यासादथवान्यतः।

प्राप्यते तत् परं स्थानं सहस्त्रेणैव जन्मना॥५३॥

ये भक्ता देवदेवेशे वाराणस्यां वसन्ति वै।

ते विन्दन्ति परं मोक्षमेकेनैव तु जन्मना॥५४॥

यत्र योगस्तथा ज्ञानं मुक्तिरेकेन जन्मना।

अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत्तपोवनम्॥५५॥

दूसरे स्थानमें योग, ज्ञान, संन्यास अथवा अन्य उपायों से हजारों जन्मोंमें वह परमपद-मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु देवदेवेश शंकर के जो भक्त वाराणसीमें निवास करते हैं, वे एक ही जन्ममें परमपद-मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जहाँ एक ही जन्ममें योग, ज्ञान अथवा मुक्ति मिल जाती है, उस अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें पहुंचकर फिर किसी दूसरे तपोवनमें नहीं जाना चाहिये ॥५३-५५॥

यतो मया न मुक्तं तदविमुक्तं ततः स्मृतम्।

तदेव गुह्यं गुह्यानामेतद् विज्ञाय मुच्यते॥५६ ।।

ज्ञानाज्ञानाभिनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।

या गतिर्विहिता सुभ्र साविमुक्ते मृतस्य तु ।। ५७॥

यानि चैवाविमुक्तस्य देहे तूक्तानि कृत्स्नशः।

पुरी वाराणसी तेभ्यः स्थानेभ्यो ह्यधिका शुभा॥५८॥

चूँकि मैं वाराणसी क्षेत्र कभी नहीं छोड़ता, इसलिये वह अविमुक्त (क्षेत्र) कहलाता है, यही गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य (ज्ञान) है। इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे सुभ्र (सुन्दर भौंहोंवाली)! ज्ञान* (ब्रह्मज्ञान) और अज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधनरूप ज्ञान)-में निरत तथा परमानन्दकी इच्छा करनेवालोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्त (क्षेत्र)-में मरनेवालोंको प्राप्त होती है। अविमुक्तरूप देह (विराट्)-में जिन क्षेत्रों का | वर्णन हुआ है, उन सभी क्षेत्रोंमें वाराणसीपुरी अधिक शुभ है॥५६-५८॥

यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते स्वयमीश्वरः।

व्याचष्टे तारकं ब्रह्म तत्रैव ह्यविमुक्तकम्॥५९।।

यत् तत् परतरं तत्त्वमविमुक्तमिति श्रुतम्।

एकेन जन्मना देवि वाराणस्यां तदाप्नुयात्॥६०॥

भ्रूमध्ये नाभिमध्ये च हृदये चैव मूर्धनि।

यथाविमुक्तमादित्ये वाराणस्यां व्यवस्थितम्॥६१॥

यह अविमुक्त क्षेत्र ऐसा है, जहाँ साक्षात् महादेव ईश्वर देहान्त होनेके समय तारक ब्रह्मका उपदेश देते हैं। देवि! जो वह परतर तत्त्व 'अविमुक्त' नामसे कहा जाता है, वह वाराणसीमें एक जन्ममें ही प्राप्त हो जाता है। (विराट्के) भौंहोंके मध्य, नाभिके मध्य, हृदयमें, मूर्धा में तथा आदित्यमें जिस प्रकार अविमुक्त स्थित है, उसी प्रकार वाराणसीमें अविमुक्त क्षेत्र प्रतिष्ठित है॥५९-६१ ॥

वरणायास्तथा चास्या मध्ये वाराणसी पुरी।

तत्रैव संस्थितं तत्त्वं नित्यमेवाविमुक्तकम्॥६२॥

वाराणस्याः परं स्थानं न भूतं न भविष्यति।

यत्र नारायणो देवो महादेवो दिवेश्वरः॥६३॥

तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।

उपासते मां सततं देवदेवं पितामहम्॥ ६४॥

वरुणा और असीके मध्य वाराणसीपुरी है। वहाँ अविमुक्त नामक नित्य तत्त्व स्थित है। जहाँ नारायण देव और महादेव दिवेश्वर (सुरलोकके अधिपति) स्थित हैं, उस वाराणसीसे श्रेष्ठ स्थान न कोई हुआ है और न कोई होगा। वहाँ गन्धर्वो, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंसहित सभी देवता मुझ देवाधिदेव पितामह की सतत उपासना करते हैं। ६२-६४॥

महापातकिनो ये च ये तेभ्यः पापकृत्तमाः।

वाराणसी समासाद्य ते यान्ति परमां गतिम्॥६५॥

तस्मान्मुमुक्षुर्नियतो वसेद् वै मरणान्तिकम्।

वाराणस्यां महादेवाज्ज्ञानं लब्ध्वा विमुच्यते॥६६॥

किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसः ।

ततो नैव चरेत् पापं कायेन मनसा गिरा॥६७॥

एतद् रहस्यं वेदानां पुराणानां च सुव्रताः ।

अविमुक्ताश्रयं ज्ञानं न कश्चिद् वेत्ति तत्त्वतः॥६८॥

जो महापापी हैं और उनसे भी जो अधिक पाप करनेवाले (अतिपातकी) हैं, वे वाराणसी पहुंचकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। इसलिये मोक्षार्थी को मरणपर्यन्त वाराणसीमें निश्चितरूपसे निवास करना चाहिये। वाराणसीमें महादेवसे ज्ञान प्राप्तकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। किंतु पापसे आक्रान्त चित्तवालोंको विघ्न होते हैं। इसलिये शरीर, मन और वाणीसे पाप नहीं करना चाहिये। सुव्रतो! (उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले) यह वेदों और पुराणोंका रहस्य है। अविमुक्तसे सम्बद्ध ज्ञानको कोई तत्त्वतः जानता नहीं है ॥ ६५-६८॥

देवतानामृषीणां च शृण्वतां परमेष्ठिनाम्।

देव्यै देवेन कथितं सर्वपापविनाशनम्।। ६९॥

महादेवने देवताओं, ऋषियों तथा परमेष्ठियोंके समक्ष देवी पार्वतीसे सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले इस ज्ञानको कहा था ॥६९॥

यथा नारायणः श्रेष्ठो देवानां पुरुषोत्तमः ।

यथेश्वराणां गिरिशः स्थानानां चैतदुत्तमम्॥ ७० ॥

यैः समाराधितो रुद्रः पूर्वस्मिन्नेव जन्मनि।

ते विन्दन्ति परं क्षेत्रमविमुक्तं शिवालयम्॥७१॥

कलिकल्मषसम्भूता येषामुपहता मतिः।

न तेषां वेदितुं शक्यं स्थानं तत् परमेष्ठिनः ॥७२॥

जिस प्रकार देवताओंमें पुरुषोत्तम नारायण श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार ईश्वरोंमें गिरिश (महादेव) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी स्थानोंमें यह (अविमुक्त क्षेत्र) श्रेष्ठ है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें रुद्रकी उपासना की है, वे ही परम अविमुक्त क्षेत्र नामक शिवके निवास स्थान को प्राप्त करते हैं। कलिके दोषोंके कारण जिनकी बुद्धि उपहत हो गयी है, वह परमेष्ठीके उस स्थानको जान नहीं सकते ॥७०-७२ ।।

ये स्मरन्ति सदा कालं विन्दन्ति च पुरीमिमाम्।

तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥७३॥

यानि चेह प्रकुर्वन्ति पातकानि कृतालयाः।

शयेत् तानि सर्वाणि देवः कालतनुः शिवः॥७४॥

जो सर्वदा कालरूप शिवका और इस पुरी (वाराणसी) का स्मरण करते रहते हैं, उनका इस लोक और अन्य लोकका पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यहाँ निवास करनेवाले जो पाप करते हैं, कालस्वरूप देव शिव उन सबको नष्ट कर देते हैं।७३-७४॥

आगच्छतामिदं स्थानं सेवितुं मोक्षकाङ्किणाम्।

मृतानां च पुनर्जन्म न भूयो भवसागरे॥७५॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः।

योगी वाप्यथवाऽयोगी पापी वा पुण्यकृत्तमः॥७६॥

न वेदवचनात् पित्रोर्न चैव गुरुवादतः।

मतिरुत्क्रमणीया स्यादविमुक्तगतिं प्रति॥७७॥

मोक्षकी इच्छासे इस स्थानका सेवन करनेके लिये जो यहाँ आते हैं, उन्हें मृत्युके अनन्तर पुन: भवसागर में जन्म नहीं लेना पड़ता। इसीलिये चाहे योगी हो, अयोगी हो अथवा पापी हो या श्रेष्ठ पुण्यकर्मा हो, जैसा भी हो, उसे सभी प्रयत्नोंसे वाराणसीमें ही निवास करना चाहिये। वेद के वचनसे, माता-पिताके कहनेसे अथवा गुरुके वचनसे भी अविमुक्त क्षेत्र-वाराणसीमें आने के विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये ।।७५-७७॥

सूत उवाच

इत्येवमुक्त्वा भगवान् व्यासो वेदविदां वरः।

सहैव शिष्यप्रवरैर्वाराणस्यां चचार ह॥७८॥

सूतजी बोले-ऐसा कहकर वेदविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यास प्रधान शिष्योंके साथ वाराणसीमें विचरण करने लगे॥ ७८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥२९॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९ ॥