कूर्म महा पुराण
40 अध्याय
सूर्य- -रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता
आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा
सूत उवाच
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १ ॥
धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणः शक्र एव च।
विवस्वानथ पूषा च पर्जन्यश्चांशुरेव च॥ २ ॥
भगस्त्वष्टा च विष्णुश्च द्वादशैते दिवाकराः।
आप्याययन्ति वै भानुं वसन्तादिषु वै क्रमात्॥ ३ ॥
पुलस्त्यः पुलहश्चात्रिर्वसिष्ठश्चाङ्गिरा भृगुः।
भरद्वाजो गौतमश्च कश्यपः क्रतुरेव च॥ ४ ॥
जमदग्निः कौशिकश्च मुनयो ब्रह्मवादिनः।
स्तुवन्ति देवं विविधैश्छन्दोभिस्ते यथाक्रमम्॥ ५ ॥
सूतजीने कहा-वे (सूर्यदेव) (सभी) देवों, (द्वादश) आदित्यों, (अष्ट) वसुओं, गन्धों, अप्सराओं, ग्रामणी*, सो तथा राक्षसोंसहित उस रथपर अधिष्ठित रहते हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा तथा विष्णु-ये बारह आदित्य हैं। ये क्रमश: वसन्त आदि ऋतुओंमें भानु को आप्यायित करते हैं। पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, भरद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक-ये ब्रह्मवादी मुनि अनेक प्रकारके छन्दों (वैदिक मन्त्रों)-के द्वारा क्रमशः सूर्यदेवकी स्तुति करते हैं॥१-५॥
रथकृच्च रथौजाश्च रथचित्रः सुबाहुकः।
रथस्वनोऽथ वरुणः सुषेणः सेनजित् तथा॥ ६ ॥
तार्थ्यश्चारिष्टनेमिश्च रथजित् सत्यजित् तथा।
ग्रामण्यो देवदेवस्य कुर्वतेऽभीशुसंग्रहम्॥७॥
अथ हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।
सर्पो व्याघ्रस्तथापश्च वातो विद्युद् दिवाकरः॥८॥
ब्रह्मोपेतश्च विप्रेन्द्रा यज्ञोपेतस्तथैव च।
राक्षसप्रवरा ह्येते प्रयान्ति पुरतः क्रमात्॥ ९ ॥
वासुकिः कङ्कनीरश्च तक्षकः सर्पपुंगवः ।
एलापत्रः शङ्खपालस्तथैरावतसंज्ञितः॥१०॥
धनंजयो महापद्मस्तथा कर्कोटको द्विजाः।
कम्बलाश्वतरश्चैव वहन्त्येनं यथाक्रमम्॥११॥
रथकृत्, रथौजा, रथचित्र, सुबाहुक, रथस्वन, वरुण, सुषेण, सेनजित्, ताय, अरिष्टनेमि, रथजित् और सत्यजित्-ये (बारह) ग्रामणी देवोंके देव सूर्य की रश्मियोंका संग्रह करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत-ये (बारह) श्रेष्ठ राक्षस क्रम से सूर्यके आगे-आगे चलते हैं। हे द्विजो! वासुकि, कङ्कनीर, तक्षक, सर्पपुङ्गव, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा
अश्वतर-ये (बारह) नाग क्रमशः इन सूर्यदेवको वहन करते हैं॥६-११॥
तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूर्विश्वावसुस्तथा।
उग्रसेनो वसुरुचिरर्वावसुरथापरः॥१२॥
चित्रसेनस्तथोर्णायुधृतराष्ट्रो द्विजोत्तमाः।
सूर्यवर्चा द्वादशैते गन्धर्वा गायतां वराः।
गायन्ति विविधैर्गानैर्भानुषड्जादिभिः क्रमात्॥१३॥
क्रतुस्थलाप्सरोवर्या तथान्या पुजिकस्थला।
मेनका सहजन्या च प्रम्लोचा च द्विजोत्तमाः॥१४॥
अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।
अन्या च पूर्वचित्तिः स्यादन्या चैव तिलोत्तमा॥१५॥
ताण्डवैर्विविधैरेनं वसन्तादिषु वै क्रमात्।
तोषयन्ति महादेवं भानुमात्मानमव्ययम्॥१६॥
द्विजोत्तमो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, विश्वावसु, उग्रसेन, वसुरुचि, अर्वावसु, चित्रसेन, उर्णायु, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा-ये (बारह) श्रेष्ठ गायन करनेवाले गन्धर्व क्रमशः षड्ज आदि स्वरोंके द्वारा विविध प्रकारके गीतोंसे सूर्यके समीप गान करते रहते हैं। हे द्विजोत्तमो! अप्सराओंमें श्रेष्ठ अप्सरा- क्रतुस्थला, पुञ्जिक-स्थला, मेनका, सहजन्या, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, अन्या और तिलोत्तमा–ये (बारह) अप्सराएँ क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें विविध ताण्डव आदि (नृत्यों)-के द्वारा इन अव्यय, आत्मस्वरूप महान् देवता भानुको संतुष्ट करती हैं । १२-१६॥
एवं देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।
सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेजसां निधिम्॥१७॥
ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।
गन्धर्वाप्सरसश्चैनं नृत्यगेयैरुपासते॥१८॥
इस प्रकार ये देवता क्रमश: दो-दो महीनों में (वसन्त आदि ६ ऋतुओंमें) सूर्यमें प्रतिष्ठित रहते हुए तेजोनिधि सूर्यको अपने तेजसे आप्यायित करते हैं।
मुनिगण स्वयंरचित स्तुतियोंसे सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं और अप्सराएँ एवं गन्धर्व नृत्य तथा गीतोंके द्वारा इनकी उपासना करते हैं ॥ १७-१८॥
ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसंग्रहम्।
सर्पा वहन्ति देवेशं यातुधानाः प्रयान्ति च ॥१९॥
बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्।
एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।
भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥२०॥
एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवि सानुगाः।
विमाने च स्थिता नित्यं कामगे वातरंहसि॥२१॥
वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।
गोपयन्तीह भूतानि सर्वाणीहायुगक्षयात्।। २२॥
एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।
यथायोगं यथासत्त्वं स एष तपति प्रभुः ॥२३॥
ग्रामणी, यक्ष और भूतगण (सूर्यदेवसे) रश्मियों का संग्रह करते हैं, सर्प देवताओंके ईश (सूर्य)-को वहन करते हैं और राक्षस (उनके आगे-आगे) चलते हैं। बालखिल्य नामक मुनिगण सूर्यको आवृतकर उदयाचल से अस्ताचलतक ले जाते हैं। (पूर्वमें कहे गये) ये (द्वादश आदित्य) तपते, बरसते, प्रकाश करते, बहते एवं सृष्टि करते हैं। इनका कीर्तन करनेपर ये प्राणियों के अशुभ कर्मोंको दूर करते हैं। ये नित्य कामचारी तथा वायु के समान गतिवाले विमानपर सूर्यके साथ अपने अनुचरोंसहित आकाशमें भ्रमण करते हैं। ये क्रमशः वर्षा, ताप एवं प्रजाको आनन्द प्रदान करते हुए प्रलयपर्यन्त सभी प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। ये प्रभु सूर्य इन्हीं देवोंके वीर्य, तप, योग और सत्त्वके अनुसार (प्राणिमात्रको) ताप देते हैं। १९-२३॥
अहोरात्रव्यवस्थानकारणं स प्रजापतिः।
पितृदेवमनुष्यादीन् स सदाप्याययेद् रविः ॥२४॥
तत्र देवो महादेवो भास्वान् साक्षान्महेश्वरः।
भासते वेदविदुषां नीलग्रीवः सनातनः ॥२५॥
स एष देवो भगवान् परमेष्ठी प्रजापतिः।
स्थानं तद् विदुरादित्यं वेदज्ञा वेदविग्रहम्॥२६॥
वे प्रजापति (सूर्य) दिन और रात्रि की व्यवस्था के कारण हैं। ये सूर्य पितरों, देवों तथा मनुष्य आदि सभीको सदा आप्यायित करते हैं। वेदज्ञोंके (आराध्य)
सनातन, नीलग्रीव, महादेव साक्षात् देव महादेव महेश्वर ही सूर्यके रूपमें प्रकाशित होते हैं। वेदज्ञ लोग आदित्य (सूर्य)-को वेदका विग्रह (शरीर ही) मानते हैं और यही वेदविग्रह आदित्य, देव भगवान् परमेष्ठी प्रजापति हैं॥ २४-२६ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४० ॥
Summary of chapter 38 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
The narration outlines the sacred rituals to be performed at Prayāga, including Piṇḍa Dāna, Śrāddha, and Dāna. Offerings made to Pitṛs at the Saṅgama liberate seven generations of ancestors from earthly bondage and elevate them to heavenly Pitṛloka. Sūta emphasizes that selfless giving at Prayāga yields inexhaustible spiritual rewards.