कूर्म महा पुराण
8 अध्याय
सृष्टि-वर्णनमें ब्रह्माजीसे मनु और शतरूपाका प्रादुर्भाव, स्वायम्भुव मनुके वंशका
वर्णन, दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंका वर्णन तथा उनका विवाह,
धर्म तथा अधर्मकी संतानोंका विवरण
श्रीकूर्म उवाच
एवं भूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च।
यदा चास्य प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त धीमतः॥१॥
तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदाशोचत दुःखितः ।
ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्॥ २ ॥
श्रीकूर्मने कहा-इस प्रकार स्थावर तथा जङ्गम प्राणियोंकी सृष्टि हुई, किंतु जब उन बुद्धिमान् (ब्रह्मा)- द्वारा उत्पन्न की गयी प्रजाओंमें वृद्धि नहीं हुई, तब तमोगुण की अधिकता से आवृत ब्रह्मा दुःखी होकर चिन्ता करने लगे और फिर उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको ग्रहण किया॥१-२॥
अथात्मनि समद्राक्षीत् तमोमात्रां नियामिकाम्।
रजःसत्त्वं च संवृत्य वर्तमानां स्वधर्मतः॥ ३ ॥
तमस्तद् व्यनुदत् पश्चात् रजः सत्त्वेन संयुतः।
तत् तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ ४ ॥
तदनन्तर उन्होंने स्वधर्मानुसार रजोगुण एवं सत्त्वगुण को आवृत कर स्थित रहनेवाली तथा (कर्मकी) नियामिका (तमोवृत्ति)-को अपनी आत्मामें देखा। तत्पश्चात् सत्त्वगुण से संयुक्त रजोगुणने उस तमोगुणको दूर किया और दूर
हुआ वह तम दो भागोंमें विभक्त हो गया॥३-४ ॥
अधर्माचरणो विप्रा हिंसा चाशुभलक्षणा।
स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत भास्वराम्॥ ५ ॥
हे ब्राह्मणो! (इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त हुए तमसे) अधर्माचरण और अशुभ लक्षणोंवाली हिंसा उत्पन्न हुई। तब ब्रह्माजीने अपने उस प्रकाशमान शरीरको छोड़ दिया ॥५॥
द्विधाकरोत् पुनर्देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।
अर्धेन नारी पुरुषो विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ६ ॥
पुनः (पुरातन) पुरुष प्रभुने अपने शरीरको दो भागोंमें बाँटा। आधेसे पुरुष हुआ और आधेसे नारी। तत्पश्चात् (उन्होंने) विराट् पुरुषको उत्पन्न किया॥६॥
नारीच शतरूपाख्यां योगिनी ससृजे शुभाम्।
सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य संस्थिता॥ ७ ॥
उन्होंने 'शतरूपा' नामवाली कल्याणमयी योगिनी नारीको बनाया, वह पृथिवी-लोक तथा धुलोकको अपनी महिमासे व्याप्तकर प्रतिष्ठित हुई॥७॥
योगैश्वर्यबलोपेता ज्ञानविज्ञानसंयुता।
योऽभवत् पुरुषात् पुत्रो विराडव्यक्तजन्मनः ॥ ८ ॥
स्वायम्भुवो मनुर्देवः सोऽभवत् पुरुषो मुनिः।
सा देवी शतरूपाख्या तपः कृत्वा सुदुश्चरम्॥ ९ ॥
भर्तारं ब्रह्मणः पुत्रं मनुमेवान्वपद्यत।
तस्माच्च शतरूपा सा पुत्रद्वयमसूयत॥१०॥
(वह शतरूपा नामवाली नारी) योगके ऐश्वर्य एवं बलसे सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानसे युक्त थी। (और) जो पुरुषसे अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका विराट् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह देवपुरुष मुनि स्वायम्भुव मनुके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। शतरूपा नामवाली उस देवीने अत्यन्त कठोर तप करके ब्रह्माजीके पुत्र (स्वायम्भुव) मनुको ही (अपना) पति बनाया और शतरूपाने उनसे (मनुसे) दो पुत्र उत्पन्न किये॥८-१०॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ कन्याद्वयमनुत्तमम्।
तयोः प्रसूतिं दक्षाय मनुः कन्यां ददौ पुनः॥११॥
(ये ही) प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे। (इनके अतिरिक्त) दो श्रेष्ठ कन्याएँ भी हुईं। उन दो कन्याओंमेंसे स्वायम्भुव मनुने प्रसूति नामक एक कन्या | दक्ष प्रजापतिको प्रदान की॥११।।
प्रजापतिरथाकूतिं मानसो जगृहे रुचिः।
आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम्।
यज्ञश्च दक्षिणा चैव याभ्यां संवर्धितं जगत्॥१२॥
आकूति नामक दूसरी कन्याको (ब्रह्माजीके) मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने ग्रहण किया। मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने आकूति से दो संतानें प्राप्त की-यज्ञ और दक्षिणा, जिनसे संसार वृद्धिको प्राप्त हुआ॥१२॥
यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे।
यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥१३॥
प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्त्रो विंशतिं तथा।
ससर्ज कन्या नामानि तासां सम्यक् निबोधत॥१४॥
यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र उत्पन्न हुए जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'याम' इस नामसे प्रसिद्ध देवता हुए और दक्ष प्रजापति ने प्रसूति से चौबीस कन्याओं को उत्पन्न किया, उनके नामोंको भलीभाँति सुनो-(वे हैं-) श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कन्याका नाम है कीर्ति ॥ १३-१५॥
श्रद्धा लक्ष्मीकृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा।
बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी॥१५॥
पल्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणी: शुभाः।
ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥१६॥
ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।
संततिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा॥१७॥
दक्ष प्रजापतिकी इन (तेरह दाक्षायणी) मङ्गलमयी कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। उन (तेरह कन्याओं)-के अतिरिक्त इनसे सुन्दर आँखोंवाली दक्ष की ग्यारह, अवस्थामें छोटी कन्याएँ और थीं (जिनके नाम हैं-) ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संतति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा ॥ १६-१७॥
भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः।
पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः परमधर्मवित्।। १८ ।।
अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्।
ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तमाः॥१९॥
श्रेष्ठ मुनियो! ख्याति, सती आदि जो (ग्यारह) कन्याएँ थीं, उन्हें क्रमशः भृगु, मरीचि, अङ्गिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, परम धर्मज्ञ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ नामक मुनियों, अग्निदेव और पितरोंने ग्रहण किया॥ १८-१९ ॥
श्रद्धया आत्मजः कामो दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः।
धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्टयाः संतोष उच्यते॥२०॥
श्रद्धा का पुत्र 'काम' तथा लक्ष्मी का पुत्र 'दर्प' नाम से कहा जाता है। धृतिका 'नियम' नामक पुत्र तथा तुष्टिका (पुत्र) 'संतोष' कहलाता है ॥ २० ॥
पुष्टया लाभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा।
क्रियायाश्चाभवत् पुत्रो दण्डः समय एव च॥२१॥
बुद्ध्या बोधः सुतस्तद्वदप्रमादो व्यजायत।
लज्जाया विनयः पुत्रो वपुषो व्यवसायकः॥२२॥
क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धिरजायत।
यशः कीर्तिसुतस्तद्वदित्येते धर्मसूनवः॥ २३ ॥
कामस्य हर्षः पुत्रोऽभूद् देवानन्दो व्यजायत।
इत्येष वै सुखोदकः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः॥२४॥
पुष्टिका पुत्र 'लाभ' और मेधाका पुत्र 'श्रुत' हुआ। क्रियाका पुत्र 'दण्ड' हुआ और वही 'समय' भी कहलाता है। बुद्धिसे 'बोध' नामक पुत्र और उसी प्रकार 'अप्रमाद' नामक पुत्र भी हुआ। लज्जा का | 'विनय' नामक पुत्र और वपुका 'व्यवसायक' हुआ। 'क्षेम' शान्तिका पुत्र और 'सुख' सिद्धिका पुत्र हुआ। इसी प्रकार कीर्तिका 'यश' नामक पुत्र हुआ। ये सभी धर्म के पुत्र हुए। कामका 'हर्ष' नामक पुत्र हुआ, जो देवताओं को आनन्द देनेवाला हुआ। यही (इतनी) | धर्म की सुखदायक सृष्टि कहलाती है॥ २१-२४॥
जज्ञे हिंसा त्वधर्माद् निकृतिं चानृतं सुतम्।
निकृत्यनृतयोर्जज्ञे भयं नरक एव च॥२५॥
माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः ।
भयाजज्ञेऽथ वै माया मृत्यु भूतापहारिणम्॥२६॥
अधर्मसे हिंसाने निकृति तथा अनृत नामक पुत्र को उत्पन्न किया। निकृति और अनृतसे भय तथा नरक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। माया तथा वेदना-ये दो इनकी क्रमश: भय एवं नरककी पत्नियाँ हैं। मायाने भयसे समस्त प्राणियों को मार देनेवाले मृत्युको उत्पन्न किया ॥ २५-२६ ॥
वेदना च सुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।
मृत्योर्व्याधिजराशोकतृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे॥ २७॥
वेदनाने भी रौरव (नरक नामक पति)-से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा तथा क्रोध उत्पन्न हुए ॥ २७॥
दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।
नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा सर्वे ते अ॒र्ध्वरेतसः ॥ २८॥
ये सभी उत्तरोत्तर अधिक दुःखदायी कहे गये हैं और अधर्माचरण ही इनका लक्षण है। इनकी न कोई स्त्री है और न कोई पुत्र। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं ॥२८॥
इत्येष तामसः सर्गों जज्ञे धर्मनियामकः।
संक्षेपेण मया प्रोक्ता विसृष्टिर्मुनिपुंगवाः ॥ २९॥
श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार धर्मनियामक ने तामस सर्गकी सृष्टि की। मैंने संक्षेपमें इस विशिष्ट सृष्टि का वर्णन किया।॥ २९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागेऽष्टमोऽध्यायः ।।८।।
इस प्रकार छ: हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥८॥
Summary of chapter 8 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Seeing that the beings created were not expanding, Brahmā subdued Tamoguna through Sattva and Rajas, shedding his dark body which transformed into the duality of Adharma and Hiṁsā. Dividing his own radiant body into two halves, Brahmā became Purusha in one half and the blissful Yoginī Shatarūpā in the other. Shatarūpā performed intense Tapas and wed Svāyambhuva Manu, giving birth to two illustrious sons, Priyavrata and Uttānapāda, and two virtuous daughters, Prasūti and Ākūti. Prasūti was given to Daksha and Ākūti to Ruchi, from whom Yajña and Dakshinā were born, giving rise to the Yāma Devas. Prasūti bore twenty-four daughters to Daksha, thirteen of whom were wed to Dharma, while eleven younger daughters were given to Bhṛgu, Śiva, Marīchi, Angiras, Pulastya, Pulaha, Kratu, Atri, Vashishṭha, Agni, and Pitṛs. In contrast, Adharma and Nikṛti produced fear, hell, delusion, pain, and ultimate death with its offspring of disease, old age, sorrow, thirst, and anger, depicting the cosmic interplay of righteous and unrighteous lineages.