32 अध्याय

प्रायश्चित्त -प्रकरणमें महापातकोंके प्रायश्चित्तका विधान

तथा अन्य उपपातकोंसे शुद्धिका उपाय

व्यास उवाच

सुरापस्तु सुरां तप्तामग्निवर्णां स्वयं पिबेत्।

तया स काये निर्दग्धे मुच्यते तु द्विजोत्तमः॥१॥

गोमूत्रमग्निवर्णं वा गोशकृद्रसमेव वा।

पयो घृतं जलं वाथ मुच्यते पातकात् ततः ॥२॥

जलार्द्रवासाः प्रयतो ध्यात्वा नारायणं हरिम्।

ब्रह्महत्याव्रतं चाथ चरेत् तत्पापशान्तये॥३॥

व्यासजीने कहा-सुरापान करनेवाले द्विजोत्तम को अग्निके समान वर्णवाली प्रतप्त (अति उष्ण) सुराका स्वयं पान करना चाहिये। उससे शरीरके दग्ध होने पर वह (पापसे) मुक्त हो जाता है। अथवा अग्निके समान रंगवाला (अति उष्ण) गोमूत्र या गोबरका रस अथवा (गौका) दुग्ध, घृत या जल पीनेपर द्विज (पापसे)मुक्त हो जाता है। उस (सुरापानजन्य) पापके शमनके लिये जलसे भीगा वस्त्र धारणकर तथा प्रयत्नपूर्वक नारायण हरिका ध्यान कर पुनः ब्रह्महत्यासम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रतका पालन करना चाहिये॥१-३॥

सुवर्णस्तेयकृद् विप्रो राजानमभिगम्य तु।

स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान्मां भवाननुशास्त्विति॥४॥

गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद् हन्यात् ततः स्वयम्।

वधे तु शुद्धयते स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव वा॥५॥

स्कन्धेनादाय मुसलं लकुटं वाऽपि खादिरम्।

शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा॥६॥

राजा तेन च गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।

आचक्षाणेन तत्पापमेवंकर्माऽस्मि शाधि माम्॥७॥

शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद् विमुच्यते।

अशासित्वा तुतंराजा स्तेनस्यानोति किल्बिषम्॥८॥

तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्।

चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद् ब्रह्महणो व्रतम्॥९॥

सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके पास जाकर अपने (पाप) कर्मको बताते हुए कहे-'आप मुझे दण्डित करें'। राजा मूसल लेकर स्वयं उसे एक बार मारे। इस प्रकार वध हो जानेपर ब्राह्मण चोरी-रूप (महापाप)-से शुद्ध हो जाता है अथवा तपस्या करनेसे वह शुद्ध होता है। मूसल अथवा खैरकी लकड़ीकी लाठी और दोनों ओर तीक्ष्ण धारवाली शक्ति या लोहेका दण्ड कंधेपर लेकर उस (पापयुक्त ब्राह्मण)-को राजाके पास केश खोले दौड़ते हुए जाना चाहिये और अपने उस (पापकर्म)-को बताते हुए कहना चाहिये-'मैंने यह कर्म किया है, आप मुझे दण्ड दें।' दण्डसे अथवा (यथाशास्त्र प्रायश्चित्तपूर्वक शरीर) परित्याग कर देने से सुवर्ण-चोर चोरी (-रूप पापकर्म)-से मुक्त हो जाता है। उसको दण्डित न करनेसे तो राजा चोरका पाप (स्वयं) प्राप्त कर लेता है। तपस्याद्वारा सुवर्णकी चोरी से उत्पन्न पापको दूर करनेकी इच्छा रखनेवाले द्विज को चाहिये कि वह चीर (फटे-पुराने) वस्त्र धारण करके जंगलमें जाकर ब्रह्महत्या-सम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रत का पालन करे॥४-९॥

स्नात्वाश्वमेधावभृथे पूतः स्यादथवा द्विजः।

प्रदद्याद्वाऽथ विप्रेभ्यः स्वात्मतुल्यं हिरण्यकम् ॥१०॥

चरेद् वा वत्सरं कृच्छ्रे ब्रह्मचर्यपरायणः।

ब्राह्मणः स्वर्णहारी तु तत्पापस्यापनुत्तये॥११॥

अथवा अश्वमेधयज्ञ-सम्बन्धी अवभृथ-स्नान करने से द्विज पवित्र हो जाता है। या (शुद्ध होनेके लिये) ब्राह्मणोंको अपने भारके बराबर स्वर्ण-दान करना चाहिये। अथवा सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मण को उस पापको दूर करनेके लिये एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए कृच्छ्रव्रत करना चाहिये॥१०-११ ॥

गुरोर्भार्यां समारुह्य ब्राह्मणः काममोहितः।

अवगृहेत् स्त्रियं तप्तां दीप्तां कार्णायसीं कृताम्॥१२॥

स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ।

आतिष्ठेद् दक्षिणामाशामानिपातादजिह्मगः ॥१३॥

गुर्वर्थं वा हतः शुध्येच्चरेद् वा ब्रह्महा व्रतम्।

शाखांवा कण्टकोपेतां परिष्वज्याथ वत्सरम्।

अधः शयीत नियतो मुच्यते गुरुतल्पगः॥१४॥

कृच्छ्रे वाब्दं चरेद् विप्रश्चीरवासाः समाहितः।

अश्वमेधावभृथके स्नात्वा वा शुध्यते नरः॥१५॥

कालेऽष्टमे वा भुञ्जानो ब्रह्मचारी सदाव्रती।

स्थानासनाभ्यां विहरंस्त्रिरह्नोऽभ्युपयन्नपः॥१६॥

अधःशायी त्रिभिर्वस्तव्यपोहति पातकम्।

चान्द्रायणानि वा कुर्यात् पञ्च चत्वारिवा पुनः॥१७॥

कामसे मोहित होकर गुरुकी भार्याके साथ गमन करनेवाले ब्राह्मणको लोहेसे बनायी गयी कृष्णवर्णकी तप्त एवं उद्दीप्त स्त्रीका आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा स्वयं लिङ्ग एवं अण्डकोशको काटकर और अपनी अञ्जलिमें रखकर निष्कपट-भावसे दक्षिण दिशा की ओर तबतक जाना चाहिये, जबतक शरीरपात न हो जाय। गुरुके लिये मारे जानेसे भी गुरुपत्नीगामी शुद्ध हो जाता है अथवा ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये या एक वर्षतक काँटोंसे युक्त शाखा का आलिङ्गन करते हुए गुरुपत्नीसे गमन करनेवाले को नियमपूर्वक नीचे भूमिपर सोना चाहिये। इससे वह गुरुपत्नीगामी पापमुक्त हो जाता है। अथवा ब्राह्मण को चीर (कन्था) वस्त्र धारणकर समाहित होकर एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। या अश्वमेधयज्ञ के अवभृथ-स्नान करनेसे व्यक्ति शुद्ध हो जाता है। अथवा सर्वदा ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत धारणकर अष्टमकाल (अर्थात् चौथे दिन, सायंकाल)-में भोजन करना चाहिये। इसके पूर्व प्रयत्नपूर्वक एक ही स्थानपर एक ही आसन से रहकर केवल जल पीते हुए तीन दिन व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करते हुए तीन वर्षांतक भूमिपर शयन करने से उस (गुरुपत्नी-गमनरूप) पापसे छुटकारा मिलता है, अथवा चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥१२-१७॥

पतितैः सम्प्रयुक्तानामथ वक्ष्यामि निष्कृतिम्।

पतितेन तु संसर्ग यो येन कुरुते द्विजः।

स तत्पापापनोदार्थं तस्यैव व्रतमाचरेत्॥१८॥

तप्तकृच्छ्रे चरेद् वाथ संवत्सरमतन्द्रितः ।

घाण्मासिके तु संसर्गे प्रायश्चित्तार्धमर्हति॥१९॥

अब पतितों (पापियों)-के साथ संसर्ग करनेवालों के निस्तारका उपाय (प्रायश्चित्त) बतलाता हूँ। जिस पतित के साथ जो द्विज (एक वर्षतक) संसर्ग करता है, उसे उस पतितद्वारा किये गये पापको दूर करनेके लिये विहित व्रतका (एक वर्षतक) पालन करना चाहिये। अथवा वर्षभरतक आलस्यरहित होकर तप्तकृच्छ्रव्रत का पालन करना चाहिये। छः महीनोंतक संसर्ग होने पर उपर्युक्त व्रतका आधा प्रायश्चित्त करे॥१८-१९॥

एभितैरपोहन्ति महापातकिनो मलम्।

पुण्यतीर्थाभिगमनात् पृथिव्यां वाथ निष्कृतिः ॥२०॥

इन व्रतोंके द्वारा महापातकी अपने पापको दूर करते हैं। अथवा पृथ्वीके पुण्य-तीर्थों की यात्रा करनेसे भी निष्कृति (निस्तार) हो जाती है ॥ २० ॥

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।

कृत्वा तैश्चापि संसर्ग ब्राह्मणः कामकारतः॥२१॥

कुर्यादनशनं विप्रः पुण्यतीर्थे समाहितः।

ज्वलन्तं वा विशेदग्निं ध्यात्वा देवं कपर्दिनम्॥२२॥

न ह्यन्या निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिर्धर्मवादिभिः ।

तस्मात् पुण्येषु तीर्थेषु दहेद् वापि स्वदेहकम्॥ २३॥

ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाले अथवा स्वेच्छापूर्वक उनके साथ संसर्ग करनेवाले ब्राह्मणको भी पुण्य-तीर्थमें समाहित होकर अनशनव्रत करना चाहिये अथवा कपर्दी भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए जलती हुई अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। धर्मवादी मुनियोंने (इसके अतिरिक्त) दूसरा प्रायश्चित्त नहीं बतलाया है, इसलिये पुण्य- तीर्थों में अपना शरीर जला देना चाहिये ।। २१-२३ ॥

गत्वा दुहितरं विप्रः स्वसारं वा स्नुषामपि।

प्रविशेज्वलनं दीप्तं मतिपूर्वमिति स्थितिः ॥२४॥

मातृष्वसां मातुलानी तथैव च पितृष्वसाम्।

भागिनेयीं समारुह्य कुर्यात् कच्छ्रातिकृच्छ्कौ ॥ २५॥

चान्द्रायणं च कुर्वीत तस्य पापस्य शान्तये।

ध्यायन् देवं जगद्योनिमनादिनिधनं परम्॥२६॥

भ्रातृभार्यां समारुह्य कुर्यात् तत्पापशान्तये।

चान्द्रायणानि चत्वारि पञ्च वा सुसमाहितः ॥२७॥

पैतृष्वस्त्रेयीं गत्वा तु स्वस्त्रेयां मातुरेव च।

मातुलस्य सुतां वापि गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ २८॥

सखिभार्यां समारुह्य गत्वा श्याली तथैव च।

अहोरात्रोषितो भूत्वा तप्तकृच्छ्रे समाचरेत्॥ २९॥

उदक्यागमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।

चाण्डालीगमने चैव तप्तकृच्छ्रत्रयं विदुः।

सह सांतपनेनास्य नान्यथा निष्कृतिः स्मृता॥३०॥

(जान-बूझकर) अपनी पुत्री, बहिन या पुत्रवधू के साथ गमन करनेवालेको जलती हुई प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। ऐसी मर्यादा है। मौसी, मामी, फूआ तथा भांजी के साथ गमन करनेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र नामक व्रतोंको करना चाहिये और इन पापोंकी शान्ति के लिये जगद्योनि अनादिनिधन परमदेवका ध्यान करते हुए चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। भाईकी पत्नीके साथ

सहवास करनेपर उस पापकी शान्तिके लिये अच्छी प्रकार समाहित-मन होकर चार अथवा पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। फूआकी लड़की, मौसीकी लड़की अथवा मामाकी लड़कीके साथ गमन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। मित्रकी पत्नी तथा सालीके साथ सहवास करनेपर एक अहोरात्र उपवास करके तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। रजस्वलाके साथ गमन करनेपर विप्र तीन रातमें शुद्ध होता है और चाण्डालीके साथ गमन करनेपर तीन तप्तकृच्छ्र व्रतोंके साथ सांतपनव्रत करने से शुद्धि होती है। अन्य किसी प्रकारसे निष्कृति (निस्तार) नहीं कही गयी है ॥ २४-३०॥

मातृगोत्रां समासाद्य समानप्रवरां तथा।

चान्द्रायणेन शुध्येत प्रयतात्मा समाहितः॥३१॥

ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गत्वा कृच्छ्रमेकं समाचरेत्।

कन्यकां दूषयित्वा तु चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥३२॥

अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।

रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रे सान्तपनं चरेत्॥३३॥

माताके गोत्रकी अथवा समान प्रवरवाले कुल की स्त्रीसे समागम करनेपर इन्द्रियजयी होकर एकाग्रतापूर्वक चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है। (समागम के अयोग्य) ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर ब्राह्मण को एक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और कन्याको दूषित करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अमानुषी स्त्री, रजस्वला, अयोनि तथा जलमें वीर्यपात करनेपर पुरुष को कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये॥ ३१-३३ ।।

बन्धकीगमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।

गवि मैथुनमासेव्य चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥३४॥

अजावीमैथुनं कृत्वा प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।

पतितांच स्त्रियं गत्वा त्रिभिः कृच्छर्विशुध्यति॥३५॥

पुल्कसीगमने चैव कच्छू चान्द्रायणं चरेत् ।

नटी शैलूषकी चैव रजकी वेणुजीविनीम्।

गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात् तथा चर्मोपजीविनीम्॥३६॥

ब्रह्मचारी स्त्रियं गच्छेत् कथञ्चित्काममोहितः।

सप्तागारं चरेद् भैक्षं वसित्वा गर्दभाजिनम्॥ ३७॥

उपस्पृशेत् त्रिषवणं स्वपापं परिकीर्तयन्।

संवत्सरेण चैकेन तस्मात् पापात् प्रमुच्यते॥ ३८॥

ब्रह्महत्याव्रतं वापि षण्मासानाचरेद् यमी।

मुच्यते ह्यवकीर्णी तु ब्राह्मणानुमते स्थितः॥३९॥

सप्तरात्रमकृत्वा तु भैक्षचर्याग्निपूजनम् ।

रेतसश्च समुत्सर्गे प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ ४०॥

ओंकारपूर्विकाभिस्तु महाव्याहृतिभिः सदा।

संवत्सरं तु भुञ्जानो नक्तं भिक्षाशनः शुचिः॥४१॥

सावित्री च जपेच्चैव नित्यं क्रोधविवर्जितः।

नदीतीरेषु तीर्थेषु तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥४२॥

हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः कुर्याद् ब्रह्महणो व्रतम्।

अकामतो वैषण्मासान् दद्यात् पञ्चशतंगवाम्॥४३॥

अब्दं चरेत नियतो वनवासी समाहितः।

प्राजापत्यं सान्तपनं तप्तकृच्छं तु वा स्वयम्॥४४॥

प्रमाप्याकामतो वैश्यं कुर्यात् संवत्सरद्वयम्।

गोसहस्त्रं सपादं च दद्यात् ब्रह्महणो व्रतम्।

कृच्छातिकृच्छ वा कुर्याच्चान्द्रायणमथापिवा॥४५॥

संवत्सरं व्रतं कुर्याच्छूद्रं हत्वा प्रमादतः।

गोसहस्रार्धपादं च दद्यात् तत्पापशान्तये॥४६॥

प्रमादवश शूद्रकी हत्या करनेपर इस पापके शमनके लिये एक वर्षतक ब्रह्महत्याका व्रत करना चाहिये और एक हजार एक सौ पचीस गौओंका दान करना चाहिये॥४६॥

अष्टौ वर्षाणि षट् त्रीणि कुर्याद् ब्रह्महणो व्रतम्।

हत्वा तु क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं चैव यथाक्रमम्॥४७॥

निहत्य ब्राह्मणी विप्रस्त्वष्टवर्षं व्रतं चरेत्।

राजन्यां वर्षषट्कं तु वैश्यां संवत्सरत्रयम्।

वत्सरेण विशुध्येत शूद्रां हत्वा द्विजोत्तमः॥४८॥

वैश्यां हत्वा प्रमादेन किञ्चिद् दद्याद् द्विजातये।

अन्त्यजानां वधे चैव कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्।

पराकेणाथवा शुद्धिरित्याह भगवानजः ॥ ४९ ॥

क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इनमेंसे किसी एकका वध करनेपर क्रमश: आठ, छ: तथा तीन वर्षतक ब्रह्महत्या- सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये। ब्राह्मणीकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको आठ वर्षतक ब्रह्महत्याके व्रतका पालन करना चाहिये। क्षत्राणीकी हत्या करनेपर छ: वर्षतक और वैश्याकी हत्या होनेपर तीन वर्षतक तथा शूद्राकी हत्या होनेपर एक वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करनेसे द्विजोत्तम शुद्ध हो जाता है। प्रमादवश वैश्यकी स्त्रीकी हत्या करनेपर द्विजको किञ्चित् दान करना चाहिये। अन्त्यजोंका वध होनेपर चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये अथवा भगवान् ब्रह्माने पराकव्रतके द्वारा शुद्धि बतलायी है॥ ४७-४९ ॥

मण्डूकं नकुलं काकं दन्दशूकं च मूषिकम्।

श्वानं हत्वा द्विजः कुर्यात् षोडशांशं व्रतं ततः॥५०॥

पयः पिबेत् त्रिरात्रं तु श्वानं हत्वा सुयन्त्रितः।

मार्जारं वाथ नकुलं योजनं वाध्वनो व्रजेत्।

कृच्छू द्वादशरात्रं तु कुर्यादश्ववधे द्विजः॥५१॥

अभ्रीं कार्णायसीं दद्यात् सर्प हत्वा द्विजोत्तमः ।

पलालभारं षण्डं च सैसकं चैकमाषकम्॥५२॥

मेढक, नकुल, कौआ, दन्दशूक (हिंसक जन्तु), चूहा अथवा कुत्तेकी हत्या करनेपर द्विजको व्रतके सोलहवें अंशका पालन करना चाहिये। कुत्तेकी हत्या करनेपर सावधान होकर तीन रात्रिपर्यन्त दूधमात्र पीकर रहना चाहिये। बिल्ली अथवा नेवलेका वध हो जानेपर एक योजन (चार कोस)-तक मार्गमें (अनशनपूर्वक) चलना चाहिये। द्विजको अश्वका वध करनेपर बारह रात्रिपर्यन्त कृच्छ्व्रत करना चाहिये। द्विजोत्तमको चाहिये कि वह सर्पको मारनेपर काले लोहेकी अभ्री (तीक्ष्ण अग्रभागवाला लोहदण्ड)-की प्रतिमा दान करे। साँड़की हत्या करनेपर एक भार धानकी भूसी तथा एक मासा सीसा दान देना चाहिये॥५०-५२॥

घृतकुम्भं वराहं च तिलद्रोणं च तित्तिरिम्।

शुकं द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम्॥५३॥

हत्वा हंसं बलाकां च बकं बहिणमेव च।

वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद् ब्राह्मणाय गाम्॥५४॥

वराहकी हत्या करनेपर घृतसे भरा घड़ा और तितिरकी हत्या करनेपर एक द्रोण तिल देना चाहिये। शुककी हत्या करनेपर दो वर्षतकके (गायका) बछड़ा, क्रौञ्चको मारनेपर तीन वर्षके (गायके ) बछड़ेका दान करना चाहिये। हंस, बलाका (वक-पंक्ति), बक (बगुला), मोर, वानर, बाज एवं गिद्धका वध करनेपर ब्राह्मणके लिये गौका दान करना चाहिये ॥५३-५४॥

क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात् पयस्विनीम्।

अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्टुं हत्वा तु कृष्णलम्॥५५॥

किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।

अनस्यां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुध्यति॥५६॥

मांस भक्षण करनेवाले अरण्यके पशुओं (व्याघ्र आदि)-की हत्या करनेपर पयस्विनी गौका दान करना चाहिये। मांस न खानेवाले पशुओं-हरिण, खंजरीट आदिकी हत्या करनेपर (गौकी) बछड़ीका दान करना चाहिये और ऊँटका वध करनेपर कृष्णलका (घुघची अर्थात् एक रत्ती सुवर्णका) दान करना चाहिये। अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध करनेपर ब्राह्मणको किञ्चित् दान करना चाहिये और बिना अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध होनेपर प्राणायाम करनेसे शुद्धि होती है ।। ५५-५६ ।।

फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्।

गुल्मवल्लीलतानां तु पुष्पितानां च वीरुधाम्॥५७॥

अन्येषां चैव वृक्षाणां सरसानां च सर्वशः।

फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥५८॥

हस्तिनां च वधे दृष्टं तप्तकृच्छ्रे विशोधनम्।

चान्द्रायणं पराकं वा गां हत्वा तु प्रमादतः।

मतिपूर्वं वधे चास्याः प्रायश्चित्तं न विद्यते॥५९॥

फलदार वृक्षोंके काटनेपर एक सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। गुल्म, वल्ली, लता तथा फूलवाले वृक्षों और अन्य सभी प्रकारके रसवाले, फल तथा पुष्प देनेवाले वृक्षोंको नष्ट करनेपर घृत-प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। हाथीका वध करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करने से शुद्धि होती है। प्रमादवश गौकी हत्या करनेपर चान्द्रायण अथवा पराकव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर वध करनेपर इस हिंसाका कोई प्रायश्चित्त नहीं है॥५७-५९॥