43 अध्याय

सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत

तथा किंपुरुष आदि वर्षों का वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका

कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन

सूत उवाच

एतद् ब्रह्माण्डमाख्यातं चतुर्दशविधं महत्।

अतः परं प्रवक्ष्यामि भूलॊकस्यास्य निर्णयम्॥१॥

जम्बुद्वीपः प्रधानोऽयं प्लक्षः शाल्मल एव च।

कुशः क्रौञ्चश्च शाकश्च पुष्करश्चैव सप्तमः॥२॥

एते सप्त महाद्वीपा: समुद्रैः सप्तभिर्वृताः।

द्वीपाद् द्वीपो महानुक्तः सागरादपि सागरः॥३॥

क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदकः।

दध्योदः क्षीरसलिलः स्वादूदश्चेति सागराः॥४॥

पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।

द्वीपैश्च सप्तभिर्युक्ता योजनानां समासतः॥५॥

जम्बूद्वीपः समस्तानां द्वीपानां मध्यतः शुभः।

तस्य मध्ये महामेरुर्विश्रुतः कनकप्रभः॥६॥

सूतजी बोले-इस चौदह (सात पाताल तथा सात ऊर्ध्वलोक) प्रकारके महान् ब्रह्माण्डका वर्णन किया गया। इसके बाद इस भूलोक के निर्णय को कहूँगा। (भूलोकमें) जम्बूद्वीप प्रधान है। (इसके अतिरिक्त) प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा सातवाँ पुष्कर द्वीप है। ये सातों महाद्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हैं, एक द्वीपसे दूसरा द्वीप तथा एक सागरसे दूसरा सागर महान् कहा गया है। क्षारोदक, इक्षुरसोदक, सुरोदक, घृतोदक, दध्योदक, क्षीरोदक तथा स्वादूदक-ये (सात) महासागर हैं। संक्षेपमें समुद्रसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। यह सात द्वीपोंसे परिवेष्टित है समस्त द्वीपोंके मध्यमें शुभ जम्बूद्वीप स्थित है। उसके बीचमें स्वर्णके समान आभावाला महामेरु कहा गया है॥१-६॥

चतुरशीतिसाहस्रो योजनैस्तस्य चोच्छ्यः ।

प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्वात्रिंशन्मूनि विस्तृतः॥ ७ ॥

मूले षोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वतः।

भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकात्वेन संस्थितः॥ ८ ॥

हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे।

नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः॥ ९ ॥

लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्ये दशहीनास्तथा परे।

सहस्रद्वितयोच्छ्रायास्तावद्विस्तारिणश्च ते॥१०॥

उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। नीचे की ओर यह सोलह योजनतक प्रविष्ट है और ऊपरकी ओर बत्तीस योजन विस्तृत है। उस पर्वतके मूलमें सभी ओर सोलह हजार योजनका विस्तार है। यह पर्वत इस पृथ्वी रूप कमलकी कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिण में हिमवान्, हेमकूट तथा निषध और उत्तरमें नील, श्वेत एवं श्रृंगी नामक वर्षपर्वत हैं। इनमें दो (हिमवान् एवं हेमकूट वर्षपर्वत) एक लाख योजन परिमाणवाले हैं और अन्य (वर्षपर्वत) दस योजन कम विस्तारवाले हैं। इनकी ऊँचाई दो हजार योजनकी है और उनका विस्तार भी उतना ही है॥७-१०॥

भारतं दक्षिणं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्।

हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोदक्षिणतो द्विजाः ॥११॥

रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्मयम्।

उत्तराः कुरवश्चैव यथैते भरतास्तथा ॥१२॥

हे द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें प्रथम भारतवर्ष, तदनन्तर किंपुरुषवर्ष और फिर हरिवर्ष तथा अन्य भी वैसे ही स्थित हैं। उसके उत्तरमें रम्यक, हिरण्मय

एवं उत्तरकुरुवर्ष स्थित है। ये सभी भारतवर्ष के समान हैं॥११-१२॥

नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तमाः।

इलावृतं च तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः ॥१३॥

मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रविस्तृतम्।

इलावृतं महाभागाश्चत्वारस्तत्र पर्वताः।

विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः ॥१४॥

पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः।

विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः ॥१५॥

द्विजश्रेष्ठो! इनमेंसे प्रत्येक नौ हजार योजनका है। इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और इसके मध्यमें उन्नत मेरु पर्वत है। हे महाभागो! वहाँ मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनका इलावृत नामक वर्ष है। वहाँ चार पर्वत हैं। मेरुके व्यासके रूपमें विरचित इनकी ऊँचाई दस हजार योजन है। इसके पूर्व में मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम पार्श्वमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है॥ १३-१५॥

कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च।

जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महर्षयः॥१६॥

महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च।

पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः ॥१७॥

रसेन तस्याः प्रख्याता तत्र जम्बूनदीति वै।

सरित् प्रवर्तते चापि पीयते तत्र वासिभिः ॥१८॥

न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः ।

तत्पानात् सुस्थमनसां नराणां तत्र जायते॥१९॥

तीरमृत् तत्र सम्प्राप्य वायुना सुविशोषिता।

जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्ण सिद्धभूषणम्॥२०॥

उसमें (सुपार्श्व पर्वतमें) कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट वृक्ष हैं। हे महर्षियो! यही जम्बूवृक्ष जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उस जम्बूवृक्षके फल महान् हाथी के प्रमाणवाले होते हैं। पर्वतके पृष्ठपर गिरनेसे वे विशीर्ण हो जाते हैं। वहाँ उनके रससे प्रवाहित होनेवाली नदी जम्बूनदीके नामसे विख्यात है। वहाँ के निवासी उस रसका पान किया करते हैं। वहाँ उस रस (जल)का पान करनेसे स्वस्थ मनवाले मनुष्योंको न स्वेद (पसीना) होता है, न उनमें दुर्गन्धि होती है, न वृद्धावस्था आती है और न ही उनकी इन्द्रियाँ क्षीण होती हैं। उस (जम्बू नदी) के तटपर स्थित मिट्टीके रसका वायु शोषण कर लेता है, जिससे जाम्बूनद नामक सुवर्ण होता है, सिद्धगण उसीका आभूषण धारण करते हैं ॥ १६-२०॥

भद्राश्वः पूर्वतो मेरो: केतुमालश्च पश्चिमे।

वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठास्तयोर्मध्ये इलावृतम्॥२१॥

वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।

वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्वनम्॥ २२॥

अरुणोदं महाभद्रमसितोदं च मानसम्।

सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा ॥२३॥

सितान्तश्च कुमुद्वांश्च कुरुरी माल्यवांस्तथा।

वैकङ्को मणिशैलश्च ऋक्षवांश्चाचलोत्तमाः॥२४॥

महानीलोऽथ रुचकः सबिन्दुमन्दरस्तथा।

वेणुमांश्चैव मेघश्च निषधो देवपर्वतः।

इत्येते देवरचिता: सिद्धावासाः प्रकीर्तिताः ॥ २५॥

मेरुके पूर्वमें भद्राश्व, पश्चिममें केतुमाल नामक दो वर्ष हैं। मुनिश्रेष्ठो! उन दोनोंके मध्य इलावृत वर्ष है। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम में वैभ्राज और उत्तरमें सवितृवन स्थित है। उन (वनों) में अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस नामक ये चार सरोवर हैं। ये सदा देवताओं द्वारा उपभोग किये जाने योग्य हैं। सितान्त, कुमुद्वान्, कुरुरी, माल्यवान्, वैकङ्क, मणिशैल, ऋक्षवान्, महानील, रुचक, सबिन्दु, मन्दर, वेणुमान्, मेघ, निषध एवं देवपर्वत-इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी रचना देवताओंद्वारा हुई है और इन्हें सिद्धों का आवास कहा जाता है ॥ २१-२५ ॥

अरुणोदस्य सरसः पूर्वतः केसराचलः।

त्रिकूटशिखरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा ॥२६॥

निषधो वसुधारश्च कलिङ्गस्त्रिशिखः शुभः ।

समूलो वसुधारश्च कुरवश्चैव सानुमान्॥२७॥

ताम्रातश्च विशालश्च कुमुदो वेणुपर्वतः ।

एकशृङ्गो महाशैलो गजशैल: पिशाचकः॥२८॥

पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः।

इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः॥२९॥

अरुणोद सरोवरके पूर्वमें केसराचल, त्रिकूट-शिखर, पतङ्ग, रुचक, निषध, वसुधार, कलिंग, शुभ त्रिशिख, समूल, वसुधार, कुरव, सानुमान्, ताम्रात, विशाल, कुमुद, वेणुपर्वत, एकशृंग, महाशैल, गजशैल, पिशाचक, पञ्चशैल, कैलास और पर्वतोंमें उत्तम हिमवान्–ये सभी देवताओंद्वारा सेवित अत्यन्त श्रेष्ठ पर्वत हैं ॥ २६-२९॥

महाभद्रस्य सरसो दक्षिणे केसराचलः।

शिखिवासश्च वैदूर्यः कपिलो गन्धमादनः॥३०॥

जारुधिश्च सुगन्धिश्च श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः ।

सुपार्श्वश्च सुपक्षश्च कङ्कः कपिल एव च॥३१॥

पिञ्जरो भद्रशैलश्च सुरसश्च महाबलः।

अञ्जनो मधुमास्तद्वत् कुमुदो मुकुटस्तथा ॥ ३२॥

सहस्रशिखरश्चैव पाण्डुरः कृष्ण एव च।

पारिजातो महाशैलस्तथैव कपिलोदकः॥३३॥

सुषेण: पुण्डरीकश्च महामेघस्तथैव च।

एते पर्वतराजानः सिद्धगन्धर्वसेविताः ॥ ३४॥

महाभद्र सरोवरके दक्षिणमें-केसराचल, शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन, जारुधि, सुगन्धि, उत्तम पर्वत श्रीश्रृंग, सुपार्श्व, सुपक्ष, कङ्क, कपिल, पिञ्जर, भद्रशैल, सुरस, महाबल, अञ्जन, मधुमान्, कुमुद, मुकुट, सहस्रशिखर, पाण्डुर, कृष्ण, पारिजात, महाशैल, कपिलोदक, सुषेण, पुण्डरीक और महामेघ-ये सभी पर्वतराज सिद्धों और गन्धर्वोसे सेवित हैं ॥३०-३४॥

असितोदस्य सरसः पश्चिमे केसराचलः।

शङ्खकूटोऽथ वृषभो हंसो नागस्तथा परः ॥ ३५॥

कालाञ्जनः शुक्रशैलो नीलः कमल एव च।

पुष्पकश्च सुमेघश्च वाराहो विरजास्तथा।

मयूरः कपिलश्चैव महाकपिल एव च॥ ३६॥

इत्येते देवगन्धर्वसिद्धसङ्घनिषेविताः।

सरसो मानसस्येह उत्तरे केसराचलः॥३७॥

असितोद सरोवरके पश्चिममें केसराचल, शंखकूट, वृषभ, हंस, नाग, कालाञ्जन, शुक्रशैल, नील, कमल, पुष्पक, सुमेघ, वाराह, विरजा, मयूर, कपिल तथा महाकपिल-ये सभी (पर्वत) देव, गन्धर्व और सिद्धों के समूहोंद्वारा सेवित हैं। मानसरोवरके उत्तरमें केसराचल नामक पर्वत है॥ ३५-३७॥

एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।

सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांसि च वनानि च ॥३८॥

वसन्ति तत्र मुनयः सिद्धाश्च ब्रह्मभाविताः।

प्रसन्नाः शान्तरजसः सर्वदुःखविवर्जिताः ।। ३९॥

इन प्रधान शैलोंके मध्य क्रमानुसार घाटियाँ, सरोवर और अनेक वन हैं। वहाँ प्रसन्न, रजोगुणरहित और सभी दु:खोंसे विनिर्मुक्त ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध निवास करते हैं॥३८-३९॥