कूर्म महा पुराण
36 अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थों की महिमा, देवदारु-वन-तीर्थका माहात्म्य
सूत उवाच
इदमन्यत् परं स्थानं गुह्याद् गुह्यतमं महत्।
महादेवस्य देवस्य महालयमिति श्रुतम्॥१॥
तत्र देवादिदेवेन रुद्रेण त्रिपुरारिणा।
शिलातले पदं न्यस्तं नास्तिकानां निदर्शनम्॥२॥
तत्र पाशुपताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।
उपासते महादेवं वेदाध्ययनतत्पराः॥३॥
स्नात्वा तत्र पदं शार्वं दृष्ट्वा भक्तिपुरःसरम्।
नमस्कृत्वाथ शिरसा रुद्रसामीप्यमाप्नुयात्॥४॥
सूतजीने कहा-भगवान् महादेवका एक दूसरा गुह्यसे भी गुह्य महान् श्रेष्ठ स्थान है, जो 'महालय' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ त्रिपुरारि तथा देवों के आदिदेव रुद्रने नास्तिकोंके लिये प्रमाणके रूपमें शिलातल पर चरण (-का चिह्न) स्थापित किया है। वहाँ समस्त शरीरमें भस्म लगाये हुए, शान्त पशुपतिके भक्तजन वेदाध्ययनमें तत्पर रहकर महादेवकी उपासना करते हैं। उस तीर्थमें स्नानकर भक्तिपूर्वक शंकरके पद का दर्शन करके उन्हें सिरसे नमस्कार करनेसे उन रुद्र का सामीप्य प्राप्त होता है॥१-४॥
अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं शम्भोर्महात्मनः।
केदारमिति विख्यातं सिद्धानामालयं शुभम्॥५॥
तत्र स्नात्वा महादेवमभ्यर्च्य वृषकेतनम्।
पीत्वा चैवोदकं शुद्धं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥६॥
श्राद्धदानादिकं कृत्वा ह्यक्षयं लभते फलम्।
द्विजातिप्रवरैर्जुष्टं योगिभिर्यतमानसैः॥७॥
देवाधिदेव महात्मा शम्भुका एक दूसरा स्थान है जो 'केदार' इस नामसे विख्यात है। वह शुभ स्थान सिद्धोंकी निवासभूमि है। वहाँ स्नान करके वृषकेतु महादेवकी आराधना करने और (वहाँके) पवित्र जलका पान करनेसे गाणपत्य-पदकी प्राप्ति होती है। वह तीर्थ श्रेष्ठ द्विजातियों तथा संयतचित्तवाले योगियोंद्वारा सेवित है। वहाँ श्राद्ध, दान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है॥५-७॥
तीर्थं प्लक्षावतरणं सर्वपापविनाशनम्।
तत्राभ्यर्च्य श्रीनिवासं विष्णुलोके महीयते॥ ८॥
अन्यं मगधराजस्य तीर्थं स्वर्गगतिप्रदम्।
अक्षयं विन्दति स्वर्गं तत्र गत्वा द्विजोत्तमः॥ ९ ॥
तीर्थं कनखलं पुण्यं महापातकनाशनम्।
यत्र देवेन रुद्रेण यज्ञो दक्षस्य नाशितः॥१०॥
तत्र गङ्गामुपस्पृश्य शुचिर्भावसमन्वितः।
मुच्यते सर्वपापैस्तु ब्रह्मलोकं लभेन्मृतः॥११॥
महातीर्थमिति ख्यातं पुण्यं नारायणप्रियम्।
तत्राभ्यर्च्य हृषीकेशं श्वेतद्वीपं निगच्छति॥१२॥
(एक) प्लक्षावतरण-तीर्थ (है जो) सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ श्रीनिवासकी आराधना करनेसे विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मगधराजका एक अन्य तीर्थ है, जो स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। वहाँकी यात्रा करनेसे द्विजोत्तमको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होता है। कनखल नामका एक तीर्थ है जो पुण्यप्रद तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला है। रुद्रदेवने जहाँ दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था। वहाँपर पवित्र भावनासे युक्त होकर गङ्गास्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। 'महातीर्थ' इस नामसे विख्यात नारायणका प्रिय एक पवित्र तीर्थ है, वहाँ हृषीकेशकी आराधना करने से श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है॥८-१२॥
अन्यच्च तीर्थप्रवरं नाना श्रीपर्वतं शुभम्।
तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रस्य दयितो भवेत्॥१३॥
तत्र संनिहितो रुद्रो देव्या सह महेश्वरः।
स्नानपिण्डादिकं तत्र कृतमक्षय्यमुत्तमम्॥१४॥
'श्रीपर्वत' नामका एक दूसरा शुभ श्रेष्ठ तीर्थ है, वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे व्यक्ति रुद्रका प्रिय होता है। वहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर रुद्र स्थित रहते हैं। वहाँ किये हुए स्नान, पिण्डदान आदि उत्तम कर्म अक्षय हो जाते हैं ॥१३-१४॥
गोदावरी नदी पुण्या सर्वपापविनाशिनी।
तत्र स्नात्वा पितॄन् देवांस्तर्पयित्वा यथाविधि।
सर्वपापविशुद्धात्मा गोसहस्रफलं लभेत्॥१५॥
पवित्रसलिला पुण्या कावेरी विपुला नदी।
तस्यां स्नात्वोदकं कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः।
त्रिरात्रोपोषितेनाथ एकरात्रोषितेन वा॥१६॥
द्विजातीनां तु कथितं तीर्थानामिह सेवनम्।
यस्य वाङ्मनसी शुद्धे हस्तपादौ च संस्थितौ।
अलोलुपो ब्रह्मचारी तीर्थानां फलमाप्नुयात्॥१७॥
गोदावरी नदी पवित्र और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। वहाँ स्नानकर विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओंका तर्पण करनेसे (मनुष्य) सभी पापोंसे रहित
होकर पवित्रात्मा हो जाता है और उसे हजारों गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। शुद्ध जलवाली विशाल | कावेरी नदी पुण्यस्वरूप ही है। उसमें स्नान कर तीन रात्रि अथवा एक रात्रिका उपवास करके तर्पण आदि करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजातियों के लिये यहाँ तीर्थोंके सेवनका विधान किया गया है। जिसके मन एवं वाणी शुद्ध हों तथा हाथ-पैर संयमित हों, ऐसा
लोभरहित तथा ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाला द्विज तीर्थों (-में निवास)-का फल प्राप्त करता है॥१५-१७॥
स्वामितीर्थं महातीर्थ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।
तत्र संनिहितो नित्यं स्कन्दोऽमरनमस्कृतः॥१८॥
स्नात्वा कुमारधारायां कृत्वा देवादितर्पणम्।
आराध्य षण्मुखं देवं स्कन्देन सह मोदते॥१९॥
स्वामितीर्थ नामक महातीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। देवताओंद्वारा नमस्कृत (भगवान्) कार्तिकेय वहाँ नित्य स्थित रहते हैं। (वहाँ) कुमारधारामें स्नानकर
देवताओंका पूजन तथा पितरोंका तर्पण करके षण्मुख देव कार्तिकेयकी आराधना करनेसे (आराधक) स्कन्द (कार्तिकेय)-के साथ आनन्द प्राप्त करता है॥१८-१९॥
नदी त्रैलोक्यविख्याता ताम्रपर्णीति नामतः।
तत्र स्नात्वा पितॄन् भक्त्या तर्पयित्वा यथाविधि ।
पापकर्तृनपि पितॄस्तारयेन्नात्र संशयः॥२०॥
ताम्रपर्णी नामवाली नदी तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ स्नानकर विधिपूर्वक भक्तिभावसे पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य पाप करनेवाले पितरोंको भी मुक्त कर देता है, इसमें संदेह नहीं॥ २०॥
चन्द्रतीर्थमिति ख्यातं कावेर्याः प्रभवेऽक्षयम्।
तीर्थं तत्र भवेद् वस्तुं मृतानां स्वर्गति वा ॥२१॥
विन्ध्यपादे प्रपश्यन्ति देवदेवं सदाशिवम्।
भक्त्या ये ते न पश्यन्ति यमस्य सदनं द्विजाः॥२२॥
देविकायां वृषो नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।
तत्र स्नात्वोदकं दत्त्वा योगसिद्धिं च विन्दति॥२३॥
दशाश्वमेधिकं तीर्थं सर्वपापविनाशनम्।
दशानामश्वमेधानां तत्राप्नोति फलं नरः॥२४॥
पुण्डरीकं महातीर्थं ब्राह्मणैरुपसेवितम्।
तत्राभिगम्य युक्तात्मा पौण्डरीकफलं लभेत्॥२५॥
कावेरी के उद्गम स्थानपर चन्द्रतीर्थ नामसे विख्यात अक्षय फल देनेवाला एक तीर्थ है। वहाँ निवास करने तथा वहाँ मृत्यु होनेपर निश्चय ही स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जो विन्ध्यपादमें देवाधिदेव सदाशिवका भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, वे द्विज यमलोकका दर्शन नहीं करते। देविकामें वृष नामका एक तीर्थ है जो सिद्धोंद्वारा सेवित है। वहाँ स्नानकर (पितरोंको) जलदान (तर्पण) करनेसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ सभी पापोंको विनष्ट करनेवाला है। वहाँ (स्नान, दान आदि पुण्य कार्य करनेसे) मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। पुण्डरीक नामक महातीर्थ ब्राह्मणों के द्वारा भलीभाँति सेवित है। वहाँकी यात्रा करने से संयतचित्त व्यक्ति पौण्डरीक (याग)-का फल प्राप्स करता है॥ २१-२५॥
तीर्थेभ्यः परमं तीर्थं ब्रह्मतीर्थमिति श्रुतम्।
ब्रह्माणमर्चयित्वा तु ब्रह्मलोके महीयते॥२६॥
सरस्वत्या विनशनं प्लक्षप्रस्रवणं शुभम्।
व्यासतीर्थं परं तीर्थं मैनाकं च नगोत्तमम्।
यमुनाप्रभवं चैव सर्वपापविशोधनम्॥२७॥
तीर्थों में परम तीर्थ 'ब्रह्मतीर्थ' इस नामसे विख्यात है। वहाँ ब्रह्माकी पूजा करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। सरस्वतीका विनशन अर्थात् लुप्त होनेका स्थान, शुभ प्लक्षप्रस्रवण, श्रेष्ठ व्यासतीर्थ, पर्वतोंमें उत्तम मैनाक तथा सभी पापोंका शोधन करनेवाला यमुनाका उद्गम स्थान-ये सभी तीर्थ हैं(तथा सभी पापोंका शोधन करनेवाले हैं)॥२६-२७॥
पितॄणां दुहिता देवी गन्धकालीति विश्रुता।
तस्यां स्नात्वा दिवंयाति मृतो जातिस्मरो भवेत्॥२८॥
कुबेरतुङ्गं पापघ्नं सिद्धचारणसेवितम्।
प्राणांस्तत्र परित्यज्य कुबेरानुचरो भवेत्॥२९॥
उमातुङ्गमिति ख्यातं यत्र सा रुद्रवल्लभा।
तत्राभ्यर्च्य महादेवीं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३०॥
भृगुतुङ्गे तपस्तप्तं श्राद्धं दानं तथा कृतम्।
कुलान्युभयतः सप्त पुनातीति श्रुतिर्मम॥३१॥
पितरोंकी पुत्री गन्धकाली देवी (एक विशेष नदी के रूपमें) विख्यात है। उसमें स्नान करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है और मरनेके उपरान्त पूर्वजन्मोंके स्मरण की शक्ति प्राप्त होती है। सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित 'कुबेरतुङ्ग' नामक तीर्थ पापोंको विनष्ट करनेवाला है। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे व्यक्ति कुबेरका अनुचर होता है। 'उमातुङ्ग' नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ रुद्रकी प्रिया पार्वती स्थित रहती हैं। वहाँ महादेवी की आराधना करनेसे हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। मैंने ऐसा सुना है कि भृगुतुङ्ग (अन्य तीर्थ-विशेष) पर तपस्या करने, श्राद्ध तथा दान आदि करनेसे व्यक्ति अपने दोनों कुलों (मातृकुल-पितृकुल)-की सात पीढ़ियों को पवित्र कर देता है ॥ २८-३१॥
काश्यपस्य महातीर्थं कालसर्पिरिति श्रुतम्।
तत्र श्राद्धानि देयानि नित्यं पापक्षयेच्छया॥३२॥
दशार्णायां तथा दानं श्राद्धं होमस्तथा जपः।
अक्षयं चाव्ययं चैव कृतं भवति सर्वदा॥३३॥
तीर्थं द्विजातिभिर्जुष्टं नाम्ना वै कुरुजाङ्गलम्।
दत्त्वा तु दानं विधिवद् ब्रह्मलोके महीयते॥३४॥
वैतरण्यां महातीर्थे स्वर्णवेद्यां तथैव च।
धर्मपृष्ठे च सरसि ब्रह्मणः परमे शुभे॥३५॥
भरतस्याश्रमे पुण्ये पुण्ये श्राद्धवटे शुभे।
महाहदे च कौशिक्यां दत्तं भवति चाक्षयम्।। ३६ ॥
काश्यपका 'कालसर्पि' इस नामवाला विख्यात महातीर्थ है। पापोंके क्षय करनेकी अभिलाषासे वहाँ नित्य श्राद्ध करना चाहिये। दशार्णा में किया गया दान, श्राद्ध, होम तथा जप सदाके लिये अक्षय और अविनाशी हो जाता है। द्विजातियोंके द्वारा सेवित तीर्थ 'कुरुजाङ्गल' नामवाला है। वहाँ विधिपूर्वक दान करनेसे ब्रह्मलोक में आदर प्राप्त होता है। वैतरणी, महातीर्थ, स्वर्णवेदी, धर्मपृष्ठ, परम शुभ ब्रह्मसरोवर, पवित्र भरताश्रम, पुण्य तथा शुभ श्राद्धवट, महाहृद तथा कौशिकी नदीमें दिया गया दान अक्षय होता है॥ ३२-३६ ॥
मुञ्जपृष्ठे पदं न्यस्तं महादेवेन धीमता।
हिताय सर्वभूतानां नास्तिकानां निदर्शनम्॥ ३७॥
अल्पेनापि तु कालेन नरो धर्मपरायणः।
पाप्मानमुत्सृजत्याशु जीर्णां त्वचमिवोरगः॥३८॥
नाना कनकनन्देति तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
उदीच्यां मुञ्जपृष्ठस्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ३९॥
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति सशरीरा द्विजातयः।
दत्तं चापि सदा श्राद्धमक्षयं समुदाहृतम्।
ऋणैस्त्रिभिर्नरः स्नात्वा मुच्यते क्षीणकल्मषः॥४०॥
सभी लोगोंके कल्याणके लिये मुञ्जपृष्ठमें अपने चरण (चिह्न) स्थापित कर परम ज्ञानी महादेव ने नास्तिकोंके लिये प्रमाण उपस्थित किया। (यहाँ) अल्पकालमें ही धर्मपरायण व्यक्ति पापोंका उसी प्रकार शीघ्रतासे परित्याग करता है, जैसे सर्प अपनी जीर्ण त्वचा (केंचुल)-का परित्याग कर देता है। ब्रह्मर्षिगणों के द्वारा सेवित मुञ्जपृष्ठके उत्तर भागमें स्थित कनकनन्दा नामक तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है। वहाँ स्नानकर द्विजाति लोग सशरीर स्वर्ग प्राप्त करते हैं। वहाँपर दिया गया दान तथा किया गया श्राद्ध अक्षय कहा गया है। वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य पापरहित होकर तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है ॥ ३७–४० ॥
मानसे सरसि स्नात्वा शक्रस्यार्धासनं लभेत्।
उत्तरं मानसं गत्वा सिद्धिं प्राप्नोत्यनुत्तमाम्॥४१॥
तस्मान्निवर्तयेच्छ्राद्धं यथाशक्ति यथाबलम्।
कामान् स लभते दिव्यान् मोक्षोपायं च विन्दति ॥४२॥
मानस सरोवरमें स्नान करनेसे इन्द्रका अर्धासन प्राप्त होता है। उत्तर मानस तीर्थकी यात्रा करनेसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। अतः (वहाँ) अपनी शक्ति एवं सामर्थ्यके अनुसार श्राद्ध सम्पन्न करना चाहिये। ऐसा करनेवाला दिव्य भोगों और मोक्षके उपाय (धर्म)-को प्राप्त कर लेता है॥ ४१-४२॥
पर्वतो हिमवान्नाम नानाधातुविभूषितः ।
योजनानां सहस्त्राणि सोऽशीतिस्त्वायतो गिरिः।
सिद्धचारणसंकीर्णों देवर्षिगणसेवितः॥४३॥
तत्र पुष्करिणी रम्या सुषुम्ना नाम नामतः।
तत्र गत्वा द्विजो विद्वान् ब्रह्महत्यां विमुञ्चति॥४४॥
श्राद्धं भवति चाक्ष तत्र दत्तं महोदयम्।
तारयेच्च पितॄन् सम्यग् दश पूर्वान् दशापरान्॥४५॥
विविध प्रकारकी धातुओंसे सुशोभित हिमवान् नाम का | पर्वत एक हजार अस्सी योजन विस्तृत, सिद्धों तथा चारणोंसे परिपूर्ण और देवर्षिगणोंसे सेवित है। वहाँ सुषुम्रा नामवाली रमणीय पुष्करिणी है। वहाँको यात्रा कर विद्वान् ब्राह्मण ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्त हो जाता है। वहाँ किया गया श्राद्ध अक्षय होता है और दिया हुआ दान महान् अभ्युदयको प्राप्त कराता है। वहाँ जानेसे व्यक्ति अपनेसे पहले और बादकी दस पीढ़ीतकके पितरों को भलीभाँति तार देता है ॥ ४३-४५॥
सर्वत्र हिमवान् पुण्यो गङ्गा पुण्या समन्ततः ।
नद्यः समुद्रगाः पुण्याः समुद्रश्च विशेषतः॥ ४६॥
हिमालय तथा गङ्गा सर्वत्र ही पवित्र हैं। समुद्रमें जानेवाली नदियाँ तथा विशेषरूपसे समुद्र पवित्र हैं ॥ ४६॥
बदर्याश्रममासाद्य मुच्यते कलिकल्मषात् ।
तत्र नारायणो देवो नरेणास्ते सनातनः॥४७॥
अक्षयं तत्र दानं स्यात् जप्यं वापि तथाविधम्।
महादेवप्रियं तीर्थं पावनं तद् विशेषतः।
तारयेच्च पितॄन् सर्वान् दत्त्वा श्राद्धं समाहितः॥४८॥
बदर्याश्रममें पहुँचकर मनुष्य कलिके पापसे मुक्त हो जाता है। वहाँपर सनातन नारायणदेव नरके साथ विराजमान रहते हैं। वहाँ विधिपूर्वक किया गया दान तथा जप अक्षय हो जाता है। वह पवित्र तीर्थ महादेव को विशेषरूपसे प्रिय है। वहाँ समाहित मनसे श्राद्ध करके मनुष्य अपने सभी पितरोंको मुक्त कर देता है॥ ४७-४८॥
देवदारुवनं पुण्यं सिद्धगन्धर्वसेवितम्।
महादेवेन देवेन तत्र दत्तं महद् वरम् ।। ४९॥
मोहयित्वा मुनीन् सर्वान् पुनस्तैः सम्प्रपूजितः ।
प्रसन्नो भगवानीशो मुनीन्द्रान् प्राह भावितान्॥५०॥
इहाश्रमवरे रम्ये निवसिष्यथ सर्वदा।
मद्भावनासमायुक्तास्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ॥५१॥
सिद्ध तथा गन्धर्वोसे सेवित पवित्र देवदास-वन नामक एक तीर्थ है। देव महादेवने वहाँ महान् वर प्रदान किया था। सभी मुनियोंको मोहित करने के अनन्तर पुनः उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होनेपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने भक्तहृदय उन मुनियोंसे कहा- इस रमणीय तथा श्रेष्ठ आश्रममें आप लोग मेरी भक्ति से संयुक्त होकर सदा निवास करें, इससे आप लोगोंको सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४९-५१॥
येऽत्र मामर्चयन्तीह लोके धर्मपरा जनाः।
तेषां ददामि परमं गाणपत्यं हि शाश्वतम्॥५२॥
अत्र नित्यं वसिष्यामि सह नारायणेन च।
प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न भूयो जन्म विन्दति॥५३॥
इस लोकमें धर्मपरायण जो लोग यहाँ मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ शाश्वत गाणपत्य-पद प्रदान करता हूँ। मैं यहाँ नारायणके साथ नित्य निवास करता हूँ। जो मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता ।। ५२-५३ ॥
संस्मरन्ति च ये तीर्थं देशान्तरगता जनाः।
तेषां च सर्वपापानि नाशयामि द्विजोत्तमाः॥५४॥
श्राद्धं दानं तपो होमः पिण्डनिर्वपणं तथा।
ध्यानं जपश्च नियमः सर्वमत्राक्षयं कृतम्॥५५॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन द्रष्टव्यं हि द्विजातिभिः ।
देवदारुवनं पुण्यं महादेवनिषेवितम्॥५६॥
यत्रेश्वरी महादेवो विष्णुर्वा पुरुषोत्तमः।
तत्र संनिहिता गङ्गा तीर्थान्यायतनानि च॥५७॥
हे द्विजोत्तमो! दूसरे देशोंमें गये हुए जो लोग इस तीर्थका स्मरण करते हैं, उनके सभी पापोंको मैं नष्ट कर देता हूँ। यहाँ किया हुआ श्राद्ध, दान, तप, होम, पिण्डदान, ध्यान, जप तथा नियम सर्वदाके लिये अक्षय हो जाता है। इसलिये द्विजातियोंको महादेवद्वारा सेवित पुण्य देवदारु-वनका सभी प्रयत्नोंद्वारा दर्शन (सेवन) करना चाहिये। जहाँ ईश्वर महादेव अथवा पुरुषोत्तम विष्णु रहते हैं, वहाँ गङ्गा, सभी तीर्थ तथा सभी मन्दिरोंकी स्थिति होती है ॥५४-५७॥
Summary of chapter 85 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa expounds penances for minor offenses (Upapātakas), including harming animals, cutting green trees for non-sacrificial purposes, ceremonial lapses, and improper livelihoods. He details short-term vows, consumption of Panchagavya, performance of specific Yajñas, and intense prayer to Mahādeva to ensure total ritual restoration.