कूर्म महा पुराण
25 अध्याय
गृहस्थ ब्राह्मणकी मुख्य वृत्ति तथा आपत्कालकी वृत्ति, गृहस्थके साधक तथा
असाधक दो भेद, न्यायोपार्जित धनका विभाग एवं उसका उपयोग
व्यास उवाच
एष वोऽभिहितः कृत्स्नो गृहस्थाश्रमवासिनः ।
द्विजातेः परमो धर्मो वर्तनानि निबोधत॥१॥
व्यासजीने कहा-यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थाश्रम- में निवास करनेवाले द्विजातियोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ धर्म बतलाया, अब उनकी वृत्तियोंका वर्णन सुनें॥१॥
द्विविधस्तु गृही ज्ञेयः साधकश्चाप्यसाधकः।
अध्यापनं याजनं च पूर्वस्याहुः प्रतिग्रहम्।
कुसीदकृषिवाणिज्यं प्रकुर्वीतास्वयंकृतम्॥२॥
कृषेरभावाद् वाणिज्यं तदभावात् कुसीदकम्।
आपत्कल्पो ह्ययं ज्ञेयः पूर्वोक्तो मुख्य इष्यते॥ ३॥
स्वयंवा कर्षणं कुर्याद्वाणिज्यं वा कुसीदकम्।
कष्टा पापीयसी वृत्तिः कुसीदं तद् विवर्जयेत्॥४॥
साधक तथा असाधक-भेदसे (ब्राह्मण) गृहस्थको दो प्रकारका समझना चाहिये। पहले (साधक गृहस्थकी आजीविका) अध्ययन कराना, यज्ञ कराना और (दान लेना) है। इसके अतिरिक्त वे अपने द्वारा न किये गये कुसीद (ब्याजका लेन-देन), कृषि तथा वाणिज्य भी अन्यके द्वारा करा सकते हैं। कृषिके अभाव में वाणिज्य और उसके अभावमें कुसीदका आश्रय लिया जा सकता है। इसे आपत्कल्प कहा गया है और पहलेको मुख्यवृत्ति कही गयी है। अथवा (आपत्कालमें अन्य उपाय न होनेपर) स्वयं कृषि, वाणिज्य अथवा कुसीद-वृत्तिका आश्रय ले। कुसीद-वृत्ति (सूद लेना) अत्यन्त कष्टकारक और पापकी वृत्ति है, इसलिये इसका परित्याग करना चाहिये ॥२-४॥
क्षात्रवृत्तिं परां प्राहुर्न स्वयं कर्षणं द्विजैः।
तस्मात् क्षात्रेण वर्तेत वर्तनेनापदि द्विजः॥५॥
तेन नावाप्यजीवंस्तु वैश्यवृत्तिं कृषि व्रजेत्।
न कथंचन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म कर्षणम्॥६॥
लब्धलाभः पितॄन् देवान् ब्राह्मणांश्चापि पूजयेत्।
ते तृप्तास्तस्य तं दोषं शमयन्ति न संशयः॥७॥
क्षात्रवृत्तिको (कृषिवृत्तिकी अपेक्षा) श्रेष्ठ वृत्ति कहा गया है, किंतु द्विजोंको स्वयं कर्षण नहीं करना चाहिये। अतएव द्विजको आपत्तिमें (ही) क्षात्रधर्मसे भी जीविका का निर्वाह करना चाहिये। उस क्षात्रवृत्ति (शस्त्र-जीविका) द्वारा भी निर्वाह न होनेपर कृषिस्वरूप वैश्यवृत्ति का आश्रय लेना चाहिये, किंतु ब्राह्मणको कभी भी खेत जोतने का कार्य नहीं करना चाहिये। लाभ होने पर (विशेषकर अन्य वर्णकी जीविकासे लाभ मिलने पर अवश्य ही) पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। तृप्त होनेपर वे उसके उस (कर्मजन्य) दोषको शान्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं॥५-७॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च दद्याद् भागं तु विंशकम्।
त्रिंशद्भागं ब्राह्मणानां कृषिं कुर्वन् न दुष्यति॥८॥
वणिक् प्रदद्याद् द्विगुणं कुसीदी त्रिगुणं पुनः।
कृषीवलो न दोषेण युज्यते नात्र संशयः॥९॥
देवताओं और पितरोंको (कृषिसे प्राप्त लाभका) बीसवाँ भाग (५ प्रतिशत) और ब्राह्मणोंको तीसवाँ भाग (३६ प्रतिशत) देना चाहिये। ऐसी अवस्थामें कृषि कर्म करनेवाला दोषी नहीं होता। वाणिज्य करनेपर (कृषिजन्य लाभसे दिये जानेवाले अंशकी अपेक्षा) दुगुना, कुसीद- वृत्तिपर तिगुना दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे कृषि करनेवाला निस्संदेह दोषी नहीं होता ॥ ८-९॥
शिलोञ्छं वाप्याददीत गृहस्थः साधकः पुनः।
विद्याशिल्पादयस्त्वन्ये बहवो वृत्तिहेतवः ॥१०॥
असाधकस्तु यः प्रोक्तो गृहस्थाश्रमसंस्थितः।
शिलोञ्छे तस्य कथिते द्वे वृत्ती परमर्षिभिः ॥११॥
अमृतेनाथवा जीवेन्मृतेनाप्यथवा यदि।
अयाचितं स्यादमृतं मृतं भैक्षं तु याचितम्॥१२॥
अथवा साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको शिलोञ्छवृत्तिका' आश्रय लेना चाहिये। विद्या तथा शिल्प आदि भी अन्य बहुतसे जीविकाके साधन हैं। गृहस्थाश्रममें रहनेवाला जो असाधक (नामका दूसरा गृहस्थ) कहा गया है, श्रेष्ठ महर्षियोंद्वारा उसके लिये शिल तथा उञ्छ नामक दो वृत्तियाँ कही गयी हैं। अमृत अथवा मृत साधनद्वारा जीवनयापन करना चाहिये। अयाचित पदार्थ अमृत और याचनाद्वारा भिक्षास्वरूप प्राप्त वस्तु मृत होती है॥१०-१२॥
कुशूलधान्यको वा स्यात् कुम्भीधान्यक एव वा।
व्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव च ॥१३॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
श्रेयान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥१४॥
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति॥१५॥
ब्राह्मणको कुशूलधान्यक (तीन वर्षांतकके लिये संचित धान्यवाला), कुम्भीधान्यक (एक वर्षतकके लिये संचित धान्यवाला), त्र्यैहिक (तीन दिनोंतकके लिये संचित धान्यवाला) अथवा अश्वस्तनिक (अगले दिनके लिये भी धान्य संचित न करनेवाला) होना चाहिये। इन (उपर्युक्त) चार प्रकारके गृहस्थ द्विजों (ब्राह्मणों)-में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है (ऐसा ब्राह्मण) अपने धर्मके कारण श्रेष्ठ लोकजयी (स्वर्ग आदि लोकोंको जीतनेवाला) होता है। इनमें कोई (जिनके पास पोष्य-वर्ग अधिक है) द्विज (ब्राह्मण) षट्कर्मोंसे अपनी जीविका निर्वाह करते हैं, दूसरे (अल्प परिग्रहवाले) कुछ द्विज (ब्राह्मण) तीन साधनोंसे निर्वाह करते हैं, कुछ दो साधनोंसे और चौथे प्रकारके ब्राह्मण ब्रह्मयज्ञ (अध्यापन)-द्वारा आजीविका चलाते हैं ॥ १३-१५॥
वर्तयंस्तु शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टी: पार्वायणान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा॥१६॥
जो ब्राह्मण केवल उञ्छ या शिल-वृत्तिसे अपना निर्वाह करे वह (धनसाध्य अन्य कर्मोंके अनुष्ठानमें असमर्थ होनेके कारण) केवल नित्य-कर्म अग्नि- होत्रको ही करता रहे तथा पर्व एवं अयनके मध्य सम्पन्न की जानेवाली दर्शपौर्णमास एवं आग्रयण इष्टियाँ करता रहे॥१६॥
न लोकवृत्तिं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन।
अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ १७॥
ब्राह्मण जीविकाके लिये लोकवृत्ति (विचित्र हास-परिहास आदिसे युक्त लोककथा आदि)-का आश्रयण कभी न करे। अजिह्म (किसीकी झूठी निन्दा-स्तुति आदिके वर्णनरूप पापसे रहित), अशठ (दम्भ आदि अनेक प्रकारके बनावटी व्यवहारसे शून्य), शुद्ध (वैश्य आदिकी जीवनवृत्तिसे असम्बद्ध) शास्त्रीय वृत्तिका ही आश्रयण करना चाहिये॥१७॥
याचित्वा वापि सद्भयोऽन्नं पितॄन् देवांस्तु तोषयेत्।
याचयेद् वा शुचिं दान्तं न तृप्येत स्वयं ततः॥१८॥
यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा गृहस्थस्तोषयेन्न तु।
देवान् पितॄश्च विधिना शुनां योनिं व्रजत्यसौ॥१९॥
उसे (ब्राह्मणको) सज्जनोंसे अन्न माँगकर भी पितरों तथा देवताओंको संतुष्ट करना चाहिये। अथवा पवित्र इन्द्रियजयी व्यक्तियोंसे याचना करे, किंतु उससे स्वयं तृप्त न होवे (अर्थात् उस याचित द्रव्यका उपयोग स्वयंके लिये न करे)। जो गृहस्थ द्रव्योपार्जन करके देवताओं तथा पितरोंको विधिपूर्वक संतुष्ट नहीं करता है, वह कुत्तेकी योनिमें जाता है ॥ १८-१९ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च श्रेयो मोक्षश्चतुष्टयम्।
धर्माविरुद्धः कामः स्याद्ब्राह्मणानांतुनेतरः॥२०॥
योऽर्थो धर्माय नात्मार्थः सोऽर्थोऽनर्थस्तथेतरः।
तस्मादर्थ समासाद्य दद्याद्वै जुहुयाद्यजेत्॥२१॥
धर्म, अर्थ, काम तथा कल्याणकारी मोक्ष नामक चार पुरुषार्थ हैं। ब्राह्मणोंका काम (नामक पुरुषार्थ) धर्मका अविरोधी होना चाहिये, इससे भिन्न (अर्थात् धर्मविरोधी कथमपि) नहीं होना चाहिये। जो अर्थ धर्मके लिये होता है अपने लिये नहीं वह (वास्तविक) अर्थ है, इससे भिन्न प्रकारका अर्थ तो अनर्थ है। इसलिये (धर्मपूर्वक) अर्थ प्राप्त होनेपर दान, हवन तथा
यज्ञ करना चाहिये ॥ २०-२१॥
Summary of chapter 74 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa details the stringent criteria for selecting Brāhmaṇas to represent Devas and Pitṛs during Śrāddha ceremonies. He emphasizes inviting scholars well-versed in the Vedas, Vedāṅgas, Purāṇas, and those who practice severe penance, daily Agnihotra, and Śiva-Vishṇu devotion. Conversely, Vyāsa strictly forbids inviting degraded, unlettered, greedy, or morally compromised persons, as improper invitations ruin the sacrificial merit.