33 अध्याय

प्रायश्चित्त-प्रकरणमें चोरी तथा अभक्ष्य-भक्षणका प्रायश्चित्त, प्रकीर्ण पापोंका प्रायश्चित्त,

समस्त पापोंकी एकत्र मुक्तिके विविध उपाय,पतिव्रताको कोई पाप नहीं लगता,

पतिव्रताके माहात्म्यमें देवी सीताका आख्यान, सीताद्वारा अग्निस्तुति,

ज्ञानयोगकी प्रशंसा तथा प्रायश्चित्त-प्रकरणका उपसंहार

व्यास उवाच

मनुष्याणां तु हरणं कृत्वा स्त्रीणां गृहस्य च।

वापीकूपजलानां च शुध्येच्चान्द्रायणेन तु॥१॥

द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः ।

चरेत् सांतपनं कृच्छं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ॥२॥

धान्यान्नधनचौर्यं तु कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।

स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुध्यति॥३॥

भक्षभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च।

पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम्॥४॥

तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च।

चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥५॥

व्यासजीने कहा-मनुष्य, स्त्री, गृह, वापी, कूप तथा जलाशयोंका अपहरण करनेपर चान्द्रायणव्रत करने से शुद्धि होती है। दूसरेके घरोंसे अल्प सारवाली अर्थात् सामान्य वस्तुओंकी चोरी करनेपर उस पापसे अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसान्तपनव्रत करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि इच्छापूर्वक अपनी जातिवाले बान्धवोंके घरसे धान्य, अन्न अथवा धनकी चोरी करे तो अर्धकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे शुद्ध होता है। भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थों तथा यान, शय्या, आसन, पुष्प, मूल तथा फलोंकी चोरी की शुद्धि पञ्चगव्य-प्राशनसे होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, शुष्कान, गुड़, वस्त्र, चर्म तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन रात्रितक भोजन नहीं करना चाहिये ॥१-५॥

मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।

अयःकांस्योपलानां च द्वादशाहं कणाशनम्॥ ६ ॥

कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।

पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ७॥

मणि, मोती, मूंगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनतक कण (टूटे चावल)-का भक्षण करना चाहिये। कपास, रेशम, ऊन, दो खुर तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, गन्ध, औषधि तथा रस्सीका हरण करनेपर तीन दिनतक जलमात्र पीकर रहना चाहिये॥६-७॥

नरमांसाशनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्।

काकं चैव तथा श्वानं जग्ध्वा हस्तिनमेव च।

वराहं कुक्कुटं चाथ तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥ ८ ॥

क्रव्यादानां च मांसानि पुरीषं मूत्रमेव च।

गोगोमायुकपीनां च तदेव व्रतमाचरेत्।

उपोष्य द्वादशाहं तु कूष्माण्डैर्जुहुयाद् घृतम्॥ ९ ॥

नकुलोलूकमार्जारं जग्ध्वा सांतपनं चरेत्।

श्वापदोष्ट्रखराञ्जग्ध्वा तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति।

व्रतवच्चैव संस्कारं पूर्वेण विधिनैव तु॥१०॥

मनुष्यका मांस भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कौआ, कुत्ता, हाथी, वराह और कुक्कुटका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। कच्चा मांस खानेवाले जानवरों, सियारों तथा बंदरोंका मांस तथा मल-मूत्र भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये तथा बारह दिनोंतक उपवास करके कूष्माण्ड-संज्ञक मन्त्रोंसे घीकी आहुति देनी चाहिये। नेवला, उल्लू तथा बिल्लीका मांस भक्षण करनेपर सान्तपनव्रत करना चाहिये। शिकारी पशु, ऊँट और गदहेका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रत से शुद्धि होती है। पहले निर्दिष्ट विधानके अनुसार व्रत के समान ही संस्कार भी करना चाहिये॥८-१०॥

बकं चैव बलाकं च हंसं कारण्डवं तथा।

चक्रवाकं प्लवं जग्ध्वा द्वादशाहमभोजनम्॥११॥

कपोतं टिट्टिभं चैव शुकं सारसमेव च।

उलूकं जालपादं च जग्ध्वाप्येतद् व्रतं चरेत्॥१२॥

शिशुमारं तथा चाषं मत्स्यमांसं तथैव च।

जग्ध्वा चैव कटाहारमेतदेव चरेद् व्रतम्॥१३॥

कोकिलं चैव मत्स्यांश्च मण्डूकं भुजगं तथा।

गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति॥१४॥

जलेचरांश्च जलजान् प्रत्तुदान् नखविष्किरान्।

रक्तपादांस्तथा जग्ध्वा सप्ताहं चैतदाचरेत्॥१५॥

शुनो मांसंशुष्कमांसमात्मार्थं च तथा कृतम्।

भुक्त्वा मासं चरेदेतत् तत्पापस्यापनुत्तये॥१६॥

वार्ताकं भूस्तृणं शिग्रंखुखुण्डं करकं तथा।

प्राजापत्यं चरेजग्ध्वा शंखं कुम्भीकमेव च॥१७॥

बक (बगुला), बलाक (बक-पंक्ति), हंस, कारण्डव, चक्रवाक तथा प्लव पक्षीका मांस भक्षण करनेपर बारह दिनतक भोजन (अन्न ग्रहण) नहीं करना

चाहिये। कपोत, टिट्टिभ, शुक, सारस, उलूक तथा कलहंसका मांस भक्षण करनेपर भी यही व्रत (बारह दिनतक उपवास) करना चाहिये। शिशुमार, नीलकण्ठ, मछलीका मांस तथा गीदड़का मांस भक्षण करने पर भी यही (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कोयल, मत्स्य, मेढक तथा सर्प भक्षण करनेपर एक मासतक गोमूत्र में अधपके यवका या यवके सत्तू आदिका भक्षण करनेसे शुद्धि होती है। जलचर, जलज, प्रत्तुद अर्थात् चोंचद्वारा ठोकर मारकर आहार करनेवाले कौआ आदि, नखविष्किर अर्थात् तितिर आदि और लाल पैरवाले पक्षियोंका मांस भक्षण करनेपर एक सप्ताहतक यह (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कुत्तेका मांस, सूखा मांस तथा अपने लिये बनाया मांस खानेपर उस पापको हटानेके लिये एक महीनेतक यह (ऊपर कहा गया) व्रत करना चाहिये। बैगन, भूस्तृण, सहजन, खुखुण्ड, करक, शङ्ख और कुम्भीकका भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥११-१७॥

पलाण्डुलशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणंचरेत्।

नालिकां तण्डुलीयं च प्राजापत्येन शुध्यति॥१८॥

अश्मान्तकं तथा पोतं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति ।

प्राजापत्येन शुद्धिः स्यात् कक्कुभाण्डस्य भक्षणे॥१९॥

अलाचं किंशुकं चैव भुक्त्वा चैतद् व्रतं चरेत्।

उदुम्बरं च कामेन तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥२०॥

प्याज एवं लहसुन भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। नालिका शाक और तण्डुलीयक (चौलाई) का साग खानेपर प्राजापत्य व्रतसे शुद्धि होती है। अश्मान्तक तथा पोतका भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। कक्कुभके अंडेका भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रतसे शुद्धि होती है। अलाबु (वर्तुलाकार अर्थात् गोल लौकी) तथा किंशुक (पलाश)-का भक्षण करनेपर भी यही व्रत करना चाहिये। इच्छापूर्वक उदुम्बर (गूलर)-का भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रसे शुद्धि होती है ॥ १८-२०॥

वृथा कृसरसंयावं पायसापूपसंकुलम्।

भुक्त्वा चैवंविधं त्वन्नं त्रिरात्रेण विशुध्यति॥२१॥

पीत्वा क्षीराण्यपेयानि ब्रह्मचारी समाहितः।

गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति ॥२२॥

अनिर्दशाहं गोक्षीरं माहिषं चाजमेव च।

संधिन्याश्च विवत्सायाः पिबन् क्षीरमिदं चरेत्॥२३॥

एतेषां च विकाराणि पीत्वा मोहेन मानवः।

गोमूत्रयावकाहारः सप्तरात्रेण शुध्यति॥२४॥

किसी शास्त्रीय उद्देश्यके बिना व्यर्थ ही या केवल अपने लिये कृसर (अन्न), संयाव (लपसी), खीर और मालपूआके समान पदार्थ भक्षण करनेपर तीन रात्रितक व्रत करनेसे शुद्धि होती है। पीनेके अयोग्य दूधका पान करनेपर सावधानीपूर्वक गोमूत्रमें पके यावकका आहार करनेसे एक मासमें ब्रह्मचारी शुद्ध होता है। ब्याने के दस दिन हुए बिना अथवा गर्भिणी और बिना बच्चेवाली गौ, भैंस और बकरीका दूध पीनेपर यही व्रत करना चाहिये। इनके (दूधके) विकार अर्थात् घी-दही आदि का मोहवश भक्षण करनेपर मनुष्य सात रात्रितक गोमूत्र में अधपके यवका अथवा यवके सत्तू आदिका भोजन करनेसे शुद्ध होता है ॥ २१-२४॥

भुक्त्वा चैव नवश्राद्धे मृतके सूतके तथा।

चान्द्रायणेन शुध्येत ब्राह्मणस्तु समाहितः॥२५॥

यस्याग्नौ हूयते नित्यं न यस्याग्नं न दीयते।

चान्द्रायणंचरेत् सम्यक् तस्यान्नप्राशने द्विजः॥२६॥

अभोज्यानां तु सर्वेषां भुक्त्वा चान्नमुपस्कृतम्।

अन्तावसायिनां चैव तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥२७॥

चाण्डालानं द्विजो भुक्त्वा सम्यक् चान्द्रायणं चरेत् ।

बुद्धिपूर्वं तु कृच्छाब्दं पुनः संस्कारमेव च ॥२८॥

 (मृत्युके अनन्तर होनेवाले) नवश्राद्ध (मृत व्यक्ति के प्रथम दिनसे लेकर दशम दिनतक किये जानेवाले श्राद्ध), जननाशौच तथा मरणाशौचमें भोजन करने पर ब्राह्मण समाहित होकर चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो (अधिकारी) न नित्य अग्निमें हवन करता है और न अग्रासन (भोजन करनेके पूर्व ब्राह्मण तथा अतिथिको भोजन कराता है, न गोग्रास ही निकालता है) देता है, उसका अन्न भक्षण करनेपर द्विज को चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो अभोज्य हैं उन सभीका तथा अन्त्यजोंका पक्वान्न ग्रहण करने पर तप्तकृच्छ्वतसे शुद्धि होती है। बिना जाने चाण्डाल का अन्न भक्षण करके द्विजको भलीभाँति चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा करनेपर एक वर्ष तक कृच्छ्वतका पालन करके पुनः (द्विजत्व प्राप्ति के लिये) संस्कार करना चाहिये। २५-२८॥

असुरामद्यपानेन कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्।

अभोज्यान्नं तु भुक्त्वा च प्राजापत्येन शुध्यति॥२९॥

विण्मूत्रप्राशनं कृत्वा रेतसश्चैतदाचरेत्।

अनादिष्टेषु चैकाहं सर्वत्र तु यथार्थतः ॥ ३०॥

सुराभिन्न मद्यका पान करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और अभोज्यान-भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रतसे शुद्धि होती है। मल, मूत्र एवं वीर्यका भक्षण करने पर भी यही (प्राजापत्य नामक) व्रत करना चाहिये। अन्य सभी न कहे गये पापोंमें यथाविधि एक दिनका उपवास करना चाहिये॥ २९-३०॥

विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः।

प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्॥३१॥

अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च।

पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥३२॥

क्रव्यादां पक्षिणां चैव प्राश्य मूत्रपुरीषकम्।

महासांतपनं मोहात् तथा कुर्याद् द्विजोत्तमः।

भासमण्डूककुररे विष्किरे कृच्छ्रमाचरेत्॥ ३३॥

ग्रामसूकर, गदहा, ऊँट, शृगाल, बंदर तथा कौए के मल-मूत्रका भक्षण करनेपर द्विजको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अज्ञानसे मल-मूत्रका भक्षण करने और सुराका स्पर्श करनेपर तीनों वर्णवाले द्विजातियोंको पुनः संस्कार करना चाहिये। अज्ञानवश कच्चा मांसभक्षी पक्षियों के मूत्र-पुरीषका भक्षण हो जानेपर द्विजोत्तमको महासांतपन नामक व्रत करना चाहिये। गृध्र,मेढक, कुरर पक्षी एवं विष्किर (नखसे बिखेरकर खानेवाले पक्षी)-का भक्षण करनेपर (अथवा इनके मूत्र-पुरीषादिका भक्षण करनेपर) कृच्छ्रव्रत करना चाहिये ॥ ३१-३३ ॥

प्राजापत्येन शुध्येत ब्राह्मणोच्छिष्टभोजने।

क्षत्रिये तप्तकृच्छ्रे स्याद्वैश्ये चैवातिकृच्छ्रकम्।

शूद्रोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्॥३४॥

सुराभाण्डोदरे वारि पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्।

शुनोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति।

गोमूत्रयावकाहारः पीतशेषं च रागवान् ॥ ३५॥

ब्राह्मणका उच्छिष्ट भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रत से शुद्धि होती है। क्षत्रियोंका उच्छिष्ट भक्षण करने पर तप्तकृच्छ्र नामक व्रत करना चाहिये, वैश्यका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर अतिकृच्छ्र और शूद्रका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर ब्राह्मणको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। सुराके पात्रमें जल पीनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कुत्ते का जूठा खानेपर द्विजकी शुद्धि तीन रात्रितक उपवास करनेसे होती है। कुत्तेका पीतशेष इच्छापूर्वक ग्रहण करनेवालेको तीन राततक गोमूत्रमें पके हुए यवान्न का आहारमात्र ग्रहण करना चाहिये॥ ३४-३५॥

अपो मूत्रपुरीषाद्यैर्दूषिताः प्राशयेद् यदा।

तदा सांतपनं प्रोक्तं व्रतं पापविशोधनम्॥३६॥

चाण्डालकूपभाण्डेषु यदि ज्ञानात् पिबेज्जलम्।

चरेत् सांतपनं कृच्छ्रे ब्राह्मणः पापशोधनम्॥ ३७॥

चाण्डालेन तुसंस्पृष्टं पीत्वा वारि द्विजोत्तमः ।

त्रिरात्रेण विशुध्येत पञ्चगव्येन चैव हि ॥३८॥

महापातकिसंस्पर्श भुंक्तेऽस्नात्वा द्विजो यदि।

बुद्धिपूर्व तु मूढात्मा तप्तकृच्छं समाचरेत्॥३९॥

स्पृष्ट्वा महापातकिनं चाण्डालं वा रजस्वलाम्।

प्रमादाद् भोजनं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति॥४०॥

यदि मल तथा मूत्र आदिसे दूषित जलका पान कर ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये सांतपन नामक व्रत बतलाया गया है। चाण्डालके कूपसे तथा उसके बरतनोंमें यदि ज्ञानपूर्वक ब्राह्मण जल पी ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसांतपन नामक व्रत करना चाहिये। चाण्डालके द्वारा स्पर्श हुआ जल पीने पर द्विजोत्तम तीन रात्रितक पञ्चगव्य ग्रहण करनेसे शुद्ध होता है। महापातकीका स्पर्श होनेपर बिना स्नान किये यदि द्विज जान-बूझकर मोहवश भोजन करता है तो उसे तप्तकृच्छ्र करना चाहिये। प्रमादवश महापातकी, चाण्डाल या रजस्वलाका स्पर्शकर भोजन करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवाससे शुद्धि होती है॥३६-४०॥

स्नाना) यदि भुञ्जीत अहोरात्रेण शुध्यति।

बुद्धिपूर्वं तु कृच्छ्रेण भगवानाह पद्मजः॥४१॥

शुष्कपर्युषितादीनि गवादिप्रतिदूषितम्।

भुक्त्वोपवासं कुर्वीत कृच्छ्रपादमथापि वा ॥४२॥

संवत्सरान्ते कृच्छ्रे तु चरेद् विप्रः पुनः पुनः

अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः॥४३॥

भगवान् ब्रह्माने कहा है कि स्नानके योग्य व्यक्ति यदि बिना स्नान किये भोजन करता है तो वह अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्ध हो जाता है, किंतु ज्ञानपूर्वक भोजन करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। शुष्क, बासी आदि तथा गौ आदिद्वारा दूषित (उच्छिष्ट) पदार्थोंका भक्षण करनेपर एक दिनका उपवास अथवा कृच्छ्रव्रतका चतुर्थांश व्रत करना चाहिये। अज्ञान में अभोज्य पदार्थोंके भक्षणसे होनेवाले पापकी शुद्धि के लिये संवत्सरके अन्तमें ब्राह्मणको बार-बार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा होनेपर इसे विशेषरूपसे करना चाहिये॥ ४१-४३॥

व्रात्यानां यजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च।

अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छैर्विशुध्यति॥४४॥

ब्राह्मणादिहतानां तु कृत्वा दाहादिकाः क्रियाः।

गोमूत्रयावकाहारः प्राजापत्येन शुध्यति॥४५॥

तैलाभ्यक्तोऽथवा कुर्याद् यदि मूत्रपुरीषके।

अहोरात्रेण शुध्येत श्मश्रुकर्म च मैथुनम्॥ ४६॥

संस्कारहीन पुरुषोंका यज्ञ कराने और दूसरोंका* अन्त्येष्टिकर्म तथा अभिचार-कर्म करनेपर तीन कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। ब्राह्मण आदिके द्वारा मारे गये पुरुषोंका दाहादि कर्म करनेपर गोमूत्रमें पके यवान्नका आहार करने और प्राजापत्य-व्रत करनेसे शुद्धि होती है। तेल लगाकर और मल-मूत्रका त्याग करने, श्मश्रुकर्म करने (दाढ़ी आदि बनाने) तथा मैथुन करनेपर अहोरात्र

उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥ ४४-४६ ॥

एकाहेन विवाहाग्निं परिहार्य द्विजोत्तमः।

त्रिरात्रेण विशुध्येत त्रिरात्रात् षडहं पुनः॥४७॥

दशाहं द्वादशाहं वा परिहार्य प्रमादतः।

कृच्छ्रे चान्द्रायणं कुर्यात् तत्पापस्यापनुत्तये॥४८॥

एक दिन विवाहाग्नि (गृह्याग्नि)-का त्याग करने अर्थात् उस अग्निमें हवन न करनेसे द्विजोत्तम तीन दिन (उपवास करने)-से शुद्ध होता है और तीन दिनतक नित्य हवन न करनेपर छः दिनोंके उपवास से शुद्ध होता है। प्रमादवश दस दिन अथवा बारह दिनतक गृह्याग्निका त्याग करनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४७-४८॥

पतिताद् द्रव्यमादाय तदुत्सर्गेण शुध्यति।

चरेत् सांतपनं कृच्छ्रमित्याह भगवान् प्रभुः॥४९॥

अनाशकनिवृत्तास्तु प्रव्रज्यावसितास्तथा।

चरेयुस्त्रीणि कृच्छ्राणि त्रीणि चान्द्रायणानिच॥५०॥

भगवान् प्रभुने बताया है कि पतित व्यक्तिसे द्रव्य लेनेपर उस द्रव्यका त्याग कर देनेसे शुद्धि होती है, साथ ही कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये। प्रायोपवेशन- व्रतसे भ्रष्ट तथा संन्यास-आश्रमसे च्युत व्यक्तिको तीन कृच्छ और तीन चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४९-५०॥

पुनश्च जातकर्मादिसंस्कारैः संस्कृता द्विजाः।

शुध्येयुस्तद् व्रतं सम्यक् चरेयुर्धर्मवर्धनाः॥५१॥

पुन: जातकर्मादि संस्कारोंद्वारा संस्कृत होनेपर धर्मकी वृद्धि चाहनेवाले द्विजोंको भलीभाँति व्रतका पालन करना चाहिये॥५१॥

अनुपासितसंध्यस्तु तदहर्यापको वसेत्।

अनश्नन् संयतमना रात्रौ चेद् रात्रिमेव हि ॥५२॥

अकृत्वा समिदाधानं शुचिः स्नात्वा समाहितः।

गायत्र्यष्टसहस्त्रस्य जप्यं कुर्याद् विशुद्धये ॥५३॥

उपासीत नचेत् संध्यां गृहस्थोऽपि प्रमादतः।

स्नात्वा विशुध्यते सद्यः परिश्रान्तस्तु संयमात्॥५४॥

वेदोदितानि नित्यानि कर्माणि च विलोप्य तु।

स्नातकव्रतलोपं तु कृत्वा चोपवसेद् दिनम् ॥५५॥

(प्रातः) संध्या न करनेपर उस दिन वैसे ही बिना भोजन किये संयतमन होकर रहना चाहिये और सायं-संध्या न करनेपर रात्रिमें भोजन नहीं करना चाहिये। (गार्हपत्याग्निमें) समिधा न डालनेपर अर्थात् नित्य-हवन (नित्यकर्म-अग्निहोत्र) न करनेपर उस पाप की शुद्धिके लिये स्नान करके पवित्रतापूर्वक समाहित होकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी व्यक्ति यदि प्रमादसे संध्या नहीं करता है तो स्नान करके उपवास करनेसे वह शुद्ध हो जाता है और थकानके कारण संध्या न करनेवाला संयम (मन एकाग्रकर पश्चात्तापमात्र) करनेसे शुद्ध हो जाता है। वेदमें बताये गये नित्य-कर्मोंका लोप करने तथा स्नातकके व्रतका लोप करनेपर स्नातकको एक दिन का उपवास करना चाहिये ॥५२-५५॥

संवत्सरं चरेत् कृच्छ्रमग्न्युत्सादी द्विजोत्तमः ।

चान्द्रायणं चरेद् व्रात्यो गोप्रदानेन शुध्यति ॥५६॥

नास्तिक्यं यदि कुर्वीत प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।

देवद्रोहं गुरुद्रोहं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥५७॥

उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं च कामतः ।

त्रिरात्रेण विशुध्येत् तु नग्नो वा प्रविशेजलम्॥५८॥

अग्निका परित्याग करनेवाले द्विजोत्तमको एक वर्षतक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और संस्कारहीन व्यक्ति चान्द्रायणव्रत करने और गोदान करनेसे शुद्ध हो जाता है। नास्तिकता करनेवाले द्विजको प्राजापत्य-व्रतका पालन करना चाहिये। देवतासे तथा गुरुसे द्रोह करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करने से शुद्धि होती है। इच्छापूर्वक ऊँट या गदहेकी सवारी करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवास करनेसे शुद्धि होती है। इसी प्रकार नग्न होकर जलमें प्रवेश करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये॥५६-५८॥

षष्ठान्नकालतामासं संहिताजप एव च।

होमाश्च शाकला नित्यमपांक्तातानां विशोधनम्॥५९।।

नीलं रक्तं वसित्वा च ब्राह्मणो वस्त्रमेव हि।

अहोरात्रोषितः स्नातः पञ्चगव्येन शुध्यति॥६०॥

पंक्तिसे बहिष्कृत यदि ऐसे लोग हैं, जिनके लिये विशेष प्रायश्चित्तका उपदेश नहीं किया गया है, वे लोग एक मासतक नियमपूर्वक 'षष्ठान्नकालता' (तीन दिन भोजन न कर तीसरे दिन सायं केवल एक बार सात्त्विक (हविष्यान्न) भोजन करें, संहिताजप (वेदसंहिता के मन्त्रोंका पाठ) करें तथा शाकल होम (बौधायनस्मृति प्रश्न ४, अध्याय ३ के अनुसार) करें तो शुद्ध हो सकते हैं। नीला या लाल वस्त्र धारण करनेपर ब्राह्मण एक अहोरात्र उपवास करनेके अनन्तर स्नानकर पञ्चगव्यका पान करनेसे शुद्ध होता है॥५९-६०॥

वेदधर्मपुराणानां चण्डालस्य तु भाषणे।

चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यान्न ह्यन्या तस्य निष्कृतिः ॥६१॥

चाण्डालको वेद, धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का उपदेश करनेपर चान्द्रायणसे शुद्धि होती है, इसके अतिरिक्त उसकी निष्कृति (निस्तार)-का कोई अन्य उपाय नहीं है॥६१॥

उद्बन्धनादिनिहतं संस्पृश्य ब्राह्मणः क्वचित्।

चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यात् प्राजापत्येन वा पुनः॥६२॥

उच्छिष्टो यद्यनाचान्तश्चाण्डालादीन् स्पृशेद् द्विजः ।

प्रमादावै जपेत्स्नात्वा गायत्र्यष्टसहस्रकम्॥६३॥

द्रुपदानां शतं वापि ब्रह्मचारी समाहितः।

त्रिरात्रोपोषितः सम्यक् पञ्चगव्येन शुध्यति॥६४॥

चण्डालपतितादींस्तु कामाद् यः संस्पृशेद् द्विजः।

उच्छिष्टस्तत्र कुर्वीत प्राजापत्यं विशुद्धये॥६५॥

उद्बन्धन (फाँसी) आदिद्वारा मरे व्यक्तिका कदाचित् स्पर्श होनेपर ब्राह्मण चान्द्रायण अथवा प्राजापत्यव्रत करनेसे शुद्ध होता है। प्रमादवश यदि जूठे मुँह बिना आचमन किये द्विज चाण्डाल आदिका स्पर्श करता है तो उसे स्नानकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्रह्मचारीको तो समाहित होकर तीन रात उपवास करके भलीभाँति सौ बार द्रुपदा मन्त्रका जप करना चाहिये और फिर पञ्चगव्यप्राशन करनेपर उसकी शुद्धि होती है। जो उच्छिष्टमुख द्विज इच्छापूर्वक चाण्डाल तथा पतित आदिका स्पर्श करता है, उसे शुद्धिके लिये प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥६२-६५॥

चाण्डालसूतकशवांस्तथा नारी रजस्वलाम्।

स्पृष्ट्वा स्नायाद् विशुद्ध्यर्थं तत्स्पृष्टं पतितं तथा॥६६॥

चाण्डालसूतकशवैः संस्पृष्टं संस्पृशेद् यदि।

प्रमादात् तत आचम्य जपं कुर्यात् समाहितः॥६७॥

तत्स्पृष्टस्पर्शिनं स्पृष्ट्वा बुद्धिपूर्वं द्विजोत्तमः ।

आचमेत् तद्विशुद्ध्यर्थं प्राह देवः पितामहः॥६८॥

चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति, शव, रजस्वला स्त्री, उनसे स्पृष्ट व्यक्ति तथा पतितका स्पर्श करनेपर शुद्धि के लिये स्नान करना चाहिये। प्रमादवश चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति तथा शव-इनको स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श होने पर (स्नानोपरान्त) आचमन करके एकाग्र होकर (गायत्री-) जप करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि जान-बूझकर चाण्डाल आदिद्वारा स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श करे तो उसे उस पापकी शुद्धिके लिये (स्नान* करके) आचमन करना चाहिये-ऐसा पितामहदेवने कहा है॥६६-६८॥

भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित् संस्रवेद् गुदम्।

कृत्वा शौचं ततः स्नायादुपोष्य जुहुयाद् घृतम्॥६९॥

चाण्डालान्त्यशवं स्पृष्ट्वा कृच्छं कुर्याद् विशुद्धये।

स्पृष्ट्वाभ्यक्तस्त्वसंस्पृश्यमहोरात्रेण शुध्यति॥७०॥

भोजन करते समय ब्राह्मणके गुदामार्गसे कदाचित् मलस्त्राव हो जाय तो शौच करनेके अनन्तर स्नान करना चाहिये और उपवास करके घृतसे हवन करे। चाण्डाल एवं अन्त्यजके शवका स्पर्श करके शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। उबटन आदि लगानेके बाद अस्पृश्य व्यक्तिका स्पर्श होनेपर एक अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥६९-७०॥

सुरां स्पृष्ट्वा द्विजः कुर्यात् प्राणायामत्रयं शुचिः।

पलाण्डु लशुनं चैव घृतं प्राश्य ततः शुचिः॥७१॥

ब्राह्मणस्तु शुना दष्टस्त्र्यहं सायं पयः पिबेत्।

नाभेरूज़ तु दष्टस्य तदेव द्विगुणं भवेत्॥७२॥

स्यादेतत् त्रिगुणं बाह्वोर्मूर्ध्निच स्याच्चतुर्गुणम्।

स्नात्वा जपेद् वा सावित्रीं श्वभिर्दष्टो द्विजोत्तमः॥७३॥

सुराका स्पर्श करके द्विज तीन प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है। प्याज, लहसुनका स्पर्श होनेपर घृतका प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। कुत्तेके काटनेपर ब्राह्मणको (कुत्तेके स्पर्शके प्रायश्चित्तके साथ) तीन दिन सायंकाल केवल दूध पीना चाहिये। नाभिके ऊपरी भागमें काटनेपर यही क्रिया (प्रायश्चित्त) दो बार करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुमें काटनेपर यही क्रिया तीन बार और मस्तकमें काटनेपर चार बार करनी चाहिये अथवा कुत्तेके काटनेपर द्विजोत्तमको स्नान करके गायत्रीका जप करना चाहिये॥७१-७३ ॥

अनिर्वर्त्य महायज्ञान् यो भुंक्ते तु द्विजोत्तमः ।

अनातुरः सति धने कृच्छ्रार्धेन स शुध्यति॥७४॥

आहिताग्निरुपस्थानं न कुर्याद् यस्तु पर्वणि।

ऋतौ न गच्छेद् भार्यां वा सोऽपि कृच्छ्रार्धमाचरेत्।।७५॥

स्वस्थ रहते और धन होनेपर भी जो द्विजोत्तम प्रतिदिन विहित पाँच महायज्ञोंको बिना सम्पन्न किये भोजन करता है, वह अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो अग्निहोत्री ब्राह्मण पर्यों में उपस्थान नहीं करता और जो ऋतुकालमें भार्याके साथ सहवास नहीं करता वह भी अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है । ७४-७५ ।।

विनाऽद्भिरप्सु वाप्यातः शारीरं संनिवेश्य च।

सचैलो जलमाप्लुत्य गामालभ्य विशुध्यति॥७६ ॥

बुद्धिपूर्वं त्वभ्युदितो जपेदन्तर्जले द्विजः।

गायत्र्यष्टसहस्रं तु त्र्यहं चोपवसेद् व्रती॥७७॥

कोई आर्त (मल-मूत्रके वेगसे आर्त-त्रस्त) व्यक्ति यदि जलके अभावमें मल-मूत्रका त्याग अकस्मात् कर देता है या जलके मध्यमें रहता हुआ मल-मूत्रके वेग से आर्त होनेके कारण जलके मध्य ही अकस्मात् मल-मूत्रका त्याग कर देता है तो मल-मूत्रका प्रक्षालनकर ग्राम या नगर आदिके बाहर नदी आदिमें शरीर पर धारित समस्त वस्त्रोंके साथ उसे स्नान करना चाहिये तथा गौका स्पर्श करना चाहिये, तभी शुद्धि होती है। जान-बूझकर (सूर्योदयकालतक शयन करनेवाले अथवा आलस्यवश सोये रहनेके कारण सूर्योदयकालीन अनुष्ठान को न करनेवाले) ब्राह्मणको सूर्योदयके समय जलमें प्रविष्ट होकर आठ हजार गायत्रीका जप तथा तीन दिनतक उपवास करना चाहिये॥७६-७७॥

अनुगम्येच्छया शूद्रं प्रेतीभूतं द्विजोत्तमः।

गायत्र्यष्टसहस्त्रं च जप्यं कुर्यान्नदीषु च॥७८॥

कृत्वा तु शपथं विप्रो विप्रस्य वधसंयुतम्।

मृषैव यावकान्नेन कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्॥७९॥

पंक्त्यां विषमदानं तु कृत्वा कृच्छ्रेण शुध्यति।

छायां श्वपाकस्यारुह्य स्नात्वा सम्प्राशयेद् घृतम्॥८०॥

इच्छापूर्वक मृत शूद्रके शवका अनुगमन करने पर द्विजोत्तमको नदीके किनारे आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्राह्मणके वध करनेकी झूठी शपथ करनेपर ब्राह्मणको यावकान्न (यवके सत्तू या उससे बने हुए किसी अन्य पदार्थ)-से चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको विषम दान करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। चाण्डाल की छायाका स्पर्श होनेपर स्नान करके घृतका प्राशन करना चाहिये॥७८-८०॥

ईक्षेदादित्यमशुचिर्दृष्ट्वाग्निं चन्द्रमेव वा।

मानुषंचास्थि संस्पृश्य स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥८१॥

कृत्वा तु मिथ्याध्ययनं चरेद् भैक्षं तु वत्सरम्।

कृतघ्नो ब्राह्मणगृहे पञ्च संवत्सरं व्रती॥८२॥

हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः।

स्नात्वानश्नन्नहःशेषं प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥८३॥

अशुद्धिकी स्थितिमें अग्नि अथवा चन्द्रमाका दर्शनकर सूर्यका दर्शन करना चाहिये। मनुष्यकी हड्डीका स्पर्श होनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। मिथ्या (असत् विषयका अथवा दम्भपूर्ण) अध्ययन करनेपर एक वर्षतक भिक्षाव्रत ग्रहण करना चाहिये। कृतघ्नको (ब्रह्मचर्य) व्रत का पालन करते हुए पाँच वर्षतक ब्राह्मणके घर में निवास करना चाहिये। ब्राह्मणको 'हुंकार' तथा गुरुजनों को 'त्वंकार' (तुम) कहनेपर स्नान करके दिनभर भोजन नहीं करना चाहिये और उन्हें प्रणामके द्वारा प्रसन्न करना चाहिये। ८१-८३॥

ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठंबद्धवापि वाससा।

विवादे वापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥८४॥

अवगूर्य चरेत् कृच्छ्रमतिकृच्छं निपातने।

कृच्छातिकृच्छौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम्॥८५॥

तृणद्वारा भी (उनकी) ताड़ना करनेपर, वस्त्रद्वारा कण्ठ बाँधनेपर, विवादमें पराजित करनेपर प्रणामके द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। ब्राह्मणको धमकाने पर कृच्छ्रव्रत और पटक देनेपर अतिकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। विप्रका रक्त बहानेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करना चाहिये।। ८४-८५॥

गुरोराक्रोशमनृतं कृत्वा कुर्याद् विशोधनम्।

एकरात्रं त्रिरात्रं वा तत्पापस्यापनुत्तये॥८६॥

देवर्षीणामभिमुखं ष्ठीवनाक्रोशने कृते।

उल्मुकेन दहेजिह्वां दातव्यं च हिरण्यकम्॥८७॥

देवोद्याने तु यः कुर्यान्मूत्रोच्चारं सकृद् द्विजः।

छिन्द्याच्छिश्नं तुशुद्ध्यर्थं चरेच्चान्द्रायणं तुवा।। ८८॥

देवतायतने मूत्रं कृत्वा मोहाद् द्विजोत्तमः।

शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्॥८९॥

देवतानामृषीणां च देवानां चैव कुत्सनम्।

कृत्वा सम्यक् प्रकुर्वीत प्राजापत्यं द्विजोत्तमः॥९०॥

तैस्तु सम्भाषणं कृत्वा स्नात्वा देवान् समर्चयेत्।

दृष्ट्वा वीक्षेत भास्वन्तं स्मृत्वा विश्वेश्वरं स्मरेत्॥ ९१॥

गुरुको गाली या शाप देनेपर या उनसे झूठ बोलनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये (पापके तारतम्य के अनुसार) एक रात या तीन रातका उपवास रखना चाहिये। देवताओं और ऋषियोंकी ओर थूकने तथा (उनके प्रति) आक्रोश (आक्षेप) प्रकट करने पर उल्मुक (अंगारवाली लकड़ी)-से जीभका दाह करना चाहिये और स्वर्णका दान करना चाहिये। जो द्विज देवताओंके उद्यानमें एक बार भी मल-मूत्र विसर्जित करता है तो शुद्धिके लिये मूत्रेन्द्रियका छेदन कर देना चाहिये अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो द्विजोत्तम देवमन्दिरमें मोहवश मूत्रोत्सर्ग करता है, उसे मूत्रेन्द्रिय का उच्छेद करके चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। देवताओं, ऋषियों तथा देवों (देवतुल्य महापुरुषों-माता, पिता, गुरु आदि)-की निन्दा करनेपर द्विजोत्तमको भलीभाँति प्राजापत्य-व्रत करना चाहिये। इनके साथ सम्भाषण करनेपर स्नान करके देवताओंकी पूजा करनी चाहिये और उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये तथा विश्वेश्वरका स्मरण करना चाहिये॥ ८६-९१ ॥

यः सर्वभूताधिपतिं विश्वेशानं विनिन्दति।

न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥९२।।

चान्द्रायणंचरेत् पूर्वं कृच्छ्रे चैवातिकृच्छूकम्।

प्रपन्नः शरणं देवं तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥ ९३॥

सर्वस्वदानं विधिवत् सर्वपापविशोधनम्।

चान्द्रायणंच विधिना कृच्छ्रे चैवातिकृच्छूकम्॥१४॥

पुण्यक्षेत्राभिगमनं सर्वपापविनाशनम्।

देवताभ्यर्चनं नृणामशेषाघविनाशनम्॥१५॥

जो सभी प्राणियोंके अधिपति विश्वेशानकी निन्दा करता है, उसके पापकी शुद्धि सौ वर्षों में भी सम्भव नहीं है, पर (पश्चात्तापपूर्वक) पहले चान्द्रायणव्रत करे, अनन्तर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्रव्रतोंको श्रद्धापूर्वक करके देव (शंकर)-की शरणमें जाय। ऐसा करनेपर देव | शंकरकी कृपासे ही पापसे मुक्ति हो जाती है। विधिपूर्वक अपना सर्वस्व दान करनेसे सभी पापोंकी शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार विधिपूर्वक चान्द्रायणव्रत करने, कृच्छ्र और अतिकृच्छ्रव्रतोंको करनेसे सभी पाप दूर हो जाते हैं। पुण्य क्षेत्रोंकी यात्रा सभी पापोंको दूर कर देती है। मनुष्योंके लिये देवताओंकी आराधना करना सम्पूर्ण पापोंके नाशका अचूक साधन है॥ ९२-९५॥

अमावस्यां तिथिं प्राप्य यः समाराधयेच्छिवम् ।

ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९६ ॥

कृष्णाष्टम्यां महादेवं तथा कृष्णचतुर्दशीम्।

सम्पूज्य ब्राह्मणमुखे सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९७ ॥

त्रयोदश्यां तथा रात्रौ सोपहारं त्रिलोचनम्।

दृष्ट्वेशं प्रथमे यामे मुच्यते सर्वपातकैः॥ ९८ ॥

उपोषितश्चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहितः।

यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च॥ ९९ ॥

वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।

प्रत्येकं तिलसंयुक्तान् दद्यात् सप्तोदकाञ्जलीन्।

स्नात्वा नद्यां तु पूर्वाह्ने मुच्यते सर्वपातकैः॥१००॥

अमावास्या तिथि आनेपर जो शिवकी भलीभाँति आराधना करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी ही चतुर्दशीको महादेव शंकरका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन करानेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। त्रयोदशीकी रात्रिके प्रथम याममें उपहारसहित त्रिलोचन ईश शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षको चतुर्दशी को पूर्वाह्नमें समाहित होकर नदीमें स्नानकर उपवास करके यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतविनाशक-इनमें प्रत्येकके निमित्त तिलमिश्रित सात जलाञ्जलि प्रदान करनेवाला सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९६-१००॥

ब्रह्मचर्यमधःशय्यामुपवासं द्विजार्चनम्।

व्रतेष्वेतेषु कुर्वीत शान्तः संयतमानसः॥१०१॥

अमावस्यायां ब्रह्माणं समुद्दिश्य पितामहम्।

ब्राह्मणांस्त्रीन्समभ्यर्च्य मुच्यते सर्वपातकैः॥१०२॥

षष्ठ्यामुपोषितो देवं शुक्लपक्षे समाहितः।

सप्तम्यामर्चयेद् भानुं मुच्यते सर्वपातकैः॥१०३॥

भरण्यां च चतुर्थ्यां च शनैश्चरदिने यमम्।

पूजयेत् सप्तजन्मोत्थैर्मुच्यते पातकैनरः॥१०४॥

एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।

द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य महापापैः प्रमुच्यते॥१०५॥

(प्रायश्चित्तके प्रसंगसे उपदिष्ट) इन सभी व्रतोंमें शान्त और संयतमन होकर ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, उपवास तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। अमावास्या को पितामह ब्रह्माको उद्दिष्ट करके तीन ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सभी पातकोंसे मुक्ति हो जाती है। शुक्लपक्ष की षष्ठीको समाहित होकर उपवास करके सप्तमी को सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये, इससे सभी पापों से मुक्ति हो जाती है। शनिवारको भरणी नक्षत्र और चतुर्थी तिथि होनेपर (ऐसे योगमें) जो मनुष्य यमराज का पूजन करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये पापों से मुक्त हो जाता है। शुक्लपक्षकी एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीको जनार्दनकी पूजा करनेसे महापापोंसे मुक्ति मिल जाती है। १०१-१०५ ॥

तपो जपस्तीर्थसेवा देवब्राह्मणपूजनम्।

ग्रहणादिषु कालेषु महापातकशोधनम्॥१०६॥

यः सर्वपापयुक्तोऽपि पुण्यतीर्थेषु मानवः।

नियमेन त्यजेत् प्राणान् स मुच्येत् सर्वपातकैः॥१०७॥

सूर्य तथा चन्द्रग्रहण आदि समयोंमें जप, तप, तीर्थ- सेवा और देवता तथा ब्राह्मणोंका पूजन महापातकों से शुद्ध करनेवाला होता है। सभी पापोंसे युक्त होनेपर भी जो मनुष्य नियमपूर्वक पुण्य तीर्थोंमें प्राणोंका त्याग करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१०६-१०७॥

ब्रह्मघ्नं वा कृतघ्नं वा महापातकदूषितम्।

भर्तारमुद्धरेन्नारी प्रविष्टा सह पावकम्॥१०८॥

एतदेव परं स्त्रीणां प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः ।

सर्वपापसमुद्भूती नात्र कार्या विचारणा॥१०९॥

मृत पतिके साथ अग्निमें प्रवेश करनेवाली नारी ब्रह्मघाती, कृतघ्न अथवा महापातकोंसे दूषित भी पति का उद्धार कर देती है। विद्वानोंने स्त्रीके लिये सभी प्रकार के पापों का यही (पातिव्रतधर्म-पालन ही) श्रेष्ठ प्रायश्चित्त बतलाया है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये॥१०८-१०९॥

पतिव्रता तु या नारी भर्तृशुश्रूषणोत्सुका।

न तस्या विद्यते पापमिह लोके परत्र च॥११०॥

जो नारी पतिव्रता है और पतिकी सेवा-शुश्रूषामें अनुरक्त है, उसके लिये न तो इस लोकमें कोई पाप है और न परलोकमें ।। ११० ॥

पतिव्रता धर्मरता रुद्राण्येव न संशयः।

नास्याः पराभवं कर्तुं शक्नोतीह जनः क्वचित्॥१११॥

यथा रामस्य सुभगा सीता त्रैलोक्यविश्रुता।

पत्नी दाशरथेर्दैवी विजिग्ये राक्षसेश्वरम्॥११२॥

रामस्य भार्यां विमलां रावणो राक्षसेश्वरः।

सीतां विशालनयनांचकमे कालचोदितः॥११३॥

गृहीत्वा मायया वेषं चरन्तीं विजने वने।

समाहर्तुं मतिं चक्रे तापसः किल कामिनीम्॥११४॥

विज्ञाय सा च तद्भावं स्मृत्वा दाशरथिं पतिम्।

जगाम शरणं वह्निमावसथ्यं शुचिस्मिता॥११५॥

(पातिव्रत) धर्मपरायण पतिव्रता (स्त्री) रुद्राणी ही होती है, इसमें संदेह नहीं। इस संसारमें कोई भी मनुष्य इसे कभी भी पराजित करने में समर्थ नहीं है। उदाहरणके लिये दशरथके पुत्र रामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध सुन्दर पत्नी देवी सीताने राक्षसेश्वर (रावण)-को पराजित कर दिया था। कालसे प्रेरित राक्षसराज रावणने रामकी सुन्दर तथा विशाल नेत्रोंवाली भार्या सीताको प्राप्त करने की इच्छा की। उसने मायासे तपस्वीका वेष धारणकर जनशून्य वनमें विचरण (निवास) करती हुई कामिनी (सीता)-का अपहरण करनेका विचार किया। तब पतिव्रता भगवती सीताने रावणके दुष्ट भावको समझकर अपने पति दशरथ-पुत्र रामका स्मरण किया और पवित्र मुसकानवाली उन सीतादेवीने आवसथ्य अग्निकी शरण ग्रहण की॥१११-११५॥

उपतस्थे महायोगं सर्वदोषविनाशनम्।

कृताञ्जली रामपत्नी साक्षात् पतिमिवाच्युतम्॥११६॥

नमस्यामि महायोगं कृतान्तं गहनं परम्।

दाहकं सर्वभूतानामीशानं कालरूपिणम्॥११७॥

नमस्ये पावकं देवं साक्षिणं विश्वतोमुखम्।

आत्मानं दीप्तवपुषं सर्वभूतहदि स्थितम्॥११८॥

प्रपद्ये शरणं वहिं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम्।

भूतेशं कृत्तिवसनं शरण्यं परमं पदम्॥११९॥

ॐ प्रपद्ये जगन्मूर्ति प्रभवं सर्वतेजसाम्।

महायोगेश्वरं वह्निमादित्यं परमेष्ठिनम्॥१२०॥

रामकी पत्नी (सीतादेवी) हाथ जोड़कर साक्षात् पतिके समान सभी दोषोंको नष्ट करनेवाले महायोगरूप अच्युत (अग्नि)-की शरणमें गयीं (और उनकी स्तुति करने लगीं-) महायोगस्वरूप, परम गहन (रहस्यस्वरूप), कृतान्त, दहन करनेवाले, सभी प्राणियोंके नियामक कालरूपी अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। मैं सभी ओर मुखवाले, सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित, दीप्त शरीरवाले, आत्मरूप तथा साक्षीदेव पावक (अग्नि)-को नमस्कार करती हूँ। मैं ब्राह्मणोंके उपकारक, ब्रह्मरूपी, कृत्तिवासा,* शरणागतवत्सल, परमपदरूप भूतेश वह्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं जगन्मूर्ति, सभी तेजों के उद्भव-स्थान, महायोगेश्वर, परमेष्ठी, आदित्य और ओंकाररूप वह्निदेवकी शरण ग्रहण करती हूँ॥११६-१२० ॥

प्रपद्ये शरणं रुद्रं महाग्रासं त्रिशूलिनम्।

कालाग्निं योगिनामीशं भोगमोक्षफलप्रदम्॥१२१॥

प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं भुर्भुवःस्वःस्वरूपिणम्।

हिरण्मये गृहे गुप्तं महान्तममितौजसम्॥१२२॥

मैं महाग्रास, त्रिशूली, भोग एवं मोक्षरूप फलों के प्रदाता, योगियोंके ईश और रुद्रस्वरूप कालानिकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं भूर्भुवः तथा स्वःस्वरूप, हिरण्मयगृह में सुगुप्त, विरूपाक्ष तथा अमित तेजस्वी आप महान्की शरण ग्रहण करती हूँ॥१२१-१२२ ॥

वैश्वानरं प्रपद्येऽहं सर्वभूतेष्ववस्थितम्।

हव्यकव्यवहं देवं प्रपद्ये वह्निमीश्वरम्॥१२३॥

प्रपद्ये तत्परं तत्त्वं वरेण्यं सवितुः स्वयम्।

भर्गमग्निपरं ज्योती रक्ष मां हव्यवाहन॥१२४॥

सभी प्राणियोंमें अवस्थित वैश्वानरकी मैं शरण ग्रहण करती हूँ। मैं हव्य तथा कव्यको वहन करनेवाले ईश्वर वह्निदेवकी शरणमें हूँ। मैं उस पर-तत्त्व, वरणीय, साक्षात् सविता और तेजोरूप परम ज्योति अग्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। हव्यवाहन! आप मेरी रक्षा करें॥१२३-१२४॥

इति वयष्टकं जप्त्वा रामपत्नी यशस्विनी।

ध्यायन्ती मनसा तस्थौ राममुन्मीलितेक्षणा॥१२५॥

इस वयष्टकका जप करके यशस्विनी उन्मीलित नेत्रोंवाली रामकी पत्नी सीता मनसे रामका ध्यान करती हुई स्थित हो गयीं ॥१२५ ॥

अथावसथ्याद् भगवान् हव्यवाहो महेश्वरः।

आविरासीत् सुदीप्तात्मा तेजसा प्रवहन्निव॥१२६ ॥

सृष्ट्वा मायामयीं सीतां स रावणवधेप्सया।

सीतामादाय धर्मिष्ठां पावकोऽन्तरधीयत॥१२७॥

तां दृष्ट्वा तादृशी सीतां रावणो राक्षसेश्वरः।

समादाय ययौ लङ्कां सागरान्तरसंस्थिताम्॥१२८॥

कृत्वाथ रावणवधं रामो लक्ष्मणसंयुतः।

समादायाभवत् सीतां शङ्काकुलितमानसः॥१२९॥

सा प्रत्ययाय भूतानां सीता मायामयी पुनः।

विवेश पावकं दीप्तं ददाह ज्वलनोऽपिताम्॥१३०॥

स्तुति करनेके अनन्तर उस आवसथ्य अग्निसे अत्यन्त उद्दीप्त स्वरूपवाले (दुष्ट भाववाले रावणपर क्रुद्ध होनेके कारण) तेजसे जलते हुएके समान भगवान् महेश्वर हव्यवाह प्रकट हो गये। रावणके वधकी इच्छा से मायामयी सीताको उत्पन्नकर वे पावक (अग्निदेव) धर्ममयी सीताको लेकर अन्तर्हित हो गये। धर्ममयी सीता-जैसी ही उस मायामयी सीताको देखकर राक्षसराज रावण उसे ही लेकर सागरके मध्यमें स्थित लंका को चला गया। रावणका वध करके (भगवती) सीता को प्राप्तकर लक्ष्मणसहित रामका मन शंकायुक्त हो गया। जनसामान्यको विश्वास दिलानेके लिये वह माया से निर्मित सीता उद्दीप्त अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं और अग्नि ने उन्हें अपनेमें मिला लिया॥१२६-१३०॥

दग्ध्वा मायामयीं सीतां भगवानुग्रदीधितिः।

रामायादर्शयत् सीतां पावकोऽभूत् सुरप्रियः॥१३१॥

प्रगृह्य भर्तुश्चरणौ कराभ्यां सा सुमध्यमा।

चकार प्रणतिं भूमौ रामाय जनकात्मजा॥१३२॥

मायामयी सीताको अपनेमें लीन कर लेने के पश्चात् उग्र किरणोंवाले भगवान् पावक (अग्नि) ने रामको (वास्तविक) सीताका दर्शन कराया। इससे 'पावक' देवताओंके प्रिय बन गये। सुन्दर मध्य-भागवाली उन जनककी पुत्रीने अपने दोनों हाथों से अपने स्वामी रामके दोनों चरणोंको पकड़कर भूमिपर प्रणाम किया॥१३१-१३२॥

दृष्ट्वा हृष्टमना रामो विस्मयाकुललोचनः ।

ननाम वह्नि शिरसा तोषयामास राघवः॥१३३॥

उवाच वर्भगवान् किमेषा वरवर्णिनी।

दग्धा भगवता पूर्वं दृष्टा मत्पार्श्वमागता॥१३४॥

तमाह देवो लोकानां दाहको हव्यवाहनः ।

यथावृत्तं दाशरथिं भूतानामेव संनिधौ॥१३५॥

 (सीताको) देखकर आश्चर्यचकित नेत्रोंवाले रघुवंशी रामने प्रसन्नमन हो सिरसे प्रणामकर अग्निको संतुष्ट किया। भगवान् (राम)-ने वह्रिसे कहा-मेरे समीपमें

आयी यह दिव्यगुणोंवाली सीता किस प्रकार पहले आपद्वारा अपनेमें लीन की जाती हुई देखी गयी। लोकोंको अपने में पचा लेनेवाले तथा हव्यको वहन करनेवाले अग्निने उन दशरथपुत्र रामसे सभी लोगोंकी संनिधिमें ही वह सब बताया जो पूर्वमें घटित हुआ था॥१३३-१३५॥

इयं सा मिथिलेशेन पार्वती रुद्रवल्लभाम्।

आराध्य लब्धा तपसा देव्याश्चात्यन्तवल्लभा॥१३६॥

भर्तुः शुश्रूषणोपेता सुशीलेयं पतिव्रता।

भवानीपार्श्वमानीता मया रावणकामिता॥१३७॥

या नीता राक्षसेशेन सीता भगवताहृता।

मया मायामयी सृष्टा रावणस्य वधाय सा॥१३८॥

तदर्थं भवता दुष्टो रावणो राक्षसेश्वरः।

मयोपसंहृता चैव हतो लोकविनाशनः॥१३९॥

गृहाण विमलामेनां जानकी वचनान्मम।

पश्य नारायणं देवं स्वात्मानं प्रभवाव्ययम्॥१४०॥

मिथिलानरेश जनकने तपद्वारा रुद्रप्रिया पार्वतीकी आराधनाकर देवीकी अत्यन्त प्रिय जिन सीताको पुत्रीरूपमें प्राप्त किया था, उन पतिसेवापरायणा, सुन्दर शीलवाली पतिव्रताको रावण चाह रहा है, जब मैंने यह जाना तब उन्हें (भगवती सीताको) मैं पार्वतीके पास ले आया और राक्षसराज रावणद्वारा ले जायी गयी जिन सीताको आपने प्राप्त किया उन्हें मैंने रावणके वधके लिये मायासे निर्मित किया था, उन्हींके लिये आपने लोकोंका विनाश करनेवाले दुष्ट राक्षसराज रावणको मारा तथा मैंने उन्हीं मायामयी सीताको उपसंहृत (अपनेमें लीन)-कर लिया है। मेरे कहनेसे आप इन विशुद्ध जानकीको ग्रहण करें और अपने-आपको प्रभव, अव्यय, नारायणदेवके रूपमें देखें ॥१३६-१४०॥

इत्युक्त्वा भगवांश्चण्डो विश्वार्चिविश्वतोमुखः।

मानितो राघवेणाग्निर्भूतैश्चान्तरधीयत॥१४१॥

एतत् पतिव्रतानां वै माहात्म्यं कथितं मया।

स्त्रीणां सर्वाधशमनं प्रायश्चित्तमिदं स्मृतम्॥१४२॥

अशेषपापयुक्तस्तु पुरुषोऽपि सुसंयतः।

स्वदेहं पुण्यतीर्थेषु त्यक्त्वा मुच्येत किल्बिषात्॥१४३॥

पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु स्नात्वा पुण्येषुवा द्विजः।

मुच्यते पातकैः सर्वैः समस्तैरपि पूरुषः॥१४४॥

ऐसा कहकर सभी ओर शिखा (ज्वाला) तथा सभी ओर मुखवाले भगवान् प्रचण्ड (अमित तेजोरूप) अग्निदेव राघव (राम) तथा अन्य लोगोंद्वारा सम्मानित होकर अन्तर्धान हो गये। यह मैंने आप लोगोंको पतिव्रताओंका माहात्म्य बताया। इसे स्त्रियोंके समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला प्रायश्चित्त कहा गया है। सम्पूर्ण पापोंसे युक्त पुरुष भी भलीभाँति संयत होकर पुण्य- तीर्थोंमें अपना शरीर त्याग करके पापसे मुक्त हो जाता है। अथवा पृथ्वीके सभी पुण्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे द्विज पुरुष समस्त सञ्चित पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१४१-१४४॥

व्यास उवाच

इत्येष मानवो धर्मो युष्माकं कथितो मया।

महेशाराधनार्थाय ज्ञानयोगं च शाश्वतम्॥१४५॥

योऽनेन विधिना युक्तं ज्ञानयोगं समाचरेत्।

स पश्यति महादेवं नान्यः कल्पशतैरपि॥१४६॥

स्थापयेद् यः परं धर्मं ज्ञानं तत्पारमेश्वरम्।

न तस्मादधिको लोके सयोगी परमो मतः॥१४७॥

यः संस्थापयितुं शक्तो न कुर्यान्मोहितो जनः ।

स योगयुक्तोऽपि मुनि त्यर्थं भगवत्प्रियः॥१४८॥

तस्मात् सदैव दातव्यं ब्राह्मणेषु विशेषतः।

धर्मयुक्तेषु शान्तेषु श्रद्धया चान्वितेषु वै॥१४९॥

व्यासजीने कहा-इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस मानवधर्मका और महेश्वरकी आराधनाके लिये सनातन ज्ञानयोगका वर्णन किया। जो इस विधिसे युक्त होकर ज्ञानयोगका पालन करता है, वह महादेवका दर्शन करता है। दूसरा व्यक्ति सैकड़ों कल्पोंमें भी उनका दर्शन नहीं कर सकता। जो इस परम धर्म और परमेश्वर-सम्बन्धी ज्ञानकी स्थापना (अधिकारी लोगोंमें प्रतिष्ठा) करता है, संसारमें उससे बढ़कर और कोई नहीं है, उसे श्रेष्ठ योगी माना गया है। इसकी स्थापना करने में समर्थ होनेपर भी जो व्यक्ति मोहवश धर्म एवं ज्ञानकी स्थापना नहीं करता, वह योगसम्पन्न मुनि होनेपर भी भगवान्का अत्यन्त प्रिय नहीं होता। सदा ही विशेष-रूपसे धर्मयुक्त शान्त और श्रद्धासम्पन्न ब्राह्मणोंको इसका उपदेश करना चाहिये॥१४५-१४९ ॥

यः पठेद् भवतां नित्यं संवादं मम चैव हि।

सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेत परमां गतिम्॥१५०॥

जो मेरे एवं आपके बीच हुए इस संवाद को नित्य पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करेगा॥१५०॥

श्राद्धे वा दैविके कार्ये ब्राह्मणानां च संनिधौ ।

पठेत नित्यं सुमनाः श्रोतव्यं च द्विजातिभिः ॥१५१॥

योऽर्थं विचार्य युक्तात्मा श्रावयेद् ब्राह्मणान् शुचीन् ।

स दोषकञ्चकं त्यक्त्वा याति देवं महेश्वरम्।। १५२॥

श्राद्धमें अथवा देवकार्य-पूजा आदिमें और ब्राह्मणोंके सम्मुख प्रसन्न-मनसे नित्य इसका पाठ करना चाहिये तथा द्विजातियोंको इसे सुनना चाहिये। जो योगात्मा इसके अर्थका विचारकर पवित्र ब्राह्मणोंको इसे सुनाता है, वह दोषरूपी कञ्चक (आवरण)-का परित्याग कर भगवान् महेश्वरको प्राप्त करता है॥ १५१-१५२ ॥

एतावदुक्त्वा भगवान् व्यासः सत्यवतीसुतः।

समाश्वास्य मुनीन् सूतं जगाम च यथागतम्॥१५३॥

इतना कहनेके बाद सत्यवतीके पुत्र भगवान् व्यास मुनियों तथा सूतजीको आश्वासन प्रदानकर जैसे आये थे वैसे ही चले गये ॥१५३ ॥