कूर्म महा पुराण
5 अध्याय
ब्रह्माजीकी आयुका वर्णन, युग, मन्वन्तर तथा कल्प आदि कालकी
गणना, प्राकृत प्रलय तथा कालकी महिमाका वर्णन
स्वयम्भुवो विवृत्तस्य कालसंख्या द्विजोत्तमाः।
न शक्यते समाख्यातुं बहुवर्षैरपि स्वयम्॥ १॥
कालसंख्या समासेन परार्धद्वयकल्पिता।
स एव स्यात् परः कालः तदन्ते प्रतिसृज्यते॥ २ ॥
श्रीकूर्मने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणो! स्वयम्भू-ब्रह्मा के बीते हुए कालकी गणनाका वर्णन बहुत वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। संक्षेपमें कालकी गणना दो परार्ध कही गयी है। वही परम काल है और उसके बीत जाने पर प्रलय होता है ॥१-२॥
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।
तत् पराख्यं तदर्थं च परार्धमभिधीयते॥ ३ ॥
अपने मान से ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु कही गयी है। उसी (ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु)को 'पर' नामसे कहा जाता है और उस परका आधा "परार्ध' कहलाता है॥३॥
काष्ठा पञ्चदश ख्याता निमेषा द्विजसत्तमाः।
काष्ठास्त्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तिकी गतिः॥ ४ ॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तेर्मानुषं स्मृतम्।
अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ५ ॥
तैः षड्भिरयनं वर्ष द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ ६ ॥
द्विजोत्तमो! पंद्रह निमेष की एक काष्ठा कही गयी है। तीस काष्ठा की एक कला और तीस कलाका समय एक मुहूर्त-काल होता है। उतनी ही संख्या अर्थात् तीस मुहूर्तों का एक मानवीय अहोरात्र (दिन-रात) होता है, उतने ही अर्थात् तीस अहोरात्रोंका एक मास होता है जो दो पक्षवाला है। छ: मासोंका एक अयन तथा उत्तर एवं दक्षिण नाम से दो अयनों का एक वर्ष होता है। दक्षिण अयन अर्थात् दक्षिणायन देवताओं की रात्रि और उत्तर अयन अर्थात् उत्तरायण (देवताओं का) दिन होता है॥ ४-६॥
दिव्यैर्वर्षसहस्रेस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।
चतुर्युगं द्वादशभिः तद्विभागं निबोधत॥ ७ ॥
(श्रीकूर्मने ब्राह्मणोंसे कहा-) दिव्य बारह हजार वर्षों का सत्य, त्रेता इत्यादि नाम से एक चतुर्युग होता है। उसके विभागोंका वर्णन सुनें ॥७॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च कृतस्य तु॥ ८ ॥
त्रिशती द्विशती संध्या तथा चैकशती क्रमात्।
अंशकं षट्शतं तस्मात् कृतसंध्यांशकं विना॥ ९ ॥
चार हजार दिव्य वर्षों का सत्ययुग होता है। सत्ययुग की उतने ही सौ वर्षों की अर्थात् चार सौ वर्षों की संध्या तथा संध्यांश (त्रेतायुगका संधिकाल) होता है। सत्ययुग के संध्यांशको छोड़कर क्रमश: तीन सौ, दो सौ तथा एक सौ-इस प्रकार कुल मिलाकर दिव्य छ: सौ वर्षों के द्वापर तथा कलियुगके संध्या तथा संध्यांश होते हैं।८-९॥
त्रिदयेकसाहस्रमतो विना संध्यांशकेन तु।
त्रेताद्वापरतिष्याणां कालज्ञाने प्रकीर्तितम्॥१०॥
एतद् द्वादशसाहस्त्रं साधिकं परिकल्पितम्।
तदेकसप्ततिगुणं मनोरन्तरमुच्यते॥११॥
कालका ज्ञान करनेके लिये संध्यांशोंसे रहित त्रेता, द्वापर तथा कलियुग क्रमशः तीन, दो तथा एक हजार (दिव्य) वर्षोंके कहे गये हैं। कुछ अधिकता लिये यही (दिव्य) बारह हजार वर्षोंका कालपरिमाण कहा गया है। इसके इकहत्तर गुना कालको एक मनुका अन्तर अर्थात् एक मन्वन्तरका समय कहा गया है॥१०-११॥
ब्रह्मणो दिवसे विप्रा मनवः स्युश्चतुर्दश।
स्वायम्भुवादयः सर्वे ततः सावर्णिकादयः॥१२॥
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।
पूर्ण युगसहस्रं वै परिपाल्या नरेश्वरैः॥१३॥
ब्राह्मणो! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु (मन्वन्तर)होते हैं। वे सभी स्वायम्भुव (प्रथम मनु) आदि तथा सावर्णिक (अष्टम मनु) आदि मनु हैं। उन नरेश्वरों (मन्वन्तराधिपों)के द्वारा सात द्वीपों एवं पर्वतोंवाली इस पृथ्वीका पूरे एक हजार युगोंतक पालन किया जाता है ॥ १२-१३॥
मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।
व्याख्यातानिन संदेहः कल्पं कल्पेन चैव हि॥१४॥
ब्राह्ममेकमहः कल्पस्तावती रात्रिरिष्यते।
चतुर्युगसहस्रं तु कल्पमाहुर्मनीषिणः ॥१५॥
एक मन्वन्तरके वर्णनसे अन्य भी सभी मन्वन्तरों का वर्णन कर दिया गया है (ऐसा समझना चाहिये)। इसमें संदेह नहीं करना चाहिये। प्रत्येक कल्प (पूर्व) कल्प के समान ही होता है। ब्रह्माका एक दिन एक कल्प के बराबर और रात्रि भी उतनी (अर्थात् एक कल्प के बराबर) ही होती है। विद्वानोंने एक हजार चतुर्युगी का एक कल्प कहा है॥१४-१५॥
त्रीणि कल्पशतानि स्युस्तथा षष्टिर्द्विजोत्तमाः।
ब्रह्मणः कथितं वर्षं पराख्यं तच्छतं विदुः॥१६॥
तस्यान्ते सर्वतत्त्वानां स्वहेतौ प्रकृतौ लयः।
तेनायं प्रोच्यते सद्भिः प्राकृतः प्रतिसंचरः॥१७॥
ब्रह्मनारायणेशानां त्रयाणां प्रकृतौ लयः।
प्रोच्यते कालयोगेन पुनरेव च सम्भवः ॥१८॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तीन सौ साठ कल्पोंका ब्रह्माका एक वर्ष कहा गया है, उसके सौ गुने (अर्थात् ३६०x१००-३६,००० कल्पों या १०० वर्षोंके) कालको 'पर' इस
नामसे जानना चाहिये। ('पर' नामक) उस काल के बीतने पर सभी तत्त्वोंका अपने मूल कारण प्रकृतिमें लय हो जाता है। इसीलिये विद्वानोंने इसे प्राकृत प्रतिसञ्चर (प्राकृत प्रलय) कहा है। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों का प्रकृतिमें लय हो जाता है। पुनः कालयोग से उनका आविर्भाव होना कहा जाता है॥१६-१८॥
एवं ब्रह्मा च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः।
कालेनैव तु सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः॥१९॥
अनादिरेष भगवान् कालोऽनन्तोऽजरोऽमरः।
सर्वगत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मासौ महेश्वरः॥२०॥
इस प्रकार ब्रह्मा, जीव, वासुदेव तथा शंकर की काल के द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है। यह काल भगवान् है, अनन्त है, अजर है, अमर है एवं अनादि है। सर्वव्यापी होने से, स्वतन्त्र होनेसे तथा सबका आत्मस्वरूप होनेसे यह महेश्वर कहलाता है॥ १९-२०॥
ब्रह्माणो बहवो रुद्रा ह्यन्ये नारायणादयः।
एको हि भगवानीशः कालः कविरिति श्रुतिः॥२१॥
ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि बहुत होते हैं, किंतु भगवान् एक ही है, जो ईश, काल तथा कवि कहलाता है-ऐसा वेदका अभिमत है ॥ २१ ॥
एकमत्र व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणो द्विजाः।
साम्प्रतं वर्तते तद्वत् तस्य कल्पोऽयमष्टमः ॥२२॥
योऽतीतः सप्तमः कल्पः पाद्म इत्युच्यते बुधैः।
वाराहो वर्तते कल्पः तस्य वक्ष्यामि विस्तरम्॥२३॥
ब्राह्मणो! इस समय ब्रह्माजी का एक परार्ध बीत चुका है, अब उनका दूसरा परार्ध चल रहा है, उस (द्वितीय परार्ध)-का यह आठवाँ कल्प चल रहा है। ब्रह्माजी का जो सातवाँ कल्प व्यतीत हो चुका है, विद्वानोंद्वारा वह 'पाद्म' (कल्प) कहा गया है। वर्तमानमें वाराह कल्प चल रहा है, इसके विस्तारका मैं वर्णन करूँगा ।। २२-२३ ।।
Summary of chapter 5 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Kūrma presents the precise divisions of time starting from atomic fractions up to vast cosmic ages. Fifteen Nimeshas make a Kāshṭhā, thirty Kāshṭhās form a Kalā, thirty Kalās make a Muhūrta, and thirty Muhūrtas constitute a human day and night. Human Southward motion is a single night for Devas, and Northward motion is their single day. Twelve thousand divine years comprise a Mahāyuga, consisting of Kṛtayuga, Tretāyuga, Dvāparayuga, and Kaliyuga. Seventy-one Mahāyugas form one Manvantara ruled by fourteen Manus, while one thousand Mahāyugas make a single Kalpa, which is one day of Brahmā, matched by an equal night of cosmic dissolution. Three hundred and sixty such days and nights constitute one year of Brahmā, whose full lifespan of one hundred years is divided into two Parārdhas. Eternal Time is revealed as the imperishable, all-devouring power of Parameshvara Himself, which periodically dissolves and regenerates Brahmā, Vishṇu, and Rudra across endless cosmic cycles.