कूर्म महा पुराण
11 अध्याय
योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका
विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें
प्राणत्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके
अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन,
ईश्वरगीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार
ईश्वर उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।
येनात्मानं प्रपश्यन्ति भानुमन्तमिवेश्वरम्॥ १॥
ईश्वरने कहा-इसके अनन्तर उस परम दुर्लभ योगको कहता हूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वररूप आत्माका दर्शन होता है अर्थात् सूर्यका जैसे प्रत्यक्ष हो रहा है, वैसे ही ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है॥१॥
योगाग्निदहति क्षिप्रमशेष पापपञ्जरम्।
प्रसन्नं जायते ज्ञानं साक्षानिर्वाणसिद्धिदम्॥
योगात् संजायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।
योगज्ञानाभियुक्तस्य प्रसीदति महेश्वरः॥ ३ ॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।
ये युञ्जन्तीह मद्योगं ते विज्ञेया महेश्वराः॥ ४ ॥
योगरूपी अग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण पापपञ्जरको भस्म कर देता है और (उसके बाद) साक्षात् मुक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाला प्रसन्न (निर्मल) ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित होता है। योग तथा ज्ञानसे सम्पन्न व्यक्तिपर महेश्वर प्रसन्न होते हैं। जो नित्य एक समय, दो समय या तीनों समय मेरे योगका साधन करते हैं, उन्हें महेश्वर समझना चाहिये॥२-४॥
योगस्तु द्विविधो ज्ञेयो ह्यभावः प्रथमो मतः।
अपरस्तु महायोगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः॥ ५ ॥
शून्यं सर्वनिराभासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते।
अभावयोगः स प्रोक्तो येनात्मानं प्रपश्यति॥६॥
यत्र पश्यति चात्मानं नित्यानन्दं निरञ्जनम्।
मयैक्यं स महायोगो भाषितः परमेश्वरः॥ ७॥
योग दो प्रकारका समझना चाहिये, पहला अभावयोग है और दूसरा सभी योगोंमें उत्तमोत्तम महायोग कहलाता है। जिसमें सभी आभासोंसे रहित शून्यमय (निर्विकल्पक) स्वरूपका चिन्तन होता है और जिसके द्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है, वह अभावयोग कहा गया है। जिसमें नित्यानन्दस्वरूप निरञ्जन आत्माका दर्शन होता है और मेरे साथ एकता होती है, वह परमेश्वररूप महायोग कहा गया है॥५-७॥
ये चान्ये योगिनां योगाः श्रूयन्ते ग्रन्थविस्तरे।
सर्वे ते ब्रह्मयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ८ ॥
यत्र साक्षात् प्रपश्यन्ति विमुक्ता विश्वमीश्वरम्।
सर्वेषामेव योगानां स योगः परमो मतः॥ ९॥
सहस्रशोऽथ शतशो ये चेश्वरबहिष्कृताः।
न ते पश्यन्ति मामेकं योगिनो यतमानसाः॥१०॥
अन्य जिन योगियोंके योगोंका ग्रन्थों में विस्तार हुआ है, वे सभी ब्रह्मयोगकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिस योगमें मुक्त पुरुष विश्वको साक्षात् ईश्वरके रूपमें देखते हैं, वह सभी योगों में श्रेष्ठ योग माना जाता है। जो सैकड़ों, हजारों अन्य प्रकारके मनको संयमित करनेवाले ईश्वरबहिष्कृत (वेदबाह्य) योगी हैं, वे मुझ अद्वितीयका दर्शन नहीं करते॥८-१०॥
प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा।
समाधिश्च मुनिश्रेष्ठा यमो नियम आसनम्॥११॥
मय्येकचित्ततायोगो वृत्त्यन्तरनिरोधतः।
तत्साधनान्यष्टधा तु युष्माकं कथितानि तु॥१२॥
मुनिश्रेष्ठो! अन्य वृत्तियोंका निरोधकर मेरेमें एकचित्तता ही योग है और इस योगके जो आठ साधन मैंने आप लोगोंको बताये हैं वे ये हैं-प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, समाधि, यम, नियम तथा आसन* ॥११-१२॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ
यमाः संक्षेपतः प्रोक्ताश्चित्तशुद्धिप्रदा नृणाम्॥१३॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा।
अक्लेशजननं प्रोक्तं त्वहिंसा परमर्षिभिः॥१४॥
अहिंसायाः परो धर्मो नास्त्यहिंसा परं सुखम्।
विधिना या भवेद्धिंसा त्वहिंसैव प्रकीर्तिता॥१५॥
सत्येन सर्वमाप्नोति सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यथार्थकथनाचारः सत्यं प्रोक्तं द्विजातिभिः॥१६॥
परद्रव्यापहरणं चौर्याद् वाथ बलेन वा।
स्तेयं तस्यानाचरणादस्तेयं धर्मसाधनम्॥१७॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।
सर्वत्र मैथुनत्यागं ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते॥१८॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह-संक्षेपमें इन्हें यम कहा गया है। ये मनुष्योंके चित्तकी शुद्धि करनेवाले हैं। मन, वाणी तथा कर्मसे सभी प्राणियोंको सर्वदा किसी भी प्रकार का क्लेश प्रदान न करना-इसे श्रेष्ठ ऋषियोंने अहिंसा कहा है। अहिंसासे श्रेष्ठ (कोई) धर्म नहीं है और अहिंसा से बढ़कर कोई सुख नहीं है। वेदविहित हिंसाको अहिंसा ही कहा गया है। सत्यके द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है, सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। द्विजातियों के द्वारा यथार्थ कथनके आचारको सत्य कहा गया है। चोरीसे अथवा बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है, उसका (स्तेयका) आचरण न करना अस्तेय है, यह धर्मका साधन है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा सभी अवस्थाओंमें सर्वदा सर्वत्र मैथुनका त्याग करना ब्रह्मचर्य कहलाता है॥१३-१८॥
द्रव्याणामप्यनादानमापद्यपि यथेच्छया।
अपरिग्रह इत्याहुस्तं प्रयत्नेन पालयेत्॥१९॥
तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचमीश्वरपूजनम्।
समासान्नियमाः प्रोक्ता योगसिद्धिप्रदायिनः॥२०॥
उपवासपराकादिकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।
शरीरशोषणं प्राहुस्तापसास्तप उत्तमम्॥२१॥
आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्योंका ग्रहण न करना 'अपरिग्रह' कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक उस अपरिग्रहका पालन करना चाहिये। तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच तथा ईश्वरका पूजन-संक्षेपमें नियम बतलाये गये हैं, ये योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपस्वियोंने पराक आदि उपवासों तथा कृच्छ्चान्द्रायणादि (व्रतों)-के द्वारा शरीरके शोषणको उत्तम तप कहा है॥१९-२१॥
वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजपं
सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते॥२२॥
बुधाः।
स्वाध्यायस्य त्रयो भेदा वाचिकोपांशुमानसाः।
उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः॥२३॥
यः शब्दबोधजननः परेषां शृण्वतां स्फुटम्।
स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथ लक्षणम्॥२४॥
विद्वान् लोगोंने वेदान्तशास्त्र, शतरुद्रिय और प्रणव आदिके जपको पुरुषोंके लिये सत्त्वकी शुद्धि करनेवाला 'स्वाध्याय' कहा है। स्वाध्यायके तीन भेद हैं-वाचिक, उपांशु और मानस । वेदार्थ जाननेवालोंने इन तीनोंमें उत्तरोत्तर का वैशिष्टय कहा है अर्थात् वाचिक स्वाध्यायसे उपांशु स्वाध्याय श्रेष्ठ और उपांशु स्वाध्यायसे मानस स्वाध्याय श्रेष्ठ है। दूसरे सुननेवालेको स्पष्टरूपसे शब्दका ज्ञान उत्पन्न करानेवाला स्वाध्याय 'वाचिक' कहलाता है। (अर्थात् वह स्वाध्याय वाचिक है जो दूसरोंको स्पष्ट सुनायी पड़े।) अब उपांशु का लक्षण बतलाया जाता है ॥ २२-२४॥
ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्याशब्दबोधकः ।
उपांशुरेष निर्दिष्टः साहस्रो वाचिकाजपः ॥२५॥
यत्पदाक्षरसङ्गत्या
परिस्पन्दनवर्जितम्।
चिन्तनं सर्वशब्दानां मानसं तं जपं विदुः ॥२६॥
यदृच्छालाभतो नित्यमलं पुंसो भवेदिति।
या धीस्तामृषयः प्राहुः संतोषं सुखलक्षणम् ॥ २७॥
ओठोंमें केवल स्पन्दन होनेके कारण दूसरेको शब्दका बोध न करानेवाला स्वाध्याय 'उपांशु' कहा गया है। यह वाचिक जपसे हजार गुना श्रेष्ठ है। (अर्थात् वही स्वाध्याय उपांशु है जिसमें ओठोंमें मात्र स्पन्दन हो, शब्दोंका उच्चारण न हो।) स्पन्दनरहित अक्षर एवं उस पदकी संगतिके अनुसार सभी शब्दोंके चिन्तनको विद्वान् मानस जप कहते हैं (अर्थात् मानस जप (स्वाध्याय) वही है जिसमें स्वाध्यायके शब्दोंपर केवल मन केन्द्रित हो बाकी सर्वथा व्यापारशून्य हो)। पुरुषको जो यदृच्छापूर्वक मिल जाता है, उसे ही पर्याप्त समझने वाली बुद्धिको ऋषिलोग नित्य सुख लक्षणवाला संतोष कहते हैं ॥ २५-२७॥
बाह्यमाभ्यन्तरं शौचं द्विधा प्रोक्तं द्विजोत्तमाः।
मृजलाभ्यां स्मृतं बाह्यं मनःशुद्धिरथान्तरम् ॥ २८॥
स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
सुनिश्चला शिवे भक्तिरेतदीश्वरपूजनम्॥२९॥
यमाः सनियमाः प्रोक्ताः प्राणायामं निबोधत।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम्॥३०॥
उत्तमाधममध्यत्वात् विधायं प्रतिपादितः।
स एव द्विविधः प्रोक्तः सगर्भोऽगर्भ एव च ॥३१॥
मात्राद्वादशको मन्दश्चतुर्विंशतिमात्रिकः ।
मध्यमः प्राणसंरोधः षट्त्रिंशन्मात्रिकोत्तमः ॥३२॥
द्विजश्रेष्ठो! बाह्य और आभ्यन्तर-भेदसे शौच दो प्रकार का कहा गया है। मिट्टी और जलसे होनेवाला शौच बाह्य शौच और मनकी शुद्धि आभ्यन्तर शौच है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा स्तुति, स्मरण तथा पूजा करते हुए शिव में अचल भक्ति रखना-यह ईश्वरका पूजन है। नियमों के साथ यमोंको बतलाया गया, अब प्राणायामके विषय में सुनो-अपनी देहसे उत्पन्न वायुको प्राण कहते हैं और उस वायुका निरोध करना आयाम है। उत्तम, मध्यम तथा अधमके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है। वही सगर्भ और अगर्भ-भेदसे दो प्रकारका है। द्वादश मात्रा (अर्थात् प्रणवका बारह बार जप करनेतक) के कालको मन्द प्राणायाम, चौबीस मात्रा (-के प्राणनिरोध) को मध्यम और छत्तीस मात्रातकके कालतक प्राणनिरोध को उत्तम प्राणायाम कहा जाता है॥ २८-३२॥
प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकत्वं यथाक्रमम्।
मन्दमध्यममुख्यानामानन्दादुत्तमोत्तमः ॥३३॥
सगर्भमाहुः सजपमगर्भ विजपं बुधाः।
एतद्वै योगिनामुक्तं प्राणायामस्य लक्षणम्॥३४॥
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह।
त्रिजपेदायतप्राण: प्राणायामः स उच्यते॥३५॥
रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः ।
प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥३६ ।।
मन्द, मध्यम तथा मुख्य अर्थात् उत्तम नाम के प्राणायामोंमें क्रमसे प्रस्वेद (पसीना) कम्पन तथा उत्थान होता है। इनसे तत्त्व-प्राप्तिमें क्रमश: आनन्दातिशयकी अनुभूति होती है। विद्वान् जपयुक्त प्राणायामको सगर्भ और जप-रहितको अगर्भ कहते हैं। योगियोंके प्राणायामका यही लक्षण कहा गया है। प्राणधारणपूर्वक व्याहृति (भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), प्रणव और शीर्षमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप (सगर्भ) प्राणायाम कहा जाता है। मनको संयत करनेवाले योगियोंने सभी शास्त्रोंमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामका वर्णन किया है॥३३-३६॥
रेचकोऽजननिःश्वासात् पूरकस्तन्निरोधतः।
साम्येन संस्थितिर्या सा कुम्भकः परिगीयते॥३७॥
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावतः।
निग्रहः प्रोच्यते सद्भिः प्रत्याहारस्तु सत्तमाः॥३८॥
हृत्पुण्डरीके नाभ्यां वा मूर्ध्नि पर्वतमस्तके।
एवमादिषु देशेषु धारणा चित्तबन्धनम्॥३९॥
देशावस्थितिमालम्ब्य बुद्धेर्या वृत्तिसंततिः।
वृत्त्यन्तरैरसंसृष्टा तद्ध्यानं सूरयो विदुः॥ ४०॥
एकाकारः समाधिः स्याद् देशालम्बनवर्जितः।
प्रत्ययो ह्यर्थमात्रेण योगसाधनमुत्तमम्॥४१॥
धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणाः।
ध्यानं द्वादशकं यावत् समाधिरभिधीयते॥४२॥
वायुके सतत बाहर निकालनेको रेचक और उसके रोकनेको पूरक तथा बादकी सम अवस्थाकी जो स्थिति है, उसे कुम्भक कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो! सज्जनोंने स्वभावतः विषयोंमें विचरण करनेवाली इन्द्रियोंके निग्रहको प्रत्याहार कहा है। हृदयकमल, नाभिदेश, मूर्धा तथा पर्वतशिखर आदि स्थानोंमें चित्तके बन्धनको धारणा कहा जाता है। किसी देश (स्थान)-विशेषका अवलम्बनकर उसमें बुद्धिकी जो एकतान वृत्ति बनी रहती है और दूसरी वृत्तियोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है, उसे विद्वानोंने ध्यान कहा है। किसी देश या अन्य आलम्बनसे रहित चित्तकी एकाकारता समाधि है। इसमें ध्येयमात्रका भान होता है। यह योगका उत्तम साधन है। बारह प्राणायामपर्यन्त धारणा, बारह धारणापर्यन्त ध्यान और
बारह ध्यानपर्यन्त समाधि कही जाती है॥ ३७-४२ ।।
आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा।
साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम्॥४३॥
ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे।
समासीतात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम्॥४४॥
एकं पादमथैकस्मिन् विन्यस्योरुणि सत्तमाः।
आसीतार्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम्॥४५॥
उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि।
समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम्॥४६॥
स्वस्तिकासन, पद्मासन तथा अर्धासन-भेदसे आसन (तीन प्रकारका) कहा गया है। सभी साधनोंमें यह साधन उत्तम है। विप्रेन्द्रो! अपने दोनों ऊरुओंके ऊपर दोनों पादतलोंको रखकर बैठनेको उत्तम पद्म नामक आसन कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो! एक पैरको दूसरे जाँघके ऊपर रखकर बैठनेको अर्धासन कहा जाता है। यह योगका उत्तम साधन है। दोनों पैरोंको जानुओं एवं ऊरुओंके भीतर करके बैठनेको श्रेष्ठ स्वस्तिक नामक आसन कहा जाता है॥ ४३-४६॥
अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते।
अग्न्यभ्याशे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा ।। ४७ ।।
जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे।
सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसंचये॥४८॥
अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते।
नाचरेद् देहबाधे वा दौर्मनस्यादिसम्भवे॥४९॥
सुगुप्ते सुशुभे देशे गुहायां पर्वतस्य तु।
नद्यास्तीरे पुण्यदेशे देवतायतने तथा॥५०॥
गृहे वा सुशुभे रम्ये विजने जन्तुवर्जिते।
युञ्जीत योगी सततमात्मानं मत्परायणः॥५१॥
नमस्कृत्य तु योगीन्द्रान् सशिष्यांश्च विनायकम्।
गुरुं चैवाथ मां योगी युञ्जीत सुसमाहितः॥५२॥
विपरीत देश (स्थान) और विपरीत कालमें योगतत्त्व का दर्शन भी नहीं होता। अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरके मध्य, जन्तुओंसे भरे स्थानमें, श्मशानमें, पुराने गोष्ठमें, चौराहेमें, कोलाहल और भययुक्त स्थानमें, चैत्यके समीप, दीमकोंसे पूर्ण स्थान, अशुभ स्थान, दुर्जनोंसे व्याप्त और मच्छर आदिसे भरे स्थान तथा देह-सम्बन्धी कष्ट और मनकी अस्वस्थता की दशामें योग-साधन नहीं करना चाहिये। अच्छी प्रकार रक्षित, शुभ स्थान, पर्वतकी गुफा, नदीके किनारे, पुण्यदेश, देवमन्दिर, घर, शुभ, रमणीय, जनशून्य, जन्तुओंसे रहित स्थानोंमें योगीको सतत अपनेको मेरे परायण रखते हुए योग-साधना करनी चाहिये। योगीको चाहिये कि वह शिष्योंसहित श्रेष्ठ योगियों, विनायक, गुरु तथा मुझे प्रणाम करके समाहित- होकर योग- -साधना करे॥ ४७-५२॥
आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धमथापि वा।
नासिकाग्रे समां दृष्टिमीषदुन्मीलितेक्षणः॥५३॥
कृत्वाथ निर्भयः शान्तस्त्यक्त्वा मायामयं जगत्।
स्वात्मन्यवस्थितं देवं चिन्तयेत् परमेश्वरम्॥५४॥
स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिका के अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥५३-५४॥
शिखाग्रे द्वादशाङ्गुल्ये कल्पयित्वाथ पङ्कजम्।
धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम् ॥५५॥
ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।
चिन्तयेत् परमं कोशं कर्णिकायां हिरण्मयम्॥५६॥
सर्वशक्तिमयं साक्षाद् यं प्राहुर्दिव्यमव्ययम्।
ओंकारवाच्यमव्यक्तं रश्मिजालसमाकुलम्॥५७॥
चिन्तयेत् तत्र विमलं परं ज्योतिर्यदक्षरम्।
तस्मिन् ज्योतिषि विन्यस्य स्वात्मानं तदभेदतः॥५८॥
ध्यायीताकाशमध्यस्थमीशं परमकारणम्।
तदात्मा सर्वगो भूत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्।।५९॥
शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण- मालाओंसे व्याप्त कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥५५-५९॥
एतद् गुह्यतमं ध्यानं ध्यानान्तरमथोच्यते।
चिन्तयित्वा तु पूर्वोक्तं हृदये पद्ममुत्तमम्॥६०॥
आत्मानमथ कर्तारं तत्रानलसमत्विषम्।
मध्ये वह्निशिखाकारं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥६१।।
चिन्तयेत् परमात्मानं तन्मध्ये गगनं परम्।
ओंकारबोधितं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्॥६२॥
यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥६०-६२ ॥
अव्यक्तं प्रकृतौ लीनं परं ज्योतिरनुत्तमम्।
तदन्तः परमं तत्त्वमात्माधारं निरञ्जनम्॥६३॥
ध्यायीत तन्मयो नित्यमेकरूपं महेश्वरम्।
विशोध्य सर्वतत्त्वानि प्रणवेनाथवा पुनः।। ६४॥
संस्थाप्य मयि चात्मानं निर्मले परमे पदे।
प्लावयित्वात्मनो देहं तेनैव ज्ञानवारिणा॥६५॥
मदात्मा मन्मयो भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।
तेनोद्धृत्य तु सर्वाङ्गमग्निरित्यादिमन्त्रतः।
चिन्तयेत् स्वात्मनीशानं परं ज्योतिःस्वरूपिणम्॥६६॥
उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥६३-६६॥
एष पाशुपतो योगः पशुपाशविमुक्तये।
सर्ववेदान्तसारोऽयमत्याश्रममिति श्रुतिः॥६७॥
एतत् परतरं गुह्यं मत्सायुज्योपपादकम्।
द्विजातीनां तु कथितं भक्तानां ब्रह्मचारिणाम्॥६८॥
ब्रह्मचर्यमहिंसा च क्षमा शौचं तपो दमः ।
संतोषः सत्यमास्तिक्यं व्रताङ्गानि विशेषतः॥६९॥
एकेनाप्यथ हीनेन व्रतमस्य तु लुप्यते।
तस्मादात्मगुणोपेतो मव्रतं वोढुमर्हति॥७०॥
जीवको बन्धनरूप पाशसे मुक्त करनेके लिये यह पाशुपत नामक योग कहा गया है। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है और श्रुतिमें इस योगकी अवस्थाको सभी आश्रमोंकी अवस्थासे अतीत अवस्था (उत्कृष्ट अवस्था) बतलाया गया है। इसे अत्यन्त गुह्य और द्विजातियों, भक्तों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये मेरा सायुज्य प्रदान करनेवाला कहा गया है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, शौच, तप, दम, संतोष, सत्य तथा आस्तिकता-ये सभी (इस पाशुपत) व्रतके विशेष अङ्ग हैं। इनमें से एक (अङ्ग) के भी न होनेसे इस (योग)-का व्रत लुप्त हो जाता है। इसलिये इन आत्मगुणों (ब्रह्मचर्य, अहिंसा आदि नौ व्रतके अङ्गों)-से युक्त साधक ही मेरा (पाशुपत) व्रत धारण कर सकता है॥६७-७०॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः॥७१॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
ज्ञानयोगेन मां तस्माद् यजेत परमेश्वरम्॥७२॥
अथवा भक्तियोगेन वैराग्येण परेण तु।
चेतसा बोधयुक्तेन पूजयेन्मां सदा शुचिः॥७३।।
सर्वकर्माणि संन्यस्य भिक्षाशी निष्परिग्रहः।
प्राप्नोति मम सायुज्यं गुह्यमेतन्मयोदितम्॥७४॥
राग, भय और क्रोधसे रहित, मत्परायण और मेरे आश्रित अनेक लोग इस (पाशुपत) योगके द्वारा मेरा भाव प्राप्तकर पवित्र हो गये हैं। जो जिस प्रकार मेरे पास आते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें स्वीकार करता हूँ। इसलिये ज्ञानयोगके द्वारा मुझ परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। अथवा भक्तियोग, परम वैराग्य एवं ज्ञानयुक्त चित्तके द्वारा पवित्रतापूर्वक सदा मेरा पूजन करना चाहिये। सभी कर्मोंका परित्यागकर, भिक्षाका अन्न ग्रहण करते हुए अन्य कुछ भी संग्रह न करते हुए (साधना करनेवाला) साधक मेरा सायुज्य (नामक मोक्ष) प्राप्त करता है। यह मैंने गुह्य बात बतलायी ॥७१-७४॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारो यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥७५॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मर्पितमनो बुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥७६ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स हि मे प्रियः॥७७॥
जो सभी प्राणियोंसे द्वेष न करनेवाला, मित्रता करनेवाला, करुणायुक्त, ममतारहित और अहंकारसे रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो संतुष्ट रहनेवाला, निरन्तर योग-साधना करनेवाला, संयमित- चित्त, दृढ़निश्चयी और मुझमें मन तथा बुद्धि अर्पण करनेवाला है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी भी प्राणीको उद्वेग प्राप्त नहीं होता और किसी भी प्राणीसे जो उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे होनेवाले उद्वेगोंसे रहित है, वह मुझे प्रिय है॥७५-७७॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥७८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिौनी संतुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्मद्भक्तो मामुपैष्यति॥७९॥
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मत्परायणः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं परमं पदम्॥८०॥
जो किसी भी प्रकारकी अपेक्षा न रखनेवाला, पवित्र, कुशल (वेदशास्त्र-निषिद्धके त्यागमें सावधान) पक्षपातसे (शत्रु-मित्रभावसे) रहित, दुःखसे आक्रान्त होनेपर भी व्यथाका अनुभव न करनेवाला और सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग करनेवाला है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरा प्रिय है। जो निन्दा एवं स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी पदार्थसे संतुष्ट रहनेवाला, गृहसे (गृहासक्तिसे) रहित है, वह स्थिर बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्राप्त करता है। मुझमें परायण रहनेवाला सभी कर्मोको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत परमपद प्राप्त करता है॥७८-८०॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा मामेकं शरणं व्रजेत्॥८१॥
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव तेन निबध्यते॥८२॥
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति तत्पदम्॥८३॥
चित्तसे सभी कर्मोंको मुझमें अर्पितकर मत्परायण होते हुए आशा एवं ममताकी आसक्तिसे रहित होकर एकमात्र मेरी ही शरण ग्रहण करना चाहिये। कर्मफलकी आसक्तिका सर्वथा परित्यागकर नित्य संतृप्त और (अन्य) आश्रयरहित (एकमात्र परमेश्वरको ही आश्रय समझनेवाला) व्यक्ति कर्मों में प्रवृत्त होते हुए भी उन कर्मोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। आशारहित, संयमित चित्तवाला, सब प्रकारके परिग्रहों (संचयों)-का परित्याग- कर केवल शरीर (रक्षा)-के निमित्त कर्म करते हुए भी (व्यक्ति) उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है॥८१-८३॥
यदृच्छालाभतुष्टस्य द्वन्द्वातीतस्य चैव हि।
कुर्वतो मत्प्रसादार्थं कर्म संसारनाशनम्॥८४॥
मन्मना मन्नमस्कारो मद्याजी मत्परायणः।
मामुपैष्यति योगीशं ज्ञात्वा मां परमेश्वरम्॥८५॥
मबुद्धयो मां सततं बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं मम सायुज्यमाप्नुयुः॥८६॥
एवं नित्याभियुक्तानां मायेयं कर्मसान्वगम्।
नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन भास्वता॥८७॥
अनायास जो उपलब्ध हो उसीमें संतुष्ट रहनेवाले और सभी प्रकारके सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित रहनेवाले पुरुषके द्वारा केवल मेरी प्रसन्नताके लिये किये गये कर्म संसार (रूपी बन्धन)-का विनाश करनेवाले हैं। मुझमें मन लगानेवाला, मुझे नमस्कार करनेवाला, मेरा
पूजन करनेवाला और मुझे ही अपना परम अयन (आश्रय) समझनेवाला (योगी) मुझ योगके ईश परमेश्वरको जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। मुझमें बुद्धि रखनेवाले (साधक) सतत परस्पर मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरा वर्णन करते हुए मेरा सायुज्य प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नित्य योगयुक्त पुरुषके माया (अज्ञान) से उत्पन्न तथा उनसे भी उत्पन्न कर्मरूप समस्त
अन्धकारका प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं नाश कर देता हूँ॥८४-८७॥
मबुद्धयो मां सततं पूजयन्तीह ये जनाः।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥८॥
येऽन्ये च कामभोगार्थं यजन्ते ह्यन्यदेवताः।
तेषां तदन्तं विज्ञेयं देवतानुगतं फलम्॥८९॥
ये चान्यदेवताभक्ताः पूजयन्तीह देवताः।
मद्भावनासमायुक्ता मुच्यन्ते तेऽपि भावतः॥९०॥
तस्मादनीश्वरानन्यांस्त्यक्त्वा देवानशेषतः।
मामेव संश्रयेदीशं स याति परमं पदम्॥९१॥
मुझमें बुद्धि लगानेवाले जो मनुष्य सतत मेरी पूजा करते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंके योग- क्षेमका मैं निर्वाह करता हूँ और जो दूसरे लोग अभिलषित विषयोंके उपभोगके लिये ही भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं, उनका अन्त विषयभोगतक ही समझना चाहिये, क्योंकि देवताके अनुसार ही फल भी होता है। जो दूसरे देवोंके भक्त हैं, वे यदि मेरी भावनासे युक्त होकर (दूसरे)देवताओंकी पूजा करते हैं अर्थात् दूसरे देवोंमें मेरी ही भावना करते हैं तो वे भी (मुझमें) भावना करनेके कारण मुक्त हो जाते हैं। अतएव समस्त अनीश्वर देवताओंका परित्यागकर जो मुझ ईशका ही आश्रय ग्रहण करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है॥८८-९१॥
त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निःशोको निष्परिग्रहः।
यजेच्चामरणाल्लिङ्गे विरक्तः परमेश्वरम्॥९२॥
येऽर्चयन्ति सदा लिङ्गं त्यक्त्वा भोगानशेषतः।
एकेन जन्मना तेषां ददामि परमैश्वरम्॥९३॥
परानन्दात्मकं लिङ्गं केवलं सन्निरञ्जनम्।
ज्ञानात्मकं सर्वगतं योगिनां हृदि संस्थितम्॥१४॥
पुत्र (स्त्री, गृह) आदिमें आसक्तिका परित्यागकर और शोकरहित होकर तथा अपरिग्रही होकर विरक्त पुरुषको मृत्युपर्यन्त (शिव-) लिङ्गमें परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। जो सम्पूर्ण भोगोंका परित्यागकर सर्वदा लिङ्गका पूजन करते रहते हैं, उन्हें मैं एक जन्ममें ही परम ऐश्वर-पद (मोक्ष) प्रदान करता हूँ। परम आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, सद्रूप, निरञ्जन, ज्ञानात्मक और सर्वत्र व्याप्त (शिव-) लिङ्ग योगियोंके हृदय- प्रदेशमें अवस्थित रहता है॥ ९२-९४॥
ये चान्ये नियता भक्तो भावयित्वा विधानतः।
यत्र क्वचन तल्लिङ्गमर्चयन्ति महेश्वरम्॥९५॥
जले वा वह्निमध्ये वा व्योम्नि सूर्येऽथ वान्यतः।
रत्नादौ भावयित्वेशमर्चयेल्लिङ्गमैश्वरम्॥ ९६॥
सर्वं लिङ्गमयं ह्येतत् सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।
तस्माल्लिङ्गेऽर्चयेदीशं यत्र क्वचन शाश्वतम्॥९७॥
नियमपूर्वक भक्ति करनेवाले दूसरे लोग विधि- पूर्वक जहाँ-कहीं भी (शिवलिङ्गकी) भावना करते हुए उस महेश्वर-लिङ्गकी अर्चना करते हैं। जलमें, अग्निके मध्यमें, आकाशमें, सूर्यमें, रत्न आदिमें अथवा अन्यत्र कहीं भी ईशकी भावना करके लिङ्गरूप ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये। यह सब कुछ लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतएव जहाँ-कहीं भी लिङ्गरूपमें शाश्वत ईशका अर्चन करना चाहिये ॥ ९५-९७॥
अग्नौ क्रियावतामप्सु व्योनि सूर्ये मनीषिणाम्।
काष्ठादिष्वेव मूर्खाणां हृदि लिङ्गंतु योगिनाम्॥ ९८ ॥
यद्यनुत्पन्नविज्ञानो विरक्तः प्रीतिसंयुतः।
यावज्जीवंजपेद् युक्तः प्रणवं ब्रह्मणो वपुः॥ ९९ ।।
अथवा शतरुद्रीयं जपेदामरणाद् द्विजः।
एकाकी यतचित्तात्मा स याति परमं पदम्॥ १००॥
वसेद् वामरणाद् विप्रो वाराणस्यां समाहितः।
सोऽपीश्वरप्रसादेन याति तत् परमं पदम्॥१०१॥
तत्रोत्क्रमणकाले हि सर्वेषामेव देहिनाम्।
ददाति तत् परं ज्ञानं येन मुच्येत बन्धनात्॥१०२॥
क्रियाशीलोंका (लिङ्ग) अग्निमें, मनीषियोंका जल, आकाश और सूर्यमें, अज्ञानियोंका काष्ठ आदिमें और योगियोंका लिङ्ग हृदयमें स्थित रहता है। यदि (ब्रह्म) विज्ञान उत्पन्न न हुआ हो तो विरक्त होकर (द्विजको) अत्यन्त प्रीतिसे ब्रह्मके प्रणवरूपी शरीरका यावज्जीवन जप करते हुए रहना चाहिये। अथवा एकाकी एवं संयत-चित्तवाले द्विजको मरणपर्यन्त शतरुद्रियका जप करना चाहिये, इससे उसे परम पद प्राप्त होता है। अथवा विप्रको चाहिये कि मरणपर्यन्त समाहितचित्त होकर वाराणसीमें निवास करे। वह भी ईश्वर (शंकर)- के अनुग्रहसे उत्कृष्ट परमपदको प्राप्त करता है। वहाँ (वाराणसीमें) सभी प्राणियोंको उनके प्राण निकलते समय (भगवान् शंकर) उस परम ज्ञानको प्रदान करते हैं, जिससे वे (पुनर्जन्मके) बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥९८-१०२॥
वर्णाश्रमविधिं कृत्स्नं कुर्वाणो मत्परायणः।
तेनैव जन्मना ज्ञानं लब्ध्वा याति शिवं पदम्॥१०३॥
येऽपि तत्र वसन्तीह नीचा वा पापयोनयः।
सर्वे तरन्ति संसारमीश्वरानुग्रहाद् द्विजाः ॥१०४॥
किन्तु विना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसाम्।
धर्म समाश्रयेत् तस्मान्मुक्तये नियतं द्विजाः॥१०५॥
एतद् रहस्यं वेदानां न देयं यस्य कस्यचित्।
धार्मिकायैव दातव्यं भक्ताय ब्रह्मचारिणे॥१०६॥
सम्पूर्ण वर्णाश्रम-विधिका पालन करते हुए मेरे परायण रहनेवाला अपने उसी जन्ममें (जिस जन्म में वर्णाश्रम-धर्मका पालन कर रहा है) ज्ञान प्राप्तकर शिवपदको प्राप्त करता है। द्विजो! नीच अथवा पापयोनिवाले भी जो प्राणी वहाँ (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे सभी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे संसारको पार कर लेते हैं, किंतु जो पापाक्रान्त चित्तवाले हैं, उन्हें बहुत विघ्न होते हैं। इसलिये द्विजो! मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। यह वेदोंका रहस्य है, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये। धार्मिक तथा ब्रह्मचारी भक्तको ही प्रदान करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥
व्यास उवाच
इत्येतदुक्त्वा भगवानात्मयोगमनुत्तमम्।
व्याजहार समासीनं नारायणमनामयम्॥१०७॥
व्यासजी बोले-इस प्रकार उत्तम आत्मयोग का वर्णन करके भगवान् (शंकर)-ने वहीं बैठे हुए प्रसन्नचित्त नारायणसे कहा-॥१०७॥
मयैतद् भाषितं ज्ञानं हितार्थं ब्रह्मवादिनाम्।
दातव्यं शान्तचित्तेभ्यः शिष्येभ्यो भवता शिवम्॥१०८॥
उक्त्वैवमथ योगीन्द्रानब्रवीद् भगवानजः।
हिताय सर्वभक्तानां द्विजातीनां द्विजोत्तमाः॥१०९॥
भवन्तोऽपि हि मज्ज्ञानं शिष्याणां विधिपूर्वकम्।
उपदेक्ष्यन्ति भक्तानां सर्वेषां वचनान्मम॥११०॥
मैंने ब्रह्मवादियोंके कल्याणार्थ इस ज्ञानको कहा है। आप इस कल्याणकारी ज्ञानको शान्तचित्त शिष्योंको प्रदान करें। अजन्मा भगवान् (शंकर)-ने ऐसा कहनेके उपरान्त श्रेष्ठ योगियोंसे कहा-द्विजोत्तमो! सभी द्विजाति भक्तोंके कल्याणके लिये आप लोग भी मेरे कहनेसे सभी भक्त शिष्योंको मेरे ज्ञानका विधिपूर्वक उपदेश करें॥१०८-११०॥
अयं नारायणो योऽहमीश्वरो नात्र संशयः।
नान्तरं ये प्रपश्यन्ति तेषां देयमिदं परम्॥१११॥
ममैषा परमा मूर्तिर्नारायणसमाह्वया।
सर्वभूतात्मभूतस्था शान्ता चाक्षरसंज्ञिता॥११२॥
ये त्वन्यथा प्रपश्यन्ति लोके भेददृशो जनाः।
न ते मां सम्प्रपश्यन्ति जायन्ते च पुनः पुनः॥११३॥
ये त्विमं विष्णुमव्यक्तं मां वा देवं महेश्वरम्।
एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः॥११४॥
तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम्।
मामेव सम्प्रपश्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि ॥११५॥
जो ये नारायण हैं, वह मैं ईश्वर ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है। जो (हम दोनोंमें) कोई भेद नहीं देखता, उसीको यह परम (ज्ञान) देना चाहिये। नारायण नामवाली तथा शान्त अक्षर-संज्ञक मेरी यह परम मूर्ति सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। लोकमें जो भेददृष्टिवाले लोग इसके विपरीत समझते हैं, वे मेरा दर्शन नहीं करते हैं और बार-बार (संसारमें) जन्म लेते हैं। जो इन अव्यक्त विष्णु अथवा मुझ देव महेश्वरको एकीभावसे देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये अनादिनिधन (आदि और अन्तसे रहित) आत्मरूप अव्यय विष्णु मुझे ही समझो और फिर वैसे ही पूजा भी करो॥ १११-११५ ॥
येऽन्यथा मां प्रपश्यन्ति मत्वेमं देवतान्तरम्।
ते यान्ति नरकान् घोरान् नाहं तेषु व्यवस्थितः॥११६॥
मूर्ख वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं वा मदाश्रयम्।
मोचयामि श्वपाकं वा न नारायणनिन्दकम्॥११७॥
तस्मादेष महायोगी मद्भक्तैः पुरुषोत्तमः ।
अर्चनीयो नमस्कार्यों मत्प्रीतिजननाय हि॥११८॥
जो लोग इन (विष्णु)-को दूसरा देवता मानकर मुझे दूसरा देवता समझकर देखते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, मैं उनमें स्थित नहीं रहता हूँ। मूर्ख हो, पण्डित हो, ब्राह्मण हो अथवा चाण्डाल हो, मेरे आश्रित रहनेवाले (प्रत्येक)-को मैं मुक्त कर देता हूँ, किंतु जो नारायणकी निन्दा करनेवाला है, उसे मैं मुक्त नहीं करता। इसीलिये मेरे भक्त मुझमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये इन महायोगी पुरुषोत्तमकी अर्चना अवश्य करें और इन्हें नमस्कार अवश्य करें। ११६-११८ ॥
एवमुक्त्वा समालिङ्ग्य वासुदेवं पिनाकधृक् ।
अन्तर्हितोऽभवत् तेषां सर्वेषामेव पश्यताम्॥११९॥
नारायणोऽपि भगवांस्तापसं वेषमुत्तमम्।
जग्राह योगिनः सर्वांस्त्यक्त्वा वै परमं वपुः॥१२०॥
ऐसा कहकर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर वासुदेवका आलिंगन करके उन सभीके देखते-देखते अन्तर्हित हो गये। भगवान् नारायणने भी अपने पारमार्थिक विग्रहका त्यागकर उत्तम तपस्वीका वेष धारण किया और सभी योगियोंसे कहा-॥ ११९-१२०॥
ज्ञातं भवद्भिरमलं प्रसादात् परमेष्ठिनः।
साक्षादेव महेशस्य ज्ञानं संसारनाशनम्॥१२१॥
गच्छध्वं विज्वराः सर्वे विज्ञानं परमेष्ठिनः।
प्रवर्तयध्वं शिष्येभ्यो धार्मिकेभ्यो मुनीश्वराः॥१२२॥
आप लोगोंने परमेष्ठी (महेश्वर)-की कृपासे संसार (बन्धन)-को नष्ट करनेवाला उन्हीं साक्षात् महेशका निर्मल ज्ञान प्राप्त किया है। इसलिये मुनीश्वरो! विगतज्वर होकर आप सभी जायँ और धार्मिक शिष्योंमें परमेष्ठीके ज्ञानको प्रवर्तित करें॥ १२१-१२२ ।।
इदं भक्ताय शान्ताय धार्मिकायाहिताग्नये।
विज्ञानमैश्वरं देयं ब्राह्मणाय विशेषतः ।। १२३॥
एवमुक्त्वा स विश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ।
नारायणो महायोगी जगामादर्शनं स्वयम्॥१२४॥
इस ईश्वर-सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञानको विशेष रूपसे शान्त भक्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा कहकर योगियोंमें परम श्रेष्ठ वे महायोगी विश्वात्मा नारायण स्वयं अन्तर्हित हो गये ॥ १२३-१२४ ॥
तेऽपि देवादिदेवेशं नमस्कृत्य महेश्वरम्।
नारायणं च भूतादिं स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ १२५॥
सनत्कुमारो भगवान् संवर्ताय महामुनिः।
दत्तवानैश्वरं ज्ञानं सोऽपि सत्यव्रताय तु॥१२६॥
सनन्दनोऽपि योगीन्द्रः पुलहाय महर्षये।
प्रददौ गौतमायाथ पुलहोऽपि प्रजापतिः॥१२७॥
अङ्गिरा वेदविदुषे भरद्वाजाय दत्तवान्।
जैगीषव्याय कपिलस्तथा पञ्चशिखाय च॥१२८॥
पराशरोऽपि सनकात् पिता मे सर्वतत्त्वदृक् ।
लेभेतत्परमं ज्ञानं तस्माद् वाल्मीकिराप्तवान्।। १२९॥
मामुवाच पुरा देवः सतीदेहभवाङ्गजः।
वामदेवो महायोगी रुद्रः किल पिनाकधृक्॥१३० ।।
वे (मुनिगण) भी देवोंके आदिदेवेश्वर महेश्वरको और भूतादि (समस्त प्रपञ्चके मूलकारण) नारायणको नमस्कार कर अपने स्थानोंकी ओर चले गये। महामुनि भगवान् सनत्कुमारने संवर्तको ईश्वरीय ज्ञान (शिवज्ञानका उपदेश) प्रदान किया। उन्होंने भी (वह ज्ञान) सत्यव्रतको दिया। योगीन्द्र सनन्दनने महर्षि पुलहको और प्रजापति पुलहने गौतमको ईश्वरीय ज्ञान प्रदान किया। अङ्गिराने वेदोंके ज्ञाता भरद्वाजको और कपिलने जैगीषव्य तथा पञ्चशिखको (वह ज्ञान) दिया। सभी तत्त्वोंके द्रष्टा मेरे पिता पराशरने भी वह परम ज्ञान सनकसे प्राप्त किया और उनसे वाल्मीकिने प्राप्त किया। प्राचीन कालमें अर्धनारीश्वर भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न महायोगी वामदेवजीने मुझसे कहा, जो साक्षात् पिनाकधारी रुद्रस्वरूप हैं॥१२५-१३०॥
नारायणोऽपि भगवान् देवकीतनयो हरिः।
अर्जुनाय स्वयं साक्षात् दत्तवानिदमुत्तमम्॥१३१॥
यदहं लब्धवान् रुद्राद् वामदेवादनुत्तमम्।
विशेषाद् गिरिशे भक्तिस्तस्मादारभ्य मेऽभवत्॥ १३२॥
शरण्यं शरणं रुद्रं प्रपन्नोऽहं विशेषतः।
भूतेशं गिरिशं स्थाणुं देवदेवं त्रिशूलिनम्।। १३३ ।।
भवन्तोऽपि हि तं देवं शम्भुंगोवृषवाहनम्।
प्रपद्यध्वं सपत्नीका: सपुत्राः शरणं शिवम्॥१३४॥
वर्तध्वं तत्प्रसादेन कर्मयोगेन शंकरम्।
पूजयध्वं महादेवं गोपतिं भूतिभूषणम्॥१३५ ।।
देवकीके पुत्र हरि भगवान् नारायणने भी स्वयं साक्षात् अर्जुनको यह उत्तम ज्ञान प्रदान किया। जब मैंने वामदेव रुद्रसे इस श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त किया, तभीसे मेरी गिरिशमें विशेष भक्ति हो गयी। मैंने शरणागतोंके रक्षक, शरण (प्राणिमात्रके आश्रय), भूतोंके ईश, गिरिश, स्थाणु, देवाधिदेव त्रिशूली रुद्रकी विशेषरूपसे शरण ग्रहण की है। पत्नी तथा पुत्रोंके साथ आप सब लोग भी उन गोवृषवाहन', कल्याणकारी भगवान् शम्भुकी शरणमें जायें। उनकी कृपासे कर्मयोगके द्वारा व्यवहार करें और विभूतिभूषण गोपति (इन्द्रियोंके पति) महादेव शंकरकी पूजा करें॥ १३१-१३५॥
एवमुक्तेऽथ मुनयः शौनकाद्या महेश्वरम्।
प्रणेमुः शाश्वतं स्थाणुं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥१३६ ॥
अब्रुवन् हृष्टमनसः कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।
साक्षादेव हृषीकेशं सर्वलोकमहेश्वरम्॥१३७॥
ऐसा कहे जानेपर उन शौनक आदि (महर्षियों) ने पुनः शाश्वत स्थाणु सनातन महेश्वर एवं सत्यवती के पुत्र व्यासको प्रणाम किया और प्रसन्नमन होकर वे सभी लोकोंके महेश्वर, साक्षात् हषीकेश, प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास)-से कहने लगे- ॥ १३६-१३७॥
भवत्प्रसादादचला शरण्ये गोवृषध्वजे।
इदानीं जायते भक्तिर्या देवैरपि दुर्लभा॥१३८॥
कथयस्व मुनिश्रेष्ठ कर्मयोगमनुत्तमम्।
येनासौ भगवानीशः समाराध्यो मुमुक्षुभिः॥१३९॥
त्वत्संनिधावेष सूतः शृणोतु भगवद्वचः।
तद्वदाखिललोकानां रक्षणं धर्मसंग्रहम्॥१४०॥
यदुक्तं देवदेवेन विष्णुना कूर्मरूपिणा।
पृष्टेन मुनिभिः पूर्वं शक्रेणामृतमन्थने ॥१४१ ।।
(भगवन् !) आपकी ही कृपासे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोवृषध्वज (भगवान् शंकर)-की वह अविचल भक्ति हमें प्राप्त हो गयी है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ! आप श्रेष्ठ कर्मयोग हमें बतलायें, जिसके द्वारा मोक्षार्थी लोग इन भगवान् ईशकी आराधना करते
हैं । आप (वेदव्यास)-की संनिधिमें ही श्रीसूतजी भगवान् (महेश्वर)-के वचनोंको सुन लें, जो वचन समस्त लोकोंके रक्षक हैं और जिनमें समस्त धर्मोंका संग्रह हुआ है। अत: इनका वर्णन करें। इसके अतिरिक्त आप वह भी बतायें, जो पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय इन्द्रके द्वारा तथा मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर कूर्मरूपी देवाधिदेव श्रीविष्णुने कहा था (आप उसी कर्मयोगका वर्णन करें)॥ १३८-१४१ ॥
श्रुत्वा सत्यवतीसूनुः कर्मयोगं सनातनम्।
मुनीनां भाषितं कृष्ण: प्रोवाच सुसमाहितः॥१४२।।
इस प्रकार मुनियोंने जो कहा उसे सुनकर सत्यवती के पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजीने समाहित होकर (मुनियोंको) सनातन कर्मयोग बतलाया॥१४२॥
य इमं पठते नित्यं संवादं कृत्तिवाससः।
सनत्कुमारप्रमुखैः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥१४३॥
श्रावयेद् वा द्विजान् शुद्धान् ब्रह्मचर्यपरायणान्।
यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम्॥१४४॥
यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥१४५॥
श्रीसनत्कुमार आदि प्रमुख मुनियों एवं भगवान् कृत्तिवासा (शंकर)-के मध्य सम्पन्न इस संवादको जो नित्य पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा जो ब्रह्मचर्यपरायण विशुद्ध द्विजोंको इस (संवाद) को सुनाता है, या जो इस संवादके अर्थका अनुसंधान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। जो दृढ़व्रती भक्ति-सम्पन्न होकर इस (संवाद)-को नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होते हुए ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १४३-१४५ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः।
श्रोतव्यश्चाथ मन्तव्यो विशेषाद् ब्राह्मणैः सदा ॥१४६॥
इसलिये विद्वानोंको सभी प्रयत्नोंके द्वारा नित्य इसका पठन, श्रवण एवं विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको इसका सदा मनन करना चाहिये॥ १४६ ॥
Summary of chapter 60 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Śiva elaborates on His divine omnipresence, listing His supreme manifestations among all categories of creation, such as Vishṇu among Ādityas, Shankara among Rudras, Meru among mountains, and the Veda among scriptures. He explains the nature of twenty-four Tattvas comprising the material universe, defining all bound Jīvas as Pashus trapped in the strong ropes of Avidyā, Karma, and Māyā. Bhagavān reveals that He alone is the eternal Pashupati who breaks these sturdy cosmic ropes for devotees who surrender to Him with pure hearts, conferring eternal Mukti.