कूर्म महा पुराण
15 अध्याय
दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन,
पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके
साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी
स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धक-
द्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें ग्रहण करना तथा
विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन
सूत उवाच
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा ।
ससर्ज देवान् गन्धर्वान् ऋषींश्चैवासुरोरगान्॥ १ ॥
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।
तदा ससर्ज भूतानि मैथुनेनैव धर्मतः॥ २॥
सूतजी बोले-पूर्वकालमें 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारको स्वयम्भू–ब्रह्माकी आज्ञा प्राप्तकर दक्ष ने देवताओं, गन्धर्वो, ऋषियों, असुरों तथा नागोंकी सृष्टि की। जब सृष्टि करनेवाले उन दक्षकी वे प्रजाएँ नहीं बढ़ीं, तब उन्होंने मर्यादापूर्वक मिथुन-धर्म (स्त्री-पुरुष-संयोग)-से प्राणियोंकी सृष्टि की। उन्होंने वीरण प्रजापति की धर्मपरायणा असिक्नी नामकी कन्यासे एक हजार पुत्रों को उत्पन्न किया। देवर्षि नारदकी मायासे उन पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर पुनः उन दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीसे ही साठ कन्याओंको उत्पन्न किया॥१-४॥
असिक्न्यां जनयामास वीरणस्य प्रजापतेः।
सुतायां धर्मयुक्तायां पुत्राणां तु सहस्रकम्॥ ३ ॥
तेषु पुत्रेषु नष्टेषु मायया नारदस्य सः।
षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वैरण्यां वै प्रजापतिः॥ ४ ॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
विंशत् सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ ५ ॥
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।
द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत् तासां वक्ष्येऽथ विस्तरम्॥ ६ ॥
(उन साठ कन्याओंमेंसे) उन्होंने दस धर्म को, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बहुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और इसी प्रकार दो कन्याएँ अंगिराको प्रदान की। अब मैं उनके वंश-विस्तार का वर्णन करूँगा॥५-६॥
अरुन्धती वसुर्जामी लम्बा भानुर्मरुत्वती।
संकल्पाच मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी॥ ७ ॥
धर्मपल्यो दश त्वेतास्तासां पुत्रान् निबोधत।
विश्वाया विश्वदेवास्तु साध्या साध्यानजीजनत्॥ ८ ॥
मरुत्वन्तो मरुत्वत्यां वसवोऽष्टौ वसोः सुताः।
भानोस्तु भानवश्चैव मुहूर्ता वै मुहूर्तजाः॥ ९ ॥
लम्बायाश्चाथ घोषो वै नागवीथी तु जामिजा।
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।
संकल्पायास्तु संकल्पो धर्मपुत्रा दश स्मृताः॥१०॥
अरुन्धती, वसु, जामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा भामिनी विश्वा–ये दस धर्म की पत्नियाँ हैं। इनके पुत्रोंके नाम सुनो। विश्वा के विश्वेदेव हुए और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको जन्म दिया। मरुत्वतीसे मरुद्गण हुए और वसुसे वसु नामक आठ पुत्र हुए। भानुसे भानुओं और मुहूर्ता से मुहूर्तों की उत्पत्ति हुई। लम्बासे घोष और जामिसे नागवीथी नामक पुत्र उत्पन्न हुए। अरुन्धती से सम्पूर्ण पृथ्वी से सम्बद्ध प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और संकल्पासे संकल्प नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार धर्मके (ये) दस पुत्र कहे गये हैं॥७-१०॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥११॥
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः श्रान्तो धुनिस्तथा।
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः॥१२॥
आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास-ये अष्ट वसु कहे गये हैं। आपके वैतण्ड्य, श्रम, श्रान्त तथा धुनि नामक पुत्र हुए और ध्रुवके पुत्र संसारके संहारक भगवान् काल हैं ॥११-१२॥
सोमस्य भगवान् वर्चा धरस्य द्रविणः सुतः।
पुरोजवोऽनिलस्य स्यादविज्ञातगतिस्तथा॥१३॥
कुमारो ह्यनलस्यासीत् सेनापतिरिति स्मृतः।
देवलो भगवान् योगी प्रत्यूषस्याभवत् सुतः।
विश्वकर्मा प्रभासस्य शिल्पकर्ता प्रजापतिः॥१४॥
भगवान् वर्चा सोमके पुत्र हैं और धरके द्रविण नामक पुत्र हैं। अनिलके पुरोजव तथा अविज्ञातगति नाम-वाले पुत्र हैं। अतुलके पुत्र कुमार हैं जो 'सेनापति' नाम से कहे जाते हैं। प्रत्यूष (नामक वसु)-के महायोगी भगवान् देवल नामक पुत्र हुए। इसी प्रकार प्रभासके प्रजापति विश्वकर्मा नामक पुत्र हैं जो शिल्पकारी हैं ।। १३-१४॥
अदितिर्दितिर्दनुस्तद्वदरिष्टा सुरसा तथा।
सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रुर्मुनिश्च धर्मज्ञा तत्पुत्रान् वै निबोधत॥१५॥
अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु, मुनि तथा धर्मज्ञा-(दक्षकी ये तेरह कन्याएँ कश्यपकी पत्नियाँ हैं) उनके पुत्रोंके विषयमें सुनो- ॥ १५ ॥
अंशो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा।
विवस्वान् सविता पूषा ह्यंशुमान् विष्णुरेव च॥१६॥
तुषिता नाम ते पूर्वं चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
वैवस्वतेऽन्तरे प्रोक्ता आदित्याश्चादितेः सुताः॥१७॥
दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपाद् बलसंयुतम्।
हिरण्यकशिपुं ज्येष्ठं हिरण्याक्षं तथापरम्॥१८॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो महाबलपराक्रमः।
आराध्य तपसा देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
दृष्ट्वा लेभेवरान् दिव्यान् स्तुत्वासौ विविधैः स्तवैः॥१९॥
अथ तस्य बलाद् देवाः सर्व एव सुरर्षयः ।
बाधितास्ताडिता जग्मुर्देवदेवं पितामहम्॥२०॥
शरण्यं शरणं देवं शम्भुं सर्वजगन्मयम्।
ब्रह्माणं लोककर्तारं
पुरुषं परम्।
कूटस्थं जगतामेकं पुराणं पुरुषोत्तमम्॥२१॥
अंश, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु-ये सभी पूर्वकालमें चाक्षुष मन्वन्तरमें तुषित नामक देवता थे और
वैवस्वत मन्वन्तरमें ये ही अदितिके पुत्र (बारह) आदित्य कहे गये हैं। दितिने कश्यपसे बलवान् दो पुत्रोंको प्राप्त किया। उनमें हिरण्यकशिपु बड़ा था, उसका अनुज हिरण्याक्ष था। दैत्य हिरण्यकशिपु महाबलशाली और पराक्रमी था। उसने तपस्याद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माकी आराधनाकर उनका दर्शन किया तथा विविध स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिकर दिव्य वरोंको प्राप्त किया। उसके पराक्रमसे पीड़ित एवं ताडित सभी देवता एवं देवर्षिगण शरण ग्रहण करने योग्य, आश्रयस्वरूप, सर्वजगन्मय, शम्भु देवस्वरूप त्राता, लोककर्ता, परमपुरुष, कूटस्थ, जगत्के एकमात्र पुराण पुरुष पुरुषोत्तम देवोंके देव पितामह ब्रह्माकी शरणमें गये॥१६-२१॥
स याचितो देववरैर्मुनिभिश्च मुनीश्वराः।
सर्वदेवहितार्थाय जगाम कमलासनः॥२२॥
संस्तूयमानः प्रणतैर्मुनीन्द्रैरमरैरपि।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं यत्रास्ते हरिरीश्वरः॥२३॥
दृष्ट्वा देवं जगद्योनि विष्णुं विश्वगुरुं शिवम्।
ववन्दे चरणौ मूर्जा कृताञ्जलिरभाषत॥२४॥
मुनीश्वरो! श्रेष्ठ देवताओं तथा मुनियोंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर सभी देवताओंके कल्याण करनेकी इच्छासे कमलके आसनवाले ब्रह्मा क्षीरसागरके उत्तरी तटपर गये, जहाँ विनीत मुनीन्द्रों तथा देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए हरि ईश्वर निवास करते हैं। जगत्के मूल कारण, विश्वके गुरु, कल्याणमय, विष्णुदेव का दर्शन करके उन्होंने मस्तक झुकाकर चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर (इस प्रकार) कहा- ॥ २२-२४॥
ब्रह्मोवाच
त्वं गतिः सर्वभूतानामनन्तोऽस्यखिलात्मकः।
व्यापी सर्वामरवपुर्महायोगी सनातनः ॥२५॥
ब्रह्मा ने कहा-(भगवन्!) आप सभी प्राणियों की गति हैं, अनन्त हैं और इस सम्पूर्ण विश्वके आत्मस्वरूप हैं। आप सर्वत्र व्याप्त, सभी देवताओंके शरीररूप, महायोगी तथा सनातन हैं ॥ २५॥
त्वमात्मा सर्वभूतानां प्रधानं प्रकृतिः परा।
वैराग्यैश्वर्यनिरतो रागातीतो निरञ्जनः॥२६।।
त्वं कर्ता चैव भर्ता च निहन्ता सुरविद्विषाम्।
त्रातुमर्हस्यनन्तेश त्राता हि परमेश्वरः ॥ २७॥
आप सभी प्राणियोंकी आत्मा, प्रधान और परा प्रकृति हैं। आप वैराग्य और ऐश्वर्यमें निरत, रागातीत तथा निरञ्जन हैं। आप ही कर्ता-भर्ता तथा देवताओं से द्वेष रखनेवालोंके संहर्ता हैं। अनन्तेश! आप ही रक्षा करनेवाले परमेश्वर हैं, आप रक्षा करें ॥ २६-२७॥
इत्थं स विष्णुर्भगवान् ब्रह्मणा सम्प्रबोधितः।
प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षः पीतवासासुरद्विषः ।। २८॥
किमर्थं सुमहावीर्याः सप्रजापतिकाः सुराः ।
इमं देशमनुप्राप्ताः किं वा कार्यं करोमि वः ॥२९॥
ब्रह्माके द्वारा इस प्रकार भलीभाँति प्रबुद्ध किये 1 जानेपर विकसित कमलके समान नेत्रवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले तथा असुरोंके द्वेषी भगवान् विष्णु बोले-अत्यन्त वीर्यशाली देवताओ! आपलोग प्रजापतियों के साथ इस स्थानपर किस कारणसे आये हैं अथवा मैं आप लोगोंका कौन-सा कार्य करूँ? ॥ २८-२९॥
देवा ऊचुः
हिरण्यकशिपुर्नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः।
बाधते भगवन् दैत्यो देवान् सर्वान् सहर्षिभिः ॥ ३०॥
अवध्यः सर्वभूतानां त्वामृते पुरुषोत्तम।
हन्तुमर्हसि सर्वेषां त्वं त्रातासि जगन्मय ॥ ३१॥
श्रुत्वा तदैवतैरुक्तं स विष्णुर्लोकभावनः।
वधाय दैत्यमुख्यस्य सोऽसृजत् पुरुष स्वयम्॥३२॥
मेरुपर्वतवाणं घोररूपं भयानकम्।
शङ्खचक्रगदापाणिं तं प्राह गरुडध्वजः ॥३३॥
देवता बोले-भगवन् ! ब्रह्माके द्वारा प्राप्त वरदान के कारण घमंडसे भरा हुआ हिरण्यकशिपु नामका दैत्य ऋषियों सहित सभी देवताओंको पीड़ित कर रहा है। हे पुरुषोत्तम! आपको छोड़कर अन्य सभी प्राणियोंसे वह अवध्य है। जगन्मय! आप उसे मारनेमें समर्थ हैं, आप ही सभीके रक्षक हैं। देवताओंके द्वारा कही गयी उस बातको सुनकर संसारके रक्षक विष्णुने दैत्यप्रमुख उस हिरण्यकशिपुके वधके लिये स्वयं एक पुरुषको उत्पन्न किया। सुमेरु पर्वतके समान शरीरवाले, घोर रूपवाले, भयानक एवं हाथमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले उस पुरुषसे गरुडध्वज (विष्णु)-ने कहा ॥ ३०-३३॥
हत्वा तं दैत्यराजं त्वं हिरण्यकशिपुं पुनः ।
इमं देशं समागन्तुं क्षिप्रमर्हसि पौरुषात्॥३४॥
निशम्य वैष्णवं वाक्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।
महापुरुषमव्यक्तं ययौ दैत्यमहापुरम्॥३५॥
विमुञ्चन् भैरवं नादं शङ्खचक्रगदाधरः।
आरुह्य गरुडं देवो महामेरुरिवापरः॥३६॥
आकर्ण्य दैत्यप्रवरा महामेघरवोपमम्।
समाचचक्षिरे नादं तदा दैत्यपतेर्भयात्॥ ३७॥
तुम (अपने) पराक्रमसे उस दैत्यराज हिरण्यकशिपु को मारकर पुन: इस स्थानपर शीघ्र ही वापस लौट आओ। विष्णुका वचन सुनकर शंख, चक्र, गदाधारी वह दूसरे महामेरुके समान देव गरुडपर आरूढ़ होकर भीषण नाद करते हुए अव्यक्त, महापुरुष पुरुषोत्तमको प्रणामकर (हिरण्यकशिपु) दैत्यके महानगरकी ओर गया। महामेघ की गर्जनाके समान नादको सुनकर बड़े-बड़े दैत्योंने दैत्यराज से (हिरण्यकशिपुसे) भयपूर्वक कहा- ॥ ३४-३७॥
असुरा ऊचुः
कश्चिदागच्छति महान् पुरुषो देवचोदितः।
विमुञ्चन् भैरवं नादं तं जानीमोऽमरार्दन॥३८॥
ततः सहासुरवरैर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।
संनद्धः सायुधैः पुत्रैः प्रह्लादाद्यैस्तदा ययौ॥३९॥
दृष्ट्वा तं गरुडासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम्।
पुरुषं पर्वताकारं नारायणमिवापरम्॥४०॥
दुद्रुवुः केचिदन्योन्यमूचुः सम्भ्रान्तलोचनाः।
अयं स देवो देवानां गोप्ता नारायणो रिपुः॥४१॥
अस्माकमव्ययो नूनं तत्सुतो वा समागतः।
इत्युक्त्वा शस्त्रवर्षाणि ससृजुः पुरुषाय ते।
तानि चाशेषतो देवो नाशयामास लीलया॥४२॥
दैत्योंने कहा-देवताओंका विनाश करनेवाले दैत्यराज! देवताओंकी प्रेरणा प्राप्त कर कोई महान् पुरुष भीषण नाद करता हुआ आ रहा है, हमें उसे जानना चाहिये। तदनन्तर मुख्य-मुख्य असुरों तथा आयुधों से सुसज्जित प्रह्लाद आदि पुत्रोंके साथ हिरण्यकशिपु स्वयं वहाँ गया। करोड़ों सूर्यके समान प्रभावाले तथा दूसरे नारायणके समान पर्वताकार गरुडपर बैठे हुए उस पुरुषको देखकर कोई तो भाग गये और कोई भ्रान्त- दृष्टि होकर आपसमें कहने लगे-'यह निश्चित ही हमारा शत्रु और देवताओंका रक्षक वही अव्यय नारायण देव है अथवा उसका पुत्र ही यह आया है। ऐसा कहकर वे उस पुरुषपर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, किंतु उस देवने लीलासे ही उन सभी शस्त्रोंको नष्ट कर डाला ॥ ३८-४२॥
तदा हिरण्यकशिपोश्चत्वारः प्रथितौजसः।
पुत्रा नारायणोद्भूतं युयुधुर्मेघनिःस्वनाः ।
प्रहादश्चाप्यनुह्रादः संहादो हाद एव च॥४३॥
प्रह्लादः प्राहिणोद् ब्राह्ममनुह्रादोऽथ वैष्णवम्।
संहादश्चापि कौमारमाग्नेयं हाद एव च॥४४॥
तदनन्तर अतितेजस्वी तथा मेघके समान गर्जना करनेवाले प्रह्लाद, अनुहाद, संह्राद तथा हाद नामक हिरण्यकशिपुके चार पुत्र नारायणसे उत्पन्न उस पुरुष से युद्ध करने लगे। प्रह्लादने ब्रह्मास्त्र, अनुह्रादने वैष्णवास्त्र, संहादने कौमारास्त्र तथा ह्रादने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४३-४४॥
तानि तं पुरुषं प्राप्य चत्वार्यस्त्राणि वैष्णवम्।
न शेकुर्बाधितुं विष्णुं वासुदेवं यथा तथा॥४५॥
अथासौ चतुरः पुत्रान् महाबाहुर्महाबलः।
प्रगृह्य पादेषु करैः संचिक्षेप ननाद च॥४६॥
विमुक्तेष्वथ पुत्रेषु हिरण्यकशिपुः स्वयम्।
पादेन ताडयामास वेगेनोरसि तं बली॥४७॥
स तेन पीडितोऽत्यर्थं गरुडेन तथाशुगः।
अदृश्यः प्रययौ तूर्णं यत्र नारायणः प्रभुः।
गत्वा विज्ञापयामास प्रवृत्तमखिलं तथा ॥४८॥
वे चारों अस्त्र उस वैष्णव पुरुषके पास पहुँचकर उन वासुदेव विष्णुको किसी भी प्रकार बाँधनेमें समर्थ न हो सके। तदनन्तर महाबाहु महाबलशाली उस पुरुष ने उन चारों पुत्रोंके पैरोंको अपने हाथसे पकड़कर उन्हें फेंक दिया और गर्जना की। इस प्रकार पुत्रोंके फेंक दिये जानेपर बलवान् स्वयं हिरण्यकशिपुने पैरद्वारा बड़े ही वेगसे उस (पुरुष)-की छातीपर प्रहार किया। उस प्रहारसे पीड़ित होकर वह पुरुष गरुडपर चढ़कर अदृश्य हो गया तथा शीघ्र ही वहाँ गया जहाँ प्रभु नारायण स्थित थे। वहाँ जाकर उसने सम्पूर्ण घटित वृत्तान्त उन्हें बतला दिया ।। ४५-४८ ॥
संचिन्त्य मनसा देवः सर्वज्ञानमयोऽमलः।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतर्नु तथा॥४९ ।।
नृसिंहवपुरव्यक्तो हिरण्यकशिपोः पुरे।
आविर्बभूव सहसा मोहयन् दैत्यपुङ्गवान्॥५०॥
दंष्ट्राकरालो योगात्मा युगान्तदहनोपमः।
समारुह्यात्मनः शक्तिं सर्वसंहारकारिकाम्।
भाति नारायणोऽनन्तो यथा मध्यंदिने रविः॥५१॥
दृष्ट्वा नृसिंहवपुषं प्रहादं ज्येष्ठपुत्रकम्।
वधाय प्रेरयामास नरसिंहस्य सोऽसुरः॥५२॥
तब सर्वज्ञानमय विमल देवने मनमें विचारकर आधा शरीर मनुष्यका एवं आधा शरीर सिंहका बनाया। नरसिंह-शरीर धारण करनेवाले अव्यक्त देव दैत्य-समूहों को मोहित करते हुए अकस्मात् हिरण्यकशिपु के नगरमें प्रकट हो गये। भयंकर दाढ़ोंवाले योगात्मा तथा प्रलयाग्निके समान अनन्त नारायण अपनी सर्वसंहारकारिणी शक्तिपर आरूढ़ होकर उसी प्रकार प्रकाशित हो रहे थे जैसे मध्याह्नकालीन सूर्य प्रकाशमान होता है। नरसिंहका शरीर धारण किये उन्हें देखकर उस असुरने अपने बड़े लड़के प्रह्लादको नरसिंहके वधके लिये प्रेरित किया और कहा- ॥ ४९-५२॥
इमं नृसिंहवपुषं पूर्वस्माद् बहुशक्तिकम्।
सहैव त्वनुजैः सर्वैर्नाशयाशु मयेरितः॥५३॥
अपने सभी छोटे भाइयोंके साथ तुम पहले से अधिक शक्तिवाले इस नरसिंह-शरीरधारी पुरुषको मेरी प्रेरणासे शीघ्र ही मार डालो॥५३॥
तत्संनियोगादसुरः प्रह्लादो विष्णुमव्ययम्।
युयुधे सर्वयत्नेन नरसिंहेन निर्जितः॥५४॥
ततः संचोदितो दैत्यो हिरण्याक्षस्तदानुजः।
ध्यात्वा पशुपतेरस्त्रं ससर्ज च ननाद च॥५५॥
तस्य देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।
न हानिमकरोदस्त्रं यथा देवस्य शूलिनः॥५६॥
उसकी आज्ञा पाकर असुर प्रह्लादने सभी प्रकार के प्रयत्नों के द्वारा अव्यय विष्णुके साथ युद्ध किया, किंतु वह नरसिंहद्वारा पराजित हो गया। तदनन्तर उस (हिरण्य-कशिपु)-की आज्ञा प्राप्तकर उसके छोटे भाई हिरण्याक्ष ने पाशुपतास्त्रका ध्यान करके उसे चलाया और गर्जना की। वह अस्त्र देवाधिदेव अमित तेजस्वी उन विष्णु की, कोई हानि न कर सका जैसे कोई अस्त्र त्रिशूलधारी देव (शंकर)-की हानि नहीं करता ।। ५४-५६॥
दृष्ट्वा पराहतं त्वस्त्रं प्रह्लादो भाग्यगौरवात्।
मेने सर्वात्मकं देवं वासुदेवं सनातनम्॥५७॥
संत्यज्य सर्वशस्त्राणि सत्त्वयुक्तेन चेतसा।
ननाम शिरसा देवं योगिनां हृदयेशयम्॥५८॥
स्तुत्वा नारायणैः स्तोत्रैः ऋग्यजुःसामसम्भवैः।
निवार्य पितरं भ्रातॄन् हिरण्याक्षं तदाब्रवीत्॥५९॥
अस्त्रको विफल होते देखकर भाग्यशाली होने के कारण प्रह्लादने उन देवको सर्वात्मक सनातन वासुदेव ही समझा। उसने सभी शस्त्रोंका परित्याग कर दिया और सत्त्वगुणसम्पन्न चित्तसे योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले देवको सिरसे प्रणाम किया तथा ऋक्, यजुष् तथा सामवेदमें प्राप्त वैष्णव स्तुतियोंके द्वारा स्तुतिकर अपने पिता (हिरण्यकशिपु), भाइयों एवं हिरण्याक्ष को युद्ध करनेसे रोकते हुए इस प्रकार कहा- ॥ ५७-५९॥
अयं नारायणोऽनन्तः शाश्वतो भगवानजः।
पुराणपुरुषो देवो महायोगी जगन्मयः॥६०॥
अयं धाता विधाता च स्वयंज्योतिर्निरञ्जनः।
प्रधानपुरुषस्तत्त्वं मूलप्रकृतिरव्ययः॥ ६१॥
ईश्वरः सर्वभूतानामन्तर्यामी गुणातिगः।
गच्छध्वमेनं शरणं विष्णुमव्यक्तमव्ययम्॥६२॥
ये अनन्त, सनातन, अजन्मा, महायोगी, जगन्मय पुराणपुरुष भगवान् नारायण देव हैं। ये धाता, विधाता, स्वयंज्योति, निरञ्जन, प्रधानपुरुषरूप, तत्त्व, मूलप्रकृति, अव्यय, ईश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तर्यामी तथा गुणातीत हैं। इन अव्यक्त, अव्यय विष्णुकी आप लोग शरण ग्रहण करें॥६०-६२॥
एवमुक्ते सुदुर्बुद्धिर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।
प्रोवाच पुत्रमत्यर्थं मोहितो विष्णुमायया॥६३ ॥
अयं सर्वात्मना वध्यो नृसिंहोऽल्पपराक्रमः।
समागतोऽस्मद्भवनमिदानीं कालचोदितः॥६४॥
(प्रह्लादके) इस प्रकार कहनेपर विष्णुकी मायासे अत्यन्त मोहित दुर्बुद्धि हिरण्यकशिपुने स्वयं पुत्र से कहा-यह थोड़े पराक्रमवाला नरसिंह सभी प्रकार से वध करने योग्य है। कालके द्वारा प्रेरित होकर इस समय यह हमारे घरमें ही आ गया है॥६३-६४॥
विहस्य पितरं पुत्रो वचः प्राह महामतिः।
मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम्॥६५॥
कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः।
कालेन हन्यते विष्णुः कालात्मा कालरूपधृक् ।। ६६॥
ततः सुवर्णकशिपुर्दुरात्मा विधिचोदितः।
निवारितोऽपि पुत्रेण युयोध हरिमव्ययम्॥६७॥
संरक्तनयनोऽनन्तो हिरण्यनयनाग्रजम्।
नखैर्विदारयामास प्रहादस्यैव पश्यतः॥ ६८॥
पिताका वचन सुनकर महामति प्रह्लादने हँसकर कहा-प्राणियोंके एकमात्र स्वामी इन अव्ययकी निन्दा मत करो। सनातन, कालवर्जित, कालात्मा, कालका रूप धारण करनेवाले, महादेव विष्णु देवको काल कैसे मार सकता है। तदनन्तर भाग्यसे प्रेरित हिरण्यकशिपु पुत्र के द्वारा रोके जानेपर भी अव्यय हरिसे लड़ने लगा। (क्रोधसे) अत्यन्त लाल नेत्रोंवाले अनन्त विष्णुने प्रह्लादके देखते-ही-देखते हिरण्य (स्वर्ण)-के समान नयन हैं जिसके, उस हिरण्यनयन (हिरण्याक्ष)-के बड़े भाई हिरण्य-कशिपुको अपने नखोंद्वारा विदीर्ण कर डाला॥ ६५-६८॥
हते हिरण्यकशिपौ हिरण्याक्षो महाबलः।
विसृज्य पुत्रं प्रह्लादं दुद्रुवे भयविह्वलः॥६९॥
अनुहादादयः पुत्रा अन्ये च शतशोऽसुराः।
नृसिंहदेहसम्भूतैः सिंहैर्नीता यमालयम्॥७०॥
ततः संहृत्य तद्रूपं हरिर्नारायणः प्रभुः।
स्वमेव परमं रूपं ययौ नारायणाह्वयम्॥७१॥
हिरण्यकशिपु के मार दिये जाने पर भय से विह्वल महाबली हिरण्याक्ष पुत्र प्रह्लादको छोड़कर भाग चला। नरसिंहकी देहसे उत्पन्न सिंहोंने (हिरण्यकशिपु के) अनुहाद आदि पुत्रों तथा अन्य सैकड़ों असुरों को यमलोक पहुँचा दिया। तदनन्तर प्रभु नारायण हरिने उस (नरसिंह) रूपको समेटकर अपने ही नारायण नामवाले श्रेष्ठ रूप को धारण कर लिया तथा अपने धामके लिये प्रस्थान किया॥६९-७१॥
गते नारायणे दैत्यः प्रह्लादोऽसुरसत्तमः ।
अभिषेकेण युक्तेन हिरण्याक्षमयोजयत्॥७२॥
स बाधयामास सुरान् रणे जित्वा मुनीनपि।
लब्ध्वान्धकं महापुत्रं तपसाराध्य शंकरम्॥७३॥
देवाञ्जित्वा सदेवेन्द्रान् बध्वा च धरणीमिमाम्।
नीत्वा रसातलं चक्रे वन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥७४॥
नारायणके चले जानेपर असुरश्रेष्ठ दैत्य प्रह्लाद ने (अपने चाचा) हिरण्याक्षका यथोचित अभिषेक किया। उस (हिरण्याक्ष)-ने युद्ध में देवताओं और मुनियों को जीतकर उन्हें पीड़ा पहुँचायी और तपस्याके द्वारा शंकर की आराधना करके अन्धक नामक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त किया। उसने देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओंको जीत लिया तथा कमलके समान कान्तिवाली इस पृथ्वीको बाँधकर
रसातलमें ले जाकर बंदी बना लिया ।।७२-७४॥
ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।
गत्वा विज्ञापयामासुर्विष्णवे हरिमन्दिरम्॥७५ ॥
तब मुरझायी हुई मुखकी शोभावाले सभी देवता ब्रह्मासहित हरिके निवासमें गये और उन्हें (सारा वृत्तान्त) बतलाया॥ ७५॥
स चिन्तयित्वा विश्वात्मा तद्वधोपायमव्ययः ।
सर्वदेवमयं शुभं वाराहं वपुरादधे॥७६ ॥
गत्वा हिरण्यनयनं हत्वा तं पुरुषोत्तमः।
दंष्ट्रयोद्धारयामास कल्पादौ धरणीमिमाम्॥७७॥
त्यक्त्वा वराहसंस्थानं संस्थाप्य च सुरद्विजान्।
स्वामेव प्रकृतिं दिव्यां ययौ विष्णुः परं पदम्॥७८॥
अव्यय उन विश्वात्माने उस हिरण्याक्षके वध का उपाय सोचते हुए सर्वदेवमय स्वच्छ वराहके शरीर को धारण किया। हिरण्याक्षके समीप जाकर पुरुषोत्तमने
उसे मार डाला और कल्पके आदिमें (हिरण्याक्षके द्वारा रसातल ले जायी गयी) इस पृथ्वीका अपने दाढ़ों द्वारा (उठाकर) उद्धार किया। वराह-रूपका परित्याग कर तथा देवताओं और ब्राह्मणोंको यथास्थान प्रतिष्ठित कर विष्णु ने अपने ही दिव्य (चतुर्भुज)-स्वरूपको धारण किया और वे अपने परम पदकी ओर चले गये ॥७६-७८॥
तस्मिन् हतेऽमररिपौ प्रह्लादो विष्णुतत्परः।
अपालयत्स्वकं राज्यं भावं त्यक्त्वा तदासुरम्॥७९॥
इयाज विधिवद् देवान् विष्णोराराधने रतः।
निःसपत्तं तदा राज्यं तस्यासीद् विष्णुवैभवात्॥८०॥
देवताओंके शत्रु उस (हिरण्याक्ष)-के मारे जाने पर विष्णुपरायण प्रह्लाद आसुर भावका परित्याग कर अपने राज्यका पालन करने लगा। विष्णुकी आराधनामें निरत रहते हुए उसने विधिपूर्वक देवोंका यज्ञ आदिद्वारा पूजन किया। विष्णुके प्रतापसे उसका राज्य किसी प्रतिद्वन्द्वी (शत्रु) आदिसे रहित था॥ ७९-८०॥
तत: कदाचिदसुरो ब्राह्मणं गृहमागतम्।
तापसं नार्चयामास देवानां चैव मायया॥८१॥
एक बारकी बात है-देवताओंकी मायाके वशीभूत असुर प्रह्लादने घरमें आये हुए तपस्वी ब्राह्मणकी पूजा नहीं की॥ ८१॥
स तेन तापसोऽत्यर्थं मोहितेनावमानितः।
शशापासुरराजानं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥८२॥
यत्तद्बलं समाश्रित्य ब्राह्मणानवमन्यसे।
सा भक्तिर्वैष्णवी दिव्या विनाशं ते गमिष्यति॥८३॥
मायासे अत्यन्त मोहित उस तपस्वी प्रह्लादके द्वारा अपमानित होकर क्रोधसे रक्तनेत्रवाले उस तपस्वी ब्राह्मणने असुरराज (प्रह्लाद)-को शाप दे डाला-जिस बलका आश्रय ग्रहणकर तुम ब्राह्मणोंकी अवमानना कर रहे हो, तुम्हारी वह दिव्य वैष्णवी भक्ति विनष्ट हो जायगी॥ ८२-८३॥
इत्युक्त्वा प्रययौ तूर्णं प्रहादस्य गृहाद् द्विजः।
मुमोह राज्यसंसक्तः सोऽपि शापबलात् ततः॥८४॥
बाधयामास विप्रेन्द्रान् न विवेद जनार्दनम्।
पितुर्वधमनुस्मृत्य क्रोधं चक्रे हरिं प्रति॥८५॥
तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।
नारायणस्य देवस्य प्रहादस्यामरद्विषः॥८६॥
कृत्वा तु सुमहद् युद्धं विष्णुना तेन निर्जितः।
पूर्वसंस्कारमाहात्म्यात् परस्मिन् पुरुषे हरौ।
संजातं तस्य विज्ञानं शरण्यं शरणं ययौ॥८७॥
ततः प्रभृति दैत्येन्द्रो ह्यनन्यां भक्तिमुद्वहन्।
नारायणे महायोगमवाप पुरुषोत्तमे॥८८॥
ऐसा कहकर वह ब्राह्मण प्रह्लादके घरसे शीघ्र ही निकल पड़ा और प्रहाद भी शापके प्रभावसे राज्य-संचालन में लगे रहनेपर भी मोहग्रस्त हो गया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको पीड़ित करने लगा और जनार्दनको भूल-सा गया। पिता (हिरण्यकशिपु)-के वधका स्मरणकर वह हरि (विष्णु)-पर क्रुद्ध हो गया। तब उन दोनों सुरद्रो ही प्रह्लाद और नारायणदेवमें अत्यन्त घोर रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ। बड़ा भारी युद्ध करनेके बाद विष्णुने उसे जीत लिया। पहलेके संस्कारके माहात्म्यसे उसे परमपुरुष हरिका वास्तविक ज्ञान उद्बुद्ध हो गया और वह उनकी शरणमें गया। तबसे नारायण पुरुषोत्तममें अनन्य भक्ति रखते हुए उस दैत्येन्द्र प्रह्लादको महायोगकी प्राप्ति हुई ॥ ८४-८८॥
हिरण्यकशिपोः पुत्रे योगसंसक्तचेतसि।
अवाप तन्महद् राज्यमन्धकोऽसुरपुङ्गवः॥८९॥
हिरण्यनेत्रतनयः शम्भोर्दैहसमुद्भवः।
मन्दरस्थामुमां देवीं चकमे पर्वतात्मजाम्॥९०॥
हिरण्यकशिपुके पुत्र (प्रह्लद)-का चित्त योगमें आसक्त हो जानेपर शम्भुके देहसे* उत्पन्न हिरण्याक्षके पुत्र असुर श्रेष्ठ अन्धकने उस विशाल राज्यको प्राप्त किया तथा मन्दर पर्वतपर अवस्थित पर्वत (हिमालय)की पुत्री उमा देवीको प्राप्त करनेकी इच्छा की। ८९-९०॥
पुरा दारुवने पुण्ये मुनयो गृहमेधिनः।
ईश्वराराधनार्थाय तपश्चेरुः सहस्रशः॥९१॥
ततः कदाचिन्महती कालयोगेन दुस्तरा।
अनावृष्टिरतीवोग्रा ह्यासीद् भूतविनाशिनी॥९२॥
समेत्य सर्वे मुनयो गौतमं तपसां निधिम्।
अयाचन्त क्षुधाविष्टा आहारं प्राणधारणम्॥९३॥
स तेभ्यः प्रददावन्नं मृष्टं बहुतरं बुधः।
सर्वे बुभुजिरे विप्रा निर्विशङ्केन चेतसा॥९४॥
प्राचीन कालकी बात है, हजारों गृहस्थ मुनि पुण्यदायी दारुवनमें ईश्वरकी आराधना करनेके लिये तप करते थे। तदनन्तर कालयोगसे किसी समय प्राणियों का विनाश करनेवाली अत्यन्त उग्र तथा भयंकर अनावृष्टि हुई। भूखसे व्याकुल सभी मुनियोंने साथ मिलकर तपोनिधि गौतमसे प्राण धारणके निमित्त भोजनकी याचना की। बुद्धिमान् उन गौतमने उन सभीको अत्यधिक स्वादुयुक्त अन्न प्रदान किया। उन सभी ब्राह्मणों ने निःशंक-मनसे भोजन किया॥९१-९४ ॥
गते तु द्वादशे वर्षे कल्पान्त इव शंकरी।
बभूव वृष्टिमहती यथापूर्वमभूजगत् ॥९५॥
बारह वर्ष व्यतीत हो जानेपर कल्पान्तमें होनेवाली कल्याणकारिणी वृष्टिके सदृश महान् वृष्टि हुई। संसार (पुनः) पहलेके समान हो गया॥ ९५॥
ततः सर्वे मुनिवराः समामन्त्र्य परस्परम्।
महर्षि गौतमं प्रोचुर्गच्छाम इति वेगतः॥ ९६ ॥
निवारयामास च तान्कञ्चित् कालं यथासुखम्।
उषित्वा मद्गृहेऽवश्यं गच्छध्वमिति पण्डिताः॥ ९७ ॥
ततो मायामयीं सृष्ट्वा कृशां गां सर्व एव ते।
समीपं प्रापयामासुौतमस्य महात्मनः॥ ९८ ॥
सोऽनुवीक्ष्य कृपाविष्टस्तस्याः संरक्षणोत्सुकः।
गोष्ठे तां बन्धयामास स्पृष्टमात्रा ममार सा॥ ९९ ॥
तब सभी मुनिवरोंने आपसमें मन्त्रणा कर महर्षि गौतमसे पूछा-क्या हमलोग शीघ्र यहाँसे चले जायें? तब गौतमने उन लोगोंको रोकते हुए कहा-पण्डितजनो! कुछ समय और यहाँ मेरे घरमें सुखपूर्वक रहें, इसके बाद आप सभी जायँ। तत्पश्चात् उन सभीने मायामयी एक कमजोर गाय बनाकर उसे महात्मा गौतमके समीप पहुँचा दिया। गायको देखकर उसकी रक्षाके लिये उत्सुक दयालु मुनिने अपनी गोशालामें उसे बाँध दिया, किंतु वह गाय छूते ही मर गयी॥९६-९९॥
स शोकेनाभिसंतप्तः कार्याकार्यं महामुनिः।
न पश्यति स्म सहसा तादृशं मुनयोऽब्रुवन्॥१००॥
शोकसे अत्यन्त दु:खी वे महामुनि उस समय किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये। तब शीघ्र ही मुनियोंने ऐसे उन (गौतम मुनि)-से कहा- ॥१००॥
गोवध्येयं द्विजश्रेष्ठ यावत् तव शरीरगा।
तावत् तेऽन्नं न भोक्तव्यं गच्छामो वयमेव हि॥१०१॥
हे द्विजश्रेष्ठ! जबतक यह गोहत्या आपके शरीर में (व्याप्त) रहेगी, तबतक आपके यहाँ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये, इसलिये हमलोग जा रहे हैं॥१०१॥
तेन ते मुदिताः सन्तो देवदारुवनं शुभम्।
जग्मुः पापवशं नीतास्तपश्चर्तुं यथा पुरा॥१०२॥
स तेषां मायया जातां गोवध्यां गौतमो मुनिः।
केनापि हेतुना ज्ञात्वा शशापातीवकोपनः॥१०३॥
इस प्रकार पापके वशीभूत हुए वे (मुनिजन) प्रसन्न होकर पहलेके ही समान तप करनेके लिये शुभ देवदारु वनमें चले गये। उन गौतम मुनिने उन मुनियोंकी मायाद्वारा करायी गयी गोहत्या को किसी प्रकारसे जान लिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर (इसप्रकार) शाप दिया॥१०२-१०३ ॥
भविष्यन्ति त्रयीबाह्या महापातकिभिः समाः।
बभूवुस्ते तथा शापाज्जायमानाः पुनः पुनः॥१०४॥
सर्वे सम्प्राप्य देवेशं शंकरं विष्णुमव्ययम्।
अस्तुवन् लौकिकैः स्तोत्रैरुच्छिष्टा इव सर्वगौ॥१०५॥
महापातकियोंके समान ये लोग वेदसे बहिष्कृत हो जायँगे और शापके कारण बार-बार जन्म लेनेवाले होंगे। भोजन से बची हुई जूठनके समान वे सभी (शाप से भयभीत होकर) सर्वव्यापक देवेश शंकर तथा अव्यय विष्णुके पास पहुँचकर उनकी लौकिक स्तुतियोंसे स्तुति करने लगे-॥१०४-१०५॥
देवदेवौ महादेवौ भक्तानामातिनाशिनौ।
कामवृत्त्या महायोगौ पापान्नस्त्रातुमर्हथः॥१०६॥
तदा पावस्थितं विष्णुं सम्प्रेक्ष्य वृषभध्वजः।
किमेतेषां भवेत् कार्यं प्राह पुण्यैषिणामिति॥१०७॥
ततः स भगवान् विष्णुः शरण्यो भक्तवत्सलः।
गोपति
विप्रेन्द्रानालोक्य प्रणतान् हरिः॥१०८॥
हे देवदेव (विष्णु)! हे महादेव! (शंकर) आप दोनों भक्तोंका कष्ट दूर करनेवाले हैं और इच्छानुसार योग का अवलम्बन करनेवाले हैं। आप हम लोगोंकी पाप से रक्षा करें। तब समीपमें स्थित विष्णुकी ओर देखकर वृषभध्वज शंकरने कहा-बताइये कि ये पुण्य की इच्छा करनेवाले लोग क्या चाहते हैं? तब भक्तवत्सल, शरण्य हरि उन भगवान् विष्णुने विनीत श्रेष्ठ ब्राह्मणों की ओर देखकर शंकरजीसे कहा-॥१०६-१०८॥
न वेदबाह्ये पुरुषे पुण्यलेशोऽपि शंकर।
संगच्छते महादेव धर्मों वेदाद् विनिर्बभौ॥१०९॥
शंकर! वेदबाह्य पुरुषमें पुण्यका लेशमात्र भी नहीं रहता। हे महादेव! वेदसे ही धर्म उत्पन्न हुआ है॥१०९॥
तथापि भक्तवात्सल्याद्रक्षितव्या महेश्वर।
अस्माभिः सर्व एवेमे गन्तारो नरकानपि॥११०॥
तस्माद्वैवेदबाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम्।
विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यामो वृषध्वज॥१११॥
एवं सम्बोधितो रुद्रो माधवेन मुरारिणा।
चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवेरितः॥११२॥
कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम्।
पञ्चरात्रं पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः॥११३॥
सृष्ट्वा तानूचतुर्दैवौ कुर्वाणाः शास्त्रचोदितम्।
पतन्तो निरये घोरे बहून् कल्पान् पुनः पुनः॥११४॥
जायन्तो मानुषे लोके क्षीणपापचयास्ततः।
ईश्वराराधनबलाद् गच्छध्वं सुकृतां गतिम्।
वर्तध्वं मत्प्रसादेन नान्यथा निष्कृतिर्हि वः॥११५॥
तथापि महेश्वर! भक्तवत्सलताके कारण नरकोंमें जानेवाले इन सभीकी हमारे द्वारा रक्षा की जानी चाहिये ऐसा उचित प्रतीत होता है। इसलिये वृषभध्वज! वेदबाह्य पापियोंकी रक्षा करने एवं उन्हें मोहित करनेके लिये मैं शास्त्रोंकी रचना करूँगा। इस प्रकार मुरारि माधवसे प्रेरित किये गये रुद्रने मोहित करनेवाले शास्त्रोंको बनाया और उसी प्रकार शिवसे प्रेरणा प्राप्त केशवने भी ऐसे ही शास्त्रोंकी रचना की। कापाल, नाकुल, वाम, भैरव, पूर्वपश्चिम, पञ्चरात्र, पाशुपत तथा अन्य भी सहस्रों शास्त्रोंकी रचना करके उन देवोंने उन (वेदबाह्य)-से कहा-इन शास्त्रोंमें बताये गये कर्मों को करनेके कारण बहुत कल्पोंतक आप सब घोर अन्धकारपूर्ण नरकोंमें गिरेंगे और फिर पाप-समूहके क्षीण हो जाने पर मनुष्यलोक प्राप्त करेंगे। पुनः ईश्वरकी आराधनाके बलपर पुण्यवानोंकी गति प्राप्त करेंगे। आप सभी मेरी प्रसन्नताके लिये ऐसा ही करें, आप लोगोंके निस्तारणका अर्थात् दोषमुक्त होनेका इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है॥११०-११५॥
एवमीश्वरविष्णुभ्यां चोदितास्ते महर्षयः ।
आदेशं प्रत्यपद्यन्त शिरसाऽसुरविद्विषोः॥११६॥
चक्रुस्तेऽन्यानि शास्त्राणि तत्र तत्र रताः पुनः।
शिष्यानध्यापयामासुर्दशयित्वा फलानि तु॥११७॥
इस प्रकार शिव तथा विष्णुके द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर उन महर्षियोंने असुरोंसे द्वेष करनेवाले उन दोनों देवों की आज्ञाको सिरसे स्वीकार किया। पुन: उन लोगोंने भी दूसरे शास्त्रोंकी रचना कर उनमें प्रवृत्त होने वाले शिष्यों को पढ़ाया तथा उन शास्त्रोंके पढ़नेका फल भी बताया॥११६-११७॥
मोहयन्त इमं लोकमवतीर्य महीतले।
चकार शंकरो भिक्षां हितायैषां द्विजैः सह॥११८॥
कपालमालाभरणः प्रेतभस्मावगुण्ठितः।
विमोहयल्लोकमिमं जटामण्डलमण्डितः॥११९॥
निक्षिप्य पार्वती देवीं विष्णावमिततेजसि।
नियोज्याङ्गभवं रुद्रं भैरवं दुष्टनिग्रहे॥१२०॥
दत्त्वा नारायणे देवी नन्दिनं कुलनन्दिनम्।
संस्थाप्य तत्र गणपान् देवानिन्द्रपुरोगमान्॥१२१॥
शिवने इन (ब्राह्मणों)-के कल्याणके लिये पृथ्वी पर अवतार लेकर लोगोंको मोहित करते हुए ब्राह्मणों के साथ भिक्षावृत्ति ग्रहण की। कपालोंकी मालाका आभूषण धारणकर, चिता-भस्म लगाकर और जटामण्डल से मण्डित हो इस लोकको मोहित किया। देवी पार्वती को अमित तेजस्वी विष्णुके समीप रखा और दुष्टोंका निग्रह करने के लिये अपने अङ्गसे उत्पन्न रुद्र भैरवको नियुक्त किया। देवीको नारायणके समीप रखकर कुलनन्दन नन्दी को वहाँ रखा तथा इन्द्रादि देवों एवं गणपोंको भी वहाँ स्थापित किया ॥११८-१२१॥
प्रस्थितेऽथ महादेवे विष्णुर्विश्वतनुः स्वयम्।
स्त्रीरूपधारी नियतं सेवते स्म महेश्वरीम्॥१२२॥
महादेवके जानेके पश्चात् विश्वतनु साक्षात् विष्णु स्त्री-रूप धारण करके महेश्वरी पार्वतीकी भलीभांति सेवा करने लगे॥ १२२॥
ब्रह्मा हुताशनः शक्रो यमोऽन्ये सुरपुङ्गवाः।
सिषेविरे महादेवीं स्त्रीवेशं शोभनं गताः॥१२३॥
नन्दीश्वरश्च भगवान् शम्भोरत्यन्तवल्लभः।
द्वारदेशे गणाध्यक्षो यथापूर्वमतिष्ठत॥१२४॥
एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो ह्यन्धको नाम दुर्मतिः।
आहर्तुकामो गिरिजामाजगामाथ मन्दरम्॥१२५॥
सम्प्राप्तमन्धकं दृष्ट्वा शंकरः कालभैरवः।
न्यषेधयदमेयात्मा कालरूपधरो हरः॥१२६॥
तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।
शूलेनोरसि तं दैत्यमाजघान वृषध्वजः॥१२७॥
सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, यम तथा अन्य भी श्रेष्ठ देवता महादेवी की सेवा करने लगे। शम्भुके अत्यन्त प्रिय गणोंके अध्यक्ष भगवान् नन्दीश्वर पूर्वकी भाँति द्वारपर स्थित रहे। इसी बीच अन्धक नामका एक कुबुद्धि दैत्य गिरिजा पार्वतीको हरनेकी इच्छासे उस मन्दर पर्वतपर आया। अन्धकको वहाँ आया देखकर कालरूपधारी शंकर, अमेयात्मा हर कालभैरवने उसे रोका। उन दोनोंका अत्यन्त भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ॥१२३-१२७॥
ततः सहस्त्रशो दैत्यः ससर्जान्धकसंज्ञितान्।
नन्दिषेणादयो दैत्यैरन्धकैरभिनिर्जिताः॥१२८॥
घण्टाकर्णो मेघनादश्चण्डेशश्चण्डतापनः ।
विनायको मेघवाहः सोमनन्दी च वैद्युतः॥१२९॥
सर्वेऽन्धकं दैत्यवरं सम्प्राप्यातिबलान्विताः।
युयुधुः शूलशक्त्यृष्टिगिरिकूटपरश्वधैः॥१३०॥
भ्रामयित्वाथ हस्ताभ्यां गृहीतचरणद्वयाः।
दैत्येन्द्रेणातिबलिना क्षिप्तास्ते शतयोजनम्॥१३१॥
ततोऽन्धकनिसृष्टास्ते शतशोऽथ सहस्त्रशः।
कालसूर्यप्रतीकाशा भैरवं त्वभिदुद्रुवुः॥१३२॥
हा हेति शब्दः सुमहान् बभूवातिभयङ्करः ।
युयोध भैरवो रुद्रः शूलमादाय भीषणम्॥१३३॥
इसके बाद उस दैत्यने अन्धक नामवाले हजारों दैत्योंको उत्पन्न किया। उन अन्धक नामवाले दैत्यों ने नन्दिषेण आदि (गणों)-को पराजित कर दिया। घण्टाकर्ण, मेघनाद, चण्डेश, चण्डतापन, विनायक, मेघवाह, सोमनन्दी तथा वैद्युत आदि ये सभी अत्यन्त बलशाली गण दैत्यश्रेष्ठ अन्धकके पास जाकर शूल, शक्ति, ऋष्टि, पर्वतशिखर तथा परशुद्वारा युद्ध करने लगे। अत्यन्त बलवान् दैत्येन्द्रने अपने हाथोंसे उन सभीके दोनों पैरोंको पकड़कर घुमाते हुए उन्हें सौ योजन दूर फेंक दिया। तदनन्तर अन्धकद्वारा उत्पन्न सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें प्रलयकालीन सूर्यके समान वे (दैत्य) भैरवपर टूट पड़े। अत्यन्त भयंकर हाहाकार का शब्द होने लगा। भैरव रुद्र भीषण शूल लेकर युद्ध करने ॥१२८-१३३॥
दृष्ट्वाऽन्धकानां सुबलं दुर्जयं तर्जितो हरः।
जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम्॥१३४॥
सोऽसृजद् भगवान् विष्णुर्दैवीनां शतमुत्तमम्।
देवीपार्श्वस्थितो देवो विनाशायामरद्विषाम्॥१३५॥
अन्धकों की सेनाको अजेय देखकर भयभीत हर, विभु, अजन्मा देव वासुदेवकी शरणमें गये। तब देवी के समीपमें स्थित उन देव भगवान् विष्णुने देवताओं के द्वेषियों का विनाश करनेके लिये श्रेष्ठ सौ देवियों को उत्पन्न किया ॥१३४-१३५॥
तदान्धकसहस्रं तु देवीभिर्यमसादनम्।
नीतं केशवमाहात्म्यालीलयैव रणाजिरे॥१३६॥
दृष्ट्वा पराहतं सैन्यमन्धकोऽपि महासुरः।
पराङ्मुखो रणात् तस्मात् पलायत महाजवः ॥१३७॥
तदनन्तर विष्णुकी महिमासे उन देवियोंने सैकड़ों अन्धकोंको उस युद्धस्थलमें खेल-खेलमें ही यमलोक भेज दिया। अपनी सेनाकी पराजय देखकर महान् असुर अन्धक भी युद्धसे विमुख होकर अत्यन्त वेगसे भाग चला॥१३६-१३७॥
ततः क्रीडां महादेवः कृत्वा द्वादशवार्षिकीम्।
हिताय लोके भक्तानामाजगामाथ मन्दरम्।। १३८॥
तदनन्तर संसारमें भक्तोंके कल्याणार्थ बारह वर्षतक चलनेवाली लीलाको समाप्तकर महादेव मन्दराचल पर्वतपर चले आये ॥१३८॥
सम्प्राप्तमीश्वरं ज्ञात्वा सर्व एव गणेश्वराः।
समागम्योपतस्थुस्तं भानुमन्तमिव द्विजाः॥१३९॥
प्रविश्य भवनं पुण्यमयुक्तानां दुरासदम्।
ददर्श नन्दिनं देवं भैरवं केशवं शिवः॥१४०॥
ईश्वरको आया हुआ जानकर सभी गणेश्वर उनके पासमें आकर इस प्रकार स्थित हो गये जैसे द्विज सूर्य की उपासनामें स्थित रहते हैं। अयोगियोंके लिये दुर्गम पुण्यशाली भवनमें प्रवेशकर शिवने नन्दी, भैरवदेव तथा केशवको देखा ॥ १३९-१४०॥
प्रणामप्रवणं देवं सोऽनुगृह्याथ नन्दिनम्।
आघ्राय मूर्धनीशान: केशवं परिषस्वजे॥१४१॥
दृष्ट्वा देवी महादेवं प्रीतिविस्फारितेक्षणा।
ननाम शिरसा तस्य पादयोरीश्वरस्य सा॥१४२॥
निवेद्य विजयं तस्मै शंकरायाथ शंकरी।
भैरवो विष्णुमाहात्म्यं प्रणतः पार्श्वगोऽवदत्॥१४३॥
श्रुत्वा तद्विजयं शम्भुर्विक्रमं केशवस्य च।
समास्ते भगवानीशो देव्या सह वरासने॥१४४॥
ततो देवगणाः सर्वे मरीचिप्रमुखा द्विजाः ।
आजग्मुर्मन्दरं द्रष्टुं देवदेवं त्रिलोचनम्॥१४५॥
उन देव शंकरने प्रणाम करनेवाले नन्दीके ऊपर कृपा करके उनका सिर सूंघा और केशवका आलिङ्गन किया। महादेवको देखकर प्रीतिसे विकसित आँखोंवाली उन देवीने उन ईश्वरके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया। तदनन्तर शंकरप्रिया पार्वतीने उन्हें विजयका समाचार कहा और (शंकरके) पार्श्वमें स्थित रहनेवाले भैरवने विनयपूर्वक विष्णुके माहात्म्यको भी (उन्हें) बताया। उस विजय (-के समाचार) तथा केशव विष्णुके पराक्रमको सुनकर शम्भु भगवान् शंकर देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए। तदनन्तर मरीचि आदि प्रमुख द्विज तथा सभी देवगण देवाधिदेव त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये मन्दराचलपर आये ॥ १४१-१४५ ॥
येन तद् विजितं पूर्वं देवीनां शतमुत्तमम्।
समागतं दैत्यसैन्यमीशदर्शनवाञ्छया॥१४६॥
दृष्ट्वा वरासनासीनं देव्या चन्द्रविभूषणम्।
प्रणेमुरादरादेव्यो गायन्ति स्मातिलालसाः॥१४७॥
प्रणेमुर्गिरिजां देवीं वामपार्वे पिनाकिनः।
देवासनगतं देवं नारायणमनामयम्॥१४८॥
दृष्ट्वा सिंहासनासीनं देव्या नारायणेन च।
प्रणम्य देवमीशानं पृष्टवत्यो वराङ्गनाः॥१४९॥
जिन्होंने दैत्य (अन्धक)-की सेनाको पहले जीता था, वे श्रेष्ठ सौ देवियाँ भी ईशके दर्शनोंकी लालसासे वहाँ आयीं। चन्द्रमारूपी आभूषणसे विभूषित शंकरको देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर (उन) देवियोंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अत्यन्त प्रेमसे वे गान करने लगीं। पिनाकी (शंकर)के वामभागमें स्थित देवी गिरिजा एवं शंकरके आसनपर उनके साथ विराजमान प्रसन्नचित्त नारायणको (उन देवियों ने) प्रणाम किया। देवी पार्वती और नारायण के साथ सिंहासनपर बैठे हुए देव शंकरको प्रणामकर उन
श्रेष्ठ स्त्रियोंने पूछा- ॥ १४६-१४९ ॥
कन्या ऊचुः
कस्त्वं विभ्राजसे कान्त्या केयं बालरविप्रभा।
कोऽन्वयं भाति वपुषा पङ्कजायतलोचनः॥१५०॥
कन्याओं (देवियों)-ने कहा-अपनी कान्ति से प्रकाशित होनेवाले आप कौन हैं ? बाल सूर्यके समान आभावाली यह (बाला) कौन है? और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले एवं अपने शरीरके कारण शोभायमान यह कौन पुरुष है?॥ १५०॥
निशम्य तासां वचनं वृषेन्द्रवरवाहनः।
व्याजहार महायोगी भूताधिपतिरव्ययः॥१५१॥
अहं नारायणो गौरी जगन्माता सनातनी।
विभज्य संस्थितो देवः स्वात्मानं बहुधेश्वरः॥१५२॥
उनके वचन सुनकर श्रेष्ठ वृषभपर आरूढ़ होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, महायोगी अव्यय (शिव)ने कहा-मैं अपनेको नारायण तथा सनातन जगन्माता गौरी आदि अनेक रूपों में विभक्तकर स्थित रहनेवाला देव ईश्वर हूँ॥१५१-१५२ ॥
न मे विदुः परं तत्त्वं देवाद्या न महर्षयः।
एकोऽयं वेद विश्वात्मा भवानी विष्णुरेव च ॥१५३॥
अहं हि निष्क्रियः शान्तः केवलो निष्परिग्रहः ।
मामेव केशवं देवमाहुर्दैवीमथाम्बिकाम्॥१५४॥
मेरे परम तत्त्वको न तो देवता आदि जानते हैं और न महर्षि । एकमात्र विश्वात्मा ये विष्णु और भवानी ही (मुझे) जानते हैं। मैं ही निष्क्रिय, शान्त, अद्वितीय और परिग्रहशून्य हूँ। मुझे ही केशव, देव तथा देवी अम्बिका कहा जाता है॥१५३-१५४ ॥
एष धाता विधाता च कारणं कार्यमेव च।
कर्ता कारयिता विष्णुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥१५५॥
भोक्ता पुमानप्रमेयः संहर्ता कालरूपधृक् ।
स्रष्टा पाता वासुदेवो विश्वात्मा विश्वतोमुखः॥१५६॥
कूटस्थो ह्यक्षरो व्यापी योगी नारायणः स्वयम्।
तारक: पुरुषो ह्यात्मा केवलं परमं पदम्॥१५७॥
ये विष्णु ही स्वयं धाता, विधाता, कारण, कार्य, कर्ता, कारयिता (कार्यके लिये प्रेरित करनेवाले) और भुक्ति तथा मुक्तिस्वरूप फलको प्रदान करनेवाले हैं। (ये ही) भोक्ता, अप्रमेय पुरुष, संहर्ता, कालका रूप धारण करनेवाले, सृष्टि तथा पालन करनेवाले, विश्वात्मा, सर्वव्यापक, वासुदेव, कूटस्थ, अविनाशी, व्यापी, योगी, नारायण, तारक, पुरुष, आत्मा और अद्वितीय परम पद हैं॥ १५५-१५७॥
सैषा माहेश्वरी गौरी मम शक्तिर्निरञ्जना।
शान्ता सत्या सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥१५८॥
अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति।
एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥१५९॥
ये माहेश्वरी गौरी मेरी निरञ्जन शक्ति हैं। वेद | इन्हें ही शान्त, सत्य, सदानन्द और परम पद बतलाते हैं। इन्हींसे यह सब उत्पन्न हुआ है और इन्हींमें लय भी हो जायगा। ये ही सभी प्राणियोंकी गतियोंमें उत्तम गति हैं॥१५८-१५९॥
तयाहं संगतो देव्या केवलो निष्कलः परः।
पश्याम्यशेषमेवेदं यस्तद् वेद स मुच्यते॥१६०॥
तस्मादनादिमद्वैतं विष्णुमात्मानमीश्वरम्।
एकमेव विजानीध्वं ततो यास्यथ निर्वृतिम्॥१६१॥
मन्यन्ते विष्णुमव्यक्तमात्मानं श्रद्धयान्विताः।
ये भिन्नदृष्ट्यापीशानं पूजयन्तो न मे प्रियाः॥१६२॥
द्विषन्ति ये जगत्सूतिं मोहिता रौरवादिषु।
पच्यमाना न मुच्यन्ते कल्पकोटिशतैरपि॥१६३॥
तस्मादशेषभूतानां रक्षको विष्णुरव्ययः।
यथावदिह विज्ञाय ध्येयः सर्वापदि प्रभुः॥१६४॥
इन्हीं देवीके साथ अद्वितीय, निष्कल तथा परमस्वरूप मैं इस सम्पूर्ण (विश्व)-का साक्षात्कार करता हूँ। जो इस (तत्त्व)-को जानता है, वह मुक्त हो जाता है। इसलिये अनादि, अद्वैत विष्णु और आत्मस्वरूप ईश्वर (शंकर)-को एक ही समझो। इससे तुम लोगोंको शान्ति प्राप्त होगी। जो श्रद्धासम्पन्न व्यक्ति अव्यक्त एवं आत्मरूप विष्णुको भिन्न मानकर शिवकी पूजा करते हैं, वे मुझे प्रिय नहीं हैं। जो लोग जगत्को उत्पन्न करनेवाले (विष्णु) से द्वेष रखते हैं (वे सभी) मोहित व्यक्ति रौरव आदि नरकोंमें पड़े रहते हैं और सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी मुक्त नहीं होते। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक अव्यय विष्णुको भलीभाँति समझकर समस्त आपत्तियों में उन प्रभुका ध्यान करना चाहिये॥१६०-१६४॥
श्रुत्वा भगवतो वाक्यं देव्यः सर्वगणेश्वराः।
नेमुर्नारायणं देवं देवीं च हिमशैलजाम्॥१६५॥
प्रार्थयामासुरीशाने भक्तिं भक्तजनप्रिये।
भवानीपादयुगले नारायणपदाम्बुजे॥१६६ ॥
ततो नारायणं देवं गणेशा मातरोऽपि च।
न पश्यन्ति जगत्सूतिं तदद्भुतमिवाभवत्॥१६७॥
सभी देवियों और गणेश्वरों ने भगवान्के वाक्य को सुनकर नारायण देव तथा हिमालयकी पुत्री देवी (पार्वती)को प्रणाम किया और भक्तजनोंके प्रिय ईशान भगवान् शंकर तथा भवानीके चरणयुगल एवं नारायणके चरण कमलों में भक्तिकी प्रार्थना की। तदनन्तर गणेश्वरों और मातृदेवियों ने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नारायण देवको नहीं देखा यह एक आश्चर्य-जैसा ही हुआ॥ १६५-१६७ ॥
तदन्तरे महादैत्यो ह्यन्धको मन्मथार्दितः।
मोहितो गिरिजां देवीमाहर्तुं गिरिमाययौ॥१६८॥
इसी बीच कामदेवके द्वारा पीड़ित महादैत्य अन्धक मोहित होता हुआ देवी गिरिजाको हरण करनेके लिये पर्वतपर आया ॥१६८॥
अथानन्तवपुः श्रीमान् योगी नारायणोऽमलः।
तत्रैवाविरभूद् दैत्यैर्युद्धाय पुरुषोत्तमः ॥१६९॥
कृत्वाथ पार्वे भगवन्तमीशो युद्धाय विष्णुं गणदेवमुख्यैः।
शिलादपुत्रेण च मातृकाभिः स कालरुद्रोऽभिजगाम देवः॥१७०॥
त्रिशूलमादाय कृशानुकल्पं
स देवदेवः प्रययौ पुरस्तात्।
तमन्वयुस्ते गणराजवर्या
जगाम देवोऽपि सहस्रबाहुः॥१७१॥
रराज मध्ये भगवान् सुराणां
विवाहनो वारिदवर्णवर्णः।
तदा सुमेरोः शिखराधिरूढ-
स्त्रिलोकदृष्टिभंगवानिवार्कः ॥१७२॥
इसके बाद विराटशरीरधारी, श्रीमान्, योगी, निर्मल नारायण पुरुषोत्तम दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये वहीं प्रकट हो गये। तदनन्तर वे कालरुद्रदेव भगवान् विष्णु को अपने पार्श्वमें करके तथा मुख्य गणदेवों, शिलादपुत्र नन्दी और मातृकाओंको साथ लेकर युद्धके लिये स्वयं गये। अग्निके समान त्रिशूलको लेकर वे देवदेव (शंकर) आगे-आगे चले। उन श्रेष्ठ गणराजों तथा हजार बाहुवाले देव (विष्णु)-ने भी उनका अनुगमन किया। देवताओंके बीचमें उस समय मेघके समान वर्णवाले गरुडवाहन भगवान् विष्णु उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जिस प्रकार सुमेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ तीनों लोकोंके नेत्र-स्वरूप भगवान् सूर्य सुशोभित होते हैं॥१६९-१७२॥
जगत्यनादिर्भगवानमेयो
सहस्त्राकृतिराविरासीत्।
त्रिशूलपाणिगंगने सुघोषः
देवोपरि पुष्पवृष्टिः॥१७३॥
समागतं वीक्ष्य गणेशराज
समावृतं देवरिपुर्गणेशैः।
युयोध शक्रेण समातृकाभि-
गणैरशेषैरमरप्रधानैः ॥१७४॥
विजित्य सर्वानपि बाहुवीर्यात्
स संयुगे शम्भुमनन्तधाम।
समाययौ यत्र स कालरुद्रो
विमानमारुह्य विहीनसत्त्वः॥१७५॥
दृष्ट्वान्धकं समायान्तं भगवान् गरुडध्वजः।
व्याजहार महादेवं भैरवं भूतिभूषणम्॥१७६ ॥
अनादि, अमेय त्रिशूलपाणि भगवान् हर हजारों स्वरूप धारणकर पृथ्वीपर प्रकट हुए। (उस समय) आकाशमें सुन्दर शब्द होने लगा तथा उन देव के ऊपर (आकाशसे) पुष्पवृष्टि होने लगी। गणेश्वरोंके राजा शिवको गणेश्वरोंद्वारा घिरे हुए आते देखकर देवशत्रु अन्धक, इन्द्र तथा मातृकाओं, गणों और सभी प्रधान-प्रधान देवताओंके साथ युद्ध करने लगा। अपने बाहुबल से युद्धमें सभीको जीतकर वह सत्त्वविहीन (अन्धक) अनन्त तेजस्वी शम्भुके समीप गया, जहाँ वे कालरुद्र विमानपर बैठे हुए थे। अन्धकको आते हुए देखकर भगवान् गरुडध्वजने विभूतिसे सुशोभित भैरव महादेव से कहा-॥१७३-१७६॥
हन्तुमर्हसि दैत्येशमन्धकं लोककण्टकम्।
त्वामृते भगवान् शक्तो हन्ता नान्योऽस्य विद्यते॥१७७॥
पपात
त्वं हर्ता सर्वलोकानां कालात्मा ह्येश्वरी तनुः।
स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्वेदविद्भिर्विचक्षणैः॥१७८॥
(भगवन्!) आप संसारके कण्टकरूप दैत्यपति अन्धकको मारनेमें समर्थ हैं। आपको छोड़कर इसे मारनेमें और कोई दूसरा समर्थ नहीं है। आप सभी लोकों का संहार करनेवाले ईश्वरके कालमय शरीर हैं। वेदोंको जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा विविध मन्त्रों से आपकी स्तुति की जाती है ॥ १७७-१७८ ॥
स वासुदेवस्य वचो निशम्य भगवान् हरः।
निरीक्ष्य विष्णुंहनने दैत्येन्द्रस्य मतिं दधौ॥१७९॥
जगाम देवतानीकं गणानां हर्षमुत्तमम्।
स्तुवन्ति भैरवं देवमन्तरिक्षचरा जनाः॥१८०।।
वासुदेवका वचन सुनकर उन भगवान् हरने विष्णुकी ओर देखकर दैत्येन्द्र अन्धकको मारने का विचार किया, गणोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे देवताओंकी सेनामें गये। (तब) अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले लोग भैरवदेवकी (इस प्रकार) स्तुति करने लगे-॥१७९-१८०॥
जयानन्त महादेव कालमूर्ते सनातन।
त्वमग्निः सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यशः॥१८१॥
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वं धाता हरिरव्ययः।
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्॥१८२॥
ओङ्कारमूर्तिर्योगात्मा त्रयीनेत्रस्त्रिलोचनः।
महाविभूतिर्देवेशो जयाशेषजगत्पते॥१८३॥
अनन्त! महादेव! आप सनातन हैं, कालकी मूर्ति हैं, आपकी जय हो। आप अग्निरूप और सभी प्राणियोंके भीतर सदैव निवास करनेवाले हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही धाता अव्यय हरि हैं। आप ही ब्रह्मा, महादेव और आप ही तेजःस्वरूप परमपद हैं। (आप) प्रणवमूर्ति, योगात्मा, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले त्रिलोचन हैं। आप महाविभूतिस्वरूप, देवताओंके स्वामी हैं। हे सम्पूर्ण संसारके स्वामी! आपकी जय हो॥१८१-१८३॥
ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ गृहीत्वान्धकमीश्वरः।
त्रिशूलाग्रेषु विन्यस्य प्रननर्त सतां गतिः॥१८४॥
दृष्ट्वान्धकं देवगणाः शूलपोतं पितामहः ।
प्रणेमुरीश्वरं देवं भैरवं भवमोचकम्॥१८५॥
तदनन्तर सज्जनोंके आश्रयस्थान एवं प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर वे ईश्वर अन्धक दैत्य को पकड़कर अपने त्रिशूलके अग्रभागमें रखकर नाचने लगे। त्रिशूलपर पिरोये हुए अन्धक को देखकर पितामह ब्रह्मा तथा देवगण, संसारसागरसे मुक्त करनेवाले भैरवदेवको प्रणाम करने लगे॥१८४-१८५ ॥
अस्तुवन् मुनयः सिद्धा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।
अन्तरिक्षेऽप्सरःसङ्घा नृत्यन्ति स्म मनोरमाः॥१८६॥
संस्थापितोऽथ शूलाग्रे सोऽन्धको दग्धकिल्बिषः।
उत्पन्नाखिलविज्ञानस्तुष्टाव परमेश्वरम्॥१८७॥
मुनि तथा सिद्धजन स्तुति करने लगे और गन्धर्व, किन्नर गान करने लगे तथा अन्तरिक्षमें रमणीय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। तदनन्तर त्रिशूल के अग्रभागमें स्थापित उस अन्धकके सभी पाप दग्ध (नष्ट) हो गये, उसे सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया और वह परमेश्वरकी स्तुति करने लगा- ॥ १८६-१८७ ॥
अन्धक उवाच
नमामि मूर्जा भगवन्तमेकं
समाहिता यं विदुरीशतत्त्वम्।
पुरातनं पुण्यमनन्तरूपं
कालं कविं योगवियोगहेतुम्॥१८८॥
दंष्ट्राकरालं दिवि नृत्यमानं
हुताशवक्त्रं ज्वलनार्करूपम्।
सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं
भवन्तमेकं प्रणमामि रुद्रम्॥१८९॥
अन्धक ने (स्तुति करते हुए) कहा-समाधि में स्थित रहनेवाले लोग जिस पुरातन, पुण्यदायी, अनन्त-स्वरूप, कालरूप, कवि तथा संयोग एवं वियोग के कारणरूप ईश्वर-तत्त्वको जानते हैं, मैं उन अद्वितीय भगवान्को सिर से प्रणाम करता हूँ। भयंकर दाढ़ोंवाले, आकाशमें नृत्य करते हुए, अग्निके समान मुखवाले, प्रज्वलित सूर्यके समान स्वरूपवाले, हजारों पैर, आँख तथा सिरोंसे युक्त आप अद्वितीय रुद्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १८८-१८९॥
जयादिदेवामरपूजिताने
विभागहीनामलतत्त्वरूप
त्वमग्निरेको बहुधाभिपूज्यसे
वाय्वादिभेदैरखिलात्मरूप
॥१९०॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
त्वं पश्यसीदं परिपास्यजस्त्रं
त्वमन्तको योगिगणाभिजुष्टः॥१९१॥
एकोऽन्तरात्मा बहुधा निविष्टो
देहेषु देहादिविशेषहीनः।
त्वमात्मशब्दं परमात्मतत्त्वं
भवन्तमाहुः शिवमेव केचित्॥१९२॥
हे आदिदेव! देवताओंके द्वारा आपके चरणों की पूजा की जाती है, आप विभागरहित, शुद्ध तत्त्वस्वरूप हैं, आपकी जय हो। अद्वितीय अग्निरूप आप वायु आदि भेदोंसे बहुत प्रकारसे पूजित होते हैं और अखिल आत्मरूप हैं। सूर्यके समान वर्णवाले पुराणपुरुष! एकमात्र आपको ही तम (मायारूप अन्धकार)-से परे कहा जाता है। आप इस (संसार)-के साक्षी हैं, निरन्तर इसका पालन करते हैं और आप ही संहार करनेवाले हैं। आप योगियोंके समूहोंद्वारा सेवित होते रहते हैं। अद्वितीय, अन्तरात्मारूप आप देह आदि विशेष पदार्थों से रहित होते हुए (विभिन्न) देहोंमें अनेक प्रकारसे स्थित रहते हैं। आप आत्मशब्द ('आत्मा' शब्दसे बोध्य) और परमात्मतत्त्व हैं। कुछ लोग आपको ही शिव कहते हैं॥ १९०-१९२ ॥
त्वमक्षरं ब्रह्म परं पवित्र-
मानन्दरूपं प्रणवाभिधानम्।
त्वमीश्वरो वेदपदेषु सिद्धः
स्वयं प्रभोऽशेषविशेषहीनः॥१९३॥
त्वमिन्द्ररूपो वरुणाग्निरूपो
हंसः प्राणो मृत्युरन्तोऽसि यज्ञः।
प्रजापतिर्भगवानेकरुद्रो
नीलग्रीवः स्तूयसे वेदविद्भिः॥१९४॥
नारायणस्त्वं जगतामथादिः
पितामहस्त्वं प्रपितामहश्च।
वेदान्तगुह्योपनिषत्सु गीतः
सदाशिवस्त्वं
परमेश्वरोऽसि॥१९५॥
हे प्रभो! स्वयं आप आनन्दस्वरूप, परम पवित्र, ओंकार शब्दसे वाच्य, अविनाशी, पर ब्रह्म हैं। आप स्वयं वेदवाक्योंमें 'ईश्वर'-शब्दसे सिद्ध हैं और समस्त विशेष पदार्थोंसे शून्य हैं। आप इन्द्र, वरुण, अग्नि, हंस, प्राण, मृत्यु, अन्त एवं यज्ञ हैं । वेदको जाननेवालों के द्वारा आपके नीलकण्ठ, एकरुद्र, प्रजापति और भगवत्स्वरूपकी स्तुति की जाती है। संसारके आदि और नारायण हैं, आप ही पितामह और प्रपितामह हैं। वेदान्तशास्त्र तथा गुह्य उपनिषदों में आप ही सदाशिव और परमेश्वर इस नामसे वर्णित हैं॥१९३-१९५॥
नमः परस्तात् तमसः परस्मै
परात्मने पञ्चपदान्तराय।
त्रिशक्त्यतीताय निरञ्जनाय
सहस्त्रशक्त्यासनसंस्थिताय ॥१९६॥
तमोगुणसे परे, परम परमात्मा, पञ्चपदान्तरस्वरूप, ब्राह्मी, वैष्णवी एवं शाक्त-तीनों शक्तियोंसे अतीत, निरञ्जन और सहस्रशक्तिरूप आसनपर विराजमान रहनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है॥ १९६ ॥
त्रिमूर्तयेऽनन्तपदात्ममूर्ते
जगन्निवासाय जगन्मयाया
नमो ललाटार्पितलोचनाय
नमो जनानां हृदि संस्थिताय॥१९७॥
फणीन्द्रहाराय नमोऽस्तु तुभ्यं
मुनीन्द्रसिद्धार्चितपादयुग्म
ब्रह्मा-विष्णु एवं शिव-इन त्रिमूर्तिरूप, अनन्त पदात्मक, आत्ममूर्ति, जगन्निवास और जगन्मयको नमस्कार है। ललाटमें नेत्र धारण करनेवाले तथा लोगोंके हृदयमें स्थित आपको नमस्कार है। मुनीन्द्रों तथा सिद्धोंद्वारा जिनके चरणकमलोंकी पूजा की जाती है, ऐसे नागराजों की माला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ १९७ ॥
नमः
ऐश्वर्यधर्मासनसंस्थिताय
परान्ताय भवोद्भवाय॥१९८॥
सहस्त्रचन्द्रार्कविलोचनाय
नमोऽस्तु ते सोम सुमध्यमाय
नमोऽस्तु ते देव हिरण्यबाहो
नमोऽम्बिकायाः पतये मृडाय॥१९९॥
नमोऽतिगुह्याय गुहान्तराय
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताय
त्रिकालहीनामलधामधाम्ने
नमो महेशाय नमः शिवाय॥२००॥
ऐश्वर्यमय धर्मके आसनपर विराजमान रहनेवाले, परमोत्कृष्ट एवं संसार को उत्पन्न करनेवाले आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रमा और सूर्यों के समान नेत्रवाले तथा सुन्दर मध्यभागवाले सोमस्वरूप आपको नमस्कार है। हिरण्यबाहो! देव! आपको नमस्कार है। अम्बिकाके पति मृड! आपको नमस्कार है। अत्यन्त गुह्य, गुहान्तर, वेदान्तरूपी विज्ञानके द्वारा निश्चित किये गये तीनों कालों के प्रभाव से रहित, शुद्ध तेजोमय स्थानवाले महेशको नमस्कार है, शिवको नमस्कार है॥ १९८-२००॥
एवं स्तुवन्तं भगवान् शूलाग्रादवरोप्य तम्।
तुष्टः प्रोवाच हस्ताभ्यां स्पृष्ट्वाथ परमेश्वरः॥२०१॥
प्रीतोऽहं सर्वथा दैत्य स्तवेनानेन साम्प्रतम्।
सम्प्राप्य गाणपत्यं मे संनिधाने वसामरः॥२०२॥
अरोगश्छिन्नसंदेहो देवैरपि सुपूजितः।
नन्दीश्वरस्यानुचरः सर्वदुःखविवर्जितः॥२०३॥
इस प्रकार स्तुति कर रहे उस (अन्धक)-को प्रसन्न होकर भगवान् परमेश्वर ने त्रिशूल के अग्रभाग से उतारा और हाथोंसे स्पर्श करते हुए कहा-दैत्य! इस समय तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम गणपति-पद प्राप्तकर अमर होकर मेरे समीपमें निवास करो। तुम रोगोंसे रहित, संदेहशून्य, सभी दु:खोंसे रहित और नन्दीश्वर के अनुचर होकर देवताओंके द्वारा भलीभाँति पूजित होओगे॥ २०१-२०३॥
एवं व्याहृतमात्रे तु देवदेवेन देवताः।
गणेश्वरा महादेवमन्धकं देवसंनिधौ॥२०४॥
सहस्रसूर्यसंकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रचिह्नितम्।
नीलकण्ठं जटामौलिं शूलासक्तमहाकरम्॥२०५॥
दृष्ट्वा तं तुष्टुवुर्दैत्यमाश्चर्यं परमं गताः।
उवाच भगवान् विष्णुर्देवदेवं स्मयन्निव॥२०६॥
देवताओंके भी देव (शंकर)-के इतना कहते ही हजारों सूर्यके समान प्रकाशमान, त्रिनेत्रधारी, चन्द्रमा के चिह्नसे सुशोभित, नीलकण्ठ, जटा-मुकुटधारी, विशाल भुजामें त्रिशूल धारण किये तथा महादेवरूप में विद्यमान उस अन्धक दैत्यको देव शंकरके समीप में स्थित देखकर देवता तथा गणेश्वर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये और उसकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने हँसते हुए देवाधिदेव शिव से कहा-॥२०४-२०६॥
स्थाने तव महादेव प्रभावः पुरुषो महान्।
नेक्षतेऽज्ञानजान् दोषान् गृह्णातिच गुणानपि॥२०७॥
इतीरितोऽथ भैरवो गणेशदेवपुङ्गवैः।
सकेशवः सहान्धको जगाम शंकरान्तिकम्॥२०८॥
निरीक्ष्य देवमागतं स शंकरः सहान्धकम्।
समाधवं समातृकं जगाम निर्वृतिं हरः॥२०९॥
प्रगृह्य पाणिनेश्वरो हिरण्यलोचनात्मजम्।
जगाम यत्र शैलजा विमानमीशवल्लभा॥२१०॥
महादेव! आपने उचित ही प्रभाव दिखलाया। महान् पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न दोषोंको नहीं देखते और गुणों को ही ग्रहण करते हैं। इतना कहे जानेके बाद गणेश्वरों, श्रेष्ठ देवों, केशव तथा अन्धकके साथ भैरव शंकर के पास गये। अन्धक, विष्णु तथा मातृकाओंके साथ देव (भैरव)-को आया देखकर उन कल्याणकारी हरको परम शान्ति प्राप्त हुई। हिरण्याक्षके पुत्र (अन्धक)-का हाथ पकड़कर ईश्वर (शंकर) वहाँ गये, जहाँ शंकरप्रिया पार्वती विमानपर बैठी हुई थीं॥ २०७-२१०॥
विलोक्य सा समागतं भवं भवार्तिहारिणम्।
अवाप सान्धकं सुखं प्रसादमन्धकं प्रति॥२११॥
अथान्धको महेश्वरीं ददर्श देवपार्श्वगाम्।
पपात दण्डवत् क्षितौ ननाम पादपद्मयोः॥२१२॥
संसारके दु:खोंका हरण करनेवाले भव (शंकर)- को अन्धकके साथ आया देखकर उन्हें सुख प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अन्धकपर कृपा की। अन्धक शंकर के पार्श्वभागमें स्थित महेश्वरीको देखा। वह पृथ्वीपर दण्डके समान गिर गया और देवीके चरणकमलों में प्रणाम किया॥२११-२१२॥
नमामि देववल्लभामनादिमद्रिजामिमाम्।
यतः प्रधानपूरुषौ निहन्ति याखिलं जगत्॥२१३॥
विभाति या शिवासने शिवेन साकमव्यया।
हिरण्मयेऽतिनिर्मले नमामि तामिमामजाम्॥२१४॥
यदन्तराखिलं जगजगन्ति यान्ति संक्षयम्।
नमामि यत्र तामुमामशेषभेदवर्जिताम्॥२१५॥
न जायते न हीयते न वर्धते च तामुमाम्।
नमामि या गुणातिगा गिरीशपुत्रिकामिमाम्॥२१६॥
क्षमस्व देवि शैलजे कृतं मया विमोहतः।
सुरासुरैयदर्चितं नमामि ते पदाम्बुजम्॥ २१७॥
जिनसे प्रधान (प्रकृति) और पुरुष उत्पन्न हुए हैं और जो सम्पूर्ण विश्वका संहार करनेवाली हैं, उन अनादि शंकरप्रिया अद्रितनया (पर्वतपुत्री)-को मैं प्रणाम करता हूँ। जो अति निर्मल, हिरण्मय, मंगलकारी आसनपर भगवान् शिवके साथ सुशोभित होती हैं, उन अव्यय और अजन्माको मैं नमस्कार करता हूँ। सभी भेदोंसे रहित उन उमाको मैं प्रणाम करता हूँ, जिनके भीतर सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है और विनाशको प्राप्त होता रहता है। जो न उत्पन्न होती हैं, न विनाशको प्राप्त होती हैं और न बढ़ती ही हैं, उन गुणातीत हिमालय की पुत्री उमाको मैं नमस्कार करता हूँ। देवि! शैलपुत्रि! मैंने मोहित होकर जो किया उसके लिये आप मुझे क्षमा करें। देवताओं तथा असुरोंसे पूजित आपके चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूँ॥ २१३-२१७॥
इत्थं भगवती गौरी भक्तिनप्रेण पार्वती।
संस्तुता दैत्यपतिना पुत्रत्वे जगृहेऽन्धकम्॥२१८॥
भक्तिसे विनम्र हुए दैत्यपतिके इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवती गौरी पार्वतीने उस अन्धक को पुत्र रूप में स्वीकार किया ॥ २१८॥
ततः स मातृभिः सार्धं भैरवो रुद्रसम्भवः।
जगामानुज्ञया शम्भोः पातालं परमेश्वरः॥२१९॥
यत्र सा तामसी विष्णोर्मूर्तिः संहारकारिका।
समास्ते हरिरव्यक्तो नृसिंहाकृतिरीश्वरः॥ २२०॥
ततोऽनन्ताकृतिः शम्भुः शेषेणापि सुपूजितः।
कालाग्निरुद्रो भगवान् युयोजात्मानमात्मनि॥२२१॥
युञ्जतस्तस्य देवस्य सर्वा एवाथ मातरः।
बुभुक्षिता महादेवं प्रणम्याहुस्त्रिशूलिनम्॥२२२॥
तदनन्तर रुद्रसे उत्पन्न परमेश्वर भैरव शम्भु की आज्ञासे मातृकाओंके साथ पाताल गये। जहाँ विष्णु की संहारकारिणी तामसी मूर्तिके रूपमें नृसिंहाकृति ईश्वर अव्यक्त हरि स्थित हैं। तदनन्तर शेषसे भी पूजित कालाग्नि रुद्र अनन्ताकृति भगवान् शम्भुने स्वयं को परमात्मतत्त्वसे संयुक्त कर दिया। उन देवके (परमात्मा से) संयोग करते समय सभी बुभुक्षित मातृकाओंने त्रिशूलधारी महादेवको प्रणामकर कहा- ॥ २१९-२२२॥
मातर ऊचुः
बुभुक्षिता महादेव अनुज्ञा दीयतां त्वया।
त्रैलोक्यं भक्षयिष्यामो नान्यथा तृप्तिरस्ति नः॥२२३॥
एतावदुक्त्वा वचनं मातरो विष्णुसम्भवाः ।
भक्षयाञ्चक्रिरे सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्॥२२४॥
मातृकाओं ने कहा-महादेव! हम भूखी हैं। आप आज्ञा दें, हम तीनों लोकोंका भक्षण करेंगी, हमारी और किसी प्रकारसे तृप्ति नहीं होगी। इतनी बात कहकर
विष्णुसे उत्पन्न वे मातृकाएँ चराचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीका भक्षण करने लगीं ॥ २२३-२२४
ततः स भैरवो देवो नृसिंहवपुषं हरिम्।
दथ्यो नारायणं देवं क्षणात् प्रादुरभूद्धरिः॥२२५॥
तब उन भैरवदेवने नृसिंह-शरीरधारी नारायण-देव हरिका ध्यान किया। हरि क्षणभरमें ही प्रकट हो गये ।। २२५॥
विज्ञापयामास च तं भक्षयन्तीह मातरः।
निवारयाशु त्रैलोक्यं त्वदीया भगवन्निति ॥ २२६॥
(भैरवदेवने) उन्हें बतलाते हुए कहा-भगवन्! आपकी ये मातृकाएँ त्रिलोकीका भक्षण कर रही हैं, इन्हें आप शीघ्र ही रोकें ॥ २२६॥
संस्मृता विष्णुना देव्यो नृसिंहवपुषा पुनः।
उपतस्थुर्महादेवं नरसिंहाकृतिं च तम्॥२२७॥
सम्प्राप्य संनिधिं विष्णोः सर्वाः संहारकारिकाः।
प्रददुः शम्भवे शक्तिं भैरवायातितेजसे॥२२८॥
नरसिंह-शरीरधारी विष्णुके द्वारा पुनः उन देवियों का स्मरण किये जानेपर वे उन नरसिंहरूपवाले महादेव के पास आ पहुँचीं। संहार करनेवाली उन सभी शक्तियों ने विष्णुके समीप आकर भैरवरूपधारी अति तेजस्वी शम्भुको शक्ति प्रदान कर दी॥ २२७-२२८॥
अपश्यंस्ता जगत्सूतिं नृसिंहमथ भैरवम्।
क्षणादेकत्वमापन्नं शेषाहिं चापि मातरः॥२२९॥
व्याजहार हृषीकेशो ये भक्ताः शूलपाणिनः ।
ये च मां संस्मरन्तीह पालनीयाः प्रयत्नतः॥२३०॥
ममैव मूर्तिरतुला सर्वसंहारकारिका।
महेश्वरांशसम्भूता भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वियम्॥२३१॥
उन मातृकाओंने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नृसिंह, भैरव तथा शेषनागको क्षणभरमें ही एक होते हुए देखा। हृषीकेशने कहा-शूलपाणि भगवान् शंकर के जो भक्त हैं और जो मेरा स्मरण करते हैं, प्रयत्न-पूर्वक उनका यहाँ पालन करना चाहिये। महेश्वर के अंश से उत्पन्न, सबका संहार करनेवाली यह मेरी ही अतुलनीय मूर्ति है। यह भुक्ति और मुक्ति को प्रदान करनेवाली है ॥२२९-२३१॥
अनन्तो भगवान् कालो द्विधावस्था ममैव तु।
तामसी राजसी मूर्तिर्देवदेवश्चतुर्मुखः ॥ २३२॥
सोऽयं देवो दुराधर्षः कालो लोकप्रकालनः।
भक्षयिष्यति कल्पान्ते रुद्रात्मा निखिलं जगत्॥२३३॥
या सा विमोहिका मूर्तिर्मम नारायणाह्वया।
सत्त्वोद्रिक्ता जगत् कृत्स्नं संस्थापयति नित्यदा ॥ २३४॥
स हि विष्णुः परं ब्रह्म परमात्मा परा गतिः।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सदानन्देति कथ्यते॥२३५॥
इत्येवं बोधिता देव्यो विष्णुना विश्वमातरः।
प्रपेदिरे महादेवं तमेव शरणं हरिम्॥२३६॥
भगवान् अनन्त और काल मेरी ही दो प्रकार की तामसी अवस्थाएँ हैं। देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्मा मेरी राजसी मूर्ति हैं। वे ही ये संसारका संहार करनेवाले दुर्धर्ष कालदेव हैं। कल्पका अन्त होनेपर ये रुद्रात्मा सम्पूर्ण विश्वका भक्षण करेंगे। सबको मोहित करनेवाली सत्त्वगुणसम्पन्ना मेरी 'नारायण' इस नामवाली जो मूर्ति है, वह नित्य समस्त संसारकी स्थापना करती है। (मेरी) उस (मूर्ति)-को विष्णु, परम ब्रह्म, परमात्मा, परमगति, मूलप्रकृति, अव्यक्त और सदानन्द-इस प्रकारसे कहा जाता है। विष्णुके द्वारा इस प्रकार समझानेपर देवीरूप उन सभी मातृकाओंने उन्हीं महादेव हरिकी शरण ग्रहण की॥ २३२-२३६॥
एतद् वः कथितं सर्वं मयान्धकनिबर्हणम्।
माहात्म्यं देवदेवस्य भैरवस्यामितौजसः॥२३७॥
मैंने आप लोगोंसे अन्धकके विनाश और अमित ओजस्वी देवाधिदेव भैरवके माहात्म्यका सम्पूर्ण वर्णन किया ॥ २३७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे घट्साहनयां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चदशोऽध्यायः॥१५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पंद्रहवां अध्याय समाप्त हुआ॥१५॥
Summary of chapter 15 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
When Daksha Prajāpati organized a monumental horse sacrifice at Kanakhala, he invited all Devas, Ṛshis, and Pitṛs, but deliberately excluded Mahādeva Śiva due to past enmity. Seeing Her divine husband dishonored, Satī arrived at the sacrificial arena, rebuked Her father for his delusion, and cast off Her physical body through internal yogic fire. Enraged by Satī's immolation, Mahādeva created the mighty multi-armed Vīrabhadra and Mahākālī from His matted locks. Vīrabhadra stormed the sacrifice with millions of fierce Gaṇas, decapitated Daksha, shattered the sacrificial altars, routed the fleeing Devas, and subdued the sacrificial fire. Upon Brahmā's humble prayers, Mahādeva restored the sacrifice, revived Daksha with a goat's head, and enlightened him; Daksha offered profound prayers to Mahādeva, recognizing Him as the ultimate Cause of all causes, and achieved divine grace.