उत्तरार्थ - 1 अध्याय

ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम

(ईश्वरगीता प्रारम्भ)

ऋषय ऊचुः।

भवता कथितः सम्यक् सर्गः स्वायम्भुवस्ततः।

ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तारो मन्वन्तरविनिश्चयः॥ १॥

तत्रेश्वरेश्वरो देवो वर्णिभिर्धर्मतत्परैः।

ज्ञानयोगरतैर्नित्यमाराध्यः कथितस्त्वया॥ २ ॥

तद्वदाशेषसंसारदुःखनाशमनुत्तमम्

ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं येन पश्येम तत्परम् ॥ ३॥

त्वं हि नारायणात् साक्षात् कृष्णद्वैपायनात् प्रभो।

अवाप्ताखिलविज्ञानस्तत्त्वां पृच्छामहे पुनः॥ ४ ॥

ऋषियोंने कहा-(सूतजी!) आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि तदुपरान्त इस ब्रह्माण्डका विस्तार और (अन्य विभिन्न) मन्वन्तरोंके विषयमें भलीभाँति बतलाया तथा उन (मन्वन्तरों)-में धर्मपरायण ज्ञानयोगी वर्णधर्मके अनुयायियोंके नित्य आराध्य ईश्वरोंके ईश्वर देवका भी वर्णन आपने किया। इसीके साथ ही आपने सम्पूर्ण संसारके दु:खोंको नष्ट करनेवाले एकमात्र ब्रह्मविषयक उस उत्तम ज्ञानका भी वर्णन किया, जिसके द्वारा हम उस

परम तत्त्वको देख सकते हैं। प्रभो! आपने साक्षात् नारायण कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है, इसलिये हम आपसे पुनः पूछते हैं॥१-४॥

श्रुत्वा मुनीनां तद् वाक्यं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।

सूतः पौराणिकः स्मृत्वा भाषितुं छुपचक्रमे ॥ ५ ॥

अथास्मिन्नन्तरे व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।

आजगाम मुनिश्रेष्ठा यत्र सत्रं समासते॥ ६ ॥

तं दृष्ट्वा वेदविद्वांसं कालमेघसमद्युतिम्।

व्यासं कमलपत्राक्षं प्रणेमुर्द्विजपुंगवाः॥ ७ ॥

मुनियोंके उस वाक्यको सुनकर पौराणिक सूतजीने प्रभु कृष्ण-द्वैपायनका स्मरणकर कहना प्रारम्भ किया। इसी बीच कृष्ण-द्वैपायन व्यास स्वयं वहाँ पहुँच गये जहाँ श्रेष्ठ मुनिजन यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण मेघके समान द्युतिवाले तथा कमलपत्रके समान नेत्रवाले उन वेदके विद्वान् व्यासजीको देखकर श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें प्रणाम किया॥५-७॥

पपात दण्डवद् भूमौ दृष्ट्वासौ रोमहर्षणः।

प्रदक्षिणीकृत्य गुरुं प्राञ्जलिः पार्श्वगोऽभवत्॥ ८ ॥

पृष्टास्तेऽनामयं विप्राः शौनकाद्या महामुनिम्।

समाश्वास्यासनं तस्मै तद्योग्यं समकल्पयन्॥ ९॥

रोमहर्षण सूतजीने भी उन्हें देखकर भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और गुरुकी प्रदक्षिणाकर हाथ जोड़ते हुए उनके पार्श्वभागमें खड़े हो गये। महामुनि (व्यास)-के द्वारा आरोग्यके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर उसका यथोचित उत्तर देकर शौनक आदि महामुनियों ने व्यासजीको आश्वस्त किया तथा उनके योग्य आसन उन्हें प्रदान किया॥८-९॥

अथैतानब्रवीद् वाक्यं पराशरसुतः प्रभुः।

कच्चिन्न तपसोहानिः स्वाध्यायस्य श्रुतस्य च॥१०॥

ततः स सूतः स्वगुरुं प्रणम्याह महामुनिम्।

ज्ञानं तद् ब्रह्मविषयं मुनीनां वक्तुमर्हसि ॥११॥

इमे हि मुनयः शान्तास्तापसा धर्मतत्पराः।

शुश्रूषा जायते चैषां वक्तुमर्हसि तत्त्वतः॥१२॥

ज्ञानं विमुक्तिदं दिव्यं यन्मे साक्षात् त्वयोदितम्।

मुनीनां व्याहृतं पूर्वं विष्णुना कूर्मरूपिणा॥१३॥

श्रुत्वा सूतस्य वचनं मुनिः सत्यवतीसुतः।

प्रणम्य शिरसा रुद्रं वचः प्राह सुखावहम्॥१४॥

तदनन्तर पराशरजीके पुत्र प्रभु (व्यास)-ने उनसे पूछा-क्या आप लोगोंके तप, स्वाध्याय तथा श्रवण किये गये वेदादिकी हानि तो नहीं हो रही है? तब उन सूतने अपने गुरु महामुनि (व्यास)-को प्रणामकर कहा-आप ब्रह्मविषयक ज्ञान मुनियोंको बतलायें। ये मुनि शान्त, तपस्वी तथा धर्मपरायण हैं। इन्हें सुननेको इच्छा है, आप (कृपया) यथार्थरूपसे ब्रह्मविषयक सर्वोच्च ज्ञानका उपदेश करें। मोक्ष प्रदान करनेवाले जिस दिव्य ज्ञानको आपने मुझे तथा पूर्वकालमें कूर्मरूप धारणकर विष्णुने मुनियोंको बतलाया था (इस समय आप उसी ज्ञानका उपदेश दें)। सूतके वचन सुनकर सत्यवतीके पुत्र मुनि (व्यास)-ने रुद्रको मस्तकद्वारा प्रणामकर सुखदायक वचन कहा-॥१०-१४॥

व्यास उवाच

वक्ष्ये देवो महादेवः पृष्टो योगीश्वरैः पुरा।

सनत्कुमारप्रमुखैः स्वयं यत् समभाषत ॥१५॥

सनत्कुमारः सनकस्तथैव च सनन्दनः।

अङ्गिरा रुद्रसहितो भृगुः परमधर्मवित्॥१६॥

कणादः कपिलो योगी वामदेवो महामुनिः ।

शुक्रो वसिष्ठो भगवान् सर्वे संयतमानसाः॥१७॥

परस्परं विचार्यैते संशयाविष्टचेतसः।

तप्तवन्तस्तपो घोरं पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥१८॥

अपश्यंस्ते महायोगमृषिं धर्मसुतं शुचिम्।

नारायणमनाद्यन्तं नरेण सहितं तदा ॥१९॥

संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः सर्वे वेदसमुद्भवैः ।

प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनो योगवित्तमम्॥२०॥

विज्ञाय वाञ्छितं तेषां भगवानपि सर्ववित्।

प्राह गम्भीरया वाचा किमर्थं तप्यते तपः॥२१॥

व्यासजी बोले-प्राचीन कालमें सनत्कुमार आदि प्रमुख योगीश्वरोंद्वारा पूछनेपर स्वयं प्रभु महादेवने जो कहा था, उसीको मैं कहता हूँ। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, अंगिरा, रुद्रसहित परम धर्मज्ञ भृगु, कणाद, कपिल, योगी महामुनि वामदेव, शुक्र तथा भगवान् वसिष्ठ- -इन सभी संयमित चित्तवाले मुनियोंने संशयान्वित होनेपर परस्पर परामर्श करके पवित्र बदरिकाश्रममें घोर तप किया। तब उन लोगोंने आदि और अन्तसे रहित धर्मपुत्र महायोगी पवित्र नारायण नामक ऋषिका नरके साथ दर्शन किया। उन भक्तिसम्पन्न योगियोंने वेदोंमें वर्णित विविध स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके उन श्रेष्ठ योगीको प्रणाम किया सर्वज्ञ भगवान् (नारायण)- ने उनके अभीष्टको जानकर पुनः गम्भीर वाणीमें उनसे पूछा कि आपलोग किस प्रयोजनसे तपस्या कर रहे हैं? ॥ १५-२१॥

अब्रुवन् हृष्टमनसो विश्वात्मानं सनातनम्।

साक्षान्नारायणं देवमागतं सिद्धिसूचकम्॥ २२॥

प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने जिनका शुभ आगमन अभीष्ट-सिद्धिकी निश्चित सूचना देता है (ऐसे) उन विश्वात्मा, सनातन साक्षात् नारायणदेवसे कहा- ॥ २२॥

वयं संशयमापन्नाः सर्वे वै ब्रह्मवादिनः।

भवन्तमेकं शरणं प्रपन्नाः पुरुषोत्तमम्॥ २३॥

त्वं हि तद् वेत्थ परमं सर्वज्ञो भगवानृषिः ।

नारायणः स्वयं साक्षात् पुराणोऽव्यक्तपूरुषः ॥२४॥

नह्यन्यो विद्यते वेत्ता त्वामृते परमेश्वर।

शुश्रूषास्माकमखिलं संशयं छेत्तुमर्हसि ॥२५॥

किं कारणमिदं कृत्स्नं कोऽनुसंसरते सदा।

कश्चिदात्मा च का मुक्तिः संसारः किंनिमित्तकः॥२६॥

जयानन्त

कः संसारयतीशानः को वा सर्वं प्रपश्यति।

किं तत् परतरं ब्रह्म सर्वं नो वक्तुमर्हसि ॥२७॥

(भगवन्!) हम सभी ब्रह्मवादी संशयमें पड़ गये हैं। आप पुरुषोत्तम हैं, हम एकमात्र आपकी शरणमें आये हैं। आप उस परम तत्त्वको जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ, भगवान्, ऋषि तथा स्वयं साक्षात् नारायण अव्यक्त पुराणपुरुष हैं। परमेश्वर! आपको छोड़कर अन्य कोई दूसरा जाननेवाला नहीं है, हमें सुननेकी इच्छा है, आप सम्पूर्ण संशयको दूर करनेमें समर्थ हैं। इस सम्पूर्ण (कार्यरूप जगत्)-का कारण क्या है? कौन नित्य गतिशील रहता है? आत्मा कौन है? मुक्ति क्या है और संसार (-की रचना)-का क्या प्रयोजन है? इस संसारका चलानेवाला शासक कौन हैं? अथवा सबका द्रष्टा कौन है ? परात्पर ब्रह्म क्या है? यह सब आप हमें बतलायें ॥ २३-२७॥

एवमुक्ते तु मुनयः प्रापश्यन् पुरुषोत्तमम्।

विहाय तापसं रूपं संस्थितं स्वेन तेजसा॥२८॥

विभ्राजमानं विमलं प्रभामण्डलमण्डितम् ।

श्रीवत्सवक्षसं देवं तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥२९॥

शङ्खचक्रगदापाणिं शार्ङ्गहस्तं श्रियावृतम्।

न दृष्टस्तत्क्षणादेव नरस्तस्यैव तेजसा॥३०॥

ऐसा कहे जानेपर मुनियोंने तपस्वी-रूपका परित्याग किये हुए, अपने तेजद्वारा प्रतिष्ठित, प्रकाशमण्डलसे मण्डित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स धारण किये हुए, तप्त स्वर्णके समान आभावाले और हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा शाङ्ग नामका धनुष धारण किये हुए लक्ष्मीसहित विमल एवं धुतिमान् पुरुषोत्तम देवका दर्शन किया। उस समय उन्हींके तेजके कारण नर (ऋषि) नहीं दिखलायी पड़े॥ २८-३०॥

तदन्तरे महादेवः शशाङ्काङ्कितशेखरः।

प्रसादाभिमुखो रुद्रः प्रादुरासीन्महेश्वरः॥३१॥

निरीक्ष्य ते जगन्नाथं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्।

तुष्टुवुहृष्टमनसो भक्त्या तं परमेश्वरम् ॥ ३२ ।।

उसी समय चन्द्रमासे अंकित मस्तकवाले महादेव महेश्वर रुद्र प्रसन्नतापूर्वक प्रकट हुए। चन्द्रभूषण जगन्नाथ त्रिलोचनका दर्शनकर प्रसन्न मनवाले वे सभी (मुनि) भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे-॥३१-३२॥

जयेश्वर महादेव जय भूतपते शिव।

जयाशेषमुनीशान तपसाभिप्रपूजित॥३३॥

सहस्रमूर्ते विश्वात्मन् जगद्यन्त्रप्रवर्तक ।

जगजन्मत्राणसंहारकारण॥३४॥

सहस्रचरणेशान शम्भो योगीन्द्रवन्दित।

जयाम्बिकापते देव नमस्ते परमेश्वर ॥ ३५॥

ईश्वरकी जय हो। भूतपति महादेव शिवकी जय हो। सभी मुनियोंके स्वामी तथा तपस्याद्वारा भलीभाँति प्रपूजित होनेवाले आपकी जय हो। सहस्रमूर्ति! विश्वात्मन् ! संसाररूपी यन्त्रके प्रवर्तक और संसारके जन्म, रक्षा और संहारके कारण हे अनन्त ! आपकी जय हो। हजारों चरणवाले, ईशान, शम्भु, योगीन्द्रोंद्वारा वन्दित अम्बिकापति! आपकी जय हो। परमेश्वरदेव! आपको नमस्कार है।। ३३-३५ ॥

संस्तुतो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः।

समालिङ्ग्य हृषीकेशं प्राह गम्भीरया गिरा॥३६॥

किमर्थं पुण्डरीकाक्ष मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।

इमं समागता देशं किं वा कार्यं मयाच्युत॥३७॥

आकर्ण्य भगवद्वाक्यं देवदेवो जनार्दनः।

प्राह देवो महादेवं प्रसादाभिमुखं स्थितम्॥ ३८॥

इमे हि मुनयो देव तापसा: क्षीणकल्मषाः ।

अभ्यागता मां शरणं सम्यग् दर्शनकाक्षिणः ॥ ३९ ।।

यदि प्रसन्नो भगवान् मुनीनां भावितात्मनाम्।

संनिधौ मम तज्ज्ञानं दिव्यं वक्तुमिहार्हसि ॥४०॥

इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भक्तवत्सल भगवान् त्र्यम्बक ईशने हृषीकेशका आलिंगनकर गम्भीर वाणी में कहा-हे अच्युत! पुण्डरीकाक्ष! ये ब्रह्मवादी मुनीन्द्र किस कारणसे इस स्थानपर आये हैं अथवा मुझे क्या करना है ? भगवान्के वाक्यको सुनकर देवाधिदेव जनार्दनदेवने कृपा करनेके लिये उद्यत सामने स्थित महादेवसे कहा-देव! ये सभी मुनिगण तपस्वी और निष्पाप हैं, ये लोग भलीभाँति तत्त्वदर्शनकी इच्छासे मेरी शरणमें आये हैं। हे भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे समीप इन भावनामय मुनियोंको वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें। ३६-४० ॥

त्वं हि वेत्थ स्वमात्मानं न ह्यन्यो विद्यते शिव।

ततस्त्वमात्मनात्मानं मुनीन्द्रेभ्यः प्रदर्शय॥४१॥

एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रोवाच मुनिपुङ्गवान्।

प्रदर्शयन् योगसिद्धिं निरीक्ष्य वृषभध्वजम्॥४२॥

संदर्शनान्महेशस्य शंकरस्याथ शूलिनः।

कृतार्थं स्वयमात्मानं ज्ञातुमर्हथ तत्त्वतः ।। ४३॥

प्रष्टुमर्हथ विश्वेशं प्रत्यक्षं पुरतः स्थितम्।

ममैव संनिधावेष यथावद् वक्तुमीश्वरः॥४४॥

निशम्य विष्णुवचनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।

सनत्कुमारप्रमुखाः पृच्छन्ति स्म महेश्वरम्॥४५॥

शिव! केवल आप ही अपने-आपको जानते हैं दूसरा कोई आपको जाननेवाला नहीं है। अतः आप स्वयं इन मुनीन्द्रोंको अपना स्वरूप दिखलायें। ऐसा कहकर हृषीकेशने योगसिद्धियोंको दिखाते हुए वृषभध्वज की ओर देखकर श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा-(हे मुनिगणो!) त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर महेशके दर्शनसे आपलोग अपने-आपको कृतार्थ समझें। आपलोग यथार्थरूपसे ज्ञान प्राप्त करने योग्य हैं, सामने प्रत्यक्ष स्थित विश्वेशसे (उस तत्त्वज्ञानके विषयमें) पूछे। मेरी संनिधिमें ये यथार्थरूपसे वर्णन करने में समर्थ हैं। विष्णुका (यह) वचन सुनकर तथा वृषभध्वजको प्रणामकर सनत्कुमार आदि (ऋषियों)-ने महेश्वरसे पूछा- ॥ ४१-४५ ॥

अथास्मिन्नन्तरे दिव्यमासनं विमलं शिवम्।

किमप्यचिन्त्यं गगनादीश्वराहँ समुद्बभौ॥ ४६॥

तत्राससाद योगात्मा विष्णुना सह विश्वकृत्।

तेजसा पूरयन् विश्वं भाति देवो महेश्वरः॥४७॥

तं ते देवादिदेवेशं शंकरं ब्रह्मवादिनः।

विभ्राजमानं विमले तस्मिन् ददृशुरासने॥४८॥

यं प्रपश्यन्ति योगस्थाः स्वात्मन्यात्मानमीश्वरम्।

अनन्यतेजसं शान्तं शिवं ददृशिरे किल॥४९ ।।

यतः प्रसूतिर्भूतानां यत्रैतत् प्रविलीयते।

तमासनस्थं भूतानामीशं ददृशिरे किल॥५०॥

यदन्तरा सर्वमेतद् यतोऽभिन्नमिदं जगत्।

स वासुदेवमासीनं तमीशं ददृशुः किल ॥५१॥

इसी बीच आकाशसे ईश्वरके योग्य एक अचिन्त्य दिव्य निर्मल आसन प्रकट हुआ। विश्वकर्ता वे योगात्मा (महेश्वर) विष्णुसहित उस आसनपर बैठ गये। अपने तेजसे विश्वको पूरित करते हुए महेश्वर देव वहाँ सुशोभित हो रहे थे। उन ब्रह्मवादियोंने उन प्रकाशमान देवाधिदेव शंकरका उस निर्मल आसनपर सुशोभित होते हुए दर्शन किया। योगमें स्थित लोग अपनी आत्मामें जिन आत्मस्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन्हीं अनन्य तेजस्वी शान्तस्वरूप शिवको उन ब्रह्मवादियोंने देखा, जिनसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब विलीन हो जाता है, उन प्राणियोंके ईशको ब्रह्मवादियोंने आसनपर विराजमान देखा। जिनके भीतर यह सम्पूर्ण संसार है और यह जगत् जिनसे अभिन्न है, उन परमेश्वरको वासुदेवके साथ आसनपर विराजमान देखा ॥ ४६-५१॥

प्रोवाच पृष्टो भगवान् मुनीनां परमेश्वरः।

निरीक्ष्य पुण्डरीकाक्षं स्वात्मयोगमनुत्तमम्॥५२॥

तच्छृणुध्वं यथान्यायमुच्यमानं मयानघाः ।

प्रशान्तमानसाः सर्वे ज्ञानमीश्वरभाषितम्॥५३॥

मुनियोंके पूछनेपर परमेश्वर (महेश्वर) भगवान् पुण्डरीकाक्ष (विष्णु)-की ओर देखकर अपने श्रेष्ठ योगका वर्णन करने लगे। शान्त मनवाले अनघ मुनियो! आप सभी लोग सुनें-मैं ईश्वरद्वारा कहे गये ज्ञानका वर्णन यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥५२-५३॥